भारत में औद्योगिक सम्बन्धों में प्रसिद्ध ‘गिरि’ उपागम किसके उद्देश्य का समर्थन करता है ?
- (a)न्यायनिर्णयन
- (b)अनिवार्य सामूहिक सौदाकारी
- (c)समाधान
- (d)विवाचन
उत्तर
क्यों
सही उत्तर — B, (b) अनिवार्य सामूहिक सौदाकारी — औद्योगिक सम्बन्धों में ‘गिरि उपागम’ उस दृष्टिकोण का नाम है जो वी. वी. गिरि से जुड़ा है, और उसका केंद्रीय आग्रह यह था कि विवाद पक्षकार स्वयं आपसी बातचीत से सुलझाएँ, राज्य की अनिवार्य न्यायनिर्णयन-मशीनरी उन्हें सुलझाने वाली मुख्य संस्था न बने।
गिरि श्रमिक आंदोलन से आए हुए व्यक्ति थे और स्वतंत्र भारत के आरम्भिक वर्षों में श्रम मंत्री रहे; आगे चलकर वे भारत के राष्ट्रपति भी बने। श्रम मंत्री के रूप में उन्होंने बार-बार यह मत रखा कि नियोजक और श्रमिक संघ के बीच सामूहिक सौदाकारी ही औद्योगिक शांति का सामान्य मार्ग होना चाहिए, और जहाँ बात न बने वहाँ पक्षकारों की सहमति से विवाचन की ओर जाना चाहिए — न कि हर विवाद सरकार द्वारा अधिकरण को सौंप दिया जाए। इसी नीतिगत मतभेद के कारण उन्होंने मंत्री-पद से त्यागपत्र दिया था, और इसी प्रसंग से उनके नाम के साथ यह उपागम जुड़ गया।
इसके पीछे का तर्क भी समझने योग्य है। अनिवार्य न्यायनिर्णयन में दोनों पक्ष यह जानते हैं कि अंततः निर्णय बाहर से आएगा, इसलिए बातचीत में गंभीरता घट जाती है और संघों की सौदा करने की क्षमता विकसित नहीं हो पाती। इसके विपरीत सामूहिक सौदाकारी में समझौता उन्हीं का बनाया हुआ होता है जिन्हें उसे निभाना है, इसलिए वह अधिक टिकाऊ माना जाता है।
चारों विकल्पों में केवल (b) ही सामूहिक सौदाकारी का नाम लेता है। शेष तीन — न्यायनिर्णयन, समाधान और विवाचन — विवाद-निपटान की उस मशीनरी के अंग हैं जिसमें कोई तीसरा पक्ष बीच में आता है, और गिरि का आग्रह ठीक इसी पर निर्भरता घटाने का था। इसलिए उत्तर (b) है।
अन्य विकल्प क्यों गलत हैं
- (a)न्यायनिर्णयन — न्यायनिर्णयन वह मार्ग है जिसमें सरकार विवाद को श्रम न्यायालय या औद्योगिक अधिकरण को सौंप देती है और उसका अधिनिर्णय पक्षकारों पर बाध्यकारी होता है। यह भारत की औद्योगिक विवाद-निपटान व्यवस्था का प्रमुख अंग रहा है, पर यही वह व्यवस्था है जिस पर अत्यधिक निर्भरता के विरुद्ध गिरि का तर्क था। इसलिए इस विकल्प का चुनाव उपागम को ठीक उलट देता है। परीक्षा की दृष्टि से यह विकल्प इसलिए ख़तरनाक है कि न्यायनिर्णयन ही सबसे परिचित पद है और स्मृति सहज ही उधर चली जाती है।
- (c)समाधान — समाधान में समाधान अधिकारी या समाधान बोर्ड दोनों पक्षों को बैठाकर समझौते तक पहुँचने में सहायता करता है, पर वह कोई निर्णय थोप नहीं सकता — समझौता तभी होता है जब दोनों पक्ष सहमत हों। यह उपयोगी व्यवस्था है और औद्योगिक विवाद विधि की प्रक्रिया में समाधान का चरण प्रायः अनिवार्य होता है, पर इसे ‘गिरि उपागम’ का नाम नहीं दिया जाता। अंतर यह है कि समाधान में भी प्रक्रिया राज्य की मशीनरी चलाती है, जबकि गिरि का बल पक्षकारों की अपनी सौदाकारी पर था।
- (d)विवाचन — आयोग की कुंजी इस विकल्प को नहीं लेती, और यहाँ विषय को ठीक-ठीक समझ लेना उपयोगी है। स्वैच्छिक विवाचन — जिसमें दोनों पक्ष स्वयं सहमत होकर विवाद किसी विवाचक को सौंपते हैं — गिरि के दृष्टिकोण में सामूहिक सौदाकारी के पूरक के रूप में स्वीकार्य था, और भारतीय औद्योगिक विवाद विधि में इसके लिए अलग उपबंध भी है। पर उपागम का नाम जिस बात से जुड़ा है वह यह है कि पक्षकार स्वयं बातचीत से समझौता करें; विवाचन तब आता है जब वह बातचीत किसी बिंदु पर अटक जाए। इसके अलावा यहाँ छपा हुआ पद अकेला ‘विवाचन’ है, जो यह नहीं बताता कि वह स्वैच्छिक है या अनिवार्य — और यही भेद इस पूरे विषय की धुरी है।
अवधारणा
औद्योगिक विवादों के निपटान की व्यवस्थाओं को तीन वर्गों में बाँटा जा सकता है, और तीनों में तीसरे पक्ष की भूमिका अलग-अलग है।
पहला, सामूहिक सौदाकारी : नियोजक और मान्यता प्राप्त श्रमिक संघ आमने-सामने बैठकर वेतन, बोनस, कार्य-दशा आदि पर समझौता करते हैं। कोई तीसरा पक्ष नहीं होता; समझौते की शक्ति दोनों पक्षों की सापेक्ष सौदा-क्षमता से आती है।
दूसरा, समाधान और विवाचन : समाधान में तीसरा पक्ष सहायता करता है पर निर्णय नहीं देता; विवाचन में पक्षकार स्वयं सहमत होकर किसी विवाचक को निर्णय का अधिकार देते हैं, और उसका निर्णय मान्य होता है। दूसरे शब्दों में, विवाचन में तीसरा पक्ष आता तो है, पर पक्षकारों की अपनी सहमति से।
तीसरा, न्यायनिर्णयन : सरकार विवाद को श्रम न्यायालय या अधिकरण को निर्दिष्ट करती है और वहाँ का अधिनिर्णय बाध्यकारी होता है। यहाँ तीसरा पक्ष पक्षकारों की सहमति के बिना भी आ जाता है।
भारत की औद्योगिक विवाद विधि में ये सब उपलब्ध हैं — कार्य समिति, समाधान अधिकारी, समाधान बोर्ड, जाँच न्यायालय, श्रम न्यायालय, औद्योगिक अधिकरण, राष्ट्रीय अधिकरण, और स्वैच्छिक विवाचन का अलग उपबंध। बहस इस पर रही है कि इनमें से किस पर निर्भरता कितनी हो — और यही बहस ‘गिरि उपागम’ की पृष्ठभूमि है।
स्वतंत्रता के बाद भारत ने औद्योगिक शांति के लिए बड़े पैमाने पर राज्य-हस्तक्षेप वाली व्यवस्था अपनाई : विवाद सरकार के पास जाते और वहाँ से अधिकरणों को निर्दिष्ट होते। इसके पीछे कारण भी थे — संघ अभी कमज़ोर थे, उद्योग नए थे, और हड़तालों से उत्पादन ठप होने का भय था।
इसी पृष्ठभूमि में गिरि का मत महत्त्वपूर्ण हो जाता है। उनका कहना था कि जब तक पक्षकार स्वयं सौदा करने का अभ्यास नहीं करेंगे, संस्थाएँ परिपक्व नहीं होंगी और सरकार पर निर्भरता स्थायी हो जाएगी। श्रम मंत्री के पद से उनका त्यागपत्र इसी मतभेद का परिणाम था, और उसने इस दृष्टिकोण को एक नाम दे दिया।
इस बहस का दूसरा छोर गांधीवादी दृष्टिकोण है, जिसमें न्यास-भावना और स्वैच्छिक विवाचन पर बल है और जिसका प्रयोग अहमदाबाद के वस्त्र उद्योग में हुआ। परीक्षा में ये दोनों दृष्टिकोण प्रायः एक साथ पूछे जाते हैं।
इस प्रश्नपत्र में श्रम विधि और सामाजिक सुरक्षा के लगभग दस प्रश्न हैं, और यह उनमें वह प्रश्न है जो विधि की धारा नहीं, नीति-दर्शन पूछता है।
मुख्य तथ्य
- ‘गिरि उपागम’ वी. वी. गिरि से जुड़ा वह दृष्टिकोण है जिसमें सामूहिक सौदाकारी को औद्योगिक विवाद-निपटान का सामान्य मार्ग माना गया।
- इसका मूल तर्क अनिवार्य न्यायनिर्णयन पर निर्भरता घटाना है, ताकि पक्षकार स्वयं समझौता करने की क्षमता विकसित करें।
- गिरि श्रमिक आंदोलन से आए थे, स्वतंत्र भारत के आरम्भिक वर्षों में श्रम मंत्री रहे और इसी नीतिगत मतभेद पर उन्होंने त्यागपत्र दिया; आगे चलकर वे राष्ट्रपति बने।
- समाधान में तीसरा पक्ष केवल सहायता करता है; विवाचन में पक्षकार स्वयं सहमत होकर निर्णय का अधिकार देते हैं; न्यायनिर्णयन में सरकार विवाद अधिकरण को निर्दिष्ट करती है और अधिनिर्णय बाध्यकारी होता है।
- भारतीय औद्योगिक विवाद विधि में कार्य समिति, समाधान अधिकारी, समाधान बोर्ड, जाँच न्यायालय, श्रम न्यायालय, औद्योगिक अधिकरण और राष्ट्रीय अधिकरण — सभी की व्यवस्था है, तथा स्वैच्छिक विवाचन का अलग उपबंध भी है।
आगे की तैयारी
सामान्य भ्रम
- ‘गिरि उपागम’ को न्यायनिर्णयन से जोड़ लेना, जबकि उसका पूरा बल उस पर निर्भरता घटाने का था।
- समाधान और विवाचन को एक मान लेना — पहले में तीसरा पक्ष निर्णय नहीं थोपता, दूसरे में पक्षकार स्वयं उसे निर्णय का अधिकार देते हैं।
- स्वैच्छिक और अनिवार्य विवाचन का भेद भुला देना, जो इस पूरे विषय की धुरी है।
श्रम विधि के प्रश्न दो प्रकार के होते हैं : एक, जिनमें कोई धारा या परिभाषा पूछी जाती है; दूसरे, जिनमें कोई दृष्टिकोण या समिति का नाम पूछा जाता है। यह दूसरे प्रकार का है। ऐसे प्रश्नों में सुरक्षित तरीक़ा यह है कि उस व्यक्ति की भूमिका याद रखी जाए — गिरि श्रमिक आंदोलन से आए थे, इसलिए उनका झुकाव संघों की अपनी सौदा-क्षमता की ओर था, न कि राज्य की मशीनरी की ओर। यही सूत्र चारों विकल्पों में से सही को अलग कर देता है। इस प्रश्नपत्र में श्रम विधि से जुड़े शेष प्रश्न प्रायः अधिनियमों और उनकी धाराओं पर हैं, इसलिए तैयारी में दोनों पक्ष — दर्शन और धारा — साथ रखने चाहिए।
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- (a) 1 and 2 only
- (b) 1 and 3 only
- (c) 2 and 3 only
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उत्तर(a) 1 and 2 only
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- (a) 1, 2, 3 and 4
- (b) 2, 3, 4 and 5
- (c) 2, 4, 5 and 6
- (d) 3, 4, 5 and 6
उत्तर(c) 2, 4, 5 and 6
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अभ्यास
- practice — not a real PYQ
औद्योगिक विवाद-निपटान की किस विधि में तीसरा पक्ष केवल सहायता करता है और कोई निर्णय नहीं थोपता ?
- (a)समाधान
- (b)न्यायनिर्णयन
- (c)अनिवार्य विवाचन
- (d)तालाबंदी
उत्तर(a) समाधान
- practice — not a real PYQ
सामूहिक सौदाकारी की मुख्य विशेषता क्या है ?
- (a)विवाद सरकार द्वारा अधिकरण को निर्दिष्ट किया जाता है
- (b)नियोजक और श्रमिक संघ स्वयं बातचीत से समझौता करते हैं
- (c)निर्णय श्रम न्यायालय देता है
- (d)विवाद उच्च न्यायालय में दायर किया जाता है
उत्तर(b) नियोजक और श्रमिक संघ स्वयं बातचीत से समझौता करते हैं