किसी संस्था में उत्पादन की गतिविधियों में उपयोग में आने वाली किसी विशिष्ट वस्तु की माल-सूची सम्बन्धी आँकड़े इस प्रकार हैं : स्टॉक में मात्रा 1500 इकाई है और इस स्टॉक का मूल्य ₹ 1,27,500 है । (इससे प्रति इकाई औसत लागत ₹ 85 निकलती है ।) आगामी वर्ष X के दौरान, ₹ 95 की प्रति इकाई लागत पर 300 अतिरिक्त इकाइयाँ खरीदी जाती हैं । उत्पादन प्रक्रियाओं में X वर्ष के दौरान 600 इकाइयाँ उपभुक्त हो जाती हैं । पहले-आवक-पहले-जावक के आधार पर कार्य करने पर, वर्ष X के अंत में इस वस्तु की अवशिष्ट माल-सूची का मूल्य क्या होगा ?
- (a)₹ 1,00,000
- (b)₹ 1,02,500
- (c)₹ 1,05,000
- (d)₹ 1,07,500
उत्तर
क्यों
सही उत्तर — C, (c) ₹ 1,05,000 — पहले-आवक-पहले-जावक का अर्थ है कि उपभोग सबसे पुराने स्टॉक से होता है, इसलिए जो माल बचता है वह सबसे नई ख़रीद का होता है।
आँकड़े क्रम से रखिए :
आरम्भिक स्टॉक = 1500 इकाई, मूल्य ₹ 1,27,500, यानी ₹ 85 प्रति इकाई वर्ष X में ख़रीद = 300 इकाई, ₹ 95 प्रति इकाई, यानी ₹ 28,500 वर्ष X में उपभोग = 600 इकाई अतः शेष मात्रा = 1500 + 300 − 600 = 1200 इकाई
अब मूल्यांकन। पहले-आवक-पहले-जावक के अनुसार 600 इकाइयाँ आरम्भिक स्टॉक में से जाएँगी, क्योंकि वही सबसे पुरानी हैं। इसलिए आरम्भिक स्टॉक में से 1500 − 600 = 900 इकाइयाँ बचती हैं, और नई ख़रीद की सारी 300 इकाइयाँ ज्यों की त्यों बची रहती हैं :
900 × 85 = ₹ 76,500 300 × 95 = ₹ 28,500 अवशिष्ट माल-सूची का मूल्य = 76,500 + 28,500 = ₹ 1,05,000
यही विकल्प (c) है।
एक जाँच का रास्ता और है, जो प्रायः तेज़ पड़ता है : कुल उपलब्ध मूल्य में से उपभोग का मूल्य घटा दीजिए। कुल उपलब्ध = 1,27,500 + 28,500 = ₹ 1,56,000। उपभोग 600 इकाइयों का, सबसे पुराने भाव पर = 600 × 85 = ₹ 51,000। शेष = 1,56,000 − 51,000 = ₹ 1,05,000। दोनों रास्ते एक ही उत्तर देते हैं।
ध्यान देने योग्य बात यह है कि यहाँ कोष्ठक में दी गई सूचना — प्रति इकाई औसत लागत ₹ 85 — कोई अलग विधि नहीं सुझाती; वह केवल आरम्भिक स्टॉक का प्रति इकाई भाव बताती है, जो 1,27,500 ÷ 1500 से भी निकल आता है।
अन्य विकल्प क्यों गलत हैं
- (a)₹ 1,00,000 — ₹ 1,00,000 इन आँकड़ों पर किसी भी मान्य विधि से नहीं बनता। शेष मात्रा 1200 इकाई है, इसलिए यह मूल्य तभी आता जब प्रति इकाई भाव ठीक ₹ 83·33 मान लिया जाए, जो न पुराना भाव है (₹ 85), न नया (₹ 95), न दोनों का कोई भारित औसत (₹ 86·67)। चारों विकल्पों में यह सबसे छोटा है और उस पाठक को खींचता है जो गणना पूरी किए बिना कोई गोल-सी संख्या चुन लेता है। शेष मात्रा और भाव — दोनों अलग-अलग निकाल लेने पर यह विकल्प तुरन्त कट जाता है।
- (b)₹ 1,02,500 — ₹ 1,02,500 भी किसी मानक विधि का परिणाम नहीं है, और यह देख लेना उपयोगी है कि तीनों प्रचलित विधियाँ क्या देती हैं। पहले-आवक-पहले-जावक से ₹ 1,05,000; भारित औसत से 1,56,000 ÷ 1800 = ₹ 86·67 प्रति इकाई, यानी 1200 × 86·67 = ₹ 1,04,000; और यदि कोई अंतिम-आवक-पहले-जावक लगाए तो 1200 × 85 = ₹ 1,02,000। इनमें से कोई भी 1,02,500 नहीं है। यह विकल्प ठीक उस परास में रखा गया है जहाँ ग़लत विधि लगाने वाला पहुँचता है, ताकि वह पास की संख्या चुन ले।
- (d)₹ 1,07,500 — ₹ 1,07,500 पाने के लिए 1200 इकाइयों का औसत भाव लगभग ₹ 89·58 चाहिए, जो दिए गए दोनों भावों में से किसी से नहीं आता और किसी भारित औसत से भी नहीं। यह चारों में सबसे बड़ा मान है और उस दिशा की चूक को पकड़ता है जिसमें बचे हुए माल पर आवश्यकता से अधिक नया, ऊँचा भाव लगा दिया जाए — जैसे यह मान लेना कि बची हुई 1200 में से बहुत बड़ी संख्या ₹ 95 वाली है। वास्तव में नई ख़रीद केवल 300 इकाई की थी, इसलिए ऊँचा भाव उतनी ही इकाइयों पर लगता है।
अवधारणा
माल-सूची का मूल्यांकन इसलिए आवश्यक होता है कि एक ही वस्तु अलग-अलग समय पर अलग-अलग भाव पर ख़रीदी जाती है, और वर्ष के अंत में यह तय करना पड़ता है कि जो इकाइयाँ खप गईं वे किस भाव की थीं और जो बचीं वे किस भाव की।
पहले-आवक-पहले-जावक विधि मानती है कि जो माल पहले आया वही पहले खपा। इसका परिणाम यह होता है कि अवशिष्ट माल-सूची नवीनतम भावों पर आती है और खपत पुराने भावों पर। बढ़ती क़ीमतों के दौर में इससे बंद स्टॉक का मूल्य ऊँचा और खपत की लागत नीची दिखती है, इसलिए लाभ अपेक्षाकृत अधिक दिखता है।
भारित औसत विधि में सारे उपलब्ध माल की कुल लागत को कुल इकाइयों से भाग देकर एक ही भाव निकाला जाता है और उसी से खपत तथा शेष, दोनों का मूल्यांकन होता है।
तीसरी विधि — अंतिम-आवक-पहले-जावक — पाठ्यपुस्तकों में तुलना के लिए पढ़ाई जाती है, पर भारत के लेखा मानकों में माल-सूची के मूल्यांकन के लिए इसकी अनुमति नहीं है; वहाँ पहले-आवक-पहले-जावक और भारित औसत ही मान्य हैं।
एक और नियम साथ रखिए : माल-सूची का मूल्यांकन लागत और निवल वसूली योग्य मूल्य में से जो कम हो, उस पर किया जाता है।
यह प्रश्न लागत और वित्तीय लेखांकन के उस भाग से आता है जो EPFO के प्रश्नपत्रों में नियमित रूप से लौटता है। माल-सूची का मूल्यांकन सीधे लाभ-हानि खाते को प्रभावित करता है, इसलिए विधि का चुनाव केवल तकनीकी प्रश्न नहीं रहता — वह कर-दायित्व और वित्तीय विवरणों की तस्वीर, दोनों को बदल देता है।
प्रश्न की भाषा में एक व्यावहारिक संकेत छिपा है : ‘पहले-आवक-पहले-जावक के आधार पर कार्य करने पर’ — यानी विधि स्वयं बता दी गई है और उत्तर देने वाले को केवल उसे ठीक से लगाना है। ऐसे प्रश्नों में सबसे आम चूक विधि बदल देना है, समझ की कमी नहीं।
हिन्दी स्तंभ में कोष्ठक के भीतर पूरा वाक्य है और दण्ड भी कोष्ठक के अंदर ही छपा है — यह अंग्रेज़ी स्तंभ की छपाई-शैली का अनुसरण करता है। इकाई-संख्याओं में कोई विभाजक नहीं है, जबकि मुद्रा भारतीय अंक-समूहन के साथ छपी है।
मुख्य तथ्य
- पहले-आवक-पहले-जावक विधि में उपभोग सबसे पुराने स्टॉक से माना जाता है, इसलिए शेष माल नवीनतम भावों पर मूल्यांकित होता है।
- यहाँ शेष मात्रा = 1500 + 300 − 600 = 1200 इकाई, जिसमें 900 इकाई ₹ 85 की और 300 इकाई ₹ 95 की हैं।
- अवशिष्ट माल-सूची का मूल्य = 76,500 + 28,500 = ₹ 1,05,000।
- जाँच का दूसरा रास्ता : कुल उपलब्ध मूल्य ₹ 1,56,000 में से खपत का मूल्य 600 × 85 = ₹ 51,000 घटाना।
- भारित औसत विधि से यही शेष ₹ 1,04,000 आता, यानी विधि बदलते ही उत्तर बदल जाता है।
- भारत के लेखा मानकों में माल-सूची के लिए पहले-आवक-पहले-जावक और भारित औसत मान्य हैं; अंतिम-आवक-पहले-जावक की अनुमति नहीं है।
आगे की तैयारी
सामान्य भ्रम
- प्रश्न में बताई गई विधि छोड़कर औसत भाव लगा देना, जिससे उत्तर ₹ 1,04,000 आ जाता है।
- उपभोग को नई ख़रीद में से घटा देना, जो अंतिम-आवक-पहले-जावक की मान्यता है और यहाँ लागू नहीं।
- शेष मात्रा निकाले बिना सीधे मूल्य पर काम करने लगना, जिससे किस भाव पर कितनी इकाइयाँ बची हैं यह गड़बड़ा जाता है।
माल-सूची के प्रश्नों में सबसे भरोसेमंद क्रम यह है : पहले मात्राएँ, फिर विधि, फिर भाव। मात्राओं का हिसाब — आरम्भिक जोड़ ख़रीद घटाओ खपत — प्रायः एक पंक्ति में हो जाता है और उसी से पता चल जाता है कि कितनी इकाइयाँ किस भाव पर बची हैं। इसके बाद प्रश्न में बताई गई विधि से मूल्यांकन कीजिए और अंत में कुल उपलब्ध मूल्य में से खपत घटाकर उत्तर की जाँच कर लीजिए। ऐसे प्रश्न कभी तालिका के रूप में भी आते हैं, जिसमें कई तिथियों की ख़रीद और निर्गम दिए होते हैं; वहाँ यही क्रम और भी अधिक काम आता है।
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EPFO_EOAO_2023_Q78Consider the following information : Date | Particulars | Units | Rate per unit (₹) January 1 | Inventory in hand | 200 | 7 January 8 | Purchases | 1100 | 8 January 25 | Purchases | 300 | 9 January 6 | Issued for sale | 100 | – January 9 | Issued for sale | 200 | – Which one of the following is the value of inventory on January 31 under perpetual inventory system using First-In-First-Out (FIFO) method ?
- (a) ₹ 6,700
- (b) ₹ 8,700
- (c) ₹ 10,700
- (d) ₹ 12,000
उत्तर(c) ₹ 10,700
EO/AO 2023 का वह प्रश्न जिसमें तिथिवार तालिका देकर माल-सूची का मूल्यांकन कराया गया है।
EPFO_EOAO_2023_Q76Which of the following is included in the ‘Cost of Inventory’ according to Accounting Standard-2 (Inventory Valuation) :
- (a) Administrative overheads that do not contribute to bringing the inventories to their present location and condition
- (b) Storage costs which are necessary in the production process prior to a further production stage
- (c) Selling and distribution costs
- (d) Duties and taxes paid on purchases, subsequently recoverable by the enterprise from the Tax Authorities
उत्तर(b) Storage costs which are necessary in the production process prior to a further production stage
EO/AO 2023 का वह प्रश्न जो लेखा मानक के अनुसार माल-सूची की लागत में सम्मिलित मदें पूछता है।
अभ्यास
- practice — not a real PYQ
बढ़ती क़ीमतों के दौर में पहले-आवक-पहले-जावक विधि से बंद माल-सूची का मूल्य किस प्रकार दिखता है ?
- (a)भारित औसत विधि की तुलना में अधिक
- (b)भारित औसत विधि की तुलना में कम
- (c)दोनों विधियों में समान
- (d)शून्य
उत्तर(a) भारित औसत विधि की तुलना में अधिक
- practice — not a real PYQ
आरम्भिक स्टॉक 800 इकाई ₹ 50 प्रति इकाई का है और वर्ष में 200 इकाई ₹ 60 प्रति इकाई पर ख़रीदी गईं । यदि 300 इकाइयाँ खप जाएँ, तो पहले-आवक-पहले-जावक से शेष माल का मूल्य क्या होगा ?
- (a)₹ 35,000
- (b)₹ 37,000
- (c)₹ 39,000
- (d)₹ 41,000
उत्तर(b) ₹ 37,000