कोई कंपनी दो वस्तुओं की, दोनों की ही उधार खरीद एक ही दिन कर रही है । पहली वस्तु के लिए ऑफर किया गया उधार निबंधन (क्रेडिट टर्म) 2 1/2 /10, 1/20, निवल 30 है; और दूसरी वस्तु के लिए ऑफर किया गया उधार निबंधन (क्रेडिट टर्म) 3/5, 2/15, निवल 30 है । वस्तु 1 की घोषित क्रय लागत ₹ 60,000 है और वस्तु 2 की घोषित क्रय लागत ₹ 1,40,000 है । यदि दोनों उधार 14वें दिन समायोजित किए जा सकते हैं, तो भुगतान की जाने वाली कुल राशि क्या होगी ?
- (a)₹ 1,97,200
- (b)₹ 1,97,500
- (c)₹ 1,96,600
- (d)₹ 1,98,400
उत्तर
क्यों
सही उत्तर — C, (c) ₹ 1,96,600 — यहाँ सारा काम उधार-निबंधन की संकेत-पद्धति पढ़ लेने से हो जाता है; अंकगणित उसके बाद दो पंक्तियों का है।
पहले संकेत-पद्धति। ‘2 1/2 /10, 1/20, निवल 30’ का अर्थ है : यदि भुगतान 10 दिन के भीतर हो तो ढाई प्रतिशत की छूट; यदि 20 दिन के भीतर हो तो एक प्रतिशत की छूट; और किसी भी दशा में पूरी राशि 30वें दिन तक देनी है। इसी तरह ‘3/5, 2/15, निवल 30’ का अर्थ है : 5 दिन के भीतर तीन प्रतिशत, 15 दिन के भीतर दो प्रतिशत, और निवल अवधि 30 दिन।
अब 14वाँ दिन दोनों पर रखिए।
वस्तु 1 : 14 > 10, इसलिए ढाई प्रतिशत वाली खिड़की बंद हो चुकी है; पर 14 ≤ 20, इसलिए एक प्रतिशत वाली खिड़की खुली है। छूट = 60,000 का 1% = ₹ 600। देय = 60,000 − 600 = ₹ 59,400।
वस्तु 2 : 14 > 5, इसलिए तीन प्रतिशत वाली खिड़की बंद; पर 14 ≤ 15, इसलिए दो प्रतिशत वाली खुली। छूट = 1,40,000 का 2% = ₹ 2,800। देय = 1,40,000 − 2,800 = ₹ 1,37,200।
कुल भुगतान = 59,400 + 1,37,200 = ₹ 1,96,600, यानी विकल्प (c)।
पूरा दाँव इस बात पर है कि प्रत्येक वस्तु के लिए वह सबसे ऊँची छूट खोजी जाए जिसकी अवधि 14वें दिन तक भी चल रही हो। दोनों वस्तुओं में पहली-स्तर की छूट चूक जाती है और दूसरी-स्तर की मिल जाती है — यही इस प्रश्न की डिज़ाइन है, और यहीं सबसे अधिक चूक होती है।
एक जाँच-बिंदु और है। कुल घोषित लागत ₹ 2,00,000 है और 14वें दिन उपलब्ध कुल छूट ₹ 600 + ₹ 2,800 = ₹ 3,400 है। इसलिए उत्तर 2,00,000 − 3,400 होना ही चाहिए; इस अनुमान से भी सीधे (c) निकल आता है।
अन्य विकल्प क्यों गलत हैं
- (a)₹ 1,97,200 — ₹ 1,97,200 का अर्थ है कुल छूट केवल ₹ 2,800, यानी वस्तु 2 की छूट तो ली गई पर वस्तु 1 पर कुछ नहीं। यह ठीक वही भूल है जिसके लिए प्रश्न बना है : वस्तु 1 का पहला निबंधन ‘2 1/2 /10’ 14वें दिन तक चूक जाता है, और पाठक मान लेता है कि अब उस वस्तु पर कोई छूट नहीं बचती। बचती है — उसी पंक्ति का दूसरा स्तर ‘1/20’ बीसवें दिन तक चलता है, और 14 उसके भीतर है। इसीलिए उधार-निबंधन की हर पंक्ति के सभी स्तर पढ़ने चाहिए, पहला स्तर चूकते ही आगे बढ़ जाना ग़लत है।
- (b)₹ 1,97,500 — ₹ 1,97,500 पर पहुँचने के लिए कुल छूट ₹ 2,500 होनी चाहिए, पर इन दोनों निबंधनों के किसी भी संयोजन से यह राशि नहीं बनती। उपलब्ध छूटें केवल ये हैं : वस्तु 1 पर ₹ 1,500 (ढाई प्रतिशत) या ₹ 600 (एक प्रतिशत), और वस्तु 2 पर ₹ 4,200 (तीन प्रतिशत) या ₹ 2,800 (दो प्रतिशत)। इनके किसी भी जोड़ से 2,500 नहीं आता। ऐसे विकल्प यह देखने के लिए रखे जाते हैं कि उत्तर देने वाला वास्तव में छूट निकाल रहा है या आसपास की कोई संख्या चुन रहा है।
- (d)₹ 1,98,400 — ₹ 1,98,400 का अर्थ होगा कुल छूट ₹ 1,600, जो इन निबंधनों से बनने वाली किसी भी जोड़ी से मेल नहीं खाती। यह चारों विकल्पों में सबसे बड़ी राशि है, यानी सबसे कम छूट वाली, और उसी पाठक को खींचती है जिसे लगता है कि 14वें दिन तक अधिकांश खिड़कियाँ बंद हो चुकी होंगी। वास्तव में दोनों वस्तुओं पर दूसरे स्तर की छूट उपलब्ध है, इसलिए कुल छूट ₹ 3,400 बनती है और भुगतान इससे काफ़ी कम रह जाता है।
अवधारणा
व्यापारिक उधार में छूट की शर्तें एक संक्षिप्त संकेत-पद्धति में लिखी जाती हैं। ‘क/ख’ का अर्थ है ख दिनों के भीतर भुगतान करने पर क प्रतिशत की छूट, और ‘निवल न’ का अर्थ है कि बिना छूट के पूरी राशि न दिनों में देनी है। एक ही बिल पर एक से अधिक स्तर हो सकते हैं, जैसे यहाँ हैं — जितनी जल्दी भुगतान, उतनी बड़ी छूट।
गणना का नियम सीधा है : भुगतान की तिथि लीजिए और उस सबसे ऊँची छूट-दर को चुनिए जिसकी अवधि उस तिथि तक चल रही हो। तिथि किसी स्तर की अवधि से आगे निकल जाए तो वह स्तर समाप्त, पर उससे लंबी अवधि वाले स्तर अब भी उपलब्ध रहते हैं।
इस विषय का दूसरा पक्ष वित्तीय है। नक़द छूट छोड़ देना वस्तुतः महँगा उधार लेना है। मान लीजिए ‘1/20, निवल 30’ में कोई 20वें दिन के बजाय 30वें दिन भुगतान करता है : उसने एक प्रतिशत छोड़कर दस दिन की मोहलत ख़रीदी। दस दिन की यह लागत वार्षिक रूप में बदलने पर बहुत ऊँची बैठती है — इसी कारण वित्त-प्रबंधन में सिखाया जाता है कि नक़द छूट प्रायः ले लेनी चाहिए, बशर्ते उतनी अवधि के लिए धन जुटाने की लागत उससे कम हो।
यह प्रश्न लेखांकन और वित्त-प्रबंधन की उस सीमा पर है जहाँ से EPFO के प्रश्नपत्र नियमित रूप से सामग्री उठाते हैं : कार्यशील पूँजी, लेनदार-प्रबंधन और नक़द छूट। पद ‘क्रेडिट टर्म’ का हिन्दी रूप ‘उधार निबंधन’ यहाँ कोष्ठक में लिप्यन्तरण के साथ दिया गया है, जिससे दोनों शब्द एक साथ पहचान में आ जाते हैं।
छपाई की एक बात ध्यान देने योग्य है। पहले निबंधन में ढाई प्रतिशत को द्वि-स्तरीय भिन्न के रूप में छापा गया है और उसके बाद ‘/10’ आता है; इसी कारण यहाँ उसे ‘2 1/2 /10’ के रूप में रखा गया है, बीच की जगह के साथ, ताकि उसे इक्कीस बटा दो न पढ़ा जाए। भुगतान का दिन ‘14वें’ देवनागरी प्रत्यय के साथ छपा है।
इस प्रश्नपत्र का लगभग एक-तिहाई हिस्सा संख्यात्मक और सांख्यिकीय है, और उसमें ऐसे प्रश्न कम नहीं हैं जहाँ गणना सरल है पर शर्तों को पढ़ना ही असली काम है। यह प्रश्न उसी वर्ग का अच्छा उदाहरण है।
मुख्य तथ्य
- ‘क/ख’ का अर्थ है ख दिनों के भीतर भुगतान करने पर क प्रतिशत की नक़द छूट, और ‘निवल 30’ का अर्थ है पूरी राशि 30 दिन में देय।
- एक ही बिल पर कई स्तर हो सकते हैं; भुगतान की तिथि पर वही सबसे ऊँची छूट मिलती है जिसकी अवधि उस तिथि तक चल रही हो।
- इस प्रश्न में 14वें दिन वस्तु 1 पर एक प्रतिशत यानी ₹ 600 और वस्तु 2 पर दो प्रतिशत यानी ₹ 2,800 की छूट उपलब्ध है।
- कुल घोषित लागत ₹ 2,00,000 में से कुल छूट ₹ 3,400 घटाने पर देय राशि ₹ 1,96,600 आती है।
- नक़द छूट छोड़कर देर से भुगतान करना वस्तुतः बहुत ऊँची वार्षिक दर पर उधार लेने के बराबर पड़ता है, इसलिए वित्त-प्रबंधन में छूट ले लेने की सलाह दी जाती है।
आगे की तैयारी
सामान्य भ्रम
- पहला स्तर चूकते ही यह मान लेना कि उस बिल पर कोई छूट नहीं बची — लंबी अवधि वाला दूसरा स्तर प्रायः खुला रहता है।
- दोनों बिलों पर एक ही दर लगा देना, जबकि उनके उधार-निबंधन अलग-अलग छपे हैं।
- ‘निवल 30’ को छूट की अवधि समझ लेना; वह केवल पूरी राशि चुकाने की अंतिम तिथि बताता है।
इस प्रकार के प्रश्न में सबसे कारगर आदत यह है कि पहले हर बिल के लिए एक छोटी तालिका मन में बना ली जाए — दर, दिन, और क्या भुगतान की तिथि उस दिन-सीमा के भीतर है। उसके बाद गणना केवल दो गुणा और एक जोड़ की रह जाती है। दूसरा उपाय है कुल छूट के रास्ते चलना : घोषित कुल लागत में से कुल छूट घटाइए, इससे बड़े अंकों का गुणा टल जाता है और उत्तर की जाँच भी हो जाती है। लेखांकन से जुड़े संख्यात्मक प्रश्न इसी पत्र में और भी हैं — जैसे माल-सूची के मूल्यांकन और उपरिव्यय दर वाले — और उन सबमें शर्तों का ठीक पाठ ही आधी सफलता है।
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EPFO_APFC_2016_Q69खोलें व हल करें →Data regarding inventory of a particular item of usage in the production activities of an organization are : the quantity in stock is 1500 units and the value of this stock is ₹ 1,27,500. (This works out to an average unit cost of ₹ 85.) During the ensuing year X, an additional 300 units are purchased at a unit cost of ₹ 95. Consumption in production processes during the year X has been 600 units. Working by the First-In-First-Out basis, the value of the residual inventory of the item at the end of the year X will be
- (a) ₹ 1,00,000
- (b) ₹ 1,02,500
- (c) ₹ 1,05,000
- (d) ₹ 1,07,500
उत्तर(c) ₹ 1,05,000
इसी प्रश्नपत्र का माल-सूची मूल्यांकन वाला प्रश्न — वही लेखांकन-परिवार, जहाँ भी नियम पहले पढ़ना और फिर लगाना पड़ता है।
EPFO_APFC_2016_Q62खोलें व हल करें →Consider an industry with the following features : • Budgeted monthly fixed cost = ₹ 2,20,000 • Normal monthly output = 12000 per standard labour hour • Standard variable overhead rate = ₹ 25 per labour hour What would be the total factory overhead rate ?
- (a) ₹ 40·33 per labour hour
- (b) ₹ 41·67 per labour hour
- (c) ₹ 42·67 per labour hour
- (d) ₹ 43·33 per labour hour
उत्तर(d) ₹ 43·33 per labour hour
इसी प्रश्नपत्र का कुल उपरिव्यय दर वाला प्रश्न, जिसमें भी दिए गए आँकड़ों को सही सूत्र में रखना ही पूरा काम है।
अभ्यास
- practice — not a real PYQ
‘2/10, निवल 30’ के उधार निबंधन पर ₹ 50,000 का बिल यदि 8वें दिन चुकाया जाए, तो कितनी राशि देनी होगी ?
- (a)₹ 48,500
- (b)₹ 49,000
- (c)₹ 49,500
- (d)₹ 50,000
उत्तर(b) ₹ 49,000
- practice — not a real PYQ
‘3/5, 2/15, निवल 30’ के निबंधन पर ₹ 1,00,000 का बिल 20वें दिन चुकाने पर कितनी छूट मिलेगी ?
- (a)₹ 3,000
- (b)₹ 2,000
- (c)₹ 1,000
- (d)कोई छूट नहीं
उत्तर(d) कोई छूट नहीं