संसद्, अंतर्राष्ट्रीय संधियों के कार्यान्वयन हेतु सम्पूर्ण भारत या भारत के किसी भाग के लिए कोई विधि बना सकती है
- (a)सभी राज्यों की सहमति से
- (b)बहुसंख्यक राज्यों की सहमति से
- (c)सम्बन्धित राज्यों की सहमति से
- (d)किसी भी राज्य की सहमति के बिना
उत्तर
क्यों
सही उत्तर — D, (d) किसी भी राज्य की सहमति के बिना — यह सीधे संविधान के अनुच्छेद 253 का पाठ है।
अनुच्छेद 253 कहता है कि इस अध्याय के पूर्ववर्ती उपबंधों में किसी बात के होते हुए भी, संसद् को किसी अन्य देश के साथ की गई संधि, करार या अभिसमय के, अथवा किसी अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन, संगम या निकाय में किए गए किसी विनिश्चय के कार्यान्वयन के लिए भारत के सम्पूर्ण राज्यक्षेत्र या उसके किसी भाग के लिए विधि बनाने की शक्ति है। ‘इस अध्याय के पूर्ववर्ती उपबंधों में किसी बात के होते हुए भी’ वाला वाक्यांश ही निर्णायक है : वह संघ और राज्यों के बीच विधायी शक्तियों के सामान्य बँटवारे को इस एक प्रयोजन के लिए हटा देता है। इसलिए राज्य सूची का विषय होने पर भी संसद् विधि बना सकती है, और इसके लिए किसी राज्य की सहमति अपेक्षित नहीं है।
तर्क भी यही कहता है। संधि करने और अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलनों में भाग लेने की शक्ति संघ सूची में है, और अंतर्राष्ट्रीय मंच पर वचन पूरा देश देता है। यदि उस वचन को घरेलू विधि में उतारने के लिए राज्यों की सहमति चाहिए होती, तो एक राज्य के इनकार से भारत अपने अंतर्राष्ट्रीय दायित्व से बँधा रह जाता और उसे निभा नहीं पाता।
व्यवहार में इसका सबसे परिचित उदाहरण पर्यावरण विधि है : स्टॉकहोम सम्मेलन में लिए गए निश्चयों के कार्यान्वयन के लिए बनी वायु (प्रदूषण निवारण और नियंत्रण) अधिनियम तथा पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम जैसी विधियाँ इसी अनुच्छेद के बल पर बनीं।
राज्यों की सहमति वाला रास्ता संविधान में है, पर वह दूसरा अनुच्छेद है — 252, जहाँ दो या अधिक राज्यों के विधान-मंडल स्वयं संकल्प पारित करके संसद् से विधि बनाने का अनुरोध करते हैं। इस प्रश्न के तीनों ग़लत विकल्प उसी दूसरे रास्ते की ओर खींचते हैं।
अन्य विकल्प क्यों गलत हैं
- (a)सभी राज्यों की सहमति से — सभी राज्यों की सहमति की शर्त संविधान में कहीं नहीं है — न संधि-कार्यान्वयन के लिए, न किसी और साधारण विधि के लिए। सर्वसम्मति की माँग व्यावहारिक रूप से भी असंभव होती : एक राज्य के इनकार से भारत का अंतर्राष्ट्रीय वचन अधूरा रह जाता। जिस एक जगह राज्यों की स्वीकृति सचमुच आवश्यक है, वह संविधान संशोधन की कुछ श्रेणियाँ हैं, जहाँ आधे राज्यों के अनुसमर्थन की बात आती है — वह अनुच्छेद 368 का प्रसंग है, 253 का नहीं।
- (b)बहुसंख्यक राज्यों की सहमति से — बहुसंख्यक राज्यों की सहमति का ढाँचा भी अनुच्छेद 253 में नहीं है। यह विकल्प संविधान संशोधन की उस प्रक्रिया की स्मृति से बनता है जिसमें कुछ विषयों पर आधे राज्यों के विधान-मंडलों का अनुसमर्थन चाहिए होता है, पर वह संशोधन की प्रक्रिया है, संधि-कार्यान्वयन की साधारण विधि की नहीं। संधि लागू करने के लिए संसद् की शक्ति स्वयंपूर्ण है और किसी गणना पर निर्भर नहीं करती।
- (c)सम्बन्धित राज्यों की सहमति से — यह विकल्प सबसे निकट का जाल है, क्योंकि यह एक वास्तविक संवैधानिक व्यवस्था का वर्णन करता है — पर दूसरे अनुच्छेद की। अनुच्छेद 252 के अंतर्गत दो या अधिक राज्यों के विधान-मंडल संकल्प पारित करके संसद् से अपने लिए विधि बनवा सकते हैं, और वह विधि उन्हीं राज्यों पर लागू होती है जिन्होंने संकल्प पारित किया या जिन्होंने बाद में उसे स्वीकार किया; जल (प्रदूषण निवारण और नियंत्रण) अधिनियम इसी मार्ग से बना था। संधि के कार्यान्वयन का मार्ग इससे भिन्न है और उसमें सम्बन्धित राज्यों की सहमति की कोई शर्त नहीं है।
अवधारणा
संघ और राज्यों के बीच विधायी शक्तियों का बँटवारा सातवीं अनुसूची की तीन सूचियों से होता है, पर संविधान स्वयं कुछ स्थितियों में संसद् को राज्य सूची के विषय पर भी विधि बनाने देता है। ये अपवाद गिने-चुने हैं और उन्हें एक साथ याद रखना चाहिए :
अनुच्छेद 249 — राज्य सभा दो-तिहाई बहुमत से संकल्प पारित कर दे कि राष्ट्रीय हित में आवश्यक है; ऐसी विधि एक वर्ष तक प्रभावी रहती है और संकल्प दोहराया जा सकता है। अनुच्छेद 250 — आपात की उद्घोषणा प्रवर्तन में हो। अनुच्छेद 252 — दो या अधिक राज्यों के विधान-मंडल स्वयं अनुरोध करें; विधि उन्हीं राज्यों पर लागू होती है। अनुच्छेद 253 — अंतर्राष्ट्रीय संधि, करार, अभिसमय या अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन के विनिश्चय का कार्यान्वयन।
इनमें 253 सबसे व्यापक है, क्योंकि वहाँ न कोई समय-सीमा है, न किसी राज्य की सहमति की शर्त, और न विधि का क्षेत्र किसी राज्य-समूह तक सीमित। इसका आधार संघ सूची की वे प्रविष्टियाँ हैं जो विदेशी देशों के साथ संधि करने और उन्हें लागू करने तथा अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलनों में भाग लेने को संघ का विषय बनाती हैं।
भारत की व्यवस्था इस मामले में द्वैतवादी है : कोई संधि करने भर से वह देश के भीतर स्वतः विधि नहीं बन जाती। कार्यपालिका संधि करती है, पर उसे नागरिकों के अधिकारों और दायित्वों में बदलने के लिए विधायिका को विधि बनानी पड़ती है। अनुच्छेद 253 उसी बदलाव का द्वार है।
पर्यावरण विधि इसका सबसे स्पष्ट उदाहरण है। मानव पर्यावरण पर स्टॉकहोम सम्मेलन में लिए गए निश्चयों को लागू करने के लिए वायु (प्रदूषण निवारण और नियंत्रण) अधिनियम बना, और आगे चलकर पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम भी उसी आधार पर आया। दूसरी ओर जल (प्रदूषण निवारण और नियंत्रण) अधिनियम अनुच्छेद 252 के रास्ते से बना, क्योंकि जल राज्य सूची का विषय है और उस समय राज्यों ने संकल्प पारित किए थे। यही जोड़ी इन दोनों अनुच्छेदों का भेद सबसे अच्छी तरह याद कराती है।
इस प्रश्नपत्र में राजव्यवस्था और संविधान के प्रश्न लगभग सात हैं और वे प्रायः इसी तरह किसी एक अनुच्छेद के ठीक-ठीक पाठ पर टिके होते हैं।
मुख्य तथ्य
- अनुच्छेद 253 : संसद् किसी संधि, करार, अभिसमय या अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन के विनिश्चय के कार्यान्वयन के लिए भारत के सम्पूर्ण राज्यक्षेत्र या उसके किसी भाग के लिए विधि बना सकती है।
- यह शक्ति विधायी शक्तियों के सामान्य बँटवारे पर अध्यारोही है, इसलिए राज्य सूची का विषय होने पर भी किसी राज्य की सहमति नहीं चाहिए।
- संधि करना, अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलनों में भाग लेना और संधियों को लागू करना संघ सूची के विषय हैं।
- अनुच्छेद 252 इसका उलटा मार्ग है : दो या अधिक राज्य स्वयं संकल्प पारित करें, तब संसद् उन्हीं राज्यों के लिए विधि बनाती है — जल (प्रदूषण निवारण और नियंत्रण) अधिनियम इसी मार्ग से बना।
- वायु (प्रदूषण निवारण और नियंत्रण) अधिनियम तथा पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम स्टॉकहोम सम्मेलन के निश्चयों के कार्यान्वयन के लिए अनुच्छेद 253 के आधार पर बने।
- अनुच्छेद 249 (राज्य सभा का संकल्प) और अनुच्छेद 250 (आपात) संसद् को राज्य सूची पर विधि बनाने के अन्य, समय-सीमित मार्ग देते हैं।
आगे की तैयारी
सामान्य भ्रम
- अनुच्छेद 252 (राज्यों के संकल्प पर बनी विधि) और अनुच्छेद 253 (संधि-कार्यान्वयन) को आपस में बदल देना।
- आधे राज्यों के अनुसमर्थन वाली संविधान-संशोधन प्रक्रिया को साधारण विधि पर लागू कर देना।
- यह मान लेना कि संधि पर हस्ताक्षर होते ही वह भारत में स्वतः लागू विधि बन जाती है; उसे विधायिका द्वारा विधि में उतारना पड़ता है।
संघ-राज्य विधायी सम्बन्धों से प्रश्न प्रायः इसी शैली में आते हैं — एक अधूरा वाक्य और चार विकल्प जो सहमति की अलग-अलग मात्राएँ बताते हैं। यहाँ काम आने वाली आदत यह है कि हर विकल्प को किसी न किसी अनुच्छेद से जोड़कर देखा जाए : ‘सम्बन्धित राज्यों की सहमति’ पढ़ते ही 252 याद आना चाहिए, ‘आधे राज्यों का अनुसमर्थन’ पढ़ते ही संविधान संशोधन, और ‘राज्य सभा का संकल्प’ पढ़ते ही 249। जो विकल्प किसी अनुच्छेद से नहीं जुड़ता, वह प्रायः गढ़ा हुआ होता है। संधि-कार्यान्वयन का प्रश्न अकसर पर्यावरण विधियों के उदाहरण के साथ भी पूछा जाता है, इसलिए वायु अधिनियम और जल अधिनियम का अंतर याद रखना दुगुना काम करता है।
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- (a) 1 and 4 only
- (b) 1 and 3 only
- (c) 2 and 4 only
- (d) 2 and 3 only
उत्तर(b) 1 and 3 only
इसी प्रश्नपत्र का वित्त आयोग वाला प्रश्न — संघ-राज्य सम्बन्धों के वित्तीय पक्ष से, जबकि यह प्रश्न विधायी पक्ष से है।
अभ्यास
- practice — not a real PYQ
संविधान के किस अनुच्छेद के अंतर्गत जल (प्रदूषण निवारण और नियंत्रण) अधिनियम राज्यों के संकल्पों के आधार पर बनाया गया था ?
- (a)अनुच्छेद 249
- (b)अनुच्छेद 250
- (c)अनुच्छेद 252
- (d)अनुच्छेद 253
उत्तर(c) अनुच्छेद 252
- practice — not a real PYQ
राष्ट्रीय हित में राज्य सूची के किसी विषय पर संसद् को विधि बनाने का अधिकार किसके संकल्प से मिलता है ?
- (a)लोक सभा के दो-तिहाई बहुमत के संकल्प से
- (b)राज्य सभा के दो-तिहाई बहुमत के संकल्प से
- (c)अंतर्राज्यीय परिषद् के संकल्प से
- (d)राष्ट्रपति की उद्घोषणा से
उत्तर(b) राज्य सभा के दो-तिहाई बहुमत के संकल्प से