सार्वजनिक क्षेत्रक के उद्यमों में शेयरों के विनिवेश पर रंगराजन समिति ने सुझाया, कि 1. ईक्विटी (साम्या) की मुक्त की जाने वाली प्रतिशतता, स्पष्टतः सार्वजनिक क्षेत्रक के लिए आरक्षित उद्योगों के लिए 49% से अधिक नहीं होनी चाहिए, और अन्य के लिए या तो 74% या 100% होनी चाहिए । 2. विनिवेश का वर्षवार लक्ष्य बनाए रखा जाना चाहिए । उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं ?
- (a)केवल 1
- (b)केवल 2
- (c)1 और 2 दोनों
- (d)न तो 1, न ही 2
उत्तर
क्यों
सही उत्तर — A, (a) केवल 1 — दोनों कथनों को अलग-अलग तौलिए, क्योंकि यह प्रश्न एक ही समिति की दो अलग बातों की जाँच कर रहा है।
जिस समिति की बात है वह डॉ. सी. रंगराजन की अध्यक्षता में सार्वजनिक क्षेत्रक के उद्यमों में शेयरों के विनिवेश की रूपरेखा बनाने के लिए बनी थी और उसने 1993 में अपनी रिपोर्ट दी।
कथन 1 — प्रतिशतता वाली बात। सही। समिति की सबसे प्रलेखित सिफ़ारिश ठीक यही है : जो उद्योग स्पष्ट रूप से सार्वजनिक क्षेत्रक के लिए आरक्षित हैं, उनमें मुक्त की जाने वाली ईक्विटी सीमित रखी जाए, और शेष उद्योगों में वह कहीं अधिक — यहाँ तक कि सरकार की पूरी हिस्सेदारी तक — हो सकती है। इस भेद का कारण राजस्व नहीं, नियंत्रण है : आरक्षित उद्योग में राज्य स्वयं संचालक बना रहना चाहता है, इसलिए उसकी हिस्सेदारी उस स्तर से ऊपर रहनी चाहिए जहाँ प्रबंधन का नियंत्रण हाथ से निकल जाता है। इसी तर्क से समिति ने आरक्षित इकाइयों में सरकारी स्वामित्व का लक्ष्य-स्तर 51 प्रतिशत रखने की बात कही थी। आरक्षित सूची से बाहर यह बंधन नहीं रहता, इसलिए वहाँ बड़ा विनिवेश संभव हो जाता है।
कथन 2 — वर्षवार लक्ष्य। समिति की सिफ़ारिशों में यह नहीं है। प्रतिशतता के अलावा समिति ने जो कहा वह विनिवेश की रीति और सुरक्षा-उपायों से जुड़ा था : रक्षा और परमाणु ऊर्जा को छोड़कर शेष में विनिवेश किसी भी स्तर तक हो सकता है और वहाँ सरकार बहुमत हिस्सेदारी रखे; प्रक्रिया पारदर्शी हो और श्रमिकों के अधिकार सुरक्षित रहें; तथा कार्यक्रम के सुचारु संचालन और निगरानी के लिए एक स्वायत्त निकाय बने। वर्ष-दर-वर्ष का लक्ष्य इस योजना का अंग नहीं है — वार्षिक विनिवेश लक्ष्य बजट की प्रथा है, जहाँ वह ऋणेतर पूँजीगत प्राप्तियों में दिखाया जाता है।
इसलिए केवल कथन 1 टिकता है और उत्तर (a) है।
बनावट पर एक बात : यहाँ सूची के बाद सीधे प्रश्न-वाक्य आता है और ‘नीचे दिए गए कूट’ वाली पंक्ति नहीं है; विकल्प ‘1 और 2 दोनों / न तो 1, न ही 2’ की जोड़ी वाले हैं। इस प्रश्नपत्र पर यह सामान्य बनावट है।
अन्य विकल्प क्यों गलत हैं
- (b)केवल 2 — यह विकल्प उस कथन को अकेला सही मान लेता है जो समिति की सिफ़ारिशों में है ही नहीं, और साथ ही उस कथन को गिरा देता है जो उसकी सबसे प्रसिद्ध सिफ़ारिश है। वर्षवार लक्ष्य की बात कार्यपालिका की बजट-प्रथा से आती है, समिति की रिपोर्ट से नहीं; समिति का बल इस पर था कि कौन-सी इकाइयों में कितनी ईक्विटी मुक्त हो, प्रक्रिया कैसी हो और उसकी निगरानी कौन करे। जिसने केवल ‘विनिवेश और वार्षिक लक्ष्य’ का जोड़ा सुन रखा है, वह यहीं फिसलता है।
- (c)1 और 2 दोनों — दोनों कथनों को सही मानना कथन 1 पर तो ठीक बैठता है, पर कथन 2 पर नहीं। यही इस प्रश्न का सबसे लुभावना विकल्प है, क्योंकि दोनों वाक्य विनिवेश की चर्चा में सुने-सुनाए लगते हैं और सूची में साथ-साथ छपे हैं। परीक्षा की दृष्टि से यही सीख है : सूची में साथ छपे दो वाक्यों की सच्चाई एक-दूसरे से बँधी नहीं होती, हर कथन का निर्णय अलग करना पड़ता है। यहाँ पहला कथन समिति के प्रलेखित शब्दों के निकट है, दूसरा उसके दायरे से बाहर।
- (d)न तो 1, न ही 2 — दोनों कथनों को ग़लत मानने का अर्थ होगा 49 प्रतिशत तथा 74 या 100 प्रतिशत वाली उस सिफ़ारिश को भी नकारना, जो इस समिति की पहचान ही है और जिसे विनिवेश की चर्चा में सबसे अधिक उद्धृत किया जाता है। जब सूची के किसी एक कथन के बारे में आप निश्चित हों कि वह सही है, तब ‘न तो 1, न ही 2’ जैसा विकल्प अपने आप बाहर हो जाता है — यह विकल्प केवल उसी के लिए बचता है जिसे दोनों कथनों में कुछ भी परिचित न लगे।
अवधारणा
विनिवेश का अर्थ है सार्वजनिक क्षेत्रक के उद्यमों में सरकार की शेयर-हिस्सेदारी का कुछ अंश बेचना। इसे निजीकरण का पर्याय मान लेना पहली भूल है : जब तक बेची गई हिस्सेदारी के साथ प्रबंधन का नियंत्रण भी हस्तांतरित न हो, वह अल्पांश विनिवेश ही रहता है। इसीलिए विनिवेश की हर चर्चा में असली प्रश्न प्रतिशत का नहीं, नियंत्रण का होता है — 51 प्रतिशत, 74 प्रतिशत और 100 प्रतिशत जैसे आँकड़े कंपनी विधि में साधारण और विशेष संकल्प पारित करने की शक्ति से जुड़े हैं।
रंगराजन समिति ने इसी तर्क पर उद्योगों को दो श्रेणियों में बाँटा। जो स्पष्ट रूप से सार्वजनिक क्षेत्रक के लिए आरक्षित हैं, वहाँ सरकार का स्वामित्व नियंत्रण-स्तर से ऊपर बना रहे; शेष में विनिवेश बहुत आगे तक जा सकता है। रक्षा और परमाणु ऊर्जा को उसने अलग रखा, जहाँ सरकार की बहुमत हिस्सेदारी बनी रहनी चाहिए। साथ ही उसने प्रक्रिया की पारदर्शिता, श्रमिकों के हितों की रक्षा और एक स्वायत्त निगरानी-निकाय की बात कही।
इसके बाद की कड़ी भी याद रखने योग्य है : 1996 में जी. वी. रामकृष्ण की अध्यक्षता में विनिवेश आयोग बना, और आगे चलकर विनिवेश के लिए अलग विभाग बना, जो आज निवेश और लोक परिसंपत्ति प्रबंधन विभाग कहलाता है।
यह प्रश्न 1991 के बाद के आर्थिक सुधारों की उस कड़ी से आता है जिसमें सरकार ने सार्वजनिक उद्यमों में अपनी हिस्सेदारी घटाने की नीति अपनाई। शुरुआती वर्षों में यह काम बिना किसी स्पष्ट रूपरेखा के हुआ, और उसी कमी को पूरा करने के लिए रंगराजन समिति बनी।
समिति की सिफ़ारिशें आगे की पूरी बहस की शब्दावली तय कर गईं : कितनी ईक्विटी बेची जाए, किन क्षेत्रों को छूट दी जाए, बेचने की प्रक्रिया कैसी हो, और प्राप्त राशि का उपयोग किस मद में हो। इनमें से आख़िरी प्रश्न — प्राप्तियों का उपयोग — आगे चलकर सबसे विवादास्पद रहा, क्योंकि विनिवेश से मिली राशि पूँजीगत प्राप्ति है और उसे राजस्व-व्यय में खपाना पूँजी को खाने जैसा माना जाता है।
परीक्षा की दृष्टि से इस विषय में तीन नाम एक साथ याद रखने चाहिए : रंगराजन समिति (रूपरेखा), विनिवेश आयोग (इकाइयों की सिफ़ारिश), और विनिवेश का अलग विभाग (क्रियान्वयन)। प्रश्न प्रायः इन्हीं के काम आपस में बदलकर पूछे जाते हैं।
मुख्य तथ्य
- डॉ. सी. रंगराजन की अध्यक्षता वाली समिति ने सार्वजनिक उद्यमों में शेयरों के विनिवेश की रूपरेखा पर 1993 में रिपोर्ट दी।
- मुख्य सिफ़ारिश : स्पष्टतः सार्वजनिक क्षेत्रक के लिए आरक्षित उद्योगों में मुक्त की जाने वाली ईक्विटी सीमित रहे और शेष उद्योगों में वह कहीं अधिक — पूर्ण निकास तक — हो सकती है।
- आरक्षित इकाइयों में सरकारी स्वामित्व का लक्ष्य-स्तर 51 प्रतिशत सुझाया गया था, ताकि प्रबंधन का नियंत्रण राज्य के पास बना रहे।
- रक्षा और परमाणु ऊर्जा को अलग रखते हुए वहाँ सरकार की बहुमत हिस्सेदारी बनाए रखने की बात कही गई।
- समिति ने पारदर्शी प्रक्रिया, श्रमिकों के अधिकारों की रक्षा और कार्यक्रम की निगरानी के लिए एक स्वायत्त निकाय की सिफ़ारिश की; वर्षवार लक्ष्य उसकी सिफ़ारिश नहीं थी।
- वार्षिक विनिवेश लक्ष्य बजट में तय होते हैं और ऋणेतर पूँजीगत प्राप्तियों के अंतर्गत दिखाए जाते हैं।
आगे की तैयारी
सामान्य भ्रम
- विनिवेश को निजीकरण का पर्याय मान लेना; जब तक प्रबंधन-नियंत्रण हस्तांतरित न हो, वह अल्पांश विनिवेश ही रहता है।
- बजट में तय होने वाले वार्षिक विनिवेश लक्ष्यों को किसी समिति की सिफ़ारिश समझ लेना — वे कार्यपालिका की प्रथा हैं।
- रंगराजन समिति (रूपरेखा) और विनिवेश आयोग (इकाइयों की सिफ़ारिश) के काम आपस में बदल देना।
विनिवेश पर प्रश्न प्रायः तीन रूपों में आते हैं : किसी समिति की सिफ़ारिश की पहचान, विनिवेश और निजीकरण के भेद की परख, और प्राप्त राशि के उपयोग से जुड़ा नीतिगत प्रश्न। कथन-सूची वाले रूप में, जैसा यहाँ है, सुरक्षित तरीक़ा यह है कि हर कथन को अलग से इस कसौटी पर रखा जाए — क्या यह बात रिपोर्ट में कही गई थी, या यह बाद की सरकारी प्रथा है ? दोनों में अंतर करने की आदत ही ऐसे प्रश्नों में निर्णायक होती है। इस प्रश्नपत्र में अर्थव्यवस्था और लोक वित्त के प्रश्न बड़ी संख्या में हैं और उनमें से कई इसी तरह कथन-सूची के रूप में पूछे गए हैं।
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- (a) 1, 2 and 3 only
- (b) 1, 2 and 4 only
- (c) 1, 2, 3 and 4
- (d) 3 and 4 only
उत्तर(c) 1, 2, 3 and 4
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- (a) 1 and 4 only
- (b) 1 and 3 only
- (c) 2 and 4 only
- (d) 2 and 3 only
उत्तर(b) 1 and 3 only
इसी प्रश्नपत्र का वित्त आयोग की भूमिकाओं वाला प्रश्न, जहाँ भी असली परख यह है कि कौन-सा काम किस संस्था का है।
अभ्यास
- practice — not a real PYQ
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- (a)डॉ. सी. रंगराजन
- (b)जी. वी. रामकृष्ण
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उत्तर(a) डॉ. सी. रंगराजन
- practice — not a real PYQ
विनिवेश से प्राप्त राशि सरकारी लेखा में किस मद में आती है ?
- (a)राजस्व प्राप्तियाँ
- (b)ऋणेतर पूँजीगत प्राप्तियाँ
- (c)ऋण-सृजनकारी पूँजीगत प्राप्तियाँ
- (d)अनुदान
उत्तर(b) ऋणेतर पूँजीगत प्राप्तियाँ