‘महँगी मुद्रा’ शब्द किसे निर्दिष्ट करता है ?
- (a)आवासीय ऋणों पर निम्न ब्याज-दर
- (b)मंदी की अवस्था में मुद्रा का मूल्य
- (c)उच्च ब्याज-दर
- (d)आवासीय ऋणों पर ब्याज की दर में कमी के कारण प्राप्त बचत
उत्तर
क्यों
सही उत्तर — C, (c) उच्च ब्याज-दर — ‘महँगी मुद्रा’ में ‘महँगी’ विशेषण मुद्रा के मूल्य पर नहीं, उधार की क़ीमत पर लगता है। अर्थशास्त्र में ब्याज-दर ही ऋण की क़ीमत है: जो दर उधार लेने वाला चुकाता है, वही उस रुपये की क़ीमत है। इसलिए जब ब्याज-दरें ऊँची होती हैं तो कहा जाता है कि मुद्रा महँगी हो गई (dear money), और जब वे नीची होती हैं तो मुद्रा सस्ती (cheap money) कहलाती है।
यह पद केवल एक मुहावरा नहीं, मौद्रिक नीति की एक पूरी अवस्था का नाम है। केंद्रीय बैंक जब मुद्रास्फीति पर अंकुश लगाना चाहता है तो नीतिगत दरें बढ़ाता है, नक़द आरक्षित अनुपात कड़ा करता है या खुले बाज़ार में प्रतिभूतियाँ बेचकर तरलता खींचता है। बैंकों के लिए संसाधन महँगे होते हैं, वे अपनी उधार-दरें बढ़ाते हैं, ऋण की माँग घटती है और कुल माँग पर दबाव पड़ता है — इसी को महँगी मुद्रा नीति या संकुचनकारी नीति कहते हैं। मंदी में ठीक इसका उल्टा किया जाता है, दरें घटाकर ऋण सस्ता किया जाता है।
विकल्पों की बनावट भी यही संकेत देती है। (a) और (d) दोनों आवासीय ऋण की एक उप-श्रेणी की बात करते हैं, जबकि महँगी मुद्रा पूरे मुद्रा-बाज़ार की अवस्था है; (b) मुद्रा के मूल्य की बात करता है, उसकी क़ीमत की नहीं। केवल (c) ही उस अवस्था को ब्याज-दर के स्तर के रूप में परिभाषित करता है, और वही परिभाषा सही है।
अन्य विकल्प क्यों गलत हैं
- (a)आवासीय ऋणों पर निम्न ब्याज-दर — यह ठीक उल्टी अवस्था है। नीची ब्याज-दर का नाम ‘सस्ती मुद्रा’ है, ‘महँगी मुद्रा’ नहीं — विकल्प वही शब्द उठाता है जो प्रश्न में है और उसका अर्थ उलट देता है, इसलिए जल्दबाज़ी में यह ठीक दिखता है। दूसरी ग़लती दायरे की है: महँगी या सस्ती मुद्रा पूरे मुद्रा-बाज़ार की स्थिति बताती है, केवल आवासीय ऋण जैसी एक श्रेणी की नहीं। आवास ऋण की दर तो उस व्यापक अवस्था का एक परिणाम है — जब समग्र दरें चढ़ती हैं तो गृह-ऋण भी महँगा होता है।
- (b)मंदी की अवस्था में मुद्रा का मूल्य — यहाँ ‘मूल्य’ और ‘क़ीमत’ आपस में गड्डमड्ड हो गए हैं। मुद्रा का मूल्य उसकी क्रय-शक्ति है और वह मूल्य-स्तर से व्युत्क्रमानुपाती होता है; मुद्रा की क़ीमत ब्याज-दर है। ‘महँगी मुद्रा’ दूसरी बात कहता है, पहली नहीं। मंदी का उल्लेख भी भ्रामक है: मंदी में केंद्रीय बैंक प्रायः दरें घटाकर सस्ती मुद्रा की ओर जाता है, इसलिए मंदी को महँगी मुद्रा से जोड़ना उलटा सम्बन्ध बनाता है।
- (d)आवासीय ऋणों पर ब्याज की दर में कमी के कारण प्राप्त बचत — यह किसी उधारकर्ता की जेब में हुई बचत का वर्णन है, मुद्रा-बाज़ार की किसी अवस्था का नहीं। दर घटने पर मासिक किस्त में जो बचत होती है वह सस्ती मुद्रा का एक परिणाम है, और परिणाम को परिभाषा मान लेना यहाँ की चूक है। ध्यान दीजिए कि यह विकल्प भी दर में कमी की बात कर रहा है, यानी महँगी मुद्रा से उलटी दिशा में — दिशा और स्तर, दोनों ही ग़लत हैं।
अवधारणा
मुद्रा की दो अलग-अलग बातें प्रायः आपस में मिला दी जाती हैं, और यह प्रश्न ठीक उसी सीमा-रेखा पर खड़ा है। मुद्रा का मूल्य उसकी क्रय-शक्ति है — एक रुपये से कितना सामान आता है — और वह मूल्य-स्तर बढ़ने पर घटती है। मुद्रा की क़ीमत ब्याज-दर है — एक अवधि के लिए रुपया उधार लेने पर कितना चुकाना पड़ता है। ‘महँगी मुद्रा’ और ‘सस्ती मुद्रा’ दूसरी बात, यानी ब्याज-दर, के दो सिरे हैं।
महँगी मुद्रा नीति संकुचनकारी मौद्रिक नीति का दूसरा नाम है। इसके औज़ार परिचित हैं: नीतिगत दर (भारत में रेपो दर) बढ़ाना, बैंक दर बढ़ाना, नक़द आरक्षित अनुपात या सांविधिक तरलता अनुपात कड़ा करना, और खुले बाज़ार की क्रियाओं में प्रतिभूतियाँ बेचकर बैंकिंग तंत्र से तरलता खींचना। संचरण की कड़ी सीधी है — बैंकों के लिए निधि महँगी होती है, वे उधार-दरें बढ़ाते हैं, नए ऋण और उन पर टिकी माँग सिकुड़ती है, और मुद्रास्फीति का दबाव घटता है। इसकी क़ीमत निवेश और वृद्धि पर पड़ती है, इसीलिए यह नीति सदा एक संतुलन का प्रश्न रहती है।
सस्ती मुद्रा नीति इसका दर्पण-प्रतिबिम्ब है: दरें घटाकर ऋण सस्ता किया जाता है ताकि निवेश और उपभोग बढ़ें। मंदी और सुस्ती के दौर इसी नीति के दौर होते हैं।
भारत में यह नीति रिज़र्व बैंक चलाता है और उसका मुख्य नीतिगत औज़ार रेपो दर है — वह दर जिस पर बैंक सरकारी प्रतिभूतियों की ज़मानत पर रिज़र्व बैंक से अल्पकालिक निधि लेते हैं। रेपो दर बढ़ते ही बैंकों की सीमांत निधि-लागत बढ़ती है और उधार-दरें ऊपर खिसकती हैं; यही ‘महँगी मुद्रा’ की स्थिति है।
लचीली मुद्रास्फीति-लक्ष्य व्यवस्था के अंतर्गत उपभोक्ता मूल्य सूचकांक पर आधारित मुद्रास्फीति का लक्ष्य 4 प्रतिशत रखा गया है, जिसमें दो प्रतिशत बिंदु ऊपर-नीचे का दायरा है, और दर-सम्बन्धी निर्णय मौद्रिक नीति समिति करती है। यही ढाँचा तय करता है कि कब दरें कड़ी की जाएँ और कब ढीली।
परीक्षा की दृष्टि से यह पद उस परिवार का सदस्य है जिसमें सस्ती मुद्रा, हॉट मनी, नियर मनी और सुलभ मुद्रा जैसे पद आते हैं — सब अंग्रेज़ी से आए हुए, सब सुनने में एक-दूसरे जैसे, और सब अलग-अलग अर्थ रखने वाले।
मुख्य तथ्य
- ब्याज-दर ऋण की क़ीमत है; इसीलिए ऊँची दरों की अवस्था को ‘महँगी मुद्रा’ और नीची दरों की अवस्था को ‘सस्ती मुद्रा’ कहा जाता है।
- महँगी मुद्रा नीति संकुचनकारी होती है और मुख्यतः मुद्रास्फीति पर अंकुश लगाने के लिए अपनाई जाती है।
- इसके औज़ार हैं — रेपो दर व बैंक दर बढ़ाना, नक़द आरक्षित अनुपात और सांविधिक तरलता अनुपात कड़ा करना, तथा खुले बाज़ार में प्रतिभूतियाँ बेचना।
- रेपो दर वह दर है जिस पर रिज़र्व बैंक सरकारी प्रतिभूतियों की ज़मानत पर बैंकों को अल्पकालिक ऋण देता है; यही भारत की मुख्य नीतिगत दर है।
- मुद्रा का मूल्य (क्रय-शक्ति) मूल्य-स्तर से व्युत्क्रमानुपाती होता है और यह ब्याज-दर से भिन्न अवधारणा है — इसी भेद पर यह प्रश्न टिका है।
आगे की तैयारी
सामान्य भ्रम
- ‘महँगी मुद्रा’ को मुद्रा के अवमूल्यन या विनिमय दर से जोड़ लेना — वह विदेशी विनिमय बाज़ार का विषय है, जबकि यह पद घरेलू ब्याज-दर के स्तर का नाम है।
- इसे आवास ऋण जैसी किसी एक श्रेणी तक सीमित मान लेना, जबकि यह पूरे मुद्रा-बाज़ार की अवस्था बताता है और गृह-ऋण की दर तो उसका परिणाम भर है।
- मंदी को महँगी मुद्रा से जोड़ देना, जबकि मंदी में केंद्रीय बैंक सामान्यतः दरें घटाकर सस्ती मुद्रा की ओर जाता है।
इस प्रकार के प्रश्न में पूरा भार एक पारिभाषिक पद पर होता है और विकल्प जान-बूझकर उसी परिवार से उठाए जाते हैं। सुरक्षित तरीक़ा यह है कि पद को उसके मूल अंग्रेज़ी रूप में लौटाकर देखा जाए — ‘महँगी मुद्रा’ = dear money — और फिर पूछा जाए कि इसमें महँगा क्या हो रहा है: उधार, न कि सामान। EPFO और संघ लोक सेवा आयोग दोनों की परीक्षाओं में मौद्रिक नीति से जुड़े पद बार-बार आते हैं, कभी सीधी परिभाषा के रूप में और कभी ‘विस्तारकारी नीति का ब्याज-दर और आय पर क्या असर होगा’ जैसे कारण-परिणाम के रूप में। दोनों ही रूपों में मुद्रा के मूल्य और मुद्रा की क़ीमत का भेद ही निर्णायक होता है।
संबंधित PYQ
EPFO_APFC_2016_Q32खोलें व हल करें →How does an expansionary monetary policy affect the rate of interest and level of income ?
- (a) Raises the level of income but lowers the rate of interest
- (b) Raises the rate of interest but lowers the level of income
- (c) Raises both, the rate of interest and the level of income
- (d) Lowers both, the rate of interest and the level of income
उत्तर(a) Raises the level of income but lowers the rate of interest
इसी प्रश्नपत्र का वह प्रश्न जो विस्तारकारी मौद्रिक नीति का ब्याज-दर और आय के स्तर पर असर पूछता है — यानी सस्ती मुद्रा वाला सिरा।
अभ्यास
- practice — not a real PYQ
‘सस्ती मुद्रा’ (cheap money) की अवस्था सामान्यतः किसे निर्दिष्ट करती है ?
- (a)नीची ब्याज-दरें और सुलभ ऋण
- (b)विदेशी मुद्रा भंडार में गिरावट
- (c)मुद्रा का अवमूल्यन
- (d)प्रत्यक्ष करों में कटौती
उत्तर(a) नीची ब्याज-दरें और सुलभ ऋण
- practice — not a real PYQ
निम्नलिखित में से कौन-सा क़दम महँगी मुद्रा की दिशा में ले जाता है ?
- (a)खुले बाज़ार में सरकारी प्रतिभूतियाँ खरीदना
- (b)नक़द आरक्षित अनुपात घटाना
- (c)रेपो दर बढ़ाना
- (d)बैंक दर घटाना
उत्तर(c) रेपो दर बढ़ाना