निम्नलिखित कथनों में से कौन-सा, वितरण के सिद्धान्त की अंतर्वस्तु को सर्वोत्तम रूप से वर्णित करता है ?
- (a)अर्थव्यवस्था में विभिन्न व्यक्तियों के बीच आय का वितरण
- (b)केन्द्र तथा राज्य सरकारों के बीच आय का वितरण
- (c)संपत्ति तथा आय के न्यायसंगत वितरण का नियम
- (d)उपादान संसाधनों के स्वामियों के बीच आय का वितरण
उत्तर
क्यों
सही उत्तर — D, (d) उपादान संसाधनों के स्वामियों के बीच आय का वितरण — अर्थशास्त्र में वितरण के सिद्धांत का यही विषय है। यहाँ 'वितरण' का अर्थ सामाजिक न्याय की दृष्टि से आय बाँटना नहीं, बल्कि यह विश्लेषण है कि उत्पादन से जो आय बनती है वह उत्पादन के साधनों के बीच किस नियम से बँटती है — भूमि को लगान, श्रम को मज़दूरी, पूँजी को ब्याज और उद्यम को लाभ। इसे प्रकार्यात्मक वितरण कहा जाता है, क्योंकि प्रत्येक साधन को उसके प्रकार्य, अर्थात् उत्पादन में उसके योगदान के आधार पर प्रतिफल मिलता है। इसी कारण वितरण का सिद्धांत वस्तुतः उपादानों की क़ीमत का सिद्धांत है : जैसे वस्तु-बाज़ार में माँग और पूर्ति से वस्तु की क़ीमत तय होती है, वैसे ही उपादान-बाज़ार में उपादान की माँग और पूर्ति से उसका प्रतिफल तय होता है। सीमांत उत्पादकता का सिद्धांत इसी का प्रमुख रूप है, जिसके अनुसार प्रतिस्पर्धी बाज़ार में प्रत्येक उपादान को उसकी सीमांत उत्पादकता के मूल्य के बराबर प्रतिफल मिलता है। इस सिद्धांत के भीतर अलग-अलग उपादानों के अपने-अपने सिद्धांत भी आते हैं — लगान का सिद्धांत, मज़दूरी के सिद्धांत, ब्याज के सिद्धांत, और लाभ की व्याख्याएँ, जिनमें कुछ लाभ को जोखिम तथा अनिश्चितता का प्रतिफल मानती हैं और कुछ नवप्रवर्तन का। इसी कारण विकल्प (d) इस सिद्धांत की अंतर्वस्तु का सबसे सटीक वर्णन है और उत्तर वही है।
अन्य विकल्प क्यों गलत हैं
- (a)अर्थव्यवस्था में विभिन्न व्यक्तियों के बीच आय का वितरण — आयोग की कुंजी इस विकल्प को नहीं लेती, और यहाँ कारण भेद का है, असत्य का नहीं — इसलिए इसे ध्यान से पढ़िए। व्यक्तियों के बीच आय का वितरण अर्थशास्त्र का वास्तविक विषय है और उसे वैयक्तिक वितरण कहा जाता है : वह पूछता है कि कुल आय का कितना भाग किस आय-वर्ग के पास है, और उसका अध्ययन असमानता के मापों से होता है, जैसे लॉरेंज़ वक्र और गिनी गुणांक। किन्तु 'वितरण का सिद्धांत' पद परंपरागत रूप से प्रकार्यात्मक वितरण के लिए प्रयुक्त होता है, अर्थात् उपादानों के बीच आय के बँटवारे के लिए। दोनों के बीच संबंध भी है — व्यक्तियों की आय अंततः इसी बात से बनती है कि उनके पास कौन-से उपादान हैं और उनका प्रतिफल क्या है — पर प्रश्न सिद्धांत की अंतर्वस्तु पूछ रहा है, और वह अंतर्वस्तु उपादानों की है। यह भेद स्पष्ट रखिए, क्योंकि परीक्षा दोनों को आमने-सामने रखकर ही प्रश्न बनाती है।
- (b)केन्द्र तथा राज्य सरकारों के बीच आय का वितरण — यह विषय राजकोषीय संघवाद का है, वितरण के आर्थिक सिद्धांत का नहीं। केंद्र और राज्यों के बीच संसाधनों का बँटवारा संविधान की व्यवस्था और वित्त आयोग की संस्तुतियों से होता है : करों की शुद्ध आय का कितना भाग राज्यों को जाएगा, राज्यों के बीच उसका बँटवारा किन कसौटियों पर होगा, और सहायता अनुदान किन सिद्धांतों पर दिए जाएँगे। यह पूरी चर्चा लोक वित्त की है और उसका अपना शब्द-भंडार है — हस्तांतरण, विभाज्य पूल, ऊर्ध्वाधर तथा क्षैतिज असंतुलन। इसी प्रश्नपत्र में वित्त आयोग की भूमिका पर अलग प्रश्न भी है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि परीक्षक दोनों विषयों को अलग-अलग परखता है। इस विकल्प का आकर्षण केवल 'वितरण' शब्द से आता है, जो दोनों संदर्भों में प्रयुक्त होता है — और यही इस प्रश्न में शब्द के संदर्भ पर ध्यान देने की आवश्यकता दिखाता है।
- (c)संपत्ति तथा आय के न्यायसंगत वितरण का नियम — यह विकल्प वर्णनात्मक विश्लेषण को आदर्शात्मक प्रश्न से बदल देता है। वितरण का सिद्धांत यह बताता है कि आय वास्तव में किस नियम से बँटती है — यह एक कारण-आधारित विश्लेषण है; जबकि यह विकल्प पूछ रहा है कि आय किस प्रकार बँटनी चाहिए, जो न्याय और नीति का प्रश्न है और कल्याण-अर्थशास्त्र तथा राजनीतिक दर्शन के क्षेत्र में आता है। दोनों प्रश्न महत्त्वपूर्ण हैं, पर वे अलग-अलग हैं, और अर्थशास्त्र में इस भेद को 'जो है' और 'जो होना चाहिए' के भेद के रूप में पढ़ाया जाता है। भारतीय संदर्भ में न्यायसंगत वितरण का आदर्श नीति-निदेशक तत्त्वों में भी दिखाई देता है, जहाँ संपत्ति तथा उत्पादन के साधनों के संकेंद्रण को रोकने की बात कही गई है — पर वह संविधान की नीति है, वितरण के आर्थिक सिद्धांत की अंतर्वस्तु नहीं।
अवधारणा
अर्थशास्त्र में वितरण के दो अर्थ चलते हैं और उन्हें अलग रखना इस विषय की पहली शर्त है। प्रकार्यात्मक वितरण यह पूछता है कि उत्पादन से बनी आय उत्पादन के साधनों के बीच कैसे बँटती है — भूमि को लगान, श्रम को मज़दूरी, पूँजी को ब्याज और उद्यम को लाभ; यही 'वितरण का सिद्धांत' है और वस्तुतः यह उपादानों की क़ीमत का सिद्धांत है। वैयक्तिक वितरण यह पूछता है कि कुल आय का कितना भाग किन व्यक्तियों या परिवारों के पास है; इसका अध्ययन असमानता के मापों से होता है और उसका संबंध निर्धनता तथा कल्याण की चर्चा से है। प्रकार्यात्मक वितरण का प्रमुख आधुनिक रूप सीमांत उत्पादकता का सिद्धांत है, जिसके अनुसार प्रतिस्पर्धी बाज़ार में प्रत्येक उपादान को उसकी सीमांत उत्पादकता के मूल्य के बराबर प्रतिफल मिलता है; उपादान की माँग व्युत्पन्न माँग होती है, अर्थात् वह अंतिम उत्पाद की माँग से निकलती है। इसी ढाँचे के भीतर लगान, मज़दूरी, ब्याज और लाभ के अपने-अपने सिद्धांत आते हैं, और लाभ की व्याख्याओं में जोखिम, अनिश्चितता तथा नवप्रवर्तन को प्रमुख स्थान मिला है। इन सबको एक साथ पढ़ने पर यह खंड कुछ ही पृष्ठों में सिमट जाता है।
यह परिभाषा-प्रकार का प्रश्न है, पर उसकी कठिनाई सामान्य परिभाषा-प्रश्नों से भिन्न है : यहाँ चारों विकल्प 'वितरण' शब्द के चार वैध प्रयोगों की ओर संकेत करते हैं — उपादानों के बीच, व्यक्तियों के बीच, सरकारों के बीच, और न्याय की दृष्टि से। इसलिए यह प्रश्न वस्तुतः यह परखता है कि अभ्यर्थी को पारिभाषिक पद का ठीक-ठीक संदर्भ पता है या नहीं। ऐसे प्रश्नों में सबसे कारगर आदत यह है कि पद को उस पाठ्य-इकाई से जोड़कर याद रखा जाए जिसमें वह पढ़ाया जाता है : वितरण का सिद्धांत व्यष्टि अर्थशास्त्र की उस इकाई में आता है जहाँ उपादान-बाज़ार और उनकी क़ीमतें पढ़ाई जाती हैं, न कि लोक वित्त या कल्याण-अर्थशास्त्र में। यही कारण है कि इस कार्ड में विकल्प (a) के बारे में यह स्पष्ट कहा गया है कि वह भी एक वास्तविक धारणा है, पर दूसरे नाम से। हिन्दी स्तंभ में 'अंतर्वस्तु' अंग्रेज़ी के content का और 'उपादान संसाधन' factor resources का अनुवाद है, तथा स्टेम में 'कौन-सा,' के बाद का अल्पविराम छपाई के अनुसार है।
मुख्य तथ्य
- वितरण का सिद्धांत यह विश्लेषण करता है कि उत्पादन से बनी आय उपादानों के बीच किस नियम से बँटती है — भूमि को लगान, श्रम को मज़दूरी, पूँजी को ब्याज और उद्यम को लाभ; इसे प्रकार्यात्मक वितरण कहते हैं।
- प्रकार्यात्मक वितरण वस्तुतः उपादानों की क़ीमत का सिद्धांत है : उपादान-बाज़ार में उसकी माँग और पूर्ति से प्रतिफल तय होता है, ठीक वैसे ही जैसे वस्तु-बाज़ार में वस्तु की क़ीमत।
- सीमांत उत्पादकता के सिद्धांत के अनुसार प्रतिस्पर्धी बाज़ार में प्रत्येक उपादान को उसकी सीमांत उत्पादकता के मूल्य के बराबर प्रतिफल मिलता है; उपादान की माँग व्युत्पन्न माँग होती है।
- वैयक्तिक वितरण इससे भिन्न है : वह पूछता है कि कुल आय का कितना भाग किन व्यक्तियों के पास है, और उसका अध्ययन असमानता के मापों से होता है।
- केंद्र और राज्यों के बीच संसाधनों का बँटवारा राजकोषीय संघवाद का विषय है और वह संविधान की व्यवस्था तथा वित्त आयोग की संस्तुतियों से होता है, वितरण के आर्थिक सिद्धांत से नहीं।
आगे की तैयारी
सामान्य भ्रम
- 'वितरण' शब्द को सामान्य अर्थ में पढ़ लेना; इस पद का पारिभाषिक अर्थ उपादानों के बीच आय का बँटवारा है।
- वैयक्तिक और प्रकार्यात्मक वितरण को एक मान लेना, जबकि दोनों अलग-अलग प्रश्न पूछते हैं और अलग-अलग औज़ारों से पढ़े जाते हैं।
- राजकोषीय संघवाद के विषय को यहाँ ले आना; वह लोक वित्त का क्षेत्र है और उसकी अपनी शब्दावली है।
- वर्णनात्मक सिद्धांत को आदर्शात्मक प्रश्न से बदल देना — 'कैसे बँटती है' और 'कैसे बँटनी चाहिए' दो अलग बातें हैं।
अर्थशास्त्र के सैद्धांतिक खंड से प्रश्न तीन रूपों में आते हैं। पहला, पारिभाषिक पद की अंतर्वस्तु पूछना, जैसा यह प्रश्न है; यहाँ चारे उस शब्द के दूसरे वैध प्रयोगों से बनाए जाते हैं, इसलिए निर्णय संदर्भ पहचानने पर टिकता है। दूसरा, सिद्धांत और उसके प्रवर्तक का सुमेलन, अथवा किसी सिद्धांत की मूल मान्यता पूछना; इसी प्रश्नपत्र में असंतुलित संवृद्धि की प्राक्कल्पना पर ऐसा ही प्रश्न है। तीसरा, अनुप्रयोग का रूप — किसी सिद्धांत से निकलने वाला परिणाम पूछना, जैसे उपादान की माँग को व्युत्पन्न माँग क्यों कहा जाता है, जो इसी प्रश्नपत्र के अगले भाग में आता है। तीनों के लिए तैयारी की इकाई एक ही है : प्रत्येक पद के साथ उसकी एक-पंक्ति परिभाषा, वह पाठ्य-इकाई जिसमें वह पढ़ाया जाता है, और उसका निकटतम मिलता-जुलता पद। यही तीसरी बात इस प्रश्न में सबसे अधिक काम आती है, क्योंकि चारा ठीक वही निकटवर्ती प्रयोग है।
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- (a) 1 only
- (b) 3 only
- (c) 2 and 4 only
- (d) 1, 2, 3 and 4
उत्तर(b) 3 only
इसी प्रश्नपत्र का अगला प्रश्न, जिसमें पूछा गया है कि उत्पादन के कारक की माँग को व्युत्पन्न माँग क्यों कहा जाता है — वितरण के सिद्धांत का वही उपादान-बाज़ार वाला पक्ष, अनुप्रयोग के रूप में।
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- (a) 1 and 4 only
- (b) 1 and 3 only
- (c) 2 and 4 only
- (d) 2 and 3 only
उत्तर(b) 1 and 3 only
इसी प्रश्नपत्र का वित्त आयोग वाला प्रश्न — केंद्र और राज्यों के बीच संसाधनों के बँटवारे का वह विषय, जिसे विकल्प (b) यहाँ ग़लती से वितरण के सिद्धांत से जोड़ देता है।
अभ्यास
- practice — not a real PYQ
अर्थशास्त्र में प्रकार्यात्मक वितरण से क्या अभिप्राय है ?
- (a)उत्पादन के साधनों के बीच आय का बँटवारा
- (b)विभिन्न आय-वर्गों के बीच आय का बँटवारा
- (c)केंद्र और राज्यों के बीच करों का बँटवारा
- (d)उपभोक्ताओं के बीच वस्तुओं का बँटवारा
उत्तर(a) उत्पादन के साधनों के बीच आय का बँटवारा — अर्थात् भूमि को लगान, श्रम को मज़दूरी, पूँजी को ब्याज और उद्यम को लाभ। (b) वैयक्तिक वितरण है, (c) राजकोषीय संघवाद का विषय है, और (d) वस्तुओं के आवंटन की बात करता है।
- practice — not a real PYQ
सीमांत उत्पादकता के सिद्धांत के अनुसार प्रतिस्पर्धी बाज़ार में किसी उपादान को कितना प्रतिफल मिलता है ?
- (a)उसकी औसत उत्पादकता के बराबर
- (b)उसकी सीमांत उत्पादकता के मूल्य के बराबर
- (c)कुल उत्पादन के बराबर
- (d)सरकार द्वारा निर्धारित दर के बराबर
उत्तर(b) उसकी सीमांत उत्पादकता के मूल्य के बराबर — यही इस सिद्धांत का केंद्रीय निष्कर्ष है, और इसी से उपादान की माँग-वक्र निकलती है। औसत उत्पादकता और कुल उत्पादन अलग धारणाएँ हैं, और प्रतिस्पर्धी बाज़ार में प्रतिफल सरकार द्वारा निर्धारित नहीं होता।