भारत के संविधान के अधीन, निम्नलिखित कथनों में से कौन-से सही हैं ? 1. संविधान सर्वोच्च है । 2. संघ तथा राज्य सरकारों के बीच शक्तियों का स्पष्ट विभाजन है । 3. संविधान के संशोधनों के लिए विहित प्रक्रिया का अनुसरण करना होता है । 4. संघ की संसद् तथा राज्य विधानसभाएँ संप्रभु हैं । 5. मूल अधिकारों की परिधि को निर्धारित करने के लिए संविधान की उद्देशिका का अवलंब नहीं लिया जा सकता । नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए :
- (a)1, 2, 3, 4 और 5
- (b)केवल 2, 3 और 4
- (c)केवल 1, 4 और 5
- (d)केवल 1, 2 और 3
उत्तर
क्यों
सही उत्तर — D, (d) केवल 1, 2 और 3 — पहले तीन कथन भारतीय संविधान के सही विवरण हैं और अंतिम दो नहीं। कथन 1 सही है : भारत में संविधान सर्वोच्च है, अर्थात् विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका तीनों उसी से शक्ति पाती हैं और उसी की सीमाओं में काम करती हैं; संविधान के विरुद्ध बनी विधि न्यायालय द्वारा अविधिमान्य घोषित की जा सकती है। कथन 2 सही है : संघ और राज्यों के बीच शक्तियों का विभाजन सातवीं अनुसूची में तीन सूचियों — संघ सूची, राज्य सूची और समवर्ती सूची — के रूप में स्पष्ट रूप से किया गया है, और अवशिष्ट विषय संघ के पास हैं। कथन 3 भी सही है : संविधान में संशोधन मनमाने ढंग से नहीं, बल्कि अनुच्छेद 368 में दी गई विहित प्रक्रिया से ही किया जा सकता है, जिसमें कुछ उपबंधों के लिए संसद् के विशेष बहुमत के साथ आधे राज्यों का अनुसमर्थन भी आवश्यक है। कथन 4 ग़लत है : संघ की संसद् तथा राज्य विधानमंडल संप्रभु नहीं हैं — वे संविधान द्वारा सृजित हैं, अपनी-अपनी सूचियों के विषयों तक सीमित हैं, मूल अधिकारों से बँधे हैं और उनकी विधियाँ न्यायिक पुनर्विलोकन के अधीन हैं; यही भारत को ब्रिटिश व्यवस्था से अलग करता है, जहाँ संसदीय संप्रभुता का सिद्धांत चलता है। कथन 5 भी ग़लत है : उद्देशिका का अवलंब लिया जा सकता है — उच्चतम न्यायालय ने केशवानंद भारती के निर्णय में यह माना कि उद्देशिका संविधान का भाग है और उसका उपयोग संविधान की व्याख्या में किया जा सकता है। इसलिए सही कथन 1, 2 और 3 हैं और उत्तर (d) है।
अन्य विकल्प क्यों गलत हैं
- (a)1, 2, 3, 4 और 5 — यह विकल्प दोनों असत्य कथनों को भी सही मान लेता है। कथन 4 की भूल सबसे बुनियादी है : भारत में संप्रभुता जनता में निहित है और संविधान सर्वोच्च है, इसलिए विधायिकाएँ संप्रभु नहीं हो सकतीं — वे संविधान की उपज हैं और उसी की सीमाओं में काम करती हैं। यदि संसद् संप्रभु होती, तो कथन 1 झूठा हो जाता, क्योंकि दोनों बातें एक साथ नहीं चल सकतीं; और यही आपसी विरोध इस विकल्प को हटाने का सबसे तेज़ रास्ता है। कथन 5 की भूल न्यायिक इतिहास की है : उद्देशिका को व्याख्या का सहारा माना गया है, और केशवानंद भारती के निर्णय के बाद यह स्थिति स्पष्ट है कि वह संविधान का भाग है। इस प्रकार 'सभी सही' वाला विकल्प यहाँ दो अलग-अलग कारणों से गिरता है, और उनमें से एक कारण केवल तर्क से पकड़ा जा सकता है।
- (b)केवल 2, 3 और 4 — यह विकल्प कथन 1 को छोड़कर कथन 4 को उठा लेता है, अर्थात् संविधान की सर्वोच्चता के स्थान पर विधायिकाओं की संप्रभुता चुनता है — और ये दोनों बातें परस्पर विरोधी हैं। भारतीय व्यवस्था में विधायिका की शक्ति तीन प्रकार से सीमित है : विषय की दृष्टि से, क्योंकि संसद् और विधानमंडल अपनी-अपनी सूचियों तक बँधे हैं; अधिकारों की दृष्टि से, क्योंकि मूल अधिकारों का हनन करने वाली विधि अविधिमान्य होती है; और प्रक्रिया की दृष्टि से, क्योंकि संविधान में परिवर्तन साधारण विधि से नहीं, अनुच्छेद 368 की विहित प्रक्रिया से होता है। ब्रिटेन में ऐसा नहीं है, वहाँ संसद् की संप्रभुता का सिद्धांत चलता है और कोई लिखित संविधान नहीं है जो उसे सीमित करे। भारतीय संविधान ने ब्रिटिश संसदीय शासन-प्रणाली अपनाई अवश्य, पर संसदीय संप्रभुता नहीं — यही भेद इस विकल्प को असत्य बनाता है।
- (c)केवल 1, 4 और 5 — यह विकल्प एक सही कथन के साथ दोनों असत्य कथन जोड़ देता है, और इसकी भीतरी असंगति स्पष्ट है : यह एक ही साँस में कहता है कि संविधान सर्वोच्च है और यह भी कि विधायिकाएँ संप्रभु हैं। इसके अतिरिक्त यह कथन 5 भी उठाता है, जो उद्देशिका के विषय में न्यायालय की स्थिति के विपरीत है। उद्देशिका की कहानी परीक्षा की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण है : आरंभ में बेरुबारी संघ वाले मत में यह कहा गया था कि उद्देशिका संविधान का भाग नहीं है, यद्यपि वह निर्माताओं के मन को समझने की कुंजी है; बाद में केशवानंद भारती के निर्णय में यह स्थिति बदली और उद्देशिका को संविधान का भाग तथा व्याख्या का वैध सहारा माना गया। यही कारण है कि कथन 5 को सही मानना पुरानी और छोड़ी जा चुकी स्थिति को दोहराना है।
अवधारणा
भारतीय संविधान की चार बुनियादी विशेषताएँ इस प्रश्न के पीछे हैं। पहली, संविधान की सर्वोच्चता : संविधान ही सर्वोच्च विधि है, और विधायिका, कार्यपालिका तथा न्यायपालिका तीनों उसी से शक्ति पाती हैं; संविधान के विरुद्ध बनी विधि न्यायालय द्वारा अविधिमान्य घोषित की जा सकती है, जिसे न्यायिक पुनर्विलोकन कहते हैं। दूसरी, संघीय ढाँचा : सातवीं अनुसूची में संघ सूची, राज्य सूची और समवर्ती सूची के रूप में विषयों का विभाजन है और अवशिष्ट शक्तियाँ संघ के पास हैं; समवर्ती सूची में टकराव होने पर सामान्यतः संघ की विधि प्रभावी रहती है। तीसरी, संशोधन की विहित प्रक्रिया : अनुच्छेद 368 के अनुसार कुछ उपबंध संसद् के विशेष बहुमत से संशोधित होते हैं और कुछ के लिए आधे राज्यों का अनुसमर्थन भी चाहिए; इसके ऊपर उच्चतम न्यायालय ने केशवानंद भारती में मूल ढाँचे का सिद्धांत दिया, जिसके अनुसार संशोधन की शक्ति संविधान के मूल ढाँचे को नष्ट नहीं कर सकती। चौथी, उद्देशिका की स्थिति : वह संविधान के आदर्शों — संप्रभुता, समाजवाद, पंथनिरपेक्षता, लोकतंत्र, गणराज्य, न्याय, स्वतंत्रता, समता और बंधुता — की घोषणा है, उसे 1976 के संशोधन से एक बार बदला गया, और उसे व्याख्या का वैध सहारा माना जाता है।
यह पाँच कथनों वाला प्रश्न है, और पाँच कथन इस पुस्तिका में अपेक्षाकृत कम मिलते हैं — अधिकांश सूचियाँ तीन या चार कथनों की हैं। पाँच कथनों में लाभ यह है कि विकल्प एक-दूसरे से अधिक भिन्न होते हैं, इसलिए दो कथनों पर निश्चित निर्णय ले लेने से प्रायः एक ही विकल्प बचता है। यहाँ सबसे कारगर रास्ता यह है कि पहले कथन 4 को परखिए — क्योंकि वही सबसे स्पष्ट रूप से असत्य है और वह तीन विकल्पों में उपस्थित है। कथन 4 गिरते ही (a), (b) और (c) में से (b) तथा (c) संदिग्ध हो जाते हैं और (a) भी, इसलिए (d) की ओर संकेत मिल जाता है। इस प्रकार पाँच कथनों वाले प्रश्न में भी निर्णय एक या दो कथनों पर टिक जाता है, बशर्ते आप वह कथन चुनें जो सबसे अधिक विकल्पों में आता है। हिन्दी स्तंभ में पाँचों कथन अलग-अलग पंक्तियों में हैं और प्रत्येक दण्ड पर समाप्त होता है; 'संसद्' हलन्त सहित छपा है और अंग्रेज़ी के Preamble के लिए 'उद्देशिका' शब्द प्रयुक्त हुआ है। कथन 5 का निषेध सामान्य टाइप में है, मोटे अक्षरों में नहीं।
मुख्य तथ्य
- भारत में संविधान सर्वोच्च है और विधायिका, कार्यपालिका तथा न्यायपालिका तीनों उसी से शक्ति पाती हैं; संविधान के विरुद्ध बनी विधि न्यायिक पुनर्विलोकन में अविधिमान्य घोषित की जा सकती है।
- संघ और राज्यों के बीच विषयों का विभाजन सातवीं अनुसूची की तीन सूचियों — संघ, राज्य और समवर्ती — से होता है, और अवशिष्ट शक्तियाँ संघ के पास हैं।
- संविधान में संशोधन अनुच्छेद 368 की विहित प्रक्रिया से ही होता है; कुछ उपबंधों के लिए संसद् के विशेष बहुमत के साथ आधे राज्यों का अनुसमर्थन भी आवश्यक है।
- संघ की संसद् तथा राज्य विधानमंडल संप्रभु नहीं हैं — वे संविधान द्वारा सृजित हैं, सूचियों के विषयों तक सीमित हैं और मूल अधिकारों तथा न्यायिक पुनर्विलोकन से बँधे हैं; संसदीय संप्रभुता का सिद्धांत ब्रिटिश व्यवस्था का है।
- उद्देशिका को व्याख्या का सहारा माना जाता है : बेरुबारी संघ वाले मत में उसे संविधान का भाग नहीं माना गया था, पर केशवानंद भारती के निर्णय में उसे संविधान का भाग माना गया।
आगे की तैयारी
सामान्य भ्रम
- संसदीय शासन-प्रणाली और संसदीय संप्रभुता को एक मान लेना; भारत ने पहली अपनाई है, दूसरी नहीं।
- कथन 1 और कथन 4 को एक साथ सही मान लेना, जबकि संविधान की सर्वोच्चता और विधायिका की संप्रभुता परस्पर विरोधी हैं।
- उद्देशिका के विषय में पुरानी न्यायिक स्थिति दोहराना, जो केशवानंद भारती के निर्णय के बाद बदल चुकी है।
- पाँच कथनों वाले प्रश्न में सभी कथनों को क्रम से परखने में समय गँवाना, जबकि सबसे अधिक विकल्पों में आने वाला कथन पहले परखने से निर्णय शीघ्र हो जाता है।
राजव्यवस्था के इस खंड से प्रश्न तीन बनावटों में आते हैं। पहली, कथन-सूची, जैसा यह प्रश्न है, जिसमें संविधान की विशेषताओं के बारे में कुछ कथन देकर सही कथन छँटवाए जाते हैं; यहाँ असत्य कथन प्रायः दो प्रकार का होता है — या तो कोई ऐसा सिद्धांत जो दूसरी व्यवस्था का है, जैसे संसदीय संप्रभुता, या कोई ऐसी न्यायिक स्थिति जो बदल चुकी है, जैसे उद्देशिका के विषय में। दूसरी बनावट अनुच्छेद-आधारित है : कौन-सा अनुच्छेद किस विषय पर है, कौन-सी अनुसूची में क्या है। तीसरी बनावट न्यायिक निर्णय से जुड़ी है — किस निर्णय में कौन-सा सिद्धांत दिया गया। तीनों के लिए तैयारी की इकाई एक ही है : संविधान की मुख्य विशेषताओं की सूची, प्रमुख अनुच्छेदों की एक-पंक्ति सूची, और चार-पाँच ऐतिहासिक निर्णयों के नाम उनके सिद्धांत के साथ। इस प्रश्न में केवल पहली और तीसरी सूची से काम चल जाता है।
संबंधित PYQ
EPFO_APFC_2016_Q41खोलें व हल करें →If the Prime Minister of India is a member of the Rajya Sabha
- (a) He can make statements only in the Rajya Sabha
- (b) He has to become a member of the Lok Sabha within six months
- (c) He will not be able to speak on the budget in the Lok Sabha
- (d) He will not be able to vote in his favour in the event of a no-confidence motion
उत्तर(d) He will not be able to vote in his favour in the event of a no-confidence motion
इसी प्रश्नपत्र का वह प्रश्न, जिसमें राज्य सभा के सदस्य प्रधान मंत्री की स्थिति पूछी गई है — संसदीय व्यवस्था का वही ढाँचा, जिसकी सीमाएँ इस प्रश्न के कथनों में परखी जा रही हैं।
EPFO_EOAO_2017_Q83Which one of the following comes under the ‘State List’ under the Seventh Schedule of the Constitution of India?
- (a) Relief of the disabled and unemployable
- (b) Regulation of labour and safety in mines
- (c) Regulation and control of manufacture, supply and distribution of salt
- (d) Social security and social insurance
उत्तर(a) Relief of the disabled and unemployable
इसी परिवार का प्रश्न, जो सातवीं अनुसूची की राज्य सूची पर है — कथन 2 में वर्णित शक्तियों के विभाजन का व्यावहारिक रूप।
अभ्यास
- practice — not a real PYQ
उच्चतम न्यायालय के किस निर्णय में यह अभिनिर्धारित किया गया कि संविधान की उद्देशिका संविधान का भाग है ?
- (a)बेरुबारी संघ वाला मत
- (b)गोलकनाथ
- (c)केशवानंद भारती
- (d)मिनर्वा मिल्स
उत्तर(c) केशवानंद भारती — इसी निर्णय में उद्देशिका को संविधान का भाग माना गया और यही निर्णय मूल ढाँचे का सिद्धांत भी देता है। बेरुबारी संघ वाले मत में उद्देशिका को संविधान का भाग नहीं माना गया था, और गोलकनाथ तथा मिनर्वा मिल्स संशोधन-शक्ति से जुड़े अन्य प्रश्नों पर हैं।
- practice — not a real PYQ
भारतीय संविधान के संदर्भ में निम्नलिखित में से कौन-सा कथन सही है ?
- (a)संसद् संप्रभु है और उसकी विधियों का न्यायिक पुनर्विलोकन नहीं हो सकता
- (b)संविधान सर्वोच्च है और संसद् की विधियाँ न्यायिक पुनर्विलोकन के अधीन हैं
- (c)राज्य विधानमंडल संघ सूची के विषयों पर भी विधि बना सकते हैं
- (d)संविधान में संशोधन साधारण विधि की प्रक्रिया से किया जा सकता है
उत्तर(b) संविधान सर्वोच्च है और संसद् की विधियाँ न्यायिक पुनर्विलोकन के अधीन हैं — यही भारतीय व्यवस्था की पहचान है। (a) ब्रिटिश संसदीय संप्रभुता का वर्णन है, (c) सातवीं अनुसूची के विभाजन के विरुद्ध है, और (d) अनुच्छेद 368 की विहित प्रक्रिया की उपेक्षा करता है।