‘दि प्रॉब्लम ऑफ रूपी’ किसका DSc का शोध-प्रबंध था ?
- (a)श्री अरविन्द
- (b)डॉ. राजेन्द्र प्रसाद
- (c)पं. जवाहरलाल नेहरू
- (d)डॉ. भीमराव अम्बेडकर
उत्तर
क्यों
सही उत्तर — D, (d) डॉ. भीमराव अम्बेडकर — 'दि प्रॉब्लम ऑफ रूपी' उन्हीं का शोध-प्रबंध था, जो लंदन विश्वविद्यालय में लंदन स्कूल ऑफ़ इकोनॉमिक्स से डी.एस-सी. की उपाधि के लिए प्रस्तुत किया गया और 1923 में प्रकाशित हुआ। पूरा शीर्षक 'दि प्रॉब्लम ऑफ़ द रुपी : इट्स ओरिजिन ऐंड इट्स सोल्यूशन' है, और उसका विषय भारत की मुद्रा-व्यवस्था है — रुपये के मूल्य में हुए उतार-चढ़ाव का इतिहास, स्वर्णमान तथा स्वर्ण-विनिमय मान पर बहस, और मुद्रा के स्थायित्व के लिए क्या व्यवस्था होनी चाहिए। यह विषय उस समय भारत की सबसे बड़ी आर्थिक बहसों में था, और अम्बेडकर ने इसमें स्वर्ण-विनिमय मान की आलोचना करते हुए मुद्रा के मूल्य में स्थिरता को केंद्रीय कसौटी माना। उनका शैक्षिक पथ इस विषय के लिए तैयार ही था : कोलंबिया विश्वविद्यालय से उन्होंने अर्थशास्त्र में उच्च अध्ययन किया और वहाँ ब्रिटिश भारत के प्रांतीय वित्त के विकास पर शोध किया, तथा ईस्ट इंडिया कंपनी के प्रशासन और वित्त पर भी उनका आरंभिक कार्य है — अर्थात् उनके तीनों बड़े शोध-कार्य लोक वित्त और मुद्रा से जुड़े हैं। आगे चलकर उन्होंने भारतीय मुद्रा तथा वित्त पर बैठे शाही आयोग के सामने अपने विचार भी रखे, और उनके इन लेखों को भारत में केंद्रीय बैंकिंग की बहस से जोड़कर देखा जाता है। यही कारण है कि अम्बेडकर को केवल संविधान-निर्माता तथा समाज-सुधारक के रूप में जानना अधूरा है; प्रशिक्षण से वे अर्थशास्त्री थे, और यह प्रश्न ठीक उसी पक्ष को परखता है।
अन्य विकल्प क्यों गलत हैं
- (a)श्री अरविन्द — श्री अरविन्द का लेखन दर्शन, योग और राष्ट्रवादी विचार का है, अर्थशास्त्र का नहीं। उनका आरंभिक जीवन बंगाल के क्रांतिकारी राष्ट्रवाद से जुड़ा है — बंग-भंग के बाद के आंदोलन में उनकी भूमिका और उनके लेख प्रसिद्ध हैं — और बाद में वे पांडिचेरी चले गए, जहाँ उनका कार्य आध्यात्मिक साधना तथा दर्शन का रहा। उनकी प्रसिद्ध कृतियाँ इसी दिशा की हैं। इसलिए मुद्रा-व्यवस्था पर लिखा गया कोई शोध-प्रबंध उनके नाम से जुड़ना असंगत है। यह विकल्प उस अभ्यर्थी के लिए है जो प्रश्न में केवल एक अंग्रेज़ी शीर्षक और डी.एस-सी. जैसी उपाधि देखकर किसी भी विद्वान् व्यक्ति का नाम चुन लेता है। बचाव यह है कि हर नाम के साथ उसका क्षेत्र याद रखा जाए — दर्शन, अर्थशास्त्र, विधि, इतिहास — क्योंकि पुस्तक और लेखक वाले प्रश्नों में क्षेत्र ही पहली छँटनी करता है।
- (b)डॉ. राजेन्द्र प्रसाद — डॉ. राजेन्द्र प्रसाद विधि के विद्वान् और स्वतंत्रता संग्राम के अग्रणी नेता थे, संविधान सभा के अध्यक्ष रहे और स्वतंत्र भारत के प्रथम राष्ट्रपति बने। उनका लेखन मुख्यतः राष्ट्रीय आंदोलन, चंपारण के अनुभव और विभाजन से जुड़े प्रश्नों पर है, मुद्रा-अर्थशास्त्र पर नहीं। इस विकल्प का आकर्षण यह है कि उनके नाम के साथ भी 'डॉ.' लगा है, और प्रश्न में एक शोध-उपाधि की चर्चा है — इसलिए सतही समानता बन जाती है। यहाँ स्मरण रखने योग्य भेद यह है कि संविधान सभा के दो प्रमुख नाम अलग-अलग भूमिकाओं में हैं : राजेन्द्र प्रसाद सभा के अध्यक्ष थे और अम्बेडकर प्रारूप समिति के अध्यक्ष। पुस्तक-लेखक वाले प्रश्नों में ऐसी भूमिकाएँ ही सबसे अधिक बदली जाती हैं, इसलिए हर नाम के साथ उसकी एक प्रमुख कृति और एक प्रमुख भूमिका जोड़कर याद रखना उपयोगी है।
- (c)पं. जवाहरलाल नेहरू — जवाहरलाल नेहरू की प्रसिद्ध कृतियाँ इतिहास और आत्मकथा की कोटि की हैं — भारत की खोज, विश्व इतिहास की झलक और उनकी आत्मकथा — और वे विधि के विद्यार्थी रहे थे, अर्थशास्त्र के शोधकर्ता नहीं। उन्होंने आर्थिक विषयों पर लिखा और नियोजन की दिशा तय करने में उनकी भूमिका निर्णायक रही, पर वह नीति और राजनीति का लेखन है, किसी विश्वविद्यालय को प्रस्तुत शोध-प्रबंध नहीं। इस विकल्प का आकर्षण केवल परिचय का है : प्रश्न में जब कोई प्रसिद्ध पुस्तक और कोई प्रसिद्ध नाम एक साथ रखे जाएँ, तब सबसे परिचित नाम चुन लेने की प्रवृत्ति रहती है। इससे बचने का उपाय यह है कि पुस्तक के विषय को देखिए और फिर पूछिए कि वह किसके प्रशिक्षण-क्षेत्र से मेल खाता है — मुद्रा-व्यवस्था पर लिखा गया शोध-प्रबंध किसी प्रशिक्षित अर्थशास्त्री का ही होगा।
अवधारणा
डॉ. भीमराव अम्बेडकर का शैक्षिक और बौद्धिक जीवन तीन धाराओं में बँटा है, और परीक्षा तीनों से प्रश्न बनाती है। पहली धारा अर्थशास्त्र की है : उन्होंने कोलंबिया विश्वविद्यालय में अर्थशास्त्र का उच्च अध्ययन किया और ब्रिटिश भारत में प्रांतीय वित्त के विकास पर शोध किया; ईस्ट इंडिया कंपनी के प्रशासन तथा वित्त पर भी उनका आरंभिक कार्य है; और लंदन स्कूल ऑफ़ इकोनॉमिक्स में प्रस्तुत उनका शोध-प्रबंध 'दि प्रॉब्लम ऑफ़ द रुपी' 1923 में प्रकाशित हुआ, जिसमें रुपये के मूल्य की अस्थिरता, स्वर्णमान तथा स्वर्ण-विनिमय मान की बहस और मुद्रा-स्थायित्व के उपाय विवेचित हैं। दूसरी धारा विधि और संविधान की है : वे संविधान सभा की प्रारूप समिति के अध्यक्ष रहे और स्वतंत्र भारत के प्रथम विधि मंत्री बने। तीसरी धारा सामाजिक सुधार और अस्पृश्यता-विरोधी संघर्ष की है, जिसमें महाड़ का सत्याग्रह, मंदिर-प्रवेश के आंदोलन, पत्रिकाओं का प्रकाशन और अंततः बौद्ध धर्म की दीक्षा आती है। उन्हें 1990 में भारत रत्न से सम्मानित किया गया। इन तीनों धाराओं को अलग-अलग याद रखना चाहिए, क्योंकि प्रश्न प्रायः एक धारा का तथ्य दूसरी धारा के नाम से जोड़कर बनाया जाता है।
यह पुस्तक और लेखक वाला तथ्य-प्रश्न है, जिसमें चार परिचित नाम रखकर एक विशिष्ट कृति का कर्ता पूछा गया है। ऐसे प्रश्नों की हल-विधि दो चरणों की है : पहले पुस्तक का विषय पहचानिए, फिर देखिए कि वह विषय किस व्यक्ति के प्रशिक्षण या कार्य-क्षेत्र से मेल खाता है। यहाँ विषय मुद्रा-व्यवस्था है, और चारों नामों में केवल एक प्रशिक्षित अर्थशास्त्री है, इसलिए निर्णय सरल हो जाता है — बशर्ते अम्बेडकर का अर्थशास्त्री वाला पक्ष याद हो, जो प्रायः उनके संवैधानिक और सामाजिक योगदान की छाया में दब जाता है। यही इस प्रश्न की असली परीक्षा है। हिन्दी स्तंभ में पुस्तक का शीर्षक अनूदित नहीं किया गया, केवल देवनागरी में लिप्यन्तरित है और एकल उद्धरण-चिह्नों में छपा है, जबकि उपाधि का संक्षेप रोमन लिपि में ही रहा; नामों के साथ 'डॉ.' तथा 'पं.' के बिंदु भी वैसे ही छपे हैं। इससे यह भी दिखता है कि इस पुस्तिका में विदेशी शीर्षक अनुवाद के बजाय लिप्यन्तरण से दिए जाते हैं।
मुख्य तथ्य
- 'दि प्रॉब्लम ऑफ़ द रुपी : इट्स ओरिजिन ऐंड इट्स सोल्यूशन' डॉ. भीमराव अम्बेडकर का शोध-प्रबंध है, जो लंदन विश्वविद्यालय में डी.एस-सी. की उपाधि के लिए प्रस्तुत हुआ और 1923 में प्रकाशित हुआ।
- इस कृति का विषय भारत की मुद्रा-व्यवस्था है — रुपये के मूल्य की अस्थिरता, स्वर्णमान तथा स्वर्ण-विनिमय मान की बहस, और मुद्रा-स्थायित्व के उपाय।
- अम्बेडकर ने कोलंबिया विश्वविद्यालय में अर्थशास्त्र का उच्च अध्ययन किया और ब्रिटिश भारत में प्रांतीय वित्त के विकास पर शोध किया; ईस्ट इंडिया कंपनी के प्रशासन तथा वित्त पर भी उनका आरंभिक कार्य है।
- वे संविधान सभा की प्रारूप समिति के अध्यक्ष तथा स्वतंत्र भारत के प्रथम विधि मंत्री रहे, और उन्हें 1990 में भारत रत्न से सम्मानित किया गया।
- डॉ. राजेन्द्र प्रसाद संविधान सभा के अध्यक्ष तथा प्रथम राष्ट्रपति थे; जवाहरलाल नेहरू की प्रसिद्ध कृतियाँ भारत की खोज, विश्व इतिहास की झलक तथा उनकी आत्मकथा हैं।
आगे की तैयारी
सामान्य भ्रम
- अम्बेडकर को केवल संविधान-निर्माता तथा समाज-सुधारक मानना और उनके अर्थशास्त्री वाले पक्ष को भूल जाना — यही इस प्रश्न की मुख्य कसौटी है।
- 'डॉ.' उपाधि की समानता से भ्रमित होना, जो विकल्प (b) को कृत्रिम रूप से विश्वसनीय बनाती है।
- सबसे परिचित नाम चुन लेना; पुस्तक-लेखक वाले प्रश्नों में विषय-क्षेत्र देखे बिना अनुमान लगाना सबसे बड़ी भूल है।
- संविधान सभा की भूमिकाएँ आपस में बदल देना — प्रसाद सभा के अध्यक्ष थे और अम्बेडकर प्रारूप समिति के।
पुस्तक-लेखक वाले प्रश्न इन परीक्षाओं में तीन बनावटों में आते हैं। पहली, सीधा प्रश्न, जैसा यह है — किसी कृति का लेखक कौन है, या किसी लेखक की कौन-सी कृति है। दूसरी, सुमेलन — चार पुस्तकें और चार लेखक, जिनमें से कूट चुनना होता है; वहाँ एक निश्चित जोड़ी पहचानकर शेष विकल्प काटे जाते हैं। तीसरी, कथन-रूप — किसी लेखक के बारे में तीन-चार कथन देकर सही कथन छँटवाना, जिनमें प्रायः कृति, पद और वर्ष में से किसी एक को बदल दिया जाता है। तीनों बनावटों की तैयारी एक ही ढंग से होती है : प्रत्येक प्रमुख व्यक्ति के साथ उसका क्षेत्र, एक या दो प्रमुख कृतियाँ और एक प्रमुख पद लिख लीजिए। इस प्रश्न में यही सूची पर्याप्त है, क्योंकि पुस्तक का विषय अर्थशास्त्र है और सूची में केवल एक ही प्रशिक्षित अर्थशास्त्री है।
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उत्तर(a) Dhondo Keshav Karve
इसी परिवार का प्रश्न, जिसमें एक समाज-सुधारक की आत्मकथा के शीर्षक से उसका नाम पहचानना है — पुस्तक और लेखक वाले प्रश्नों की वही बनावट, जिसकी हल-विधि विषय-क्षेत्र से आरंभ होती है।
अभ्यास
- practice — not a real PYQ
डॉ. भीमराव अम्बेडकर की कृति 'दि प्रॉब्लम ऑफ़ द रुपी' का मुख्य विषय क्या है ?
- (a)भारत की मुद्रा-व्यवस्था तथा रुपये के मूल्य का प्रश्न
- (b)भारत में जाति-व्यवस्था का उद्भव
- (c)ब्रिटिश भारत की न्यायिक व्यवस्था
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उत्तर(a) भारत की मुद्रा-व्यवस्था तथा रुपये के मूल्य का प्रश्न — इसमें रुपये के मूल्य की अस्थिरता, स्वर्णमान तथा स्वर्ण-विनिमय मान की बहस और मुद्रा-स्थायित्व के उपाय विवेचित हैं। जाति-व्यवस्था पर उनका लेखन अलग कृतियों में है, और संविधान का प्रारूप उनके सार्वजनिक जीवन का कार्य है, कोई शोध-प्रबंध नहीं।
- practice — not a real PYQ
संविधान सभा की प्रारूप समिति के अध्यक्ष कौन थे ?
- (a)डॉ. राजेन्द्र प्रसाद
- (b)डॉ. भीमराव अम्बेडकर
- (c)जवाहरलाल नेहरू
- (d)सरदार वल्लभभाई पटेल
उत्तर(b) डॉ. भीमराव अम्बेडकर — वे प्रारूप समिति के अध्यक्ष थे, जबकि डॉ. राजेन्द्र प्रसाद संविधान सभा के अध्यक्ष थे। नेहरू ने उद्देश्य प्रस्ताव रखा था और पटेल कई अन्य समितियों से जुड़े थे, इसलिए ये भूमिकाएँ आपस में बदलकर पूछी जाती हैं।