मुद्रा-प्रसरण की मौद्रिक नीति किस प्रकार से ब्याज दर तथा आय स्तर को प्रभावित करती है ?
- (a)आय स्तर को बढ़ाती है परन्तु ब्याज दर को घटाती है
- (b)ब्याज दर को बढ़ाती है परन्तु आय स्तर को घटाती है
- (c)ब्याज दर तथा आय स्तर दोनों को बढ़ाती है
- (d)ब्याज दर तथा आय स्तर दोनों को घटाती है
उत्तर
क्यों
सही उत्तर — A, (a) आय स्तर को बढ़ाती है परन्तु ब्याज दर को घटाती है — मुद्रा-प्रसरण की मौद्रिक नीति का यही प्रभाव होता है, और उसका कारण-क्रम सीधा है। मुद्रा-प्रसरण का अर्थ है अर्थव्यवस्था में मुद्रा की पूर्ति बढ़ाना — केंद्रीय बैंक नीतिगत दर घटाकर, आरक्षित अनुपात कम करके अथवा खुले बाज़ार में प्रतिभूतियाँ ख़रीदकर ऐसा करता है। जब मुद्रा की पूर्ति बढ़ती है और आय अभी वहीं है, तो लोगों के पास लेन-देन की आवश्यकता से अधिक मुद्रा आ जाती है; वे उस अतिरिक्त मुद्रा से बॉण्ड और अन्य वित्तीय परिसंपत्तियाँ ख़रीदते हैं, जिससे उनकी क़ीमतें चढ़ती हैं और प्रतिफल, अर्थात् ब्याज दर, गिरती है। ब्याज दर गिरने से उधार लेना सस्ता होता है, इसलिए निवेश तथा उपभोग-व्यय बढ़ता है; बढ़े हुए व्यय से उत्पादन और रोज़गार बढ़ते हैं, और गुणक की क्रिया से आय का स्तर और ऊपर जाता है। इस प्रकार अंतिम स्थिति यह बनती है कि ब्याज दर पहले से नीची है और आय पहले से ऊँची — ठीक वही जो विकल्प (a) कहता है। इस प्रश्न का सबसे उपयोगी पक्ष यह है कि चारों विकल्प चार अलग-अलग नीतियों के परिणाम हैं : ब्याज दर बढ़े और आय घटे तो वह मुद्रा-संकुचन की मौद्रिक नीति है; दोनों बढ़ें तो वह प्रसारक राजकोषीय नीति है, जिसमें सरकारी व्यय बढ़ने से आय भी बढ़ती है और उधारी बढ़ने से ब्याज दर भी; और दोनों घटें तो वह संकुचनकारी राजकोषीय नीति है। इसलिए यहाँ केवल उत्तर याद रखना पर्याप्त नहीं, चारों संयोजनों को उनकी नीति से जोड़ लेना चाहिए।
अन्य विकल्प क्यों गलत हैं
- (b)ब्याज दर को बढ़ाती है परन्तु आय स्तर को घटाती है — यह मुद्रा-प्रसरण का नहीं, उसके ठीक विपरीत — मुद्रा-संकुचन की मौद्रिक नीति का परिणाम है। जब केंद्रीय बैंक मुद्रा की पूर्ति घटाता है, नीतिगत दर बढ़ाता है या खुले बाज़ार में प्रतिभूतियाँ बेचता है, तब बैंकिंग व्यवस्था में उपलब्ध कोष कम होते हैं, ब्याज दर चढ़ती है, उधार महँगा होने से निवेश तथा उपभोग घटते हैं और आय का स्तर नीचे आता है। ऐसी नीति प्रायः तब अपनाई जाती है जब मुद्रास्फीति को नीचे लाना हो, क्योंकि माँग घटाने से क़ीमतों पर दबाव कम होता है। इस प्रकार यह विकल्प अपने आप में एक सही कथन है, पर वह दूसरी नीति का सही कथन है — और यही इसे इस समुच्चय का सबसे व्यवस्थित चारा बनाता है। ऐसे प्रश्नों में सुरक्षित आदत यह है कि पहले नीति की दिशा पहचानिए — प्रसरण या संकुचन — और फिर परिणाम मिलाइए।
- (c)ब्याज दर तथा आय स्तर दोनों को बढ़ाती है — दोनों का एक साथ बढ़ना प्रसारक राजकोषीय नीति का लक्षण है, मौद्रिक प्रसरण का नहीं। जब सरकार व्यय बढ़ाती है या कर घटाती है, तब कुल माँग बढ़ने से आय ऊपर जाती है; किन्तु इस व्यय के लिए सरकार को उधार लेना पड़ता है, जिससे ऋण-बाज़ार में माँग बढ़ती है और ब्याज दर चढ़ती है — और ऊँची ब्याज दर निजी निवेश को कुछ मात्रा में हतोत्साहित करती है, जिसे बाहर धकेलने का प्रभाव कहा जाता है। मौद्रिक प्रसरण में यह नहीं होता, क्योंकि वहाँ आय की वृद्धि का रास्ता ही ब्याज दर के गिरने से होकर जाता है : पहले दर गिरती है, तब निवेश बढ़ता है, तब आय बढ़ती है। इसलिए मौद्रिक प्रसरण में ब्याज दर का बढ़ना उस कारण-क्रम को ही तोड़ देगा जिससे आय बढ़ती है। दोनों नीतियों के इस भेद पर परीक्षा में बार-बार प्रश्न बनते हैं।
- (d)ब्याज दर तथा आय स्तर दोनों को घटाती है — दोनों का एक साथ घटना संकुचनकारी राजकोषीय नीति का लक्षण है — सरकारी व्यय घटाने या कर बढ़ाने से कुल माँग घटती है, आय नीचे आती है, और सरकार की उधारी कम होने से ऋण-बाज़ार पर दबाव घटता है, जिससे ब्याज दर भी नरम पड़ती है। मुद्रा-प्रसरण में आय का घटना संभव ही नहीं, क्योंकि पूरी नीति का उद्देश्य ही माँग और उत्पादन को सहारा देना है। यह विकल्प उस अभ्यर्थी के लिए है जो 'प्रसरण' शब्द को केवल ब्याज दर से जोड़कर देखता है और आय पर पड़ने वाला प्रभाव जाँचे बिना दोनों को एक ही दिशा में घटा देता है। यहाँ यह याद रखना उपयोगी है कि मौद्रिक नीति में ब्याज दर और आय सामान्यतः विपरीत दिशाओं में चलती हैं, जबकि राजकोषीय नीति में वे एक ही दिशा में; यही एक वाक्य चारों विकल्पों को उनकी नीति से जोड़ देता है।
अवधारणा
मौद्रिक नीति केंद्रीय बैंक द्वारा मुद्रा की पूर्ति तथा ब्याज दर को प्रभावित करने की नीति है, और उसके दो रूप हैं : प्रसारक, जिसमें मुद्रा की पूर्ति बढ़ाई जाती है, और संकुचनकारी, जिसमें घटाई जाती है। भारत में इसके प्रमुख उपकरण नीतिगत दर, नक़द आरक्षित अनुपात, सांविधिक चलनिधि अनुपात और खुले बाज़ार की क्रियाएँ हैं; नीतिगत दर घटाना, आरक्षित अनुपात कम करना अथवा प्रतिभूतियाँ ख़रीदना प्रसरण के उपाय हैं। इसका संचरण-मार्ग तीन कड़ियों का है — मुद्रा की पूर्ति बढ़ने से ब्याज दर गिरती है, ब्याज दर गिरने से निवेश तथा टिकाऊ उपभोग बढ़ता है, और व्यय बढ़ने से गुणक के माध्यम से आय बढ़ती है। राजकोषीय नीति सरकार की होती है और वह व्यय तथा कराधान से माँग को प्रभावित करती है; उसके प्रसारक रूप में आय भी बढ़ती है और ब्याज दर भी, क्योंकि सरकारी उधारी ऋण-बाज़ार पर दबाव डालती है। इन दोनों नीतियों के परिणामों को एक छोटी सारणी में रख लेना चाहिए : मौद्रिक प्रसरण में आय ऊपर तथा ब्याज दर नीचे; मौद्रिक संकुचन में आय नीचे तथा ब्याज दर ऊपर; राजकोषीय प्रसरण में दोनों ऊपर; राजकोषीय संकुचन में दोनों नीचे। भारत में मौद्रिक नीति अब लचीली मुद्रास्फीति-लक्ष्यीकरण के ढाँचे में तय होती है, जिसमें निर्णय एक समिति करती है।
यह शुद्ध सिद्धांत का प्रश्न है और इसकी बनावट पूर्ण है : दो चरों — ब्याज दर और आय — की दो-दो दिशाएँ मिलाकर चार संभावित संयोजन बनते हैं, और चारों विकल्पों में वही चार संयोजन रखे गए हैं। ऐसी बनावट में अनुमान का कोई लाभ नहीं मिलता, क्योंकि कोई विकल्प अपने आप में असंगत नहीं है; प्रत्येक किसी न किसी नीति का सही परिणाम है। इसलिए यहाँ केवल एक ही रास्ता है — नीति का संचरण-मार्ग याद हो। यही कारण है कि यह प्रश्न उन प्रश्नों में है जो तैयारी की गुणवत्ता को सीधे नापते हैं। एक व्यावहारिक सूत्र भी है, जो इस पूरे खंड में काम आता है : मौद्रिक नीति में आय और ब्याज दर विपरीत दिशाओं में चलती हैं, राजकोषीय नीति में एक ही दिशा में। हिन्दी स्तंभ की एक छोटी बात दर्ज करने योग्य है : विकल्प (c) और (d) में 'दोनों' के बाद कोई अल्पविराम नहीं है, जबकि अंग्रेज़ी स्तंभ में वहीं अल्पविराम छपा है; अर्थ पर इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ता।
मुख्य तथ्य
- मुद्रा-प्रसरण की मौद्रिक नीति में मुद्रा की पूर्ति बढ़ने से ब्याज दर गिरती है, निवेश तथा उपभोग बढ़ते हैं और गुणक के माध्यम से आय का स्तर ऊपर जाता है।
- इसके प्रमुख उपकरण हैं — नीतिगत दर घटाना, नक़द आरक्षित अनुपात या सांविधिक चलनिधि अनुपात कम करना, और खुले बाज़ार में प्रतिभूतियाँ ख़रीदना।
- मुद्रा-संकुचन की मौद्रिक नीति का परिणाम उलटा होता है — ब्याज दर ऊपर और आय नीचे; ऐसी नीति प्रायः मुद्रास्फीति को नीचे लाने के लिए अपनाई जाती है।
- प्रसारक राजकोषीय नीति में आय भी बढ़ती है और ब्याज दर भी, क्योंकि सरकारी उधारी ऋण-बाज़ार पर दबाव डालती है; इससे निजी निवेश के बाहर धकेले जाने की स्थिति बनती है।
- स्मरण का सूत्र यह है कि मौद्रिक नीति में आय और ब्याज दर विपरीत दिशाओं में चलती हैं, जबकि राजकोषीय नीति में दोनों एक ही दिशा में।
आगे की तैयारी
सामान्य भ्रम
- नीति की दिशा पहचाने बिना परिणाम मिलाना; विकल्प (b) मुद्रा-संकुचन का सही परिणाम है और इसी कारण भ्रम पैदा करता है।
- मौद्रिक और राजकोषीय नीति के परिणामों को आपस में बदल देना — दोनों का एक साथ बढ़ना राजकोषीय प्रसरण का लक्षण है।
- संचरण-मार्ग की बीच की कड़ी छोड़ देना; आय इसीलिए बढ़ती है कि पहले ब्याज दर गिरती है और निवेश बढ़ता है।
- इस प्रकार के पूर्ण-संयोजन वाले प्रश्न में अनुमान लगाना, जहाँ चारों विकल्प किसी न किसी नीति के सही परिणाम होते हैं।
व्यष्टि तथा समष्टि अर्थशास्त्र का यह खंड इन परीक्षाओं में तीन ढंगों से आता है। पहला, कारण-परिणाम का सीधा प्रश्न, जैसा यह है : किसी नीति का ब्याज दर, आय, मुद्रास्फीति अथवा विनिमय दर पर क्या प्रभाव पड़ेगा। दूसरा, उपकरण की पहचान — कौन-सा उपाय प्रसरण का है और कौन-सा संकुचन का, अथवा कौन-सा उपकरण किस संस्था के पास है। तीसरा, संस्थागत तथा सांविधिक प्रश्न — मुद्रास्फीति का लक्ष्य कौन निर्धारित करता है, निर्णय कौन-सी समिति लेती है, उसकी संरचना क्या है; इसी परिवार के एक अन्य प्रश्नपत्र में यही पूछा गया है। तीनों के लिए तैयारी की इकाई एक ही सारणी है : एक ओर चार नीतियाँ — मौद्रिक प्रसरण, मौद्रिक संकुचन, राजकोषीय प्रसरण, राजकोषीय संकुचन — और दूसरी ओर उनके उपकरण तथा उनके परिणाम। यह सारणी बना लेने पर इस खंड के अधिकांश प्रश्न याद से नहीं, तर्क से निकल आते हैं।
संबंधित PYQ
EPFO_EOAO_2023_Q111Consider the following statements : Statement I : In India, Central Government determines the inflation target, in consultation with Reserve Bank of India, in terms of Consumer Price Index once in five years. Statement II : At present, the Monetary Policy framework in India is operated by Central Government. Which of the following is correct in respect of the above statements ?
- (a) Both statement I and statement II are correct and statement II is the correct explanation for statement I
- (b) Both statement I and statement II are correct and statement II is not the correct explanation for statement I
- (c) Statement I is correct but statement II is incorrect
- (d) Statement I is incorrect but statement II is correct
उत्तर(c) Statement I is correct but statement II is incorrect
इसी परिवार का प्रश्न, जिसमें मुद्रास्फीति का लक्ष्य निर्धारित करने की व्यवस्था पर कथन दिए गए हैं — वही मौद्रिक नीति का ढाँचा, जिसके भीतर प्रसरण तथा संकुचन के निर्णय लिए जाते हैं।
अभ्यास
- practice — not a real PYQ
प्रसारक राजकोषीय नीति का ब्याज दर तथा आय स्तर पर सामान्यतः क्या प्रभाव पड़ता है ?
- (a)दोनों घटते हैं
- (b)दोनों बढ़ते हैं
- (c)आय बढ़ती है और ब्याज दर घटती है
- (d)आय घटती है और ब्याज दर बढ़ती है
उत्तर(b) दोनों बढ़ते हैं — सरकारी व्यय बढ़ने या कर घटने से कुल माँग तथा आय बढ़ती है, और सरकार की बढ़ी हुई उधारी से ऋण-बाज़ार में ब्याज दर चढ़ती है। आय का बढ़ना और ब्याज दर का घटना मौद्रिक प्रसरण का लक्षण है, राजकोषीय प्रसरण का नहीं।
- practice — not a real PYQ
निम्नलिखित में से कौन-सा उपाय मुद्रा-प्रसरण की मौद्रिक नीति का अंग है ?
- (a)नक़द आरक्षित अनुपात बढ़ाना
- (b)खुले बाज़ार में सरकारी प्रतिभूतियाँ बेचना
- (c)खुले बाज़ार में सरकारी प्रतिभूतियाँ ख़रीदना
- (d)नीतिगत दर बढ़ाना
उत्तर(c) खुले बाज़ार में सरकारी प्रतिभूतियाँ ख़रीदना — इससे बैंकिंग व्यवस्था में चलनिधि बढ़ती है और ब्याज दर पर नरमी आती है। शेष तीनों उपाय मुद्रा की पूर्ति घटाते हैं और इसलिए संकुचनकारी हैं।