‘असंतुलित’ संवृद्धि तब प्राक्कल्पित होती है, जब
- (a)प्रसार, विविध संवृद्धि मार्गों पर साथ-साथ हो सकता हो
- (b)श्रम की पूर्ति नियत हो
- (c)पूँजी की पूर्ति असीमित हो
- (d)सक्रिय क्षेत्रकों के लिए आवश्यक होता है कि वे मंद पड़े क्षेत्रकों को क्रियाशील बनाएँ और वे उन्हें क्रियाशील बनाते हैं
उत्तर
क्यों
सही उत्तर — D, (d) सक्रिय क्षेत्रकों के लिए आवश्यक होता है कि वे मंद पड़े क्षेत्रकों को क्रियाशील बनाएँ और वे उन्हें क्रियाशील बनाते हैं — यही असंतुलित संवृद्धि की मूल प्राक्कल्पना है। इस विचारधारा के प्रमुख प्रवक्ता अल्बर्ट ओ. हर्शमन थे, जिन्होंने अपनी पुस्तक 'दि स्ट्रैटेजी ऑफ़ इकॉनॉमिक डेवलपमेंट' (1958) में यह तर्क रखा कि अल्पविकसित अर्थव्यवस्था के पास इतने संसाधन होते ही नहीं कि वह सभी क्षेत्रकों में एक साथ निवेश कर सके, इसलिए जानबूझकर कुछ चुने हुए क्षेत्रकों में निवेश करना चाहिए। ऐसा निवेश अर्थव्यवस्था में असंतुलन पैदा करता है — कहीं अभाव, कहीं अतिरेक — और यही असंतुलन आगे के निवेश के लिए दबाव तथा प्रेरणा बनता है। हर्शमन ने इसे कड़ियों की भाषा में समझाया : पश्चगामी कड़ी वह है जिसमें कोई उद्योग अपने कच्चे माल की माँग पैदा करके पीछे के उद्योगों को खड़ा करता है, और अग्रगामी कड़ी वह है जिसमें उसका उत्पाद आगे के उद्योगों के लिए कच्चा माल बन जाता है। इस प्रकार सक्रिय क्षेत्रक मंद पड़े क्षेत्रकों को खींचकर क्रियाशील बना देते हैं, और विकास एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र तक फैलता है। विकल्प (d) ठीक यही कहता है, और उसमें 'आवश्यक होता है' तथा 'बनाते हैं' दोनों बातें हैं — अर्थात् दबाव भी और परिणाम भी। यही इस सिद्धांत का सार है, इसलिए उत्तर (d) है। ध्यान दीजिए कि यह सिद्धांत संतुलित संवृद्धि की विचारधारा के विरोध में खड़ा किया गया था, जिसमें कहा जाता है कि सभी क्षेत्रकों में एक साथ निवेश होना चाहिए ताकि एक-दूसरे के लिए बाज़ार बन सके — और वही बात विकल्प (a) में छपी है।
अन्य विकल्प क्यों गलत हैं
- (a)प्रसार, विविध संवृद्धि मार्गों पर साथ-साथ हो सकता हो — यह विकल्प असंतुलित संवृद्धि का नहीं, उसकी प्रतिद्वंद्वी विचारधारा — संतुलित संवृद्धि — का विवरण है, और यही इसे इस समुच्चय का सबसे प्रबल चारा बनाता है। संतुलित संवृद्धि का तर्क यह है कि अल्पविकसित अर्थव्यवस्था में बाज़ार का आकार ही सबसे बड़ी बाधा है : कोई एक उद्योग अकेले खड़ा हो जाए तो उसका उत्पाद ख़रीदने वाला नहीं मिलता, इसलिए अनेक उद्योगों में एक साथ निवेश करना चाहिए ताकि एक उद्योग के श्रमिक दूसरे उद्योग के उत्पाद के ग्राहक बनें और आपस में माँग पैदा हो। रैग्नर नर्कसे ने इसे निर्धनता के दुश्चक्र के संदर्भ में रखा और रोज़नस्टीन-रोडान ने 'बड़े धक्के' के रूप में। यह विचार अपने आप में महत्त्वपूर्ण है, पर प्रश्न विशेष रूप से 'असंतुलित' संवृद्धि की प्राक्कल्पना पूछ रहा है — और वह ठीक इसका उलटा है। इसीलिए स्टेम में 'असंतुलित' शब्द उद्धरण-चिह्नों में छापा गया है, जो स्वयं एक संकेत है कि पद पारिभाषिक है।
- (b)श्रम की पूर्ति नियत हो — यह विकल्प असंतुलित संवृद्धि से जुड़ा नहीं है, और विकास-अर्थशास्त्र की मानक मान्यता को उलट भी देता है। अल्पविकसित अर्थव्यवस्थाओं के प्रतिष्ठित प्रतिरूप में — विशेषकर आर्थर लुइस के द्वैत अर्थव्यवस्था वाले प्रतिरूप में — मान्यता यह रहती है कि निर्वाह-क्षेत्र में श्रम की असीमित पूर्ति उपलब्ध है, अर्थात् कृषि से श्रमिक बिना उत्पादन घटाए आधुनिक क्षेत्र में लाए जा सकते हैं। श्रम की पूर्ति को नियत मान लेना उस परिस्थिति का वर्णन है जिसमें श्रम दुर्लभ हो, और वह विकसित अर्थव्यवस्था की स्थिति के अधिक निकट है। इस प्रकार यह विकल्प न तो हर्शमन के सिद्धांत की प्राक्कल्पना है और न ही अल्पविकसित अर्थव्यवस्था के सामान्य विवरण की। परीक्षा में ऐसे विकल्प इसीलिए रखे जाते हैं कि वे पारिभाषिक तो लगें, पर उनका संबंध पूछे गए सिद्धांत से न हो।
- (c)पूँजी की पूर्ति असीमित हो — यह विकल्प उस मान्यता को उलट देता है जिस पर पूरा विकास-अर्थशास्त्र खड़ा है : अल्पविकसित अर्थव्यवस्था की केंद्रीय समस्या ही पूँजी की दुर्लभता है, असीमितता नहीं। यदि पूँजी असीमित होती तो संतुलित और असंतुलित संवृद्धि का विवाद ही उत्पन्न न होता, क्योंकि तब सभी क्षेत्रकों में एक साथ निवेश किया जा सकता था और चुनाव की आवश्यकता नहीं रहती। हर्शमन का पूरा तर्क ही यह है कि संसाधन सीमित हैं, इसलिए उन्हें चुने हुए क्षेत्रकों में लगाना पड़ेगा और शेष क्षेत्रक कड़ियों के माध्यम से खिंचकर आएँगे। इस दृष्टि से यह विकल्प न केवल ग़लत है, बल्कि प्रश्न के सिद्धांत की पूर्व-शर्त का ही खंडन करता है। ऐसे प्रश्नों में यह जाँच बहुत काम आती है : विकल्प को सत्य मान लेने पर क्या पूछे गए सिद्धांत की आवश्यकता बचती है — यदि नहीं, तो वह विकल्प उसकी प्राक्कल्पना हो ही नहीं सकता।
अवधारणा
विकास-अर्थशास्त्र में संवृद्धि की रणनीति को लेकर दो प्रतिद्वंद्वी विचारधाराएँ हैं, और परीक्षा प्रायः उन्हीं को आमने-सामने रखकर पूछती है। संतुलित संवृद्धि का तर्क यह है कि अल्पविकसित अर्थव्यवस्था में बाज़ार का छोटा आकार ही मुख्य बाधा है, इसलिए अनेक उद्योगों में एक साथ निवेश करना चाहिए ताकि वे एक-दूसरे के लिए माँग पैदा करें; रैग्नर नर्कसे का निर्धनता का दुश्चक्र और रोज़नस्टीन-रोडान का बड़े धक्के का विचार इसी धारा के हैं। असंतुलित संवृद्धि का तर्क इसके विपरीत है : संसाधन इतने सीमित हैं कि सब कुछ एक साथ नहीं हो सकता, इसलिए चुने हुए क्षेत्रकों में निवेश करके जानबूझकर असंतुलन पैदा करना चाहिए, क्योंकि वही असंतुलन आगे के निवेश की प्रेरणा बनता है। अल्बर्ट ओ. हर्शमन इसके प्रमुख प्रवक्ता हैं और उनकी पुस्तक 'दि स्ट्रैटेजी ऑफ़ इकॉनॉमिक डेवलपमेंट' 1958 की है; उनकी दो प्रसिद्ध धारणाएँ पश्चगामी और अग्रगामी कड़ियाँ हैं। इसी क्षेत्र के अन्य नाम भी साथ याद रखने योग्य हैं : आर्थर लुइस का श्रम की असीमित पूर्ति वाला द्वैत प्रतिरूप, और गुन्नार मिर्डाल की चक्रीय संचयी कार्य-कारणता, जिसमें प्रतिकूल तथा अनुकूल प्रभावों का विवेचन है।
यह शुद्ध सिद्धांत-प्रश्न है, जिसमें एक पारिभाषिक पद देकर उसकी मूल प्राक्कल्पना पूछी गई है, और इसकी बनावट में एक जोड़ी छिपी है : विकल्प (a) और विकल्प (d) एक-दूसरे के विपरीत हैं, अर्थात् एक संतुलित संवृद्धि का विवरण है और दूसरा असंतुलित का। ऐसे प्रश्न में सबसे पहले यह देखिए कि क्या दो विकल्प आपस में विरोधी हैं — यदि हैं, तो उत्तर प्रायः उन्हीं दोनों में से एक होता है, और शेष दो विकल्प केवल संख्या पूरी करने के लिए होते हैं। इसके बाद निर्णय स्टेम के पारिभाषिक शब्द पर टिक जाता है, जो यहाँ 'असंतुलित' है और जिसे पुस्तिका ने उद्धरण-चिह्नों में छापा है। यह चिह्न स्वयं संकेत है कि शब्द सामान्य अर्थ में नहीं, सिद्धांत के नाम के रूप में प्रयुक्त है। हिन्दी स्तंभ में स्टेम 'जब' पर बिना विराम-चिह्न के छूटता है और विकल्प उसे पूरा करते हैं, ठीक वैसे ही जैसे अंग्रेज़ी स्तंभ में; 'होती है, जब' का अल्पविराम छपाई के अनुसार है।
मुख्य तथ्य
- असंतुलित संवृद्धि का सिद्धांत कहता है कि सीमित संसाधनों वाली अर्थव्यवस्था में चुने हुए क्षेत्रकों में निवेश करके जानबूझकर असंतुलन पैदा करना चाहिए, क्योंकि वही असंतुलन आगे के निवेश की प्रेरणा बनता है।
- इसके प्रमुख प्रवक्ता अल्बर्ट ओ. हर्शमन हैं, जिनकी पुस्तक 'दि स्ट्रैटेजी ऑफ़ इकॉनॉमिक डेवलपमेंट' 1958 में प्रकाशित हुई।
- हर्शमन की दो प्रसिद्ध धारणाएँ पश्चगामी और अग्रगामी कड़ियाँ हैं : पहली में उद्योग अपने कच्चे माल की माँग पैदा करके पीछे के उद्योग खड़े करता है, दूसरी में उसका उत्पाद आगे के उद्योगों का कच्चा माल बनता है।
- संतुलित संवृद्धि की प्रतिद्वंद्वी विचारधारा कहती है कि अनेक क्षेत्रकों में एक साथ निवेश होना चाहिए ताकि वे एक-दूसरे के लिए बाज़ार बनें; रैग्नर नर्कसे और रोज़नस्टीन-रोडान इसी धारा के हैं।
- आर्थर लुइस के द्वैत अर्थव्यवस्था वाले प्रतिरूप में श्रम की असीमित पूर्ति मानी जाती है और पूँजी दुर्लभ; इसलिए 'श्रम की पूर्ति नियत' तथा 'पूँजी की पूर्ति असीमित' दोनों मान्यताएँ इस साहित्य की सामान्य मान्यताओं के उलट हैं।
आगे की तैयारी
सामान्य भ्रम
- संतुलित और असंतुलित संवृद्धि के विवरणों को आपस में बदल देना; विकल्प (a) और (d) ठीक यही जोड़ी बनाते हैं।
- पारिभाषिक पद को सामान्य अर्थ में पढ़ लेना, जबकि उद्धरण-चिह्न स्वयं बताते हैं कि 'असंतुलित' यहाँ सिद्धांत का नाम है।
- विकास-अर्थशास्त्र की मानक मान्यताओं को उलट देना — पूँजी दुर्लभ मानी जाती है और श्रम की पूर्ति प्रचुर, न कि इसके विपरीत।
- अर्थशास्त्रियों और उनके सिद्धांतों की जोड़ी न बना पाना; यह खंड प्रायः सुमेलन के रूप में भी पूछा जाता है।
विकास-अर्थशास्त्र से प्रश्न तीन बनावटों में आते हैं। पहली, सिद्धांत की परिभाषा या प्राक्कल्पना पूछना, जैसा यह प्रश्न है; यहाँ प्रायः दो विकल्प एक-दूसरे के विपरीत रखे जाते हैं और निर्णय स्टेम के पारिभाषिक शब्द पर टिकता है। दूसरी, अर्थशास्त्री और सिद्धांत अथवा पुस्तक का सुमेलन — हर्शमन के साथ असंतुलित संवृद्धि, नर्कसे के साथ निर्धनता का दुश्चक्र, लुइस के साथ श्रम की असीमित पूर्ति, मिर्डाल के साथ चक्रीय संचयी कार्य-कारणता। तीसरी, नीति में उतरा हुआ रूप — भारत की पंचवर्षीय योजनाओं में किस रणनीति का अनुसरण हुआ और उसके परिणाम क्या रहे। तीनों के लिए तैयारी की इकाई एक ही सारणी है, जिसमें अर्थशास्त्री, सिद्धांत का नाम, उसकी एक-पंक्ति परिभाषा और उसकी प्रमुख पुस्तक लिखी हो; इतनी तैयारी से इस खंड के अधिकांश प्रश्न कुछ सेकंड में निकल आते हैं।
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इसी प्रश्नपत्र का दूसरा शुद्ध सिद्धांत-प्रश्न, जिसमें वितरण के सिद्धांत की अंतर्वस्तु पूछी गई है — वही बनावट, जहाँ विकल्प एक पारिभाषिक पद के मिलते-जुलते विवरण होते हैं।
अभ्यास
- practice — not a real PYQ
पश्चगामी तथा अग्रगामी कड़ियों की धारणा तथा असंतुलित संवृद्धि का सिद्धांत मुख्यतः किस अर्थशास्त्री से जुड़ा है ?
- (a)रैग्नर नर्कसे
- (b)अल्बर्ट ओ. हर्शमन
- (c)आर्थर लुइस
- (d)रोज़नस्टीन-रोडान
उत्तर(b) अल्बर्ट ओ. हर्शमन — उन्होंने 1958 की अपनी पुस्तक में असंतुलित संवृद्धि का तर्क रखा और पश्चगामी तथा अग्रगामी कड़ियों की धारणा दी। नर्कसे तथा रोज़नस्टीन-रोडान संतुलित संवृद्धि और बड़े धक्के के विचार से जुड़े हैं, और लुइस श्रम की असीमित पूर्ति वाले द्वैत प्रतिरूप से।
- practice — not a real PYQ
संतुलित संवृद्धि के सिद्धांत का मुख्य तर्क निम्नलिखित में से क्या है ?
- (a)केवल कृषि क्षेत्र में निवेश करना चाहिए
- (b)अनेक क्षेत्रकों में एक साथ निवेश करना चाहिए ताकि वे एक-दूसरे के लिए माँग तथा बाज़ार बनाएँ
- (c)निवेश केवल निर्यात-उन्मुख उद्योगों तक सीमित रहना चाहिए
- (d)सरकार को निवेश से पूरी तरह अलग रहना चाहिए
उत्तर(b) अनेक क्षेत्रकों में एक साथ निवेश करना चाहिए ताकि वे एक-दूसरे के लिए माँग तथा बाज़ार बनाएँ — यही नर्कसे तथा रोज़नस्टीन-रोडान की धारा का मूल तर्क है, जिसकी पृष्ठभूमि में बाज़ार के छोटे आकार की समस्या है। शेष तीनों कथन इस सिद्धांत के विवरण नहीं हैं।