निम्नलिखित में से कौन-से निजी (प्राइवेट) बीमा कार्यक्रमों तथा सामाजिक बीमा कार्यक्रमों के बीच प्ररूपी विभेद हैं ? 1. पर्याप्तता बनाम साम्या 2. स्वैच्छिक बनाम अधिदेशात्मक सहभागिता 3. संविदात्मक बनाम सांविधिक अधिकार 4. निधीयन नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए :
- (a)केवल 1, 2 और 3
- (b)केवल 1, 2 और 4
- (c)केवल 3 और 4
- (d)1, 2, 3 और 4
उत्तर
क्यों
सही उत्तर — D, (d) 1, 2, 3 और 4 — चारों ही निजी बीमा और सामाजिक बीमा के बीच के प्ररूपी विभेद हैं, और सामाजिक सुरक्षा के मानक विवरण में ये चारों साथ-साथ गिनाए जाते हैं। पहला विभेद पर्याप्तता बनाम साम्या का है : सामाजिक बीमा का लक्ष्य सामाजिक पर्याप्तता है, अर्थात् प्रत्येक सदस्य को जीवन-निर्वाह की एक न्यूनतम सीमा मिले, इसलिए कम आय वाले सदस्य को उसके अंशदान की तुलना में अधिक प्रतिफल मिलता है; निजी बीमा का लक्ष्य वैयक्तिक साम्या है, जहाँ लाभ चुकाए गए प्रीमियम के बीमांकिक अनुपात में मिलता है। दूसरा विभेद सहभागिता का है : निजी बीमा स्वैच्छिक है, कोई चाहे तो पॉलिसी ले, चाहे तो न ले; सामाजिक बीमा विधि द्वारा अनिवार्य किया जाता है, क्योंकि यदि वह स्वैच्छिक हो तो प्रायः वही सम्मिलित होंगे जिन्हें जोखिम अधिक है और योजना टिक नहीं पाएगी। तीसरा विभेद अधिकार के स्रोत का है : निजी बीमा में अधिकार संविदा से आता है और संविदा की शर्तों तक सीमित रहता है; सामाजिक बीमा में अधिकार क़ानून से आता है, इसलिए उसका दायरा विधायिका द्वारा अधिनियम में संशोधन से बदल सकता है। चौथा विभेद निधीयन का है : निजी बीमा को बीमांकिक सिद्धांतों पर पूर्ण निधीयन रखना पड़ता है, जबकि सामाजिक बीमा प्रायः आंशिक निधीयन या चालू-आय से भुगतान की व्यवस्था पर चलता है और उसके पीछे राज्य की कर लगाने की शक्ति खड़ी रहती है; उसमें अंशदान नियोजक, कर्मचारी और कहीं-कहीं सरकार तीनों से आते हैं। चारों कथन सही होने के कारण उत्तर (d) है।
अन्य विकल्प क्यों गलत हैं
- (a)केवल 1, 2 और 3 — यह विकल्प निधीयन को छोड़ देता है, जबकि निधीयन दोनों प्रणालियों के बीच का सबसे मूर्त अंतर है। निजी बीमा कंपनी को अपनी देयताओं के विरुद्ध पर्याप्त निधि रखनी पड़ती है और नियामक इसकी जाँच करता है — प्रीमियम इसी गणना से तय होते हैं। सामाजिक बीमा में यह अनिवार्यता उस रूप में नहीं होती : वह प्रायः आंशिक रूप से निधीयित रहता है और वर्तमान अंशदानों से वर्तमान लाभ चुकाए जाते हैं, क्योंकि उसके पीछे राज्य की कर-शक्ति और उसका स्थायित्व है, जो किसी निजी कंपनी के पास नहीं होता। अंशदान का ढाँचा भी अलग है — नियोजक, कर्मचारी और कहीं-कहीं सरकार तीनों अंशदान करते हैं, जबकि निजी बीमा में प्रीमियम पॉलिसीधारक चुकाता है। यह चारा प्रायः उस अभ्यर्थी को पकड़ता है जो कथन 4 को केवल एक शब्द — 'निधीयन' — देखकर अपर्याप्त मान लेता है और सोचता है कि इतने छोटे कथन से कोई विभेद कैसे बनेगा।
- (b)केवल 1, 2 और 4 — यह विकल्प संविदात्मक बनाम सांविधिक अधिकार वाले विभेद को छोड़ देता है, जो विधिक दृष्टि से इस पूरी तुलना का सबसे महत्त्वपूर्ण बिंदु है। निजी बीमा में सदस्य का अधिकार एक संविदा से निकलता है : पॉलिसी की शर्तें दोनों पक्षों को बाँधती हैं और विवाद उन्हीं शर्तों पर तय होता है। सामाजिक बीमा में लाभ का अधिकार अधिनियम से निकलता है : पात्रता, अंशदान की दर और लाभ की मात्रा क़ानून तथा उसके अधीन बनी योजनाओं में लिखी होती है, और उन्हें बदलने के लिए संविदा नहीं, विधि बदलनी पड़ती है। इसी कारण सामाजिक बीमा की योजनाओं में समय-समय पर संशोधन होते रहते हैं और लाभार्थी की सहमति की आवश्यकता नहीं होती। भविष्य निधि तथा पेंशन से जुड़ी योजनाएँ इसी कोटि की हैं, और यही कारण है कि उनसे संबंधित प्रश्नों में धारा और योजना का उल्लेख बार-बार आता है।
- (c)केवल 3 और 4 — यह विकल्प पहले दो विभेदों को छोड़ देता है, अर्थात् उन्हीं को जो इस तुलना में सबसे पहले पढ़ाए जाते हैं। पर्याप्तता बनाम साम्या का विभेद इस पूरी अवधारणा की धुरी है : सामाजिक बीमा जानबूझकर पुनर्वितरणकारी होता है, क्योंकि उसका लक्ष्य निर्धनता से रक्षा है, जबकि निजी बीमा में प्रतिफल और अंशदान का अनुपात बनाए रखना ही न्याय माना जाता है। इसी प्रकार स्वैच्छिक बनाम अधिदेशात्मक सहभागिता का विभेद केवल औपचारिकता नहीं है : अनिवार्यता ही वह उपाय है जिससे स्वस्थ और कम जोखिम वाले सदस्य भी योजना में बने रहते हैं और जोखिम का विस्तृत समूह बनता है। इन दोनों को छोड़ देने पर तुलना केवल विधिक और वित्तीय पक्ष तक सिमट जाती है, और उसका सामाजिक उद्देश्य ओझल हो जाता है — जबकि प्रश्न 'प्ररूपी विभेद' पूछ रहा है, अर्थात् वे अंतर जो इन दोनों प्रणालियों को स्वभाव से अलग करते हैं।
अवधारणा
सामाजिक बीमा और निजी बीमा दोनों जोखिम को समूह में बाँटने के उपाय हैं, पर उनके उद्देश्य और ढाँचे अलग हैं, और परीक्षा इसी तुलना को बार-बार पूछती है। सामाजिक बीमा की पहचान पाँच बातों से होती है : सहभागिता विधि द्वारा अनिवार्य होती है; लाभ का अधिकार अधिनियम से आता है; लाभ की रचना सामाजिक पर्याप्तता को ध्यान में रखकर होती है, इसलिए वह पुनर्वितरणकारी होती है; निधीयन प्रायः आंशिक होता है और अंशदान नियोजक, कर्मचारी तथा कहीं-कहीं सरकार से आते हैं; और योजना का संचालन किसी सांविधिक निकाय के हाथ में होता है। निजी बीमा की पहचान इसके विपरीत है : संविदा, स्वैच्छिकता, बीमांकिक साम्या, पूर्ण निधीयन और नियामक की निगरानी में चलने वाली कंपनी। भारत में सामाजिक बीमा का ढाँचा मुख्यतः कर्मचारी भविष्य निधि तथा प्रकीर्ण उपबंध अधिनियम, 1952 और कर्मचारी राज्य बीमा अधिनियम, 1948 से बनता है, जिनके अधीन भविष्य निधि, पेंशन, निक्षेप-सहबद्ध बीमा तथा चिकित्सा और नक़द लाभ की योजनाएँ चलती हैं। यह भी ध्यान रखिए कि सामाजिक सुरक्षा का दायरा सामाजिक बीमा से बड़ा है : उसमें सामाजिक सहायता, अर्थात् बिना अंशदान के दी जाने वाली सहायता, भी आती है।
यह चार कथनों वाला प्रश्न है जिसका उत्तर 'सभी सही' है, और इसकी बनावट में एक विशेष चारा छिपा है : कथन 4 केवल एक शब्द का है — 'निधीयन'। लंबे कथनों के बीच एक शब्द का कथन देखकर अभ्यर्थी को लगता है कि वह अधूरा है या तुलना का बिंदु नहीं बन सकता, और वह उसे छोड़कर तीन कथनों वाला विकल्प चुन लेता है। कथन की लंबाई उसकी सत्यता का प्रमाण नहीं है, और यहाँ यह एक शब्द दोनों प्रणालियों के बीच के सबसे बड़े ढाँचागत अंतर की ओर संकेत करता है। दूसरी बात यह कि तीनों लंबे कथन 'बनाम' के रूप में लिखे गए हैं, अर्थात् वे स्वयं विभेद के दो सिरे बता देते हैं, इसलिए उन्हें परखना सरल है। हिन्दी स्तंभ में अंग्रेज़ी के versus का अनुवाद 'बनाम' देवनागरी में ही छपा है, और स्टेम में 'निजी' के बाद कोष्ठक में लिप्यन्तरण (प्राइवेट) जोड़ा गया है, जो अंग्रेज़ी स्तंभ में नहीं है। यह जोड़ पहचान को सरल बनाता है, अर्थ नहीं बदलता।
मुख्य तथ्य
- सामाजिक बीमा में सहभागिता विधि द्वारा अनिवार्य होती है, जबकि निजी बीमा स्वैच्छिक है — अनिवार्यता ही जोखिम के विस्तृत समूह और योजना की वित्तीय स्थिरता का आधार है।
- सामाजिक बीमा का लक्ष्य सामाजिक पर्याप्तता है, इसलिए वह पुनर्वितरणकारी होता है; निजी बीमा का लक्ष्य वैयक्तिक साम्या है, जहाँ लाभ चुकाए गए प्रीमियम के बीमांकिक अनुपात में मिलता है।
- निजी बीमा में अधिकार संविदा से आता है और संविदा की शर्तों तक सीमित रहता है; सामाजिक बीमा में अधिकार अधिनियम से आता है और विधायिका उसे संशोधन द्वारा बदल सकती है।
- निजी बीमा को बीमांकिक सिद्धांतों पर पूर्ण निधीयन रखना पड़ता है, जबकि सामाजिक बीमा प्रायः आंशिक निधीयन पर चलता है और उसके पीछे राज्य की कर लगाने की शक्ति रहती है।
- भारत में सामाजिक बीमा का ढाँचा मुख्यतः कर्मचारी भविष्य निधि तथा प्रकीर्ण उपबंध अधिनियम, 1952 और कर्मचारी राज्य बीमा अधिनियम, 1948 से बनता है; सामाजिक सुरक्षा में अंशदान-रहित सामाजिक सहायता भी आती है।
आगे की तैयारी
सामान्य भ्रम
- कथन की लंबाई को उसकी सत्यता से जोड़ देना; यहाँ एक शब्द का कथन 'निधीयन' सही है और तीनों ग़लत विकल्पों में से दो उसी को गिराते हैं।
- सामाजिक बीमा को दान या सहायता मान लेना, जबकि वह अंशदान पर आधारित है और उसका अधिकार अधिनियम से निकलता है।
- साम्या और पर्याप्तता को पर्याय मान लेना, जबकि दोनों इस तुलना के दो विपरीत सिरे हैं।
- 'सभी सही' वाले विकल्प से बचने की आदत, जो कथन-सूची वाले प्रश्नों में सबसे अधिक अंक कटवाती है।
सामाजिक सुरक्षा इस परिवार की परीक्षाओं का मुख्य विषय है और यहाँ प्रश्न दो स्तरों पर आते हैं। पहला स्तर अवधारणा का है, जैसा यह प्रश्न है : सामाजिक बीमा और निजी बीमा का भेद, सामाजिक सहायता और सामाजिक बीमा का भेद, अथवा भविष्य निधि और पेंशन योजना के गुण-दोष। दूसरा स्तर सांविधिक विवरण का है : किस अधिनियम की कौन-सी धारा, कितने कर्मचारियों पर अधिनियम लागू होता है, अंशदान की दर क्या है, लाभ कितने सप्ताह का है। दोनों स्तरों की तैयारी अलग-अलग होती है — पहला पाठ्यपुस्तक की तुलना-सारणी से सधता है और दूसरा अधिनियम के पाठ से। इस प्रश्न जैसे अवधारणात्मक प्रश्न में सबसे कारगर तैयारी यही है कि दोनों प्रणालियों की पाँच-पाँच पहचानें एक सारणी में लिख ली जाएँ — सहभागिता, अधिकार का स्रोत, लाभ का आधार, निधीयन और संचालन — क्योंकि प्रश्न इन्हीं पंक्तियों में से कुछ उठाकर बनता है।
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- (a) 1 and 2 only
- (b) 1 and 3 only
- (c) 2 and 3 only
- (d) 1, 2 and 3
उत्तर(a) 1 and 2 only
इसी प्रश्नपत्र का वह प्रश्न, जो भविष्य निधि योजना की हानियाँ पूछता है — वही अवधारणात्मक खंड, जहाँ अंशदायी योजनाओं के गुण-दोष तुलना के रूप में परखे जाते हैं।
EPFO_EOAO_2017_Q88Which one of the following is the correct set of contingencies identified by William Beveridge in his comprehensive social security scheme?
- (a) Want, disease, ignorance, squalor and idleness
- (b) Want, sickness, disability, squalor and idleness
- (c) Want, disease, old age, squalor and unemployment
- (d) Disease, invalidity, old age, unemployment and ignorance
उत्तर(a) Want, disease, ignorance, squalor and idleness
इसी परिवार का प्रश्न, जो बेवरिज की व्यापक सामाजिक सुरक्षा योजना पर है — आधुनिक सामाजिक बीमा की वह अंतरराष्ट्रीय पृष्ठभूमि, जिससे यह तुलना निकलती है।
अभ्यास
- practice — not a real PYQ
निजी बीमा और सामाजिक बीमा के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन-सा कथन सही है ?
- (a)दोनों में सहभागिता स्वैच्छिक होती है
- (b)सामाजिक बीमा में लाभ का अधिकार अधिनियम से आता है, जबकि निजी बीमा में संविदा से
- (c)दोनों में लाभ चुकाए गए प्रीमियम के बीमांकिक अनुपात में मिलता है
- (d)सामाजिक बीमा में अंशदान केवल कर्मचारी से लिया जाता है
उत्तर(b) सामाजिक बीमा में लाभ का अधिकार अधिनियम से आता है, जबकि निजी बीमा में संविदा से — यही दोनों के बीच का विधिक विभेद है। (a) ग़लत है क्योंकि सामाजिक बीमा अनिवार्य होता है, (c) ग़लत है क्योंकि सामाजिक बीमा पर्याप्तता को प्राथमिकता देता है, और (d) ग़लत है क्योंकि अंशदान प्रायः नियोजक तथा कर्मचारी दोनों से और कहीं-कहीं सरकार से भी आते हैं।
- practice — not a real PYQ
सामाजिक बीमा में सहभागिता को अनिवार्य रखने का मुख्य कारण निम्नलिखित में से क्या है ?
- (a)इससे सरकार का कर-राजस्व बढ़ता है
- (b)इससे केवल उच्च आय वालों को लाभ मिलता है
- (c)इससे जोखिम का विस्तृत समूह बनता है और योजना वित्तीय रूप से टिकाऊ रहती है
- (d)इससे बीमा कंपनियों की प्रतिस्पर्धा बढ़ती है
उत्तर(c) इससे जोखिम का विस्तृत समूह बनता है और योजना वित्तीय रूप से टिकाऊ रहती है — यदि सहभागिता स्वैच्छिक हो तो प्रायः वही सम्मिलित होंगे जिन्हें जोखिम अधिक है, और योजना का संतुलन बिगड़ जाएगा। शेष तीनों विकल्प सामाजिक बीमा के उद्देश्य से मेल नहीं खाते।