‘स्त्रीधन’ के बारे में निम्नलिखित कथनों में से कौन-से सही हैं ? 1. विभिन्न प्रकार की चल सम्पत्ति जो एक स्त्री को उसके जीवनकाल में विभिन्न अवसरों पर उपहार के रूप में दी जाती है । 2. विभिन्न प्रकार की चल सम्पत्ति जो एक स्त्री को उसके प्रथम विवाह के समय उपहार स्वरूप दी जाती है । 3. स्त्री की मृत्यु पर, यह धन उसकी संतानों और पति को विरासत में मिल सकता है । 4. स्त्री की मृत्यु पर, यह धन उसके नैसर्गिक कानूनी दत्तक संतानों को विरासत में मिल सकता है, और उस धन के किसी भी भाग पर उसके दामादों में से किसी का भी कोई दावा नहीं हो सकता । नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए :
- (a)केवल 2 और 3
- (b)केवल 2 और 4
- (c)केवल 1 और 4
- (d)केवल 1 और 3
उत्तर
क्यों
सही उत्तर — C, (c) केवल 1 और 4 — प्रश्न 'स्त्रीधन' की शास्त्रीय अवधारणा पर है, अर्थात् स्मृति-परंपरा में स्त्री का वह अपना धन जिस पर उसका स्वतंत्र अधिकार माना गया। कथन 1 इसी अवधारणा का सही विवरण है : स्त्रीधन विवाह के अवसर तक सीमित नहीं है, बल्कि जीवनकाल के विभिन्न अवसरों पर मिली चल सम्पत्ति उसमें आती है। मनुस्मृति में स्त्रीधन के छह प्रकार गिनाए गए हैं — विवाह-अग्नि के समक्ष दिया गया, वधू-यात्रा के समय दिया गया, प्रीति-स्वरूप दिया गया, तथा भाई, माता और पिता से मिला — अर्थात् दाता और अवसर दोनों अनेक हैं। कथन 4 भी सही है : स्त्री की मृत्यु पर यह धन उसकी संतानों को मिलता है, और दामादों का उस पर कोई दावा नहीं होता। कथन 2 इसीलिए ग़लत है कि वह स्त्रीधन को 'प्रथम विवाह के समय' मिले उपहारों तक सीमित कर देता है — यह परिभाषा को संकुचित कर देना है, और वही संकुचन कथन 1 के साथ रखकर परखा जा रहा है। कथन 3 इसलिए ग़लत है कि वह उत्तराधिकारियों में पति को जोड़ देता है, जबकि शास्त्रीय नियम की विशिष्टता ही यह थी कि संतानें उत्तराधिकारी होती थीं और पति का उस धन पर कोई दावा नहीं होता था — यही वह बिंदु है जो स्त्रीधन को स्त्री की अपनी सम्पत्ति बनाता है। इस प्रकार दो सही कथन 1 और 4 हैं और उत्तर (c) है। ध्यान दीजिए कि प्रश्न की पूरी बनावट जोड़ियों की है : 1 और 2 परिभाषा के दो पाठ हैं, जिनमें एक व्यापक और दूसरा संकुचित है, तथा 3 और 4 उत्तराधिकार के दो पाठ हैं, जिनमें एक पति को जोड़ता है और दूसरा नहीं। हर जोड़ी में से एक ही चुनना है।
अन्य विकल्प क्यों गलत हैं
- (a)केवल 2 और 3 — यह विकल्प दोनों जोड़ियों में से ठीक वही कथन उठाता है जो असत्य है, इसलिए यह सबसे दूर का विकल्प है। कथन 2 स्त्रीधन को 'प्रथम विवाह के समय' मिले उपहारों तक सीमित कर देता है; शास्त्रीय वर्गीकरण में विवाह-अग्नि और वधू-यात्रा के अतिरिक्त प्रीति-स्वरूप तथा भाई, माता और पिता से मिला धन भी स्त्रीधन है, और 'प्रथम' विवाह की ऐसी कोई शर्त उसमें नहीं है। कथन 3 उत्तराधिकारियों में पति को जोड़ देता है, जबकि स्मृति-परंपरा का सुपरिचित नियम यह है कि यह धन संतानों को मिलता था और पति का उस पर दावा नहीं होता था। जो अभ्यर्थी स्त्रीधन को केवल 'दहेज' का पर्याय मान लेता है, उसे यह विकल्प स्वाभाविक लगता है, क्योंकि दहेज विवाह के समय दिया जाता है और परिवार की सम्पत्ति में मिल जाता है — पर स्त्रीधन की पूरी धारणा ही उसके विपरीत है।
- (b)केवल 2 और 4 — इस विकल्प का उत्तराधिकार वाला आधा भाग ठीक है — कथन 4 सही है — पर परिभाषा वाला आधा भाग ग़लत कथन उठाता है। कथन 2 और कथन 1 का अंतर केवल एक वाक्यांश का है : कथन 1 कहता है 'जीवनकाल में विभिन्न अवसरों पर' और कथन 2 कहता है 'प्रथम विवाह के समय'। यही वह जगह है जहाँ इस प्रश्न का अधिकांश अंक कटता है, क्योंकि दोनों कथन पढ़ने में लगभग एक जैसे लगते हैं और दोनों की शुरुआत भी एक ही शब्दावली से होती है। परखने का सीधा तरीक़ा यह पूछना है कि क्या विवाह के बाद पिता या भाई से मिला उपहार भी स्त्रीधन है — शास्त्रीय वर्गीकरण के अनुसार है, इसलिए कथन 2 की सीमा टिकती नहीं। जहाँ दो कथन एक ही बात के व्यापक और संकुचित पाठ हों, वहाँ प्रायः व्यापक पाठ ही परिभाषा होता है और संकुचित पाठ चारा।
- (d)केवल 1 और 3 — इसमें परिभाषा वाला आधा भाग ठीक है और उत्तराधिकार वाला आधा भाग वह कथन उठाता है जिसे आयोग की कुंजी नहीं लेती। कथन 3 संतानों के साथ पति को भी उत्तराधिकारी बताता है, जबकि स्त्रीधन की शास्त्रीय विशिष्टता ही यह है कि पति का उस पर दावा नहीं होता। यहाँ एक भेद स्पष्ट रखना आवश्यक है, और वह इस प्रश्न की असली सीख है : यह प्रश्न स्मृति-परंपरा की अवधारणा पूछ रहा है, आधुनिक संहिताबद्ध विधि नहीं। हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 के अधीन स्थिति भिन्न है — धारा 14 किसी हिन्दू स्त्री की सम्पत्ति को उसकी पूर्ण सम्पत्ति बनाती है, और धारा 15(1) में उत्तराधिकार का जो क्रम दिया गया है उसकी पहली कोटि में पुत्र, पुत्रियाँ तथा पति एक साथ आते हैं। इसलिए कथन 3 को आधुनिक अधिनियम के परिप्रेक्ष्य में पढ़ने वाला अभ्यर्थी उसे सही मान सकता है; प्रश्न की पूछ शास्त्रीय अवधारणा की है, और कुंजी उसी के अनुसार 1 और 4 लेती है।
अवधारणा
स्त्रीधन का शाब्दिक अर्थ है स्त्री का धन। स्मृति-परंपरा में यह वह चल सम्पत्ति है जो स्त्री को उपहार के रूप में मिलती है और जिस पर उसका अपना अधिकार माना जाता है — भरण-पोषण के लिए मिली सुविधा नहीं, बल्कि सम्पत्ति। मनुस्मृति में इसके छह प्रकार गिनाए गए हैं : विवाह-अग्नि के समक्ष दिया गया, वधू-यात्रा के समय दिया गया, प्रीति-स्वरूप दिया गया, तथा भाई, माता और पिता से प्राप्त। इसकी दो विशेषताएँ परीक्षा की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण हैं। पहली, इसका दायरा विवाह के क्षण तक सीमित नहीं है; दूसरी, स्त्री की मृत्यु पर यह उसकी संतानों को जाता है और पति का उस पर दावा नहीं होता — यही उसे संयुक्त परिवार की सम्पत्ति से अलग करता है। इसे दहेज से भी अलग रखना चाहिए : दहेज विवाह की शर्त के रूप में माँगा या दिया जाने वाला हस्तांतरण है और दहेज प्रतिषेध अधिनियम, 1961 से प्रतिषिद्ध है, जबकि स्त्रीधन स्त्री की अपनी सम्पत्ति की विधिक कोटि है। आधुनिक विधि में हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 की धारा 14 ने स्त्री के सीमित स्वत्व को पूर्ण स्वामित्व में बदल दिया, और उच्चतम न्यायालय ने प्रतिभा रानी बनाम सूरज कुमार (1985) में स्त्रीधन को स्त्री की अपनी सम्पत्ति मानते हुए यह माना कि पति या उसके परिवार को सौंपा गया स्त्रीधन उनके पास न्यास के रूप में रहता है।
यह चार कथनों वाला प्रश्न है और इसकी बनावट में एक सुविधा छिपी है : चारों कथन दो जोड़ियों में बँटे हैं। कथन 1 और 2 दोनों परिभाषा देते हैं और केवल दायरे में भिन्न हैं; कथन 3 और 4 दोनों मृत्यु के बाद के उत्तराधिकार की बात करते हैं और केवल इसमें भिन्न हैं कि पति को जोड़ते हैं या नहीं। ऐसी बनावट में हर जोड़ी से एक ही कथन सही हो सकता है, इसलिए चार में से दो कथन तय करने के लिए दो ही निर्णय लेने पड़ते हैं। विकल्पों की सूची भी इसी को दर्शाती है — चारों विकल्प एक परिभाषा-कथन और एक उत्तराधिकार-कथन का युग्म हैं। छपाई के विषय में एक बात ज्यों की त्यों दर्ज करने योग्य है : कथन 4 में 'नैसर्गिक कानूनी दत्तक संतानों' छपा है, जहाँ 'नैसर्गिक' और 'कानूनी दत्तक' के बीच कोई संयोजक नहीं है; अंग्रेज़ी स्तंभ में भी वहीं 'natural legally adopted children' है, बिना संयोजक के, और उसमें 'sons-in-law' के बाद एक अनावश्यक अल्पविराम भी छपा है। यह छपाई की चूक है, पर कथन का आशय स्पष्ट है और उत्तर उससे नहीं बदलता; इसलिए पाठ जैसा छपा है वैसा ही रखा गया है।
मुख्य तथ्य
- स्त्रीधन का अर्थ है स्त्री का धन — वह चल सम्पत्ति जो उसे उपहार-स्वरूप मिलती है और जिस पर स्मृति-परंपरा में उसका स्वतंत्र अधिकार माना गया है।
- मनुस्मृति में स्त्रीधन के छह प्रकार गिनाए गए हैं : विवाह-अग्नि के समक्ष दिया गया, वधू-यात्रा के समय दिया गया, प्रीति-स्वरूप दिया गया, तथा भाई, माता और पिता से प्राप्त — अर्थात् यह विवाह के क्षण तक सीमित नहीं है।
- शास्त्रीय नियम के अनुसार स्त्री की मृत्यु पर स्त्रीधन उसकी संतानों को मिलता था और पति का उस पर कोई दावा नहीं होता था; यही उसे संयुक्त परिवार की सम्पत्ति से अलग करता है।
- हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 की धारा 14 किसी हिन्दू स्त्री के अधिकार में आई सम्पत्ति को उसकी पूर्ण सम्पत्ति बनाती है, और धारा 15(1) के उत्तराधिकार-क्रम की पहली कोटि में पुत्र, पुत्रियाँ तथा पति एक साथ आते हैं।
- स्त्रीधन और दहेज अलग-अलग कोटियाँ हैं : दहेज विवाह की शर्त के रूप में होने वाला हस्तांतरण है और दहेज प्रतिषेध अधिनियम, 1961 से प्रतिषिद्ध है, जबकि स्त्रीधन स्त्री की अपनी सम्पत्ति है — प्रतिभा रानी बनाम सूरज कुमार (1985) में उच्चतम न्यायालय ने इसी आधार पर निर्णय दिया।
आगे की तैयारी
सामान्य भ्रम
- स्त्रीधन को दहेज का पर्याय मान लेना; दोनों की विधिक स्थिति एक-दूसरे के विपरीत है और यही भ्रम कथन 2 तथा 3 को आकर्षक बनाता है।
- व्यापक और संकुचित परिभाषा वाली जोड़ी में संकुचित पाठ चुन लेना — कथन 1 और 2 का अंतर केवल 'विभिन्न अवसरों पर' बनाम 'प्रथम विवाह के समय' का है।
- शास्त्रीय अवधारणा वाले प्रश्न में आधुनिक अधिनियम का नियम लगा देना; हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 में पति उत्तराधिकारी है, पर प्रश्न की पूछ स्मृति-परंपरा की है।
- कथन 4 की छपाई-चूक — 'नैसर्गिक कानूनी दत्तक' के बीच संयोजक का न होना — देखकर पूरे कथन को त्रुटिपूर्ण मान लेना और उसे छोड़ देना।
स्त्री और सम्पत्ति से जुड़े प्रश्न इस परिवार की परीक्षाओं में दो अलग-अलग खंडों से आते हैं और उनकी हल-विधि भी अलग होती है। एक ओर सामाजिक-सांस्कृतिक इतिहास से अवधारणात्मक प्रश्न आते हैं, जैसे यह — जहाँ स्त्रीधन, कुल, गोत्र या वर्ण जैसी शास्त्रीय कोटियों की परिभाषा और उनका दायरा पूछा जाता है, और उत्तर पाठ्यपुस्तक के उसी अनुच्छेद से निकलता है। दूसरी ओर श्रम एवं सामाजिक सुरक्षा विधि से सांविधिक प्रश्न आते हैं, जहाँ धारा-संख्या, सप्ताहों की संख्या या पात्रता की शर्त पूछी जाती है; इसी प्रश्नपत्र में प्रसूति प्रसुविधा अधिनियम पर ऐसा ही प्रश्न है। कथन-सूची वाले रूप में परीक्षक प्रायः एक ही अवधारणा के दो पाठ छापता है — एक व्यापक और एक संकुचित — या एक ही नियम के दो रूप, जिनमें एक में कोई नाम अतिरिक्त जोड़ दिया जाता है। इसलिए ऐसे प्रश्न में कथनों को अलग-अलग सही-ग़लत ठहराने से पहले यह देख लेना लाभदायक है कि कौन-से दो कथन आपस में जोड़ी बनाते हैं।
संबंधित PYQ
EPFO_APFC_2016_Q91खोलें व हल करें →The Maternity Benefit Act, 1961 (M.B. Act) provides for how many weeks' wages during the maternity period ?
- (a) 11 weeks
- (b) 12 weeks
- (c) 13 weeks
- (d) 14 weeks
उत्तर(b) 12 weeks
इसी प्रश्नपत्र का प्रसूति प्रसुविधा अधिनियम, 1961 पर आधारित प्रश्न — स्त्री से जुड़े अधिकारों का वह दूसरा रूप, जो शास्त्रीय अवधारणा के बजाय सांविधिक उपबंध और संख्याओं से पूछा जाता है।
अभ्यास
- practice — not a real PYQ
स्त्रीधन के संबंध में निम्नलिखित में से कौन-सा कथन स्मृति-परंपरा के अनुसार सही है ?
- (a)यह केवल विवाह के समय मिली सम्पत्ति है और स्त्री की मृत्यु पर पति को मिलती है
- (b)यह स्त्री को विभिन्न अवसरों पर उपहार-स्वरूप मिली चल सम्पत्ति है, जिस पर उसका अपना अधिकार होता है
- (c)यह संयुक्त परिवार की सम्पत्ति का वह भाग है जो स्त्री को भरण-पोषण के लिए दिया जाता है
- (d)यह केवल अचल सम्पत्ति है जो पिता से उत्तराधिकार में मिलती है
उत्तर(b) यह स्त्री को विभिन्न अवसरों पर उपहार-स्वरूप मिली चल सम्पत्ति है, जिस पर उसका अपना अधिकार होता है — मनुस्मृति में इसके छह प्रकार गिनाए गए हैं और यह विवाह के क्षण तक सीमित नहीं है। (a) दोनों बातें उलटी कहता है, (c) इसे भरण-पोषण की सुविधा बना देता है, और (d) चल के स्थान पर अचल सम्पत्ति कह देता है।
- practice — not a real PYQ
हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 की किस धारा ने किसी हिन्दू स्त्री के अधिकार में आई सम्पत्ति को उसकी पूर्ण सम्पत्ति घोषित किया ?
- (a)धारा 6
- (b)धारा 8
- (c)धारा 14
- (d)धारा 30
उत्तर(c) धारा 14 — इसी धारा ने स्त्री के सीमित स्वत्व को पूर्ण स्वामित्व में बदला। धारा 6 सहदायिक सम्पत्ति में हित से संबंधित है, धारा 8 पुरुष की सम्पत्ति के उत्तराधिकार के सामान्य नियम देती है, और धारा 30 वसीयत द्वारा व्ययन की बात करती है।