विद्वत्ता की एक शाखा, जो यूरोप में, विशेषतः पन्द्रहवीं से अठारहवीं शताब्दियों तक फली-फूली और जो ऐतिहासिक और अजैविक पुरावशेषों, स्मारकों और प्राचीन मूलग्रंथों के गुण-दोष-विवेचन, इतिहास-लेखन और वर्गीकरण को समर्पित थी, किसे निर्दिष्ट करती है ?
- (a)पुरातत्वविज्ञान
- (b)इतिहास
- (c)स्थापत्यकला
- (d)पुरातनवाद
उत्तर
क्यों
सही उत्तर — D, (d) पुरातनवाद — स्टेम में दिए गए चारों लक्षण एक साथ केवल पुरातनवाद (antiquarianism) पर बैठते हैं। पहला लक्षण काल का है : यह विद्वत्ता यूरोप में विशेष रूप से पन्द्रहवीं से अठारहवीं शताब्दी तक फली-फूली, अर्थात् पुनर्जागरण से लेकर प्रबोधन काल तक। दूसरा लक्षण उसकी सामग्री का है : ऐतिहासिक और अजैविक पुरावशेष, स्मारक और प्राचीन मूलग्रंथ — सिक्के, शिलालेख, मूर्तियाँ, खंडहर और हस्तलिखित पोथियाँ। तीसरा लक्षण उसकी क्रिया का है : गुण-दोष-विवेचन, इतिहास-लेखन और वर्गीकरण, यानी संग्रह करना, वर्णन करना, प्रामाणिकता जाँचना और कोटियों में बाँटना। यही पुरातनवादी का काम था। पुनर्जागरण के मानविकीविदों ने रोम के खंडहरों, शिलालेखों और सिक्कों का व्यवस्थित वर्णन आरंभ किया, और सत्रहवीं-अठारहवीं शताब्दी में यह रुचि विद्वत्-समाजों का रूप ले चुकी थी — लंदन की सोसाइटी ऑफ़ ऐंटीक्वेरीज़ 1707 में बनी और 1751 में उसे राजकीय अधिकार-पत्र मिला। पुरातनवादी इतिहासकार से इस बात में भिन्न था कि वह कालक्रमबद्ध कथा नहीं लिखता था, बल्कि वस्तुओं को विषय के अनुसार व्यवस्थित करके उनका विवरण देता था; और वह पुरातत्वविद् से इस बात में भिन्न था कि उसके पास उत्खनन और स्तर-विन्यास की वह पद्धति नहीं थी जो उन्नीसवीं शताब्दी में विकसित हुई। इसी अर्थ में पुरातनवाद को पुरातत्वविज्ञान का पूर्ववर्ती कहा जाता है। भारत में भी यही क्रम दिखता है : 1784 में स्थापित एशियाटिक सोसाइटी और उसके विद्वानों का सिक्कों, शिलालेखों तथा पांडुलिपियों का संग्रह पहले आया, और उसके बाद 1861 में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की स्थापना के साथ अनुशासनबद्ध पुरातत्व आया।
अन्य विकल्प क्यों गलत हैं
- (a)पुरातत्वविज्ञान — यही सबसे प्रबल चारा है, क्योंकि पुरातत्वविज्ञान भी भौतिक अवशेषों से ही अतीत जानता है। भेद पद्धति और काल का है। पुरातत्वविज्ञान की पहचान नियोजित उत्खनन, स्तर-विन्यास और सन्दर्भ से है — यह पूछता है कि वस्तु किस परत में, किन वस्तुओं के साथ मिली — और एक अनुशासन के रूप में यह उन्नीसवीं शताब्दी में खड़ा हुआ, न कि पन्द्रहवीं से अठारहवीं शताब्दी में। उसी शताब्दी में क्रिश्चियन थॉमसन की त्रि-युग पद्धति ने सामग्री को पाषाण, कांस्य और लौह युग में बाँटा, और भारत में 1861 में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की स्थापना हुई। स्टेम जिस काल-सीमा को स्पष्ट रूप से छापता है, वह इससे पहले की है, और स्टेम में उत्खनन का उल्लेख कहीं नहीं है — केवल संग्रह, विवेचन और वर्गीकरण का है। इसलिए यह विकल्प उस अनुशासन का नाम है जो इस विद्वत्ता से आगे विकसित हुआ, स्वयं इस विद्वत्ता का नहीं।
- (b)इतिहास — इतिहास अतीत का कालक्रमबद्ध और व्याख्यात्मक आख्यान है, जो मुख्यतः लिखित साक्ष्य पर टिकता है और घटनाओं के कारण-परिणाम बताता है। स्टेम में इनमें से कोई लक्षण नहीं है : वहाँ आख्यान या व्याख्या की बात ही नहीं, केवल पुरावशेषों, स्मारकों और मूलग्रंथों के विवेचन तथा वर्गीकरण की बात है। दूसरी असंगति काल की है — इतिहास-लेखन की परंपरा प्राचीन यूनान से चली आ रही है, इसलिए उसे 'विशेषतः पन्द्रहवीं से अठारहवीं शताब्दी तक फली-फूली' विद्वत्ता की एक शाखा कहना ग़लत होगा। यह भेद विद्वत्-जगत् में सुविदित है : पुरातनवादी वस्तुओं को विषय के अनुसार व्यवस्थित करता था, इतिहासकार घटनाओं को समय के अनुसार। बाद में दोनों धाराएँ मिलीं और आधुनिक इतिहास-लेखन ने पुरातनवादियों की जुटाई सामग्री को अपने प्रमाण के रूप में अपनाया — पर प्रश्न उस शाखा का नाम पूछ रहा है, उस उत्तराधिकारी का नहीं।
- (c)स्थापत्यकला — स्थापत्यकला भवनों की अभिकल्पना और निर्माण की कला तथा विद्या है — वह कुछ बनाती है, अतीत की वस्तुओं का वर्गीकरण नहीं करती। स्टेम की सूची में स्मारक अवश्य आते हैं, और यही एकमात्र शब्द है जिससे यह विकल्प जुड़ता दिखता है, पर वहाँ स्मारक अध्ययन की वस्तु हैं, निर्माण का लक्ष्य नहीं। साथ ही स्टेम की सूची में सिक्के-जैसे पुरावशेष और प्राचीन मूलग्रंथ भी हैं, जिनका स्थापत्यकला से कोई संबंध नहीं। काल भी नहीं बैठता : स्थापत्यकला किसी एक चार-शताब्दी की अवधि में 'फली-फूली' कहकर परिभाषित नहीं की जा सकती, वह हर सभ्यता में और हर काल में रही है। यह विकल्प उस पाठक के लिए रखा गया है जो स्टेम को पूरा पढ़े बिना केवल 'स्मारक' शब्द पकड़ ले।
अवधारणा
पुरातनवाद, पुरातत्वविज्ञान और इतिहास तीन अलग-अलग चीज़ें हैं और परीक्षा प्रायः इन्हीं तीनों को आपस में गड्डमड्ड करती है। पुरातनवाद पुरावशेषों का संग्रह, वर्णन, प्रामाणिकता-परीक्षण और वर्गीकरण है; उसकी इकाई वस्तु है और उसकी व्यवस्था विषयानुसार है। पुरातत्वविज्ञान भौतिक अवशेषों से अतीत का पुनर्निर्माण है, पर उसकी पहचान उत्खनन, स्तर-विन्यास, सन्दर्भ और तिथि-निर्धारण की पद्धतियों से है; उसकी इकाई स्थल है। इतिहास मुख्यतः लिखित साक्ष्य पर आधारित कालक्रमबद्ध आख्यान और व्याख्या है; उसकी इकाई घटना है। यूरोप में क्रम यही रहा : पुनर्जागरण के मानविकीविदों ने प्राचीन रोम के खंडहरों, शिलालेखों और सिक्कों का वर्णन आरंभ किया, सत्रहवीं-अठारहवीं शताब्दी में यह रुचि विद्वत्-समाजों और निजी संग्रहालयों में ढल गई, और उन्नीसवीं शताब्दी में उत्खनन की पद्धति आने पर वही सामग्री एक अनुशासन बन गई। भारत में यह क्रम औपनिवेशिक विद्वत्ता के रूप में आया — 1784 की एशियाटिक सोसाइटी, विलियम जोन्स के भाषा-संबंधी अध्ययन, कॉलिन मैकेंज़ी के विशाल संग्रह, 1837 में जेम्स प्रिंसेप द्वारा ब्राह्मी लिपि का वाचन, और अंततः 1861 में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की स्थापना, जिसके प्रथम महानिदेशक अलेक्ज़ेंडर कनिंघम थे।
यह एक परिभाषा-प्रकार का प्रश्न है, जिसमें स्टेम स्वयं एक पूरी परिभाषा छापता है और चार विकल्पों में से उस पद को चुनना होता है जिस पर वह परिभाषा ठीक बैठती है। ऐसे प्रश्न में विकल्प देखने से पहले परिभाषा के 'निर्णायक शब्द' छाँटना कारगर होता है — यहाँ वे तीन हैं : काल-सीमा (पन्द्रहवीं से अठारहवीं शताब्दी), सामग्री (पुरावशेष, स्मारक, प्राचीन मूलग्रंथ) और क्रिया (विवेचन, इतिहास-लेखन, वर्गीकरण)। इनमें से केवल एक भी लक्षण छूट जाए तो पुरातत्वविज्ञान और इतिहास दोनों प्रबल दिखने लगते हैं, और यही इस प्रश्न की कठिनाई है। हिन्दी स्तंभ की एक बनावटी बात भी ध्यान देने योग्य है : यहाँ स्टेम पूरा प्रश्नवाक्य है और प्रश्नचिह्न पर समाप्त होता है, जबकि अंग्रेज़ी स्तंभ का वही स्टेम 'refers to' पर बिना विराम-चिह्न के अधूरा छूटता है और विकल्प उसे पूरा करते हैं। दोनों स्तंभों में पूछ एक ही है। 'विशेषतः' शब्द पुस्तिका में कोलन-जैसे चिह्न के साथ छपा है, जो हिन्दी पाठ में विसर्ग का सामान्य मुद्रण-रूप है।
मुख्य तथ्य
- पुरातनवाद (antiquarianism) पुरावशेषों, स्मारकों, सिक्कों, शिलालेखों और प्राचीन ग्रंथों के संग्रह, वर्णन, प्रामाणिकता-परीक्षण तथा वर्गीकरण की विद्वत्ता है, जो यूरोप में पुनर्जागरण से प्रबोधन काल तक विशेष रूप से फली-फूली।
- लंदन की सोसाइटी ऑफ़ ऐंटीक्वेरीज़ 1707 में स्थापित हुई और 1751 में उसे राजकीय अधिकार-पत्र मिला; ऐसे विद्वत्-समाज पुरातनवादी रुचि के संस्थागत रूप थे।
- पुरातत्वविज्ञान एक अनुशासन के रूप में उन्नीसवीं शताब्दी में खड़ा हुआ, जब उत्खनन, स्तर-विन्यास और वर्गीकरण की पद्धतियाँ बनीं — क्रिश्चियन थॉमसन की त्रि-युग पद्धति (पाषाण, कांस्य, लौह) इसी शताब्दी की देन है।
- भारत में पुरातनवादी चरण 1784 की एशियाटिक सोसाइटी से आरंभ होता है, जिसमें विलियम जोन्स के भाषा-अध्ययन, कॉलिन मैकेंज़ी के संग्रह और 1837 में जेम्स प्रिंसेप द्वारा ब्राह्मी लिपि का वाचन शामिल हैं।
- भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की स्थापना 1861 में हुई और अलेक्ज़ेंडर कनिंघम उसके प्रथम महानिदेशक थे; यही वह मोड़ है जहाँ भारत में पुरातनवाद से अनुशासनबद्ध पुरातत्व की ओर संक्रमण होता है।
आगे की तैयारी
सामान्य भ्रम
- पुरातनवाद और पुरातत्वविज्ञान को पर्याय मान लेना; भेद पद्धति का है — उत्खनन और स्तर-विन्यास पुरातत्व की पहचान हैं, संग्रह और वर्गीकरण पुरातनवाद की।
- स्टेम की काल-सीमा को अनदेखा कर देना, जबकि 'पन्द्रहवीं से अठारहवीं शताब्दी' ही वह एक लक्षण है जो पुरातत्वविज्ञान को तुरंत काट देता है।
- 'स्मारक' शब्द देखकर स्थापत्यकला चुन लेना, जबकि वहाँ स्मारक अध्ययन की वस्तु हैं, निर्माण का लक्ष्य नहीं।
- परिभाषा-प्रकार के प्रश्न में केवल एक निर्णायक शब्द पर उत्तर तय कर देना; यहाँ तीनों लक्षण एक साथ मिलने पर ही विकल्प निश्चित होता है।
इस परिवार की परीक्षाएँ पुरातत्व और इतिहास-लेखन की शब्दावली को तीन ढंगों से पूछती हैं। पहला यही परिभाषा-प्रकार है, जिसमें स्टेम में पूरी परिभाषा छापकर पद पूछा जाता है; इसका उत्तर परिभाषा के निर्णायक शब्दों को छाँटकर निकलता है। दूसरा संस्था और व्यक्ति से जुड़ा तथ्य-प्रश्न है — किस संस्था की स्थापना कब हुई, उसका पहला प्रमुख कौन था — जैसा इसी परिवार के एक अन्य प्रश्नपत्र में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के प्रथम महानिदेशक को लेकर पूछा गया है। तीसरा 'कौन-सा कथन सही नहीं है' वाला निषेधात्मक रूप है, जिसमें किसी पुरातत्वविद् या स्थल के बारे में तीन सही और एक ग़लत कथन रखे जाते हैं। तैयारी की दृष्टि से सबसे उपयोगी इकाई एक छोटी समयरेखा है : पुरातनवादी चरण, फिर उन्नीसवीं शताब्दी का अनुशासन-निर्माण, फिर भारत में सर्वेक्षण की स्थापना और प्रमुख उत्खनन। इसी समयरेखा से परिभाषा, संस्था और व्यक्ति — तीनों प्रकार के प्रश्न सध जाते हैं।
संबंधित PYQ
EPFO_EOAO_2017_Q33Who was the first Director General of the Archaeological Survey of India?
- (a) John Marshall
- (b) Alexander Cunningham
- (c) Mortimer Wheeler
- (d) Francis Buchanan
उत्तर(b) Alexander Cunningham
इसी परिवार का प्रश्न, जो भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के प्रथम महानिदेशक का नाम पूछता है — वही संक्रमण-बिंदु, जहाँ भारत में पुरातनवादी संग्रह की परंपरा अनुशासनबद्ध पुरातत्व में बदलती है।
EPFO_APFC_2023_Q21Which one among the following observations pertaining to the works of Nineteenth-Twentieth Century archaeologists is not correct?
- (a) Alexander Cunningham, the first Director-General of the Archaeological Survey of India, was of the view that the history of India began with the origins of the Indus Valley Civilization.
- (b) John Marshall generally adopted the method of excavation along regular horizontal units and ignored the stratigraphy of the site.
- (c) R. E. M. Wheeler first recognized the necessity to follow the stratigraphy of the mound rather than dig along horizontal lines.
- (d) Amalananda Ghosh was the first to identify similarities between pre-Harappan and mature-Harappan cultures.
उत्तर(a) Alexander Cunningham, the first Director-General of the Archaeological Survey of India, was of the view that the history of India began with the origins of the Indus Valley Civilization.
उन्नीसवीं-बीसवीं शताब्दी के पुरातत्वविदों के कार्य पर आधारित प्रश्न, जो इस कार्ड में बताई गई अगली अवस्था — उत्खनन-आधारित पुरातत्व — को सीधे परखता है।
अभ्यास
- practice — not a real PYQ
पुरातनवाद (antiquarianism) और पुरातत्वविज्ञान के बीच मुख्य भेद निम्नलिखित में से किससे व्यक्त होता है ?
- (a)पुरातनवाद केवल लिखित ग्रंथों का अध्ययन करता है, पुरातत्वविज्ञान केवल स्मारकों का
- (b)पुरातत्वविज्ञान उत्खनन तथा स्तर-विन्यास की पद्धति पर टिका है, जबकि पुरातनवाद संग्रह, वर्णन और वर्गीकरण तक सीमित रहा
- (c)पुरातनवाद उन्नीसवीं शताब्दी में विकसित हुआ और पुरातत्वविज्ञान पुनर्जागरण काल में
- (d)दोनों एक ही अनुशासन के दो नाम हैं
उत्तर(b) पुरातत्वविज्ञान उत्खनन तथा स्तर-विन्यास की पद्धति पर टिका है, जबकि पुरातनवाद संग्रह, वर्णन और वर्गीकरण तक सीमित रहा — यही भेद स्टेम की परिभाषा में भी झलकता है, जहाँ उत्खनन का उल्लेख नहीं है। (c) काल उलट देता है, क्योंकि पुरातनवाद पहले का है और पुरातत्वविज्ञान बाद का।
- practice — not a real PYQ
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की स्थापना किस वर्ष हुई थी ?
- (a)1784
- (b)1837
- (c)1861
- (d)1904
उत्तर(c) 1861 — इसी वर्ष भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की स्थापना हुई और अलेक्ज़ेंडर कनिंघम इसके प्रथम महानिदेशक बने। 1784 एशियाटिक सोसाइटी की स्थापना का वर्ष है, 1837 में जेम्स प्रिंसेप ने ब्राह्मी लिपि पढ़ी, और 1904 में प्राचीन स्मारक परिरक्षण अधिनियम आया।