कथन (I) : विदेशी निवेश किसी देश के निर्यात निष्पादन को प्रभावित कर सकता है । कथन (II) : विदेशी निवेश का अंतर्वाह स्थानीय मुद्रा की मूल्यवृद्धि कर सकता है, जिसके कारण निर्यात होने वाली वस्तुओं की कीमतों में वृद्धि हो सकती है ।
- (a)दोनों ही कथन (I) और (II) अलग-अलग सत्य हैं और कथन (II), कथन (I) का सही स्पष्टीकरण है
- (b)दोनों ही कथन (I) और (II) अलग-अलग सत्य हैं किन्तु कथन (II), कथन (I) का सही स्पष्टीकरण नहीं है
- (c)कथन (I) सत्य है किन्तु कथन (II) असत्य है
- (d)कथन (I) असत्य है किन्तु कथन (II) सत्य है
उत्तर
क्यों
सही उत्तर — A, (a) दोनों ही कथन (I) और (II) अलग-अलग सत्य हैं और कथन (II), कथन (I) का सही स्पष्टीकरण है — यह व्याख्या हिन्दी स्तंभ के कथनों पर आधारित है, जिनमें कथन (II) 'विदेशी निवेश के अंतर्वाह' की बात करता है। इस प्रश्नांश के अपने विकल्प नहीं छपे; निर्देश-खंड और चारों कूट Q117 के ऊपर एक ही बार छपे हैं और इस पर भी लागू होते हैं। कथन (I) सत्य है — विदेशी निवेश किसी देश के निर्यात निष्पादन को कई रास्तों से प्रभावित कर सकता है। कथन (II) उन्हीं रास्तों में से एक को पूरी कड़ी सहित खोल देता है: जब बाहर से निवेश आता है तो विदेशी मुद्रा को स्थानीय मुद्रा में बदला जाता है, इससे स्थानीय मुद्रा की माँग बढ़ती है, माँग बढ़ने से उसका बाहरी मूल्य चढ़ता है, और मुद्रा के महँगे होते ही वही निर्यात-वस्तु विदेशी ख़रीदार को अधिक विदेशी मुद्रा में पड़ने लगती है — अर्थात् निर्यात की प्रतिस्पर्धात्मकता घट जाती है। दोनों कथनों का कर्ता एक ही है, विदेशी निवेश, और दूसरा कथन पहले का 'कैसे' बताता है; इसलिए यह सही स्पष्टीकरण है और उत्तर (a) बनता है। ध्यान रखने योग्य बात यह भी है कि यह कड़ी केवल एक दिशा नहीं दिखाती। विदेशी निवेश निर्यात को घटा भी सकता है, जैसा कथन (II) में बताया गया है, और बढ़ा भी सकता है — नई उत्पादन-क्षमता, बेहतर तकनीक और विदेशी बाज़ारों तक पहुँच के रास्ते। कथन (I) में 'प्रभावित कर सकता है' कहा गया है, जो दोनों दिशाओं को समेट लेता है, इसलिए कथन (II) का एक दिशा दिखाना उसे झुठलाता नहीं बल्कि उसका एक ठोस उदाहरण देता है। यही कारण है कि यहाँ स्पष्टीकरण वाला कूट बैठता है: सामान्य दावे के लिए एक कार्य-कारण कड़ी दिखा देना पर्याप्त है।
अन्य विकल्प क्यों गलत हैं
- (b)दोनों ही कथन (I) और (II) अलग-अलग सत्य हैं किन्तु कथन (II), कथन (I) का सही स्पष्टीकरण नहीं है — यह कूट तब लगता जब दोनों कथन सत्य होकर भी आपस में कारण-कार्य के सूत्र से न जुड़ते। यहाँ जुड़ते हैं — कथन (II) मुद्रा की मूल्यवृद्धि से लेकर निर्यात-वस्तुओं की क़ीमत बढ़ने तक की पूरी कड़ी बताता है, और वही कड़ी कथन (I) के सामान्य दावे को ठोस रूप देती है। जाँच का वही तरीक़ा यहाँ भी लगाइए — कथन (II) हटा दीजिए तो कथन (I) यह नहीं बताता कि निवेश निर्यात को किस रास्ते प्रभावित करता है, और वही खाली जगह कथन (II) की कड़ी भरती है। इसलिए दोनों केवल एक ही विषय के नहीं, कार्य-कारण से जुड़े कथन हैं।
- (c)कथन (I) सत्य है किन्तु कथन (II) असत्य है — कथन (II) असत्य नहीं है। पूँजी का अंतर्वाह विदेशी मुद्रा बाज़ार में स्थानीय मुद्रा की माँग बढ़ाता है और उससे मुद्रा की मूल्यवृद्धि होती है — यह विनिमय दर का सामान्य व्यवहार है। मुद्रा चढ़ने पर निर्यात विदेशी ख़रीदार को महँगा और आयात घरेलू ख़रीदार को सस्ता पड़ता है। विनिमय दर का यह व्यवहार तैरती हुई दर वाली व्यवस्थाओं में रोज़ दिखता है: पूँजी का बड़ा अंतर्वाह मुद्रा को चढ़ा देता है और बड़ा बहिर्वाह गिरा देता है। यही कारण है कि निर्यात-प्रधान अर्थव्यवस्थाएँ तेज़ मूल्यवृद्धि को चिंता से देखती हैं।
- (d)कथन (I) असत्य है किन्तु कथन (II) सत्य है — कथन (I) भी असत्य नहीं है। विदेशी निवेश निर्यात निष्पादन को केवल विनिमय दर के रास्ते ही नहीं, उत्पादन-क्षमता, तकनीक और विदेशी बाज़ारों तक पहुँच के रास्ते भी प्रभावित करता है — और प्रभाव दोनों दिशाओं में हो सकता है। कथन में 'प्रभावित कर सकता है' कहा गया है, जो इन सभी संभावनाओं को समेट लेता है। विदेशी निवेश का निर्यात पर असर मापने में यही कठिनाई आती है कि उसके कई रास्ते एक साथ चलते हैं — मुद्रा की दिशा एक ओर खींचती है और उत्पादन-क्षमता तथा तकनीक दूसरी ओर। इसीलिए कथन (I) 'प्रभावित कर सकता है' जैसा सतर्क रूप लेता है, और वही उसे सत्य बनाता है।
अवधारणा
मुद्रा की मूल्यवृद्धि (appreciation) का अर्थ है उसका बाहरी मूल्य बढ़ना, यानी एक इकाई स्थानीय मुद्रा से पहले से अधिक विदेशी मुद्रा मिलना; इसका उलटा मूल्यह्रास (depreciation) है। तैरती हुई विनिमय दर में ये दोनों बाज़ार की माँग और पूर्ति से होते हैं, जबकि नियत दर में सरकार या केन्द्रीय बैंक के निर्णय से — और तब उन्हें अधिमूल्यन तथा अवमूल्यन कहा जाता है। पूँजी का अंतर्वाह मूल्यवृद्धि का एक प्रमुख कारण है, क्योंकि बाहर से आया धन स्थानीय मुद्रा में बदला जाता है और उसकी माँग बढ़ जाती है। मूल्यवृद्धि का असर व्यापार पर दोतरफ़ा पड़ता है — निर्यात विदेशी ख़रीदार को महँगा और आयात घरेलू ख़रीदार को सस्ता। इसीलिए निर्यात-प्रधान अर्थव्यवस्थाएँ तेज़ मूल्यवृद्धि को चिंता की दृष्टि से देखती हैं और केन्द्रीय बैंक बाज़ार में हस्तक्षेप कर उतार-चढ़ाव को सँभालता है।
यह प्रश्नांश हिन्दी और अंग्रेज़ी, दोनों स्तंभों में एक जैसा नहीं है: हिन्दी के कथन (II) में 'विदेशी निवेश का अंतर्वाह' छपा है, जबकि अंग्रेज़ी के उसी कथन में 'foreign exchange' का अंतर्वाह। कथन (I) दोनों स्तंभों में विदेशी निवेश की ही बात करता है, इसलिए भेद केवल दूसरे कथन में है। दोनों स्तंभ जैसे छपे हैं वैसे ही रखे गए हैं और यह कार्ड हिन्दी स्तंभ के अनुसार लिखा गया है, जिसमें दोनों कथनों का कर्ता एक ही है और इसीलिए कड़ी सीधी बैठती है। यह प्रश्नांश उसी कथन-युग्म वाले समूह का तीसरा है, जिसके विकल्प Q117 के ऊपर एक ही बार छपे हैं; इस पेपर में विदेशी निवेश पर एक और प्रश्न भी है, जो प्रवृत्तियों के आँकड़े पूछता है।
मुख्य तथ्य
- पूँजी के अंतर्वाह से विदेशी मुद्रा बाज़ार में स्थानीय मुद्रा की माँग बढ़ती है और उसका बाहरी मूल्य चढ़ता है।
- मुद्रा की मूल्यवृद्धि से निर्यात विदेशी ख़रीदार को महँगा और आयात घरेलू ख़रीदार को सस्ता पड़ता है।
- विदेशी निवेश निर्यात को उत्पादन-क्षमता, तकनीक और विदेशी बाज़ारों तक पहुँच के रास्ते बढ़ा भी सकता है, इसलिए उसका प्रभाव दोतरफ़ा है।
- तैरती हुई दर में मूल्य का बढ़ना-घटना बाज़ार से होता है और उसे मूल्यवृद्धि तथा मूल्यह्रास कहते हैं; नियत दर में वही निर्णय से होता है और अधिमूल्यन तथा अवमूल्यन कहलाता है।
- विनिमय दर के तीव्र उतार-चढ़ाव को सँभालने के लिए केन्द्रीय बैंक विदेशी मुद्रा बाज़ार में हस्तक्षेप करता है।
आगे की तैयारी
सामान्य भ्रम
- मुद्रा की मूल्यवृद्धि को सदैव लाभदायक मान लेना — वह आयातक के लिए अनुकूल और निर्यातक के लिए प्रतिकूल होती है।
- 'प्रभावित कर सकता है' जैसे अनुमति-सूचक कथन को केवल एक ही दिशा का दावा समझ लेना।
- मूल्यवृद्धि और अधिमूल्यन को एक मान लेना, जबकि पहला बाज़ार से और दूसरा नीतिगत निर्णय से होता है।
विनिमय दर और पूँजी-प्रवाह का यह सम्बन्ध चार रूपों में आता है — कथन-युग्म, कथन-सूची, सीधा प्रश्न कि मूल्यवृद्धि का निर्यात पर क्या असर होगा, और भुगतान-संतुलन के खातों से जुड़ा प्रश्न कि कौन-सा लेन-देन किस खाते में आता है। उत्तर देने से पहले कड़ी को क्रम से लिखिए — अंतर्वाह, मुद्रा की माँग, मूल्यवृद्धि, निर्यात की क़ीमत, प्रतिस्पर्धा — और यह देख लीजिए कि प्रश्न निर्यातक की दृष्टि से पूछ रहा है या आयातक की, क्योंकि दोनों के लिए असर उलटा होता है।
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- (a) 1 and 3 only
- (b) 1, 2 and 3
- (c) 2 and 3 only
- (d) 1 and 2 only
उत्तर(b) 1, 2 and 3
इसी पेपर का प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के अंतर्वाह की प्रवृत्तियों वाला प्रश्न — वही विषय आँकड़ों की ओर से, जहाँ यहाँ तंत्र पूछा गया है।
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उत्तर(a) Both Statement (I) and Statement (II) are individually true and Statement (II) is the correct explanation of Statement (I)
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- (a) 1, 2 and 3 only
- (b) 1, 2 and 4 only
- (c) 1, 2, 3 and 4
- (d) 3 and 4 only
उत्तर(c) 1, 2, 3 and 4
इसी पेपर का विदेशी निवेश संवर्धन बोर्ड की भूमिकाओं वाला प्रश्न — विदेशी निवेश का संस्थागत पक्ष।
अभ्यास
- practice — not a real PYQ
किसी देश में पूँजी के भारी अंतर्वाह से उसकी मुद्रा की मूल्यवृद्धि होने पर सामान्यतः क्या होता है ?
- (a)निर्यात सस्ते और आयात महँगे हो जाते हैं
- (b)निर्यात महँगे और आयात सस्ते हो जाते हैं
- (c)निर्यात और आयात दोनों महँगे हो जाते हैं
- (d)निर्यात और आयात दोनों सस्ते हो जाते हैं
उत्तर(b) निर्यात महँगे और आयात सस्ते हो जाते हैं — मुद्रा का बाहरी मूल्य बढ़ने पर विदेशी ख़रीदार को वही वस्तु अधिक विदेशी मुद्रा में पड़ती है, जबकि घरेलू ख़रीदार को आयात कम में मिल जाता है।