कथन (I) : लोक सभा अध्यक्ष, लोक लेखा समिति के अध्यक्ष की नियुक्ति करता है । कथन (II) : संसद् सदस्य और उद्योग और व्यापार जगत् के लब्धप्रतिष्ठ व्यक्ति लोक लेखा समिति के सदस्य होते हैं ।
- (a)दोनों ही कथन (I) और (II) अलग-अलग सत्य हैं और कथन (II), कथन (I) का सही स्पष्टीकरण है
- (b)दोनों ही कथन (I) और (II) अलग-अलग सत्य हैं किन्तु कथन (II), कथन (I) का सही स्पष्टीकरण नहीं है
- (c)कथन (I) सत्य है किन्तु कथन (II) असत्य है
- (d)कथन (I) असत्य है किन्तु कथन (II) सत्य है
उत्तर
क्यों
सही उत्तर — C, (c) कथन (I) सत्य है किन्तु कथन (II) असत्य है — इस प्रश्नांश के अपने विकल्प नहीं छपे; निर्देश-खंड और चारों कूट Q117 के ऊपर एक ही बार छपे हैं और इस अन्तिम प्रश्नांश पर भी लागू होते हैं। कथन (I) सत्य है: लोक लेखा समिति के सभापति की नियुक्ति लोक सभा अध्यक्ष करते हैं, और 1967 से चली आ रही परम्परा के अनुसार वे विपक्ष के किसी सदस्य को यह पद देते हैं। कथन (II) असत्य है, और वहीं इस प्रश्नांश का निर्णय होता है: समिति में केवल संसद सदस्य होते हैं — बाईस सदस्य, जिनमें पन्द्रह लोक सभा से और अधिक-से-अधिक सात राज्य सभा से चुने जाते हैं। उद्योग या व्यापार जगत् के लब्धप्रतिष्ठ व्यक्ति, चाहे कितने ही अनुभवी हों, इस समिति के सदस्य नहीं होते; यहाँ तक कि मंत्री भी इसका सदस्य नहीं बन सकता। चुनाव प्रतिवर्ष एकल संक्रमणीय मत द्वारा आनुपातिक प्रतिनिधित्व की पद्धति से होता है और सदस्यों का कार्यकाल एक वर्ष का होता है। संसदीय समितियों पर प्रश्न प्रायः इसी बिंदु पर बनते हैं — संरचना — इसलिए तीनों वित्तीय समितियों के आँकड़े एक साथ याद रखिए: लोक लेखा समिति और सार्वजनिक उपक्रम समिति दोनों बाईस सदस्यों की हैं, जिनमें पन्द्रह लोक सभा से और सात राज्य सभा से आते हैं, जबकि प्राक्कलन समिति तीस सदस्यों की है और उसमें राज्य सभा का कोई सदस्य नहीं होता। तीनों में सभापति की नियुक्ति लोक सभा अध्यक्ष करते हैं, और तीनों का कार्यकाल एक वर्ष का है। इन आँकड़ों को एक साथ रख लेने पर इस प्रकार का कोई भी कथन तुरंत परखा जा सकता है, चाहे वह संख्या बदले, सदन बदले या नियुक्ति करने वाला बदले।
अन्य विकल्प क्यों गलत हैं
- (a)दोनों ही कथन (I) और (II) अलग-अलग सत्य हैं और कथन (II), कथन (I) का सही स्पष्टीकरण है — यह कूट तभी लगता जब दोनों कथन सत्य होते और दूसरा पहले का कारण भी बताता। यहाँ दूसरा कथन ही असत्य है, इसलिए स्पष्टीकरण का प्रश्न ही नहीं उठता। कथन-युग्म वाले प्रश्नों में यही क्रम रखना चाहिए — पहले सच्चाई, फिर सम्बन्ध। यह भी ध्यान रखिए कि समिति का काम विशेषज्ञता का नहीं, संसदीय उत्तरदायित्व का है — विशेषज्ञ राय उसे महालेखापरीक्षक की रिपोर्ट और विभागीय साक्ष्य से मिल जाती है, और समिति अधिकारियों को बुलाकर पूछताछ भी कर सकती है। इसलिए बाहरी विशेषज्ञों को सदस्य बनाने की आवश्यकता ही नहीं पड़ती।
- (b)दोनों ही कथन (I) और (II) अलग-अलग सत्य हैं किन्तु कथन (II), कथन (I) का सही स्पष्टीकरण नहीं है — इस कूट के लिए भी दोनों कथनों का सत्य होना आवश्यक है। समिति की संरचना संसद सदस्यों तक सीमित है, इसलिए 'उद्योग और व्यापार जगत् के लब्धप्रतिष्ठ व्यक्ति' वाला अंश ही उसे असत्य कर देता है। यह भ्रम इसलिए होता है कि सरकार की कई सलाहकार समितियों और आयोगों में बाहरी विशेषज्ञ रखे जाते हैं — पर संसदीय समितियाँ उस कोटि की नहीं हैं। संसदीय समितियों और सलाहकार निकायों का यह भेद परीक्षा में बार-बार काम आता है: नीति आयोग या विभिन्न आयोगों में बाहरी विशेषज्ञ आते हैं, पर संसद की समितियाँ संसद सदस्यों से ही बनती हैं, क्योंकि उनका अधिकार सदन की ओर से आता है और वे सदन को ही प्रतिवेदन देती हैं।
- (d)कथन (I) असत्य है किन्तु कथन (II) सत्य है — कथन (I) असत्य नहीं है। लोक लेखा समिति का सभापति लोक सभा अध्यक्ष द्वारा नियुक्त किया जाता है, समिति के सदस्यों द्वारा चुना नहीं जाता — यह भेद परीक्षा में बार-बार पूछा गया है। सदस्य अवश्य निर्वाचित होते हैं, पर सभापति की नियुक्ति अध्यक्ष के हाथ में है। नियुक्ति और निर्वाचन का यह भेद तीनों वित्तीय समितियों में एक-सा है — सदस्य सदन द्वारा निर्वाचित होते हैं और सभापति लोक सभा अध्यक्ष द्वारा नियुक्त। 1967 से पहले सभापति प्रायः सत्ता पक्ष से होते थे; उसके बाद विपक्ष से नियुक्त करने की परम्परा बनी।
अवधारणा
लोक लेखा समिति संसद की तीन वित्तीय समितियों में सबसे पुरानी है और उसका मुख्य काम नियंत्रक-महालेखापरीक्षक की लेखापरीक्षा रिपोर्टों की जाँच करना है, जो संसद में रखे जाने के बाद उसके पास आती हैं। वह यह देखती है कि जो धन संसद ने स्वीकृत किया था वह उसी प्रयोजन पर और नियमानुसार ख़र्च हुआ या नहीं — अर्थात् उसका काम व्यय हो जाने के बाद का है, इसीलिए उसे उत्तरदायित्व सुनिश्चित करने वाली समिति कहा जाता है। महालेखापरीक्षक को इस समिति का 'मित्र, दार्शनिक और मार्गदर्शक' कहा जाता है, क्योंकि उसकी रिपोर्ट ही समिति की जाँच का आधार बनती है। समिति के सभी सदस्य संसद सदस्य होते हैं, कोई मंत्री उसका सदस्य नहीं हो सकता, और उसकी सिफ़ारिशें सलाह-रूप होती हैं, बाध्यकारी नहीं — फिर भी संसदीय जाँच का दबाव उन्हें प्रभावी बनाता है।
यह पेपर का अन्तिम प्रश्नांश है और उसी कथन-युग्म वाले समूह का चौथा; इसके अपने विकल्प नहीं छपे, क्योंकि निर्देश-खंड और चारों कूट Q117 के ऊपर एक ही बार छपे हैं। इस पेपर में राजव्यवस्था और संविधान के लगभग सात प्रश्न हैं, जिनमें संसदीय संस्थाओं की संरचना और अधिकार बार-बार आए हैं। इस प्रश्नांश का दूसरा कथन जिस भ्रम पर बनाया गया है वह वास्तविक है: सरकार की बहुत-सी सलाहकार समितियों, आयोगों और परिषदों में उद्योग तथा व्यापार जगत् के विशेषज्ञ रखे जाते हैं, और वहीं से यह धारणा बनती है कि संसदीय समितियों में भी ऐसा होता होगा। हिन्दी स्तंभ में कथन (II) में 'और' दो बार लगातार आया है, जैसा छपा है वैसा ही रखा गया है।
मुख्य तथ्य
- कुल सदस्य बाईस — पन्द्रह लोक सभा से और अधिक-से-अधिक सात राज्य सभा से; सभी संसद सदस्य होते हैं और कोई मंत्री सदस्य नहीं बन सकता।
- सदस्यों का चुनाव प्रतिवर्ष एकल संक्रमणीय मत द्वारा आनुपातिक प्रतिनिधित्व की पद्धति से होता है और उनका कार्यकाल एक वर्ष का होता है।
- सभापति की नियुक्ति लोक सभा अध्यक्ष करते हैं, और 1967 से चली आ रही परम्परा के अनुसार वे विपक्ष के सदस्य होते हैं।
- समिति नियंत्रक-महालेखापरीक्षक की रिपोर्टों की जाँच करती है और अपने प्रतिवेदन सदन को सौंपती है; उसकी सिफ़ारिशें सलाह-रूप होती हैं।
- प्राक्कलन समिति तीस सदस्यों की है और पूरी तरह लोक सभा से आती है, जबकि सार्वजनिक उपक्रम समिति लोक लेखा समिति की तरह बाईस सदस्यों की है।
आगे की तैयारी
सामान्य भ्रम
- संसदीय समिति में बाहरी विशेषज्ञों को सदस्य मान लेना — वहाँ केवल संसद सदस्य होते हैं और मंत्री भी नहीं।
- सभापति की नियुक्ति और सदस्यों के निर्वाचन को एक ही प्रक्रिया समझ लेना; सदस्य निर्वाचित होते हैं और सभापति नियुक्त।
- पन्द्रह की संख्या को राज्य सभा से जोड़ देना, जबकि वह लोक सभा का आँकड़ा है और राज्य सभा से सात आते हैं।
इन समितियों पर प्रश्न पाँच बिंदुओं पर बनते हैं — सदस्य-संख्या और सदनों में बँटवारा, सभापति की नियुक्ति कौन करता है, कार्यकाल, मंत्रियों की सदस्यता, और समिति का कार्य-क्षेत्र। प्राक्कलन समिति इस समूह का सबसे आम जाल है, क्योंकि वह अकेली ऐसी वित्तीय समिति है जिसमें राज्य सभा का कोई सदस्य नहीं होता। एक और आम प्रश्न यह है कि कौन-सी समिति व्यय से पहले जाँच करती है और कौन-सी बाद में — प्राक्कलन समिति अनुमानों की जाँच पहले करती है और लोक लेखा समिति ख़र्च की जाँच बाद में।
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- (a) 1, 2, 3, 4 and 5
- (b) 2, 3 and 4 only
- (c) 1, 4 and 5 only
- (d) 1, 2 and 3 only
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इसी पेपर का संविधान से जुड़े कथनों वाला प्रश्न — राजव्यवस्था की उसी कोटि का, जहाँ संस्थाओं के अधिकार परखे जाते हैं।
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- (a) 1 and 2 only
- (b) 1, 2, 3 and 4
- (c) 2, 3 and 4 only
- (d) 3 and 4 only
उत्तर(b) 1, 2, 3 and 4
एक बाद के EPFO प्रश्नपत्र का वह प्रश्न कि भारत की संचित निधि पर कौन-से व्यय भारित हैं — उसी निधि के विनियोग-लेखे इस समिति की जाँच का विषय होते हैं।
अभ्यास
- practice — not a real PYQ
लोक लेखा समिति की सदस्य-संख्या और उसका सदन-वार बँटवारा क्या है ?
- (a)22 सदस्य — 15 लोक सभा से और 7 राज्य सभा से
- (b)22 सदस्य — 7 लोक सभा से और 15 राज्य सभा से
- (c)30 सदस्य — 20 लोक सभा से और 10 राज्य सभा से
- (d)15 सदस्य — केवल लोक सभा से
उत्तर(a) 22 सदस्य — 15 लोक सभा से और 7 राज्य सभा से; केवल लोक सभा वाली समिति प्राक्कलन समिति है, जिसमें तीस सदस्य होते हैं।