निर्देश : अगले चार (4) प्रश्नांशों में से प्रत्येक में दो कथन हैं, एक को ‘कथन (I)’ और दूसरे को ‘कथन (II)’ कहा गया है । इन दोनों कथनों की सावधानी से परीक्षा कीजिए और नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर इन प्रश्नांशों के उत्तर चुनिए : कथन (I) : उपभोग, बचत और निवेश पर आय कर के प्रभाव व्यष्टि प्रभाव हैं । कथन (II) : आय कर, प्रत्यक्ष कर का एक उदाहरण है ।
- (a)दोनों ही कथन (I) और (II) अलग-अलग सत्य हैं और कथन (II), कथन (I) का सही स्पष्टीकरण है
- (b)दोनों ही कथन (I) और (II) अलग-अलग सत्य हैं किन्तु कथन (II), कथन (I) का सही स्पष्टीकरण नहीं है
- (c)कथन (I) सत्य है किन्तु कथन (II) असत्य है
- (d)कथन (I) असत्य है किन्तु कथन (II) सत्य है
उत्तर
क्यों
सही उत्तर — B, (b) दोनों ही कथन (I) और (II) अलग-अलग सत्य हैं किन्तु कथन (II), कथन (I) का सही स्पष्टीकरण नहीं है — इस प्रश्नांश के साथ छपा निर्देश-खंड अगले चार प्रश्नांशों, यानी इसी सहित Q117 से Q120 तक को शासित करता है, और चारों कूट भी वहीं एक ही बार छपे हैं; इसलिए हर प्रश्नांश में वही चार विकल्प लागू होते हैं। ऐसे प्रश्नों में क्रम यही रखना चाहिए — पहले दोनों कथनों की सच्चाई अलग-अलग जाँचिए, और तभी, जब दोनों सत्य निकलें, यह पूछिए कि क्या दूसरा पहले का कारण बताता है। कथन (I) सत्य है: लोक वित्त में करों के प्रभाव दो स्तरों पर पढ़े जाते हैं — व्यष्टि स्तर पर, जहाँ देखा जाता है कि कर व्यक्ति के काम करने, बचत करने, उपभोग करने और निवेश करने के निर्णयों को कैसे बदलता है, और समष्टि स्तर पर, जहाँ कुल माँग, उत्पादन, रोज़गार और क़ीमत-स्तर पर पड़ने वाला असर देखा जाता है। कथन (II) भी सत्य है, क्योंकि आय कर प्रत्यक्ष कर का सबसे परिचित उदाहरण है — उसका आघात और भार एक ही व्यक्ति पर पड़ता है और वह किसी दूसरे पर टाला नहीं जा सकता। पर दूसरा कथन पहले का स्पष्टीकरण नहीं है: 'प्रत्यक्ष होना' कर के भार के टाले जाने या न टाले जाने के बारे में है, जबकि 'व्यष्टि प्रभाव' होना इस बारे में है कि प्रभाव किस स्तर पर देखा जा रहा है। दोनों कसौटियाँ अलग हैं, इसलिए उत्तर (b) है। इस खंड के चारों प्रश्नांशों के लिए एक ही कार्य-क्रम रखिए, क्योंकि कूट भी चारों के लिए एक ही हैं: पहले कथन (I) को अकेले पढ़कर सत्य या असत्य ठहराइए, फिर कथन (II) को अकेले, और तभी तीसरा प्रश्न पूछिए कि क्या दूसरा पहले का कारण बताता है। यदि दोनों में से कोई एक असत्य हो तो तीसरा प्रश्न उठता ही नहीं और कूट (c) या (d) पर निर्णय हो जाता है। और यदि दोनों सत्य हों तो यह देखिए कि क्या दूसरा कथन पहले वाली बात का 'क्यों' बताता है — केवल एक ही विषय का होना पर्याप्त नहीं है, जैसा इसी प्रश्नांश में हुआ है।
अन्य विकल्प क्यों गलत हैं
- (a)दोनों ही कथन (I) और (II) अलग-अलग सत्य हैं और कथन (II), कथन (I) का सही स्पष्टीकरण है — यह विकल्प तभी सही होता जब कर का प्रत्यक्ष होना यह समझा देता कि उसके प्रभाव व्यष्टि स्तर के क्यों कहलाते हैं। ऐसा है नहीं। अप्रत्यक्ष करों के भी व्यष्टि प्रभाव होते हैं — उत्पाद पर लगा कर उपभोक्ता के ख़रीद-निर्णय बदल देता है — और प्रत्यक्ष करों के समष्टि प्रभाव भी होते हैं, जैसे आय कर की दर बदलने पर कुल माँग का घटना-बढ़ना। इसलिए दोनों कथन सत्य होते हुए भी कारण-कार्य के सम्बन्ध में नहीं बँधते। इसे परखने का एक सरल प्रश्न यह है — यदि आय कर अप्रत्यक्ष होता, तो क्या उपभोग, बचत और निवेश पर उसके प्रभाव समष्टि कहलाने लगते ? नहीं; वे तब भी व्यक्ति के निर्णयों पर ही देखे जाते। इसी से सिद्ध होता है कि कथन (II) कथन (I) का कारण नहीं है।
- (c)कथन (I) सत्य है किन्तु कथन (II) असत्य है — कथन (II) असत्य नहीं है। आय कर वह कर है जो जिस व्यक्ति पर लगाया जाता है उसी को चुकाना पड़ता है और वह उसका भार किसी और पर नहीं डाल सकता — यही प्रत्यक्ष कर की परिभाषा है, और आय कर उसका पाठ्यपुस्तकीय उदाहरण है। भारत में यह आयकर अधिनियम, 1961 के अंतर्गत लगाया जाता है। आय कर की एक और पहचान यह है कि वह प्रगतिशील होता है — आय बढ़ने के साथ दर बढ़ती है — और यही उसे पुनर्वितरण का साधन बनाता है। अप्रत्यक्ष कर प्रायः प्रतिगामी होते हैं, क्योंकि वे आय पर नहीं, ख़र्च पर लगते हैं।
- (d)कथन (I) असत्य है किन्तु कथन (II) सत्य है — कथन (I) भी असत्य नहीं है। कर के प्रभावों का व्यष्टि और समष्टि में विभाजन लोक वित्त की स्थापित रीति है, और उपभोग, बचत तथा निवेश के निर्णयों पर पड़ने वाला असर उसी पहली कोटि में आता है। यह विकल्प तब चुना जाता है जब उपभोग, बचत और निवेश को केवल समष्टि अर्थशास्त्र की राशियाँ मान लिया जाए और यह भुला दिया जाए कि निर्णय व्यक्ति और परिवार के स्तर पर होते हैं। कर के प्रभावों का व्यष्टि-समष्टि विभाजन लोक वित्त की पाठ्य-सामग्री में स्थापित है, और उसमें उपभोग तथा बचत के व्यक्तिगत निर्णय पहली कोटि में आते हैं। समष्टि प्रभाव तब कहे जाते हैं जब उन्हीं निर्णयों का जोड़ पूरी अर्थव्यवस्था की कुल माँग या रोज़गार पर दिखने लगे।
अवधारणा
कर का आघात (impact) उस व्यक्ति पर पड़ता है जिससे कर वसूला जाता है, और भार (incidence) उस पर जो अन्ततः उसे वहन करता है। जब दोनों एक ही व्यक्ति पर हों तो कर प्रत्यक्ष है, और जब भार आगे टाल दिया जाए तो अप्रत्यक्ष; भार को आगे टालने की क्रिया को कर-विवर्तन कहते हैं। यह वर्गीकरण पूरी तरह इस बात पर है कि भार कहाँ ठहरता है। इसके विपरीत कर के प्रभावों का वर्गीकरण एक अलग कसौटी पर होता है — व्यष्टि प्रभाव वे हैं जो व्यक्ति और परिवार के निर्णयों पर पड़ते हैं, जैसे काम करने की इच्छा, बचत, उपभोग का ढाँचा और निवेश का चुनाव; और समष्टि प्रभाव वे हैं जो पूरी अर्थव्यवस्था के स्तर पर दिखते हैं, जैसे कुल माँग, उत्पादन, रोज़गार और क़ीमत-स्तर। दोनों कसौटियाँ स्वतंत्र हैं, इसलिए किसी कर का प्रत्यक्ष होना यह नहीं बताता कि उसके प्रभाव किस स्तर पर देखे जाएँगे।
यह पुस्तिका का एकमात्र कथन-युग्म वाला समूह है और उसमें 'कथन (I)' तथा 'कथन (II)' शब्दावली प्रयुक्त हुई है, 'अभिकथन और कारण' नहीं। निर्देश-खंड इसी प्रश्नांश के ऊपर एक ही बार छपा है और अगले चार प्रश्नांशों को शासित करता है, तथा चारों उत्तर-विकल्प भी उसी के नीचे एक ही बार 'कूट' शीर्षक के अंतर्गत छपे हैं — इसलिए आगे के प्रश्नांशों में विकल्प दोबारा नहीं मिलते और उन्हें यहीं से पढ़ना पड़ता है। कूट (b) में 'नहीं' मोटे तिरछे अक्षरों में छपा है, जो उसे कूट (a) से अलग करने वाला एकमात्र शब्द है। ऐसे खंड में सबसे बड़ी सावधानी यही है कि चारों कूट एक बार ध्यान से पढ़ लिए जाएँ, क्योंकि आगे के तीनों प्रश्नांशों में वही लागू होंगे।
मुख्य तथ्य
- प्रत्यक्ष कर — आघात और भार एक ही व्यक्ति पर; उदाहरण आय कर, निगम कर और सम्पत्ति कर, और भारत में आय कर आयकर अधिनियम, 1961 के अंतर्गत लगता है।
- अप्रत्यक्ष कर — भार आगे उपभोक्ता पर टाला जा सकता है; उदाहरण सीमा शुल्क, उत्पाद शुल्क और वस्तु एवं सेवा कर।
- कर के व्यष्टि प्रभाव — काम करने की इच्छा, बचत, उपभोग के ढाँचे और निवेश के व्यक्तिगत निर्णयों पर पड़ने वाला असर।
- कर के समष्टि प्रभाव — कुल माँग, उत्पादन, रोज़गार और क़ीमत-स्तर पर पड़ने वाला असर।
- अप्रत्यक्ष करों के भी व्यष्टि प्रभाव होते हैं और प्रत्यक्ष करों के समष्टि प्रभाव भी, इसलिए दोनों वर्गीकरण एक-दूसरे से स्वतंत्र हैं।
आगे की तैयारी
सामान्य भ्रम
- दोनों कथन सत्य देखकर तुरंत पहला कूट चुन लेना, बिना यह जाँचे कि दूसरा पहले का कारण बताता है या नहीं।
- कर के वर्गीकरण (प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष) और प्रभाव के स्तर (व्यष्टि-समष्टि) को एक ही कसौटी मान लेना।
- आघात और भार को एक समझ लेना, जबकि अप्रत्यक्ष करों में ये दोनों अलग-अलग व्यक्तियों पर पड़ते हैं।
कथन-युग्म वाले प्रश्न प्रायः ऐसे दो सच्चे कथन रखते हैं जो एक ही विषय के होते हैं पर अलग-अलग कसौटियों के, और परीक्षा यही देखती है कि अभ्यर्थी 'सम्बन्धित होना' और 'कारण होना' में अन्तर कर पाता है या नहीं। इसलिए तीन प्रश्न अलग-अलग पूछिए — पहला कथन सत्य है ? दूसरा कथन सत्य है ? और क्या दूसरा पहले का 'क्यों' बताता है ? लोक वित्त के इस भाग से प्रश्न प्रायः प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष के वर्गीकरण, आघात और भार के भेद, तथा कर के आर्थिक प्रभावों पर आते हैं।
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- (a) Both Statement (I) and Statement (II) are individually true and Statement (II) is the correct explanation of Statement (I)
- (b) Both Statement (I) and Statement (II) are individually true but Statement (II) is not the correct explanation of Statement (I)
- (c) Statement (I) is true but Statement (II) is false
- (d) Statement (I) is false but Statement (II) is true
उत्तर(a) Both Statement (I) and Statement (II) are individually true and Statement (II) is the correct explanation of Statement (I)
इसी खंड का अगला कथन-युग्म, व्यापार और कारक एन्डाउमेंट पर — वहाँ दूसरा कथन पहले का सही स्पष्टीकरण बनता है, इसलिए दोनों को साथ पढ़ने से कूट (a) और (b) का भेद स्पष्ट हो जाता है।
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- (b) 1 and 3 only
- (c) 2 and 4 only
- (d) 2 and 3 only
उत्तर(b) 1 and 3 only
इसी पेपर का वित्त आयोग की भूमिकाओं वाला प्रश्न — करों से जुटाए गए धन के बँटवारे की व्यवस्था, लोक वित्त का दूसरा पक्ष।
अभ्यास
- practice — not a real PYQ
निम्नलिखित में से कौन-सा प्रत्यक्ष कर है ?
- (a)सीमा शुल्क
- (b)उत्पाद शुल्क
- (c)निगम कर
- (d)वस्तु एवं सेवा कर
उत्तर(c) निगम कर — इसका भार उसी कम्पनी पर रहता है जिस पर वह लगाया जाता है; शेष तीनों में भार आगे उपभोक्ता पर टाला जा सकता है।