परिसंपत्ति का क्रय जब खर्च की तरह माना जाता है, तब लेखांकन के संदर्भ में यह क्या कहलाता है ?
- (a)सैद्धान्तिक त्रुटि
- (b)चूक
- (c)भूल
- (d)प्रतिकारी त्रुटि
उत्तर
क्यों
सही उत्तर — A, (a) सैद्धान्तिक त्रुटि — परिसंपत्ति के क्रय को खर्च की तरह लिख देना लेखांकन के एक सिद्धांत का उल्लंघन है, केवल लिखने में हुई कोई असावधानी नहीं।
सिद्धांत यह है कि पूँजीगत और राजस्व मदें अलग-अलग रखी जाती हैं। परिसंपत्ति का क्रय पूँजीगत व्यय है और वह चिट्ठे में परिसंपत्ति के रूप में दिखता है; खर्च राजस्व मद है और वह उसी वर्ष के लाभ-हानि खाते में जाता है। जब क्रय को खर्च मान लिया जाता है तो राशि ग़लत नहीं होती, दोनों पक्षों में अंतर भी नहीं आता — केवल वह गलत ढेरी में चली जाती है। यही सैद्धान्तिक त्रुटि की परिभाषा है : प्रविष्टि लेखांकन के किसी सिद्धांत के विरुद्ध की गई हो, चाहे वह अंकगणित की दृष्टि से पूरी तरह शुद्ध हो।
इस त्रुटि की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता यही है कि उससे तलपट का संतुलन नहीं बिगड़ता। दोनों ओर की राशियाँ बराबर रहती हैं, इसलिए तलपट मिल जाता है और त्रुटि छिपी रह जाती है। उसे पकड़ने के लिए किसी को यह पूछना पड़ता है कि यह मद इस खाते में होनी भी चाहिए थी या नहीं — और यही काम लेखापरीक्षा का है।
परिणाम भी दोहरा होता है, और वही इसे गंभीर बनाता है। एक ओर उस वर्ष के व्यय बढ़े हुए दिखते हैं और लाभ घटा हुआ; दूसरी ओर चिट्ठे में परिसंपत्तियाँ कम दिखती हैं, क्योंकि जो परिसंपत्ति आई थी वह वहाँ दर्ज ही नहीं हुई। साथ ही आगे के वर्षों में उस परिसंपत्ति पर मूल्यह्रास भी नहीं लगेगा, इसलिए बाद के वर्षों का लाभ बढ़ा हुआ दिखता रहेगा। एक ही चूक दो विवरणों को और कई वर्षों को प्रभावित करती है।
इसका उलटा रूप भी उतनी ही बार पूछा जाता है और वह भी सैद्धान्तिक त्रुटि ही है — जैसे मरम्मत के व्यय को मशीन खाते में जोड़ देना, या अस्थायी ढाँचे को पक्के भवन में बदलने का व्यय मरम्मत खाते में लिख देना।
अंत में विकल्पों की भाषा पर एक बात, क्योंकि इस पेपर के हिन्दी स्तंभ में दो विकल्प एक-एक शब्द के हैं। इसी पुस्तिका का अंग्रेज़ी स्तंभ विकल्प (b) पर 'Error of omission' और विकल्प (c) पर 'Error of commission' छापता है, अर्थात् एक छूट जाने की त्रुटि है और दूसरा करने में हुई भूल की। इन दोनों को अलग-अलग पहचानना यहाँ आवश्यक है, क्योंकि हिन्दी में दोनों शब्द बहुत निकट पड़ जाते हैं।
अन्य विकल्प क्यों गलत हैं
- (b)चूक — इसी पुस्तिका का अंग्रेज़ी स्तंभ यहाँ 'Error of omission' छापता है, अर्थात् वह त्रुटि जिसमें कोई लेन-देन लेखा-पुस्तकों में लिखा ही नहीं जाता, या आधा लिखा जाता है। प्रस्तुत स्थिति उससे मेल नहीं खाती : यहाँ परिसंपत्ति का क्रय छूटा नहीं है, वह दर्ज तो हुआ है, केवल ग़लत कोटि के खाते में। छूट जाने की त्रुटि दो प्रकार की होती है और उनका व्यवहार अलग-अलग है। पूर्ण चूक में लेन-देन के दोनों पक्ष लिखे ही नहीं जाते, इसलिए तलपट का संतुलन नहीं बिगड़ता और त्रुटि छिपी रहती है। आंशिक चूक में एक पक्ष लिखा जाता है और दूसरा छूट जाता है, इसलिए तलपट नहीं मिलता और त्रुटि तुरंत पकड़ में आ जाती है। इसी परीक्षा-परिवार के एक पेपर में रोकड़ बिक्री का रोकड़ बही में दर्ज न होना इसी कोटि के उदाहरण के रूप में आ चुका है।
- (c)भूल — इसी पुस्तिका का अंग्रेज़ी स्तंभ यहाँ 'Error of commission' छापता है, अर्थात् करने में हुई भूल — प्रविष्टि की तो गई, पर कहीं न कहीं ग़लत ढंग से। इसके सामान्य रूप हैं : ग़लत राशि लिख देना, किसी बही का योग ग़लत लगा देना, खाते का शेष ग़लत निकाल देना, या राशि उसी वर्ग के किसी दूसरे व्यक्ति के खाते में डाल देना, जैसे राम की जगह श्याम के खाते में। ध्यान दीजिए कि इन सबमें लेखांकन का कोई सिद्धांत नहीं टूटता; टूटती केवल सावधानी है। प्रस्तुत स्थिति में ऐसा कुछ नहीं हुआ — राशि सही है, पक्ष सही हैं, और भूल यह है कि पूँजीगत मद को राजस्व मान लिया गया, जो सिद्धांत का प्रश्न है। इसीलिए यह विकल्प इस स्थिति पर लागू नहीं होता।
- (d)प्रतिकारी त्रुटि — प्रतिकारी त्रुटि वह है जिसमें दो या अधिक त्रुटियाँ इस प्रकार होती हैं कि उनका प्रभाव आपस में कट जाता है और तलपट फिर भी मिल जाता है — जैसे किसी खाते में सौ रुपये अधिक नामे कर दिए जाएँ और किसी दूसरे खाते में उतने ही अधिक जमा कर दिए जाएँ। इसकी पहचान यह है कि उसमें कम से कम दो त्रुटियाँ चाहिए, और वे विपरीत दिशा में तथा बराबर राशि की होनी चाहिए। प्रस्तुत स्थिति में केवल एक ही त्रुटि है, इसलिए यह कोटि लागू नहीं होती। एक समानता अवश्य है, और वही इस विकल्प का प्रलोभन बनाती है : सैद्धान्तिक त्रुटि की तरह प्रतिकारी त्रुटि से भी तलपट का संतुलन नहीं बिगड़ता। पर समान परिणाम से कोटि समान नहीं हो जाती — कोटि त्रुटि के स्वरूप से तय होती है, उसके तलपट पर पड़ने वाले प्रभाव से नहीं।
अवधारणा
लेखांकन की त्रुटियों को दो अलग-अलग दृष्टियों से बाँटा जाता है, और परीक्षा में दोनों वर्गीकरण साथ-साथ पूछे जाते हैं।
पहला वर्गीकरण त्रुटि के स्वरूप के अनुसार है और उसमें चार कोटियाँ हैं। छूट जाने की त्रुटि — लेन-देन पूरा या आधा लिखा ही नहीं गया। करने में हुई भूल — प्रविष्टि हुई पर ग़लत राशि, ग़लत योग, ग़लत शेष या उसी वर्ग के ग़लत खाते में। सैद्धान्तिक त्रुटि — प्रविष्टि लेखांकन के किसी सिद्धांत के विरुद्ध, जैसे पूँजीगत और राजस्व का घालमेल। प्रतिकारी त्रुटि — दो या अधिक त्रुटियाँ जिनका प्रभाव आपस में कट जाता है।
दूसरा वर्गीकरण इस आधार पर है कि तलपट उन्हें पकड़ता है या नहीं। तलपट केवल उन्हीं त्रुटियों को पकड़ता है जिनसे नामे और जमा का योग असमान हो जाता है — जैसे आंशिक चूक, एक ओर का ग़लत योग, या केवल एक पक्ष का ग़लत शेष। जिन त्रुटियों में दोनों पक्ष बराबर बने रहते हैं उन्हें तलपट नहीं पकड़ता : पूर्ण चूक, सैद्धान्तिक त्रुटि, प्रतिकारी त्रुटि, और उसी वर्ग के ग़लत खाते में की गई प्रविष्टि।
यही दूसरा वर्गीकरण लेखापरीक्षा के अस्तित्व का एक कारण भी है। यदि तलपट सारी त्रुटियाँ पकड़ लेता तो उसका मिल जाना ही शुद्धता का प्रमाण होता; वह नहीं पकड़ता, इसलिए मिला हुआ तलपट केवल यह बताता है कि अंकगणित ठीक है, यह नहीं कि लेखे सही हैं।
त्रुटियों का सुधार भी इसी वर्गीकरण से जुड़ा है : जो त्रुटियाँ तलपट को नहीं बिगाड़तीं उन्हें सीधे सुधार-प्रविष्टि से ठीक किया जाता है, और जो बिगाड़ती हैं उनके लिए प्रायः उचंत खाते का सहारा लेना पड़ता है।
त्रुटियों का यह वर्गीकरण द्वि-अंकन प्रणाली की एक सीमा से निकला है। उस प्रणाली की सबसे बड़ी शक्ति यह है कि हर लेन-देन के दो पक्ष होते हैं और उनके योग बराबर रहते हैं, इसलिए किसी भी समय तलपट बनाकर अंकगणित की जाँच की जा सकती है। पर यही शक्ति उसकी सीमा भी है : प्रणाली केवल यह जाँच सकती है कि दोनों पक्ष बराबर हैं, यह नहीं कि सही खातों में हैं।
इसीलिए वे त्रुटियाँ सबसे ख़तरनाक मानी जाती हैं जिनसे संतुलन नहीं बिगड़ता, और उनमें भी सैद्धान्तिक त्रुटि सबसे ऊपर है। छूट जाने की त्रुटि प्रायः किसी न किसी मिलान में पकड़ी जाती है — बैंक विवरण से, या पक्षकार के खाते से। करने में हुई भूल भी प्रायः किसी पत्राचार या पुष्टि से सामने आ जाती है। पर पूँजीगत और राजस्व का घालमेल किसी बाहरी दस्तावेज़ से नहीं पकड़ा जा सकता, क्योंकि दस्तावेज़ तो सही है; केवल उसका लेखांकन-व्यवहार ग़लत है।
यही कारण है कि लेखापरीक्षा में इस भेद पर विशेष ध्यान दिया जाता है और लेखापरीक्षक बड़े व्यय की मदों को इसी दृष्टि से देखता है कि वे सही कोटि में गई हैं या नहीं। इसी कारण यह त्रुटि प्रबंधन द्वारा जान-बूझकर भी की जा सकती है — किसी वर्ष का लाभ बढ़ाना हो तो राजस्व व्यय को पूँजीगत बना दिया जाए, और घटाना हो तो उलटा।
परीक्षा की दृष्टि से इसका निष्कर्ष सीधा है : त्रुटि की कोटि पहचानने के लिए यह पूछिए कि टूटा क्या है — सावधानी, पूर्णता, या सिद्धांत। तीसरा उत्तर हो तो कोटि सैद्धान्तिक त्रुटि है।
मुख्य तथ्य
- परिसंपत्ति के क्रय को खर्च मान लेना पूँजीगत और राजस्व के भेद का उल्लंघन है, और इसीलिए वह सैद्धान्तिक त्रुटि कहलाती है।
- सैद्धान्तिक त्रुटि से तलपट का संतुलन नहीं बिगड़ता, क्योंकि राशि और दोनों पक्ष सही रहते हैं; केवल खाता ग़लत कोटि का होता है।
- इसका प्रभाव दोहरा है — उस वर्ष का लाभ कम दिखता है और चिट्ठे में परिसंपत्तियाँ भी कम, तथा आगे के वर्षों में उस पर मूल्यह्रास न लगने से लाभ बढ़ा हुआ दिखता रहता है।
- छूट जाने की त्रुटि दो प्रकार की होती है : पूर्ण चूक, जिससे तलपट का संतुलन नहीं बिगड़ता, और आंशिक चूक, जिससे बिगड़ता है।
- करने में हुई भूल के सामान्य रूप हैं — ग़लत राशि, ग़लत योग, ग़लत शेष, और उसी वर्ग के किसी दूसरे खाते में की गई प्रविष्टि।
- प्रतिकारी त्रुटि में कम से कम दो त्रुटियाँ होती हैं जो विपरीत दिशा में और बराबर राशि की होकर एक-दूसरे को काट देती हैं, इसलिए तलपट फिर भी मिल जाता है।
आगे की तैयारी
सामान्य भ्रम
- हिन्दी में छूट जाने की त्रुटि और करने में हुई भूल के नाम बहुत निकट पड़ जाते हैं। दोनों की परिभाषा से पहचानिए, नाम की ध्वनि से नहीं।
- तलपट न बिगड़ने वाली त्रुटियाँ एक से अधिक हैं, इसलिए केवल यह देखकर कोटि तय नहीं की जा सकती कि तलपट मिल गया या नहीं।
- प्रतिकारी त्रुटि के लिए कम से कम दो त्रुटियाँ चाहिए। एक अकेली त्रुटि कभी प्रतिकारी नहीं होती।
- यह त्रुटि दोनों दिशाओं में हो सकती है — पूँजीगत को राजस्व मानना और राजस्व को पूँजीगत — और दोनों ही सैद्धान्तिक त्रुटि हैं।
त्रुटियों पर प्रश्न तीन साँचों में आते हैं, और तीनों इसी परीक्षा-परिवार में आ चुके हैं। पहला वही है जो यहाँ है — एक स्थिति देकर उसकी कोटि पूछना; इसका उत्तर निकालने का भरोसेमंद तरीक़ा यह है कि पूछिए कि टूटा क्या है, सावधानी, पूर्णता या सिद्धांत। दूसरा साँचा निषेधात्मक है — 'निम्नलिखित में से कौन-सी करने में हुई भूल नहीं है' — जहाँ तीन उदाहरण एक कोटि से आते हैं और एक दूसरी कोटि से; ऐसे प्रश्न में हर उदाहरण को उसकी परिभाषा से मिलाइए, क्योंकि उदाहरण देखने में एक जैसे लगते हैं। तीसरा साँचा तलपट का है — 'कौन-सी त्रुटि तलपट से नहीं पकड़ी जाती' — जिसके लिए वह दूसरी सूची याद होनी चाहिए। तीनों की तैयारी एक तालिका से हो जाती है जिसमें चार पंक्तियाँ हों, एक-एक कोटि के लिए, और हर पंक्ति में तीन खाने : परिभाषा, दो उदाहरण, और यह कि तलपट उसे पकड़ता है या नहीं।
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