निम्नलिखित में से किस/किन परिस्थिति/यों में श्रीमान ‘X’ को उपदान संदाय (पेमेंट ऑफ ग्रेच्युटी) अधिनियम, 1972 के अंतर्गत ग्रेच्युटी देय होगी ? 1. श्रीमान ‘X’ छह वर्ष तक निरंतर सेवा देने के पश्चात उद्योग से त्यागपत्र देते हैं 2. श्रीमान ‘X’ दो वर्ष तक निरंतर सेवा देने के पश्चात उद्योग में एक दुर्घटना में दिवंगत हो जाते हैं 3. श्रीमान ‘X’ पाँच वर्ष तक निरंतर सेवा देने के पश्चात उद्योग से सेवानिवृत्त हो जाते हैं
- (a)केवल 3
- (b)1, 2 और 3
- (c)केवल 1 और 3
- (d)केवल 1 और 2
उत्तर
क्यों
सही उत्तर — B, (b) 1, 2 और 3 — तीनों परिस्थितियों में ग्रेच्युटी देय होगी, और तीनों का आधार अधिनियम की धारा 4 में एक ही स्थान पर मिल जाता है।
धारा 4(1) कहती है कि किसी कर्मचारी को उसके नियोजन के पर्यवसान पर ग्रेच्युटी देय होगी, बशर्ते उसने पाँच वर्ष से अन्यून निरंतर सेवा की हो, और पर्यवसान इनमें से किसी कारण से हुआ हो — अधिवर्षिता पर; सेवानिवृत्ति या त्यागपत्र पर; अथवा मृत्यु या दुर्घटना या रोग से हुई नि:शक्तता पर। इसके तुरंत बाद एक परंतुक है, और वही इस प्रश्न का निर्णायक भाग है : जहाँ नियोजन का पर्यवसान मृत्यु या नि:शक्तता के कारण हुआ हो, वहाँ पाँच वर्ष की निरंतर सेवा पूरी होना आवश्यक नहीं होगा।
अब तीनों परिस्थितियाँ इसी पाठ से मिलाइए।
परिस्थिति 1 — छह वर्ष की निरंतर सेवा के बाद त्यागपत्र। पाँच वर्ष की शर्त पूरी है, और त्यागपत्र धारा 4(1) में स्पष्ट रूप से गिनाया गया कारण है। ध्यान दीजिए कि त्यागपत्र देने पर ग्रेच्युटी नहीं मिलती, यह एक बहुत प्रचलित भ्रम है, और अधिनियम उसका खंडन करता है। ग्रेच्युटी देय है।
परिस्थिति 2 — दो वर्ष की सेवा के बाद उद्योग में हुई एक दुर्घटना में मृत्यु। सेवा पाँच वर्ष की नहीं है, पर परंतुक उसी दशा के लिए बना है। मृत्यु पर पाँच वर्ष की शर्त नहीं लगती, इसलिए ग्रेच्युटी देय है। मृत्यु की दशा में वह राशि कर्मचारी के नामनिर्देशिती को, और नामनिर्देशन न होने पर उसके वारिसों को दी जाती है; अवयस्क वारिस का हिस्सा नियंत्रक प्राधिकारी के पास निक्षिप्त किया जाता है।
परिस्थिति 3 — पाँच वर्ष की निरंतर सेवा के बाद सेवानिवृत्ति। यहाँ शब्द 'पाँच वर्ष से अन्यून' महत्वपूर्ण है : ठीक पाँच वर्ष भी शर्त पूरी कर देते हैं, क्योंकि अपेक्षा पाँच वर्ष से कम न होने की है, पाँच से अधिक होने की नहीं। सेवानिवृत्ति भी धारा 4(1) का गिनाया हुआ कारण है। ग्रेच्युटी देय है।
तीनों देय हैं, इसलिए उत्तर विकल्प (b) है।
यह भी जोड़ लीजिए कि 'निरंतर सेवा' का अपना अर्थ धारा 2क में दिया है, और वह केवल कैलेंडर के वर्षों की गिनती नहीं है — वहाँ वर्ष में काम किए गए दिनों की एक न्यूनतम संख्या से गणना होती है, और अवकाश, छुट्टी, दुर्घटना, विधिपूर्ण हड़ताल तथा स्त्री की प्रसूति-अवधि जैसे अंतराल सेवा में व्यवधान नहीं माने जाते।
अन्य विकल्प क्यों गलत हैं
- (a)केवल 3 — यह विकल्प केवल तीसरी परिस्थिति को स्वीकार करता है, यानी वह पहली और दूसरी दोनों को गिरा देता है, और दोनों गिराना पाठ के विरुद्ध है। पहली परिस्थिति त्यागपत्र की है, और धारा 4(1) में त्यागपत्र सेवानिवृत्ति के साथ ही, उसी उपखंड में गिनाया गया है; छह वर्ष की सेवा पाँच वर्ष की शर्त से अधिक ही है, इसलिए वहाँ कोई कठिनाई है ही नहीं। दूसरी परिस्थिति मृत्यु की है, जिसके लिए अधिनियम ने अलग से परंतुक रखा है। इस विकल्प को चुनने का एकमात्र संभव आधार यह मान लेना है कि ग्रेच्युटी केवल सेवानिवृत्ति पर मिलती है — जो अधिनियम की मूल संरचना को ही न पहचानना है, क्योंकि धारा 4(1) चार अलग-अलग कारण गिनाती है और सेवानिवृत्ति उनमें से केवल एक है।
- (c)केवल 1 और 3 — यह चारों में सबसे विचारणीय विकल्प है, क्योंकि उसका आधार अधिनियम की सबसे प्रसिद्ध शर्त है — पाँच वर्ष की निरंतर सेवा। दूसरी परिस्थिति में सेवा केवल दो वर्ष की है, इसलिए पहली दृष्टि में उसे गिरा देना स्वाभाविक लगता है। कठिनाई यह है कि धारा 4(1) उस शर्त के साथ ही उसका अपवाद भी रखती है, और अपवाद ठीक इसी दशा का है : जहाँ नियोजन का पर्यवसान मृत्यु या नि:शक्तता के कारण हुआ हो, वहाँ पाँच वर्ष पूरे होना आवश्यक नहीं। तर्क भी स्पष्ट है — पाँच वर्ष की शर्त उस कर्मचारी पर लगाई गई है जो स्वयं जाने का निर्णय करता है, न कि उस परिवार पर जिसने कमाने वाले को दुर्घटना में खो दिया। इसलिए यह विकल्प सही शर्त को सही याद रखता है और उसके अपवाद को छोड़ देता है।
- (d)केवल 1 और 2 — यह विकल्प पहली और दूसरी परिस्थिति को स्वीकार करता है और तीसरी को गिरा देता है, जो तीनों में सबसे सीधी है। संभवतः इसका आधार यह पढ़ना है कि पाँच वर्ष 'पूरे कर लेना' पर्याप्त नहीं, उससे अधिक सेवा चाहिए। अधिनियम के शब्द ऐसा नहीं कहते : वहाँ 'पाँच वर्ष से अन्यून निरंतर सेवा' लिखा है, अर्थात् सेवा पाँच वर्ष से कम नहीं होनी चाहिए। ठीक पाँच वर्ष इस कसौटी पर पूरे उतरते हैं। साथ ही तीसरी परिस्थिति में पर्यवसान का कारण सेवानिवृत्ति है, जो धारा 4(1) का सबसे स्पष्ट कारण है। इस प्रकार यहाँ न शर्त की कमी है, न कारण की, और इस परिस्थिति को गिराने का कोई आधार अधिनियम में नहीं मिलता।
अवधारणा
उपदान संदाय अधिनियम, 1972 को समझने का सरल रास्ता यह है कि उसे चार प्रश्नों में बाँट लीजिए : यह कहाँ लागू होता है, ग्रेच्युटी कब देय होती है, कितनी देय होती है, और उसे रोका कब जा सकता है।
कहाँ — धारा 1(3) के अनुसार यह हर कारख़ाने, खान, तेलक्षेत्र, बागान, पत्तन और रेल कंपनी पर लागू है, तथा हर उस दुकान या प्रतिष्ठान पर जिसमें पिछले बारह मास में किसी दिन दस या अधिक व्यक्ति नियोजित रहे हों, और केंद्र सरकार द्वारा अधिसूचित अन्य प्रतिष्ठानों पर भी। एक बार लागू हो जाने पर वह लागू ही रहता है, चाहे बाद में कर्मचारियों की संख्या घट जाए।
कब — धारा 4(1) चार कारण गिनाती है : अधिवर्षिता, सेवानिवृत्ति, त्यागपत्र, तथा मृत्यु या नि:शक्तता। पहले तीन के लिए पाँच वर्ष से अन्यून निरंतर सेवा चाहिए; अंतिम के लिए वह शर्त नहीं लगती।
कितनी — धारा 4(2) के अनुसार हर पूरे किए गए वर्ष के लिए, तथा छह मास से अधिक के भाग के लिए, पंद्रह दिन की मज़दूरी की दर से, जो कर्मचारी की अंतिम प्राप्त मज़दूरी पर निकाली जाती है। मौसमी प्रतिष्ठान के लिए दर अलग है। धारा 4(3) एक ऊपरी सीमा भी रखती है, जो समय-समय पर बढ़ाई गई है और इस समय बीस लाख रुपये है।
कब नहीं — धारा 4(6) दो दशाएँ देती है जिनमें ग्रेच्युटी अंशत: या पूर्णत: समपहृत की जा सकती है : जहाँ कर्मचारी की जानबूझकर की गई भूल या उपेक्षा से नियोजक को हानि हुई हो, और जहाँ सेवा का पर्यवसान उपद्रवी या अव्यवस्थित आचरण अथवा नैतिक अधमता वाले अपराध के कारण हुआ हो।
इन चारों के साथ धारा 4क का अनिवार्य बीमा और धारा 7 की भुगतान-प्रक्रिया जोड़ लीजिए, तो अधिनियम का पूरा ढाँचा तैयार है।
ग्रेच्युटी की संकल्पना मूलतः कृतज्ञता की थी — लंबी सेवा के बदले नियोजक की ओर से दी जाने वाली एक स्वैच्छिक राशि, जिस पर कर्मचारी का कोई अधिकार नहीं था। स्वतंत्रता के बाद कुछ राज्यों ने इसे विधिक अधिकार बनाया और औद्योगिक अधिकरणों ने भी अनेक पंचाटों में इसे मान्यता दी, पर व्यवस्था असमान रही। 1972 का यह अधिनियम उसी असमानता को समाप्त करके ग्रेच्युटी को पूरे देश में एक वैधानिक अधिकार बनाता है।
पाँच वर्ष की शर्त का उद्देश्य समझना उपयोगी है। ग्रेच्युटी वेतन का हिस्सा नहीं, दीर्घ सेवा का प्रतिफल है, इसलिए विधायिका ने एक न्यूनतम अवधि बाँधी ताकि लाभ उन्हीं तक जाए जिन्होंने प्रतिष्ठान को कुछ स्थायित्व दिया। पर वही शर्त उस परिवार पर लगाना अन्यायपूर्ण होता जिसने कमाने वाले को सेवा के दौरान ही खो दिया, इसलिए मृत्यु और नि:शक्तता के लिए अपवाद उसी वाक्य में रख दिया गया।
यह भी ध्यान रखिए कि ग्रेच्युटी और भविष्य निधि दो अलग व्यवस्थाएँ हैं। भविष्य निधि में कर्मचारी और नियोजक दोनों हर महीने अंशदान देते हैं और खाता बनता जाता है; ग्रेच्युटी में कर्मचारी कुछ नहीं देता और दायित्व पूरी तरह नियोजक का होता है, जो सेवा के अंत में एक बार चुकाया जाता है। इसी दायित्व को सुरक्षित करने के लिए अधिनियम में अनिवार्य बीमा का उपबंध जोड़ा गया, ताकि नियोजक के दिवालिया हो जाने पर भी कर्मचारी का हक़ बना रहे।
अधिनियम कर्मचारी को अधिक अनुकूल शर्तें पाने से रोकता भी नहीं; यदि किसी पंचाट, करार या संविदा से बेहतर शर्तें मिलती हों तो वही चलेंगी।
मुख्य तथ्य
- धारा 4(1) : ग्रेच्युटी नियोजन के पर्यवसान पर देय होती है — अधिवर्षिता, सेवानिवृत्ति, त्यागपत्र, अथवा मृत्यु या नि:शक्तता पर — और उसके लिए पाँच वर्ष से अन्यून निरंतर सेवा अपेक्षित है।
- धारा 4(1) का परंतुक : जहाँ पर्यवसान मृत्यु या नि:शक्तता के कारण हुआ हो, वहाँ पाँच वर्ष की निरंतर सेवा पूरी होना आवश्यक नहीं है।
- 'पाँच वर्ष से अन्यून' का अर्थ है कि ठीक पाँच वर्ष भी पर्याप्त हैं; अधिनियम पाँच से अधिक सेवा की अपेक्षा नहीं करता।
- त्यागपत्र देने पर भी ग्रेच्युटी देय है, बशर्ते पाँच वर्ष की शर्त पूरी हो — यह धारा 4(1) में सेवानिवृत्ति के साथ ही गिनाया गया कारण है।
- मृत्यु की दशा में ग्रेच्युटी नामनिर्देशिती को, और नामनिर्देशन न होने पर वारिसों को दी जाती है; अवयस्क वारिस का हिस्सा नियंत्रक प्राधिकारी के पास निक्षिप्त किया जाता है।
- धारा 4(2) : हर पूरे किए गए वर्ष के लिए, तथा छह मास से अधिक के भाग के लिए, अंतिम प्राप्त मज़दूरी पर पंद्रह दिन की मज़दूरी की दर से ग्रेच्युटी बनती है, और उस पर धारा 4(3) की ऊपरी सीमा लगती है।
आगे की तैयारी
सामान्य भ्रम
- पाँच वर्ष की शर्त सबको याद रहती है और उसका अपवाद प्रायः छूट जाता है। मृत्यु और नि:शक्तता की दशा में वह शर्त लागू ही नहीं होती।
- त्यागपत्र पर ग्रेच्युटी न मिलने की धारणा बहुत प्रचलित है और ग़लत है; अधिनियम उसे सेवानिवृत्ति के साथ ही गिनाता है।
- 'पाँच वर्ष से अन्यून' को 'पाँच वर्ष से अधिक' पढ़ लेना ठीक पाँच वर्ष वाली परिस्थिति को अनावश्यक रूप से गिरा देता है।
- प्रश्न में दिए गए वर्ष और जाने का ढंग, दोनों को अलग-अलग जाँचिए। एक ही परिस्थिति में दोनों बदल दिए जाते हैं, और केवल वर्ष देखकर निर्णय करना भूल है।
उपदान संदाय अधिनियम पर प्रश्न तीन साँचों में आते हैं। पहला परिस्थिति-सूची है, जैसा यहाँ है, जिसमें एक ही व्यक्ति की तीन अलग-अलग परिस्थितियाँ देकर पूछा जाता है कि किनमें ग्रेच्युटी देय है; इसमें हर परिस्थिति के दो अंश अलग-अलग जाँचने पड़ते हैं — सेवा की अवधि, और नियोजन के पर्यवसान का कारण — क्योंकि परंतुक कुछ कारणों में अवधि की शर्त हटा देता है। दूसरा साँचा संख्याओं और गणना का है — पंद्रह दिन की मज़दूरी की दर, छह मास से अधिक के भाग का नियम, मौसमी प्रतिष्ठान की अलग दर, और ग्रेच्युटी की ऊपरी सीमा; इसी परीक्षा-परिवार में ऊपरी सीमा सीधे पूछी जा चुकी है। तीसरा साँचा उपबंध और अधिनियम का मेल है, जिसमें अनिवार्य बीमा, नियंत्रक प्राधिकारी या निर्वाह भत्ता जैसे शब्द देकर उन्हें सही अधिनियम से मिलाना होता है, और उसमें उपदान अधिनियम प्रायः रहता है। तीनों के लिए एक तालिका बना लीजिए : कारण, अपेक्षित सेवा, दर, सीमा, और भुगतान किसे मिलेगा।
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