निम्नलिखित में से किस श्रेणी के व्यक्तियों पर औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 में दिया गया छह सप्ताह की सूचना देने वाला अधिदेश लागू होता है ? 1. सार्वजनिक उपयोगिता सेवा में कार्यरत कर्मचारियों पर, हड़ताल पर जाने से पहले 2. सार्वजनिक उपयोगिता सेवा देने वाले नियोक्ताओं पर, ताला-बंदी की घोषणा करने से पहले 3. किसी भी सेवा में कार्यरत कर्मचारियों पर, हड़ताल पर जाने से पहले नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर उत्तर चुनिए :
- (a)केवल 3
- (b)केवल 2
- (c)1 और 2
- (d)केवल 1
उत्तर
क्यों
सही उत्तर — C, (c) 1 और 2 — छह सप्ताह की सूचना वाला अधिदेश धारा 22 में है, और वह धारा दो पक्षों पर एक साथ, एक ही शर्तों के साथ लागू होती है।
धारा 22 की पहली उपधारा कर्मकारों के बारे में है : सार्वजनिक उपयोगिता सेवा में नियोजित कोई व्यक्ति संविदा-भंग करके हड़ताल पर नहीं जाएगा — हड़ताल से पहले छह सप्ताह के भीतर नियोजक को सूचना दिए बिना; या ऐसी सूचना देने के चौदह दिन के भीतर; या सूचना में बताई गई हड़ताल की तारीख़ बीतने से पहले; या सुलह अधिकारी के समक्ष सुलह कार्यवाही के लंबित रहते और उसके समाप्त होने के सात दिन तक।
धारा 22 की दूसरी उपधारा नियोजकों के बारे में है, और वह पहली का दर्पण-प्रतिबिंब है : सार्वजनिक उपयोगिता सेवा चलाने वाला कोई नियोजक अपने कर्मकारों की ताला-बंदी नहीं करेगा — ताला-बंदी से पहले छह सप्ताह के भीतर सूचना दिए बिना; या ऐसी सूचना देने के चौदह दिन के भीतर; या सूचना में बताई गई तारीख़ बीतने से पहले; या सुलह कार्यवाही के लंबित रहते और उसके समाप्त होने के सात दिन तक।
इसलिए कथन 1 और कथन 2, दोनों सही हैं।
कथन 3 ग़लत है, और उसकी ग़लती केवल एक वाक्यांश में है। वह कहता है कि यह अधिदेश किसी भी सेवा में कार्यरत कर्मचारियों पर लागू होता है। धारा 22 का पूरा दायरा 'सार्वजनिक उपयोगिता सेवा' शब्दों से बँधा है; उससे बाहर के उद्योगों में हड़ताल से पहले इस प्रकार की सूचना की कोई बाध्यता नहीं है। शेष उद्योगों के लिए धारा 23 अलग प्रतिबंध रखती है, पर वे सूचना के नहीं, लंबित कार्यवाही और प्रवर्तनशील पंचाट या समझौते के प्रतिबंध हैं — यानी वहाँ हड़ताल कुछ अवधियों में वर्जित है, पर सामान्य दिनों में छह सप्ताह की सूचना नहीं देनी पड़ती।
एक बात और, जो इस अधिदेश को ठीक-ठीक समझने के लिए आवश्यक है : छह सप्ताह न्यूनतम प्रतीक्षा नहीं, बाहरी सीमा है। सूचना हड़ताल से पहले के छह सप्ताह के भीतर दी जानी चाहिए, और हड़ताल सूचना देने के चौदह दिन के भीतर आरंभ नहीं हो सकती। इस प्रकार कार्रवाई की खिड़की चौदह दिन बीतने के बाद और सूचना की तिथि से छह सप्ताह के भीतर बनती है, और उसी बीच के समय में सुलह का प्रयास अपेक्षित है।
अन्य विकल्प क्यों गलत हैं
- (a)केवल 3 — यह विकल्प ठीक उलटी बात कहता है — वह केवल तीसरे कथन को सही मानता है, यानी यह मानता है कि अधिदेश किसी भी सेवा के कर्मकारों पर लागू है और सार्वजनिक उपयोगिता सेवा वालों पर नहीं। दोनों अंश ग़लत हैं। धारा 22 का हर उपबंध 'सार्वजनिक उपयोगिता सेवा' शब्दों से आरंभ होता है, और यही उसे धारा 23 से अलग करता है। यदि यह अधिदेश हर उद्योग पर लागू होता तो सार्वजनिक उपयोगिता सेवा नाम की कोटि बनाने का कोई प्रयोजन ही न रहता, और प्रथम अनुसूची तथा उससे जुड़ी घोषणा की पूरी व्यवस्था निरर्थक हो जाती। इस विकल्प को चुनने का सामान्य कारण यह धारणा है कि हड़ताल से पहले सूचना देना हर जगह का नियम है; अधिनियम में वह नियम केवल एक श्रेणी के लिए है।
- (b)केवल 2 — यह विकल्प नियोजक वाला कथन तो स्वीकार करता है पर कर्मकारों वाला कथन गिरा देता है, जो धारा 22 की बनावट के विरुद्ध है। वस्तुत: उस धारा की पहली उपधारा कर्मकारों की ही है, और नियोजकों वाला उपबंध उसके बाद, उसी साँचे में आता है। दोनों उपधाराओं की चारों शर्तें शब्दश: समान हैं — छह सप्ताह के भीतर सूचना, चौदह दिन की प्रतीक्षा, सूचना में बताई गई तिथि, और सुलह कार्यवाही के लंबित रहते तथा उसके सात दिन बाद तक का प्रतिबंध। यह समरूपता जान-बूझकर रखी गई है, क्योंकि क़ानून दोनों पक्षों की एकतरफ़ा कार्रवाई को समान दृष्टि से देखता है। इसलिए कर्मकारों वाला कथन गिराने का कोई आधार नहीं बनता।
- (d)केवल 1 — यह चारों में सबसे स्वाभाविक भूल है, क्योंकि हड़ताल की चर्चा अधिक होती है और ताला-बंदी की कम, इसलिए अभ्यर्थी को धारा 22 केवल कर्मकारों का उपबंध लगती है। वह दोनों पक्षों का उपबंध है। ताला-बंदी नियोजक की वही कार्रवाई है जो कर्मकारों की हड़ताल है — काम रोक देना — और अधिनियम उसे धारा 2 में अलग से परिभाषित भी करता है। सार्वजनिक उपयोगिता सेवा में जनता को होने वाली हानि इस बात से नहीं बदलती कि सेवा किसने रोकी, इसलिए सूचना की बाध्यता भी दोनों पर समान है। साथ यह भी ध्यान रखिए कि सूचना मिलने या दिए जाने पर नियोजक को निर्धारित प्राधिकारी को उसकी सूचना पाँच दिन के भीतर भेजनी होती है, जिससे सुलह-तंत्र समय रहते सक्रिय हो सके।
अवधारणा
औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 में हड़ताल और ताला-बंदी पर प्रतिबंध दो अलग धाराओं में हैं, और उनका भेद जान लेना इस अध्याय की आधी तैयारी है।
धारा 22 केवल सार्वजनिक उपयोगिता सेवा पर लागू होती है और सूचना की प्रक्रिया बाँधती है। कर्मकारों के लिए और नियोजकों के लिए, दोनों के लिए वही चार शर्तें : हड़ताल या ताला-बंदी से पहले छह सप्ताह के भीतर सूचना; सूचना देने के चौदह दिन के भीतर कार्रवाई नहीं; सूचना में बताई गई तिथि से पहले कार्रवाई नहीं; और सुलह अधिकारी के समक्ष कार्यवाही लंबित रहते तथा उसके समाप्त होने के सात दिन तक कार्रवाई नहीं। एक अपवाद भी है : जहाँ पहले से ही हड़ताल या ताला-बंदी चल रही हो, वहाँ नई सूचना आवश्यक नहीं, पर घोषणा वाले दिन ही निर्धारित प्राधिकारी को उसकी इत्तिला भेजनी होती है।
धारा 23 सब औद्योगिक प्रतिष्ठानों पर लागू होती है और सूचना की नहीं, समय की बात करती है। वह कहती है कि सुलह बोर्ड के समक्ष कार्यवाही लंबित रहते और उसके सात दिन बाद तक; श्रम न्यायालय, अधिकरण या राष्ट्रीय अधिकरण के समक्ष कार्यवाही लंबित रहते और उसके दो मास बाद तक; अधिसूचित माध्यस्थम् कार्यवाही लंबित रहते और उसके दो मास बाद तक; तथा जिस अवधि में कोई समझौता या पंचाट प्रवृत्त हो, उस अवधि में उन विषयों पर, न हड़ताल हो सकती है न ताला-बंदी।
धारा 24 इन्हीं दोनों के आलोक में बताती है कि कौन-सी हड़ताल या ताला-बंदी अवैध है, और आगे की धाराएँ अवैध कार्रवाई तथा उसके लिए वित्तीय सहायता देने पर शास्ति रखती हैं। इस प्रकार यह पूरा अध्याय एक शृंखला है : कहाँ सूचना चाहिए, कब कार्रवाई वर्जित है, कौन-सी कार्रवाई अवैध है, और अवैधता का परिणाम क्या है।
हड़ताल का अधिकार भारत में मौलिक अधिकार नहीं है, और यही इस अध्याय की पृष्ठभूमि है। संविधान का संगम बनाने का अधिकार संघ बनाने तक जाता है, हड़ताल तक नहीं; इसलिए हड़ताल की स्थिति विधि और संविदा से तय होती है, और अधिनियम उसे वर्जित नहीं करता, नियंत्रित करता है।
नियंत्रण का ढंग समय पर टिका है। विवाद के आरंभ और कार्रवाई के बीच कुछ सप्ताह का अंतर डाल देने से दो बातें होती हैं : सुलह अधिकारी को हस्तक्षेप का अवसर मिल जाता है, और जनता को — विशेषकर सार्वजनिक उपयोगिता सेवा में — व्यवस्था करने का समय। इसीलिए सूचना की बाध्यता उन्हीं सेवाओं पर लगाई गई जहाँ रुकावट का असर सबसे तत्काल और सबसे व्यापक होता है।
समरूपता इस व्यवस्था की दूसरी विशेषता है। बीसवीं सदी के आरंभ के श्रम-क़ानूनों में प्रतिबंध प्रायः केवल श्रमिक पर लगते थे; 1947 का यह अधिनियम नियोजक की ताला-बंदी को भी उसी साँचे में लाता है, उसी सूचना, उसी प्रतीक्षा और उसी शास्ति के साथ। यह उस समय की एक बड़ी बात थी और आज भी परीक्षा में उसी बिंदु पर प्रश्न बनते हैं, क्योंकि पढ़ने वाला प्रायः केवल हड़ताल वाला आधा भाग याद रखता है।
यह भी ध्यान रखिए कि सूचना देना और हड़ताल का वैध हो जाना एक बात नहीं है। सूचना के बाद भी यदि सुलह कार्यवाही आरंभ हो जाए तो कार्रवाई उसी कारण से वर्जित हो जाती है, और उस अवधि में की गई हड़ताल अवैध कहलाती है।
मुख्य तथ्य
- धारा 22(1) : सार्वजनिक उपयोगिता सेवा में नियोजित व्यक्ति हड़ताल से पहले छह सप्ताह के भीतर नियोजक को सूचना दिए बिना, संविदा-भंग करके हड़ताल पर नहीं जा सकता।
- धारा 22(2) : सार्वजनिक उपयोगिता सेवा चलाने वाला नियोजक भी ताला-बंदी से पहले छह सप्ताह के भीतर सूचना दिए बिना ताला-बंदी नहीं कर सकता — उपबंध दोनों पक्षों पर समान है।
- दोनों उपधाराओं की शेष शर्तें भी समान हैं : सूचना देने के चौदह दिन के भीतर कार्रवाई नहीं, सूचना में बताई गई तिथि से पहले नहीं, और सुलह कार्यवाही के लंबित रहते तथा उसके सात दिन बाद तक नहीं।
- छह सप्ताह बाहरी सीमा है, प्रतीक्षा-अवधि नहीं — सूचना कार्रवाई से पहले के छह सप्ताह के भीतर दी जानी चाहिए, और कार्रवाई चौदह दिन बीतने के बाद ही हो सकती है।
- धारा 22 का दायरा सार्वजनिक उपयोगिता सेवा तक सीमित है; शेष उद्योगों पर धारा 23 लागू होती है, जो सूचना की नहीं, लंबित कार्यवाही और प्रवर्तनशील पंचाट या समझौते की अवधि की बात करती है।
- सूचना मिलने या दिए जाने पर नियोजक को पाँच दिन के भीतर समुचित सरकार या निर्धारित प्राधिकारी को उसकी इत्तिला भेजनी होती है।
आगे की तैयारी
सामान्य भ्रम
- धारा 22 केवल हड़ताल की धारा नहीं है। उसकी दूसरी उपधारा ताला-बंदी की है, और उसे भूल जाना यहाँ की सबसे आम भूल है।
- 'सार्वजनिक उपयोगिता सेवा' और 'किसी भी सेवा' का अंतर पूरे कथन को पलट देता है। धारा 22 का दायरा पहली श्रेणी तक सीमित है।
- छह सप्ताह को प्रतीक्षा-अवधि मान लेना ग़लत है। वह बाहरी सीमा है, और भीतर की सीमा चौदह दिन की है।
- इस प्रश्न में विकल्प बढ़ते क्रम में नहीं छपे हैं। उत्तर का समुच्चय बनाकर विकल्पों में उसे खोजिए, स्थान के क्रम पर भरोसा मत कीजिए।
हड़ताल और ताला-बंदी पर प्रश्न तीन साँचों में आते हैं। पहला कथन-सूची है, जैसा यहाँ है, जिसमें दो कथन धारा 22 की दोनों उपधाराओं का सीधा पाठ होते हैं और तीसरा कथन दायरा बढ़ाकर 'किसी भी सेवा' कर देता है; ऐसे प्रश्न में हर कथन का अलग निर्णय कीजिए और अंत में समुच्चय बनाकर विकल्पों में खोजिए, क्योंकि विकल्प बढ़ते क्रम में हों, यह आवश्यक नहीं। दूसरा साँचा संख्याओं का है — छह सप्ताह, चौदह दिन, सात दिन, दो मास, पाँच दिन — जिनमें से कोई एक उठाकर दूसरी स्थिति के नाम रख दी जाती है; इन्हें एक पंक्ति में लिखकर हर संख्या के आगे उसकी स्थिति लिख लीजिए। तीसरा साँचा परिणाम का है — कौन-सी हड़ताल अवैध है, और अवैध हड़ताल या ताला-बंदी पर तथा उसे वित्तीय सहायता देने पर क्या शास्ति है। इसी परीक्षा-परिवार में हड़ताल के अधिकार की प्रकृति और सुलह कार्यवाही के समापन पर प्रश्न पहले आ चुके हैं, इसलिए इन तीनों साँचों को उसी अध्याय के साथ पढ़िए।
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EPFO_APFC_2023_Q35The Right of workers to resort to strike is the
- (a) Fundamental Right
- (b) Statutory Right
- (c) Common Law Right
- (d) Equitable Right
उत्तर(c) Common Law Right
कर्मकारों के हड़ताल पर जाने के अधिकार की प्रकृति पूछता है — वही अधिकार, जिसकी प्रक्रिया धारा 22 यहाँ बाँधती है।
EPFO_APFC_2023_Q98Which one of the following statements relating to conclusion of conciliation proceedings under the Industrial Disputes Act, 1947 is not correct?
- (a) It is concluded on the date when a memorandum of settlement is signed by the parties.
- (b) It is concluded on the date when it ends in failure resulting in no memorandum of settlement signed between the parties.
- (c) It is concluded on the date when the report of the Conciliation Officer is received by the Appropriate Government when no settlement is arrived.
- (d) It is concluded on the date when the reference is made by the Appropriate Government to the Labour Court/Industrial Tribunal under Section 10 of the Act during pendency of the conciliation proceedings.
उत्तर(b) It is concluded on the date when it ends in failure resulting in no memorandum of settlement signed between the parties.
सुलह कार्यवाही का समापन कब माना जाएगा, इस पर कथनों में ग़लत कथन पूछता है — वही तिथि, जिससे धारा 22 का सात दिन वाला प्रतिबंध गिना जाता है।
EPFO_EOAO_2023_Q69Which of the statements relating to the Grievance Redressal Committee under the Industrial Disputes Act, 1947 is not correct ?
- (a) It shall consist of equal number of members from among employer and workmen.
- (b) It shall be constituted in an industrial establishment employing twenty or more workmen.
- (c) The Chairperson of the Committee shall be nominated by the Appropriate Government.
- (d) The total members of the Committee shall not be more than six.
उत्तर(c) The Chairperson of the Committee shall be nominated by the Appropriate Government.
शिकायत निवारण समिति से जुड़े कथनों में ग़लत कथन पूछता है — प्रतिष्ठान के भीतर की वह व्यवस्था, जो विवाद के हड़ताल तक पहुँचने से पहले काम में आती है।
अभ्यास
- practice — not a real PYQ
औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 की धारा 22 के अनुसार सार्वजनिक उपयोगिता सेवा में हड़ताल की सूचना देने के कितने दिन के भीतर हड़ताल आरंभ नहीं की जा सकती ?
- (a)सात दिन
- (b)चौदह दिन
- (c)इक्कीस दिन
- (d)तीस दिन
उत्तर(b) चौदह दिन
- practice — not a real PYQ
औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 के अधीन छह सप्ताह की सूचना देने की बाध्यता किन प्रतिष्ठानों पर लागू होती है ?
- (a)सब औद्योगिक प्रतिष्ठानों पर
- (b)केवल सार्वजनिक उपयोगिता सेवाओं पर
- (c)केवल सरकारी प्रतिष्ठानों पर
- (d)केवल सौ से अधिक कर्मकारों वाले प्रतिष्ठानों पर
उत्तर(b) केवल सार्वजनिक उपयोगिता सेवाओं पर