निम्नलिखित में से कौन-सा उद्योग, औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 की प्रथम अनुसूची के अंतर्गत एक सार्वजनिक उपयोगिता सेवा नहीं है ?
- (a)रासायनिक उर्वरक उद्योग
- (b)पाइराइट उत्खनन
- (c)ऐलुमिना तथा ऐलुमिनियम उत्पादन
- (d)चाय बागान
उत्तर
क्यों
सही उत्तर — D, (d) चाय बागान — शेष तीनों उद्योग प्रथम अनुसूची में हैं, और चाय बागान उसकी केंद्रीय सूची में नहीं है।
पहले यह समझिए कि प्रथम अनुसूची करती क्या है। धारा 2(ढ) 'सार्वजनिक उपयोगिता सेवा' की परिभाषा देती है, और उसमें छह उपखंड हैं। पहले पाँच अपने आप काम करते हैं — रेल सेवा तथा वायुमार्ग से यात्रियों या माल की ढुलाई की परिवहन सेवा; किसी बड़े पत्तन या गोदी के प्रचालन से जुड़ी सेवा; औद्योगिक प्रतिष्ठान का वह भाग जिसके चलने पर प्रतिष्ठान या वहाँ के कर्मकारों की सुरक्षा निर्भर करती है; डाक, तार और दूरभाष सेवा; जनता को शक्ति, प्रकाश या जल देने वाला उद्योग; और लोक-सफ़ाई या स्वच्छता की कोई प्रणाली। ये सब स्वयं सार्वजनिक उपयोगिता सेवाएँ हैं, किसी घोषणा की प्रतीक्षा किए बिना।
छठा उपखंड अलग ढंग से काम करता है, और प्रथम अनुसूची उसी से जुड़ी है। वह कहता है कि प्रथम अनुसूची में विनिर्दिष्ट कोई भी उद्योग, यदि समुचित सरकार इस बात से संतुष्ट हो कि लोक-आपात या लोक-हित ऐसी अपेक्षा करता है, अधिसूचना द्वारा एक निर्धारित अवधि के लिए सार्वजनिक उपयोगिता सेवा घोषित किया जा सकता है, और वह अवधि एक बार में छह मास से अधिक नहीं होगी। यानी अनुसूची स्वयं घोषणा नहीं करती; वह उन उद्योगों की सूची है जिन्हें घोषित किया जा सकता है।
अब चारों विकल्प उसी सूची से मिलाइए। पाइराइट उत्खनन अनुसूची की खनन-प्रविष्टियों में है, ताँबा, सीसा, जस्ता, लौह-अयस्क, फ़ॉस्फ़ोराइट और मैग्नेसाइट के खनन के साथ। ऐलुमिना तथा ऐलुमिनियम का उत्पादन भी अनुसूची में जोड़ा जा चुका है, और उसी के पास बॉक्साइट के खनन की प्रविष्टि भी है। रासायनिक उर्वरक उद्योग को अनुसूची में बाद में, दिसंबर 2018 में जारी एक अधिसूचना से जोड़ा गया। चाय बागान इस सूची में नहीं है।
यहीं इस प्रश्न का असली भेद है, और उसे शब्दों में रख लीजिए : चाय बागान निस्संदेह एक उद्योग है, और उस पर यह अधिनियम लागू भी होता है — पर 'उद्योग होना' और 'सार्वजनिक उपयोगिता सेवा घोषित किए जा सकने योग्य होना' दो अलग बातें हैं। दूसरी बात के लिए उद्योग का प्रथम अनुसूची में होना आवश्यक है। बागानों के लिए श्रम-विधि का अपना अलग क़ानून भी है, बागान श्रम अधिनियम, 1951, और यही सूची में उनकी अनुपस्थिति को स्वाभाविक बनाता है।
एक बात और, जो पूर्णता के लिए आवश्यक है : अधिनियम समुचित सरकार को यह शक्ति भी देता है कि वह लोक-हित में किसी उद्योग को प्रथम अनुसूची में जोड़ दे। सूची इसीलिए समय के साथ बढ़ती रही है, जैसा उर्वरक वाली प्रविष्टि से दिखता है।
अन्य विकल्प क्यों गलत हैं
- (a)रासायनिक उर्वरक उद्योग — रासायनिक उर्वरक उद्योग प्रथम अनुसूची में है, इसलिए इसे 'नहीं है' कहना उत्तर उलट देना होगा। यह प्रविष्टि मूल अनुसूची में नहीं थी; उसे बाद में, दिसंबर 2018 में जारी एक अधिसूचना से जोड़ा गया, उसी शक्ति का प्रयोग करते हुए जो अधिनियम समुचित सरकार को अनुसूची में उद्योग जोड़ने के लिए देता है। कारण समझना कठिन नहीं : उर्वरक की आपूर्ति बोआई के मौसम से बँधी होती है, और उसमें कुछ सप्ताह का व्यवधान भी पूरे खरीफ़ या रबी के चक्र को प्रभावित कर सकता है। यही वह 'लोक-हित' है जिसके आधार पर किसी उद्योग को सार्वजनिक उपयोगिता सेवा घोषित करने योग्य बनाया जाता है। इस विकल्प को चुनने का सबसे आम कारण यह मान लेना है कि अनुसूची 1947 से अपरिवर्तित है — वह बढ़ती रही है।
- (b)पाइराइट उत्खनन — पाइराइट उत्खनन प्रथम अनुसूची की स्पष्ट प्रविष्टियों में है, और यह विकल्प उन अभ्यर्थियों को परखने के लिए रखा गया है जो सूची को केवल 'बड़े और परिचित' उद्योगों की सूची मान लेते हैं। अनुसूची में खनन की कई प्रविष्टियाँ अलग-अलग नाम से हैं — ताँबा, सीसा, जस्ता, लौह-अयस्क, पाइराइट, फ़ॉस्फ़ोराइट और मैग्नेसाइट का खनन — और वे एक सामान्य 'खनन' प्रविष्टि में समेटी नहीं गई हैं। इसका व्यावहारिक अर्थ यह है कि सूची को खनिज के नाम से याद करना पड़ता है, वर्ग के नाम से नहीं। पाइराइट गंधकाम्ल बनाने का मुख्य कच्चा माल रहा है, और गंधकाम्ल से आगे उर्वरक तथा अन्य रसायन बनते हैं, इसलिए उसकी उपस्थिति सूची के तर्क से मेल भी खाती है।
- (c)ऐलुमिना तथा ऐलुमिनियम उत्पादन — ऐलुमिना तथा ऐलुमिनियम का उत्पादन प्रथम अनुसूची में जोड़ी गई प्रविष्टियों में है, और उसी के साथ बॉक्साइट के खनन की प्रविष्टि भी है — यानी अनुसूची ने इस शृंखला की दोनों कड़ियाँ अलग-अलग पकड़ी हैं, अयस्क का खनन और उससे धातु का उत्पादन। इस विकल्प को गिराने का प्रलोभन इसलिए होता है कि उसमें दो मिलते-जुलते नाम एक साथ छपे हैं, ऐलुमिना और ऐलुमिनियम, और पहली दृष्टि में वे एक ही चीज़ के दो रूप लगते हैं; वे अलग हैं — ऐलुमिना बॉक्साइट से निकाला गया ऑक्साइड है और ऐलुमिनियम उससे प्राप्त धातु। दोनों का नाम एक ही प्रविष्टि में होने से वह प्रविष्टि गढ़ी हुई नहीं हो जाती। ऐलुमिनियम का प्रगालन बहुत बड़ी मात्रा में विद्युत् लेता है और लगातार चलता है, इसलिए उसमें व्यवधान का प्रभाव तत्काल और व्यापक होता है।
अवधारणा
'सार्वजनिक उपयोगिता सेवा' औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 की उन थोड़ी-सी संकल्पनाओं में है जिनका सीधा और तात्कालिक परिणाम होता है, इसलिए वह परीक्षा में बार-बार लौटती है।
परिणाम क्या है, यह पहले देख लीजिए। जिस प्रतिष्ठान को सार्वजनिक उपयोगिता सेवा माना जाता है, वहाँ हड़ताल और ताला-बंदी पर विशेष प्रतिबंध लागू हो जाते हैं : कर्मकार बिना निर्धारित सूचना के हड़ताल पर नहीं जा सकते, नियोजक बिना उसी सूचना के ताला-बंदी नहीं कर सकता, और सुलह कार्यवाही के लंबित रहते तथा उसके बाद कुछ समय तक दोनों वर्जित रहते हैं। शेष उद्योगों में सूचना की यह बाध्यता नहीं है।
अब परिभाषा की बनावट। धारा 2(ढ) के छह उपखंडों में पहले पाँच स्वत:-प्रवर्तक हैं — रेल और वायु-परिवहन, बड़े पत्तन और गोदी की सेवा, प्रतिष्ठान का सुरक्षा से जुड़ा भाग, डाक-तार-दूरभाष, जनता को शक्ति, प्रकाश या जल देने वाला उद्योग, तथा लोक-सफ़ाई की प्रणाली। छठा उपखंड सशर्त है : प्रथम अनुसूची में विनिर्दिष्ट उद्योग को समुचित सरकार लोक-आपात या लोक-हित में अधिसूचना से घोषित कर सकती है, एक बार में अधिकतम छह मास के लिए।
प्रथम अनुसूची की सूची में परिवहन, बैंककारी, सीमेंट, कोयला, सूती वस्त्र, खाद्य-पदार्थ, लोहा और इस्पात, प्रतिरक्षा प्रतिष्ठान, अस्पताल और औषधालय की सेवा, अग्निशमन सेवा, टकसाल और प्रतिभूति मुद्रणालय, अनेक खनिजों का खनन, मुद्रा-नोट मुद्रणालय, खनिज तेल का उत्पादन, विमानपत्तन प्राधिकरण की सेवा, नाभिकीय ईंधन से जुड़े प्रतिष्ठान, ईंधन गैसों का उत्पादन, तथा ऐलुमिना और ऐलुमिनियम जैसी प्रविष्टियाँ हैं। सूची स्थिर नहीं है — अधिनियम समुचित सरकार को उसमें उद्योग जोड़ने की शक्ति देता है।
इस व्यवस्था के पीछे का विचार सीधा है : कुछ सेवाओं का रुकना केवल नियोजक और कर्मचारी के बीच का मामला नहीं रहता, वह तीसरे पक्ष को — यानी आम जनता को — तत्काल हानि पहुँचाता है। बिजली, पानी, सफ़ाई, अस्पताल, डाक और परिवहन इसी कोटि में हैं। इसलिए क़ानून वहाँ हड़ताल और ताला-बंदी को वर्जित नहीं करता, पर उन्हें सूचना और प्रतीक्षा की एक प्रक्रिया से बाँध देता है, ताकि बीच के समय में सुलह का प्रयास हो सके।
प्रथम अनुसूची इस विचार का लचीला भाग है। कुछ उद्योग सदा-सर्वदा सार्वजनिक उपयोगिता सेवा नहीं होते, पर विशेष परिस्थितियों में हो सकते हैं — जैसे कोयला, सीमेंट, खाद्य-पदार्थ या उर्वरक, जिनकी कमी किसी मौसम या किसी संकट में असाधारण रूप से भारी पड़ जाती है। इसलिए अधिनियम ने उन्हें स्थायी रूप से सार्वजनिक उपयोगिता सेवा नहीं बनाया, बल्कि सरकार को यह शक्ति दी कि आवश्यकता पड़ने पर सीमित अवधि के लिए उन्हें घोषित कर दे।
यही कारण है कि सूची समय के साथ बढ़ी है। जैसे-जैसे अर्थव्यवस्था में नए उद्योग निर्णायक होते गए — नाभिकीय ईंधन, ईंधन गैसें, ऐलुमिनियम, बॉक्साइट, रासायनिक उर्वरक — उन्हें अनुसूची में जोड़ा गया। बागान इस सूची में नहीं आए, और इसका एक कारण यह भी है कि बागान श्रम के लिए 1951 का अपना अधिनियम है, जो आवास, चिकित्सा, पेयजल और शिक्षा जैसी सुविधाओं का अलग ढाँचा खड़ा करता है।
मुख्य तथ्य
- धारा 2(ढ) के छठे उपखंड के अनुसार प्रथम अनुसूची में विनिर्दिष्ट कोई उद्योग समुचित सरकार द्वारा लोक-आपात या लोक-हित में अधिसूचना से सार्वजनिक उपयोगिता सेवा घोषित किया जा सकता है, एक बार में अधिकतम छह मास के लिए।
- प्रथम अनुसूची में पाइराइट, फ़ॉस्फ़ोराइट, मैग्नेसाइट, ताँबा, सीसा, जस्ता और लौह-अयस्क का खनन अलग-अलग प्रविष्टियों के रूप में है — कोई एक सामान्य 'खनन' प्रविष्टि नहीं है।
- ऐलुमिना तथा ऐलुमिनियम का उत्पादन और बॉक्साइट का खनन, दोनों प्रथम अनुसूची में जोड़ी गई प्रविष्टियाँ हैं।
- रासायनिक उर्वरक उद्योग को प्रथम अनुसूची में दिसंबर 2018 में जारी एक अधिसूचना से जोड़ा गया — अनुसूची स्थिर नहीं है और उसमें उद्योग जोड़े जाते रहे हैं।
- चाय बागान प्रथम अनुसूची की केंद्रीय सूची में नहीं है; बागान श्रम का अपना अलग क़ानून है, बागान श्रम अधिनियम, 1951।
- उद्योग होना और सार्वजनिक उपयोगिता सेवा घोषित किए जा सकने योग्य होना दो अलग बातें हैं — दूसरी के लिए प्रथम अनुसूची में उपस्थिति आवश्यक है।
आगे की तैयारी
सामान्य भ्रम
- 'उद्योग है' और 'प्रथम अनुसूची में है' को एक मान लेना यहाँ की मुख्य भूल है। चाय बागान उद्योग है, पर अनुसूची में नहीं।
- अनुसूची को 1947 की अपरिवर्तित सूची मान लेना दूसरी भूल है। उसमें बाद में प्रविष्टियाँ जोड़ी गई हैं, और उर्वरक वाली प्रविष्टि उन्हीं में है।
- खनन की प्रविष्टियाँ खनिज के नाम से हैं, वर्ग के नाम से नहीं। इसलिए 'पाइराइट' जैसा कम परिचित नाम देखकर उसे बाहर मान लेना जोखिम भरा है।
- एक ही प्रविष्टि में दो मिलते-जुलते नाम छपे होने से वह गढ़ी हुई नहीं हो जाती। ऐलुमिना और ऐलुमिनियम अलग पदार्थ हैं और दोनों एक ही प्रविष्टि में हैं।
सार्वजनिक उपयोगिता सेवा पर प्रश्न तीन साँचों में आते हैं। पहला वही है जो यहाँ है — चार उद्योग देकर पूछना कि कौन प्रथम अनुसूची में नहीं है। इसमें दो या तीन नाम कम परिचित खनिज या रसायन के होते हैं और एक नाम बहुत परिचित होता है, और परिचित नाम प्रायः वही होता है जो सूची में नहीं है; इसलिए परिचय के आधार पर अनुमान लगाना उलटा पड़ता है। दूसरा साँचा परिभाषा का है — 'निम्नलिखित में से कौन बिना किसी घोषणा के सार्वजनिक उपयोगिता सेवा है', जहाँ धारा 2(ढ) के पहले पाँच उपखंड और छठे उपखंड का अंतर पूछा जाता है। तीसरा साँचा परिणाम का है — घोषणा हो जाने पर हड़ताल और ताला-बंदी पर कौन-से प्रतिबंध लगते हैं, कितनी सूचना देनी होगी, और घोषणा कितने समय के लिए हो सकती है। तीनों की तैयारी एक पृष्ठ में हो जाती है : ऊपर पाँच स्वत:-प्रवर्तक सेवाएँ, बीच में अनुसूची के मुख्य नाम, और नीचे सूचना तथा प्रतिबंध की धाराएँ।
संबंधित PYQ
EPFO_APFC_2023_Q98Which one of the following statements relating to conclusion of conciliation proceedings under the Industrial Disputes Act, 1947 is not correct?
- (a) It is concluded on the date when a memorandum of settlement is signed by the parties.
- (b) It is concluded on the date when it ends in failure resulting in no memorandum of settlement signed between the parties.
- (c) It is concluded on the date when the report of the Conciliation Officer is received by the Appropriate Government when no settlement is arrived.
- (d) It is concluded on the date when the reference is made by the Appropriate Government to the Labour Court/Industrial Tribunal under Section 10 of the Act during pendency of the conciliation proceedings.
उत्तर(b) It is concluded on the date when it ends in failure resulting in no memorandum of settlement signed between the parties.
इसी अधिनियम के अधीन सुलह कार्यवाही के समापन से जुड़े कथनों में ग़लत कथन पूछता है — वही प्रक्रिया जो सार्वजनिक उपयोगिता सेवा में हड़ताल और ताला-बंदी के प्रतिबंधों से सीधे जुड़ी है।
EPFO_EOAO_2023_Q69Which of the statements relating to the Grievance Redressal Committee under the Industrial Disputes Act, 1947 is not correct ?
- (a) It shall consist of equal number of members from among employer and workmen.
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- (c) The Chairperson of the Committee shall be nominated by the Appropriate Government.
- (d) The total members of the Committee shall not be more than six.
उत्तर(c) The Chairperson of the Committee shall be nominated by the Appropriate Government.
इसी अधिनियम के अधीन शिकायत निवारण समिति से जुड़े कथनों में ग़लत कथन पूछता है — प्रतिष्ठान-स्तर की वह व्यवस्था जो विवाद के अधिकरण तक पहुँचने से पहले आती है।
EPFO_EOAO_2023_Q100Under the provisions of the Industrial Disputes Act, 1947, right of legal representation before a Labour Court, or Industrial Tribunal or National Industrial Tribunal is :
- (a) A statutory right
- (b) Not at all permissible
- (c) Can be permitted by the forum if the other party does not object or gives consent
- (d) May be permitted if such permission is granted by the High Court of the State/Union Territory
उत्तर(c) Can be permitted by the forum if the other party does not object or gives consent
श्रम न्यायालय तथा अधिकरणों के समक्ष विधिक प्रतिनिधित्व के अधिकार की प्रकृति पूछता है — इसी अधिनियम की विवाद-निपटान वाली शृंखला की अगली कड़ी।
अभ्यास
- practice — not a real PYQ
औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 के अधीन समुचित सरकार प्रथम अनुसूची में विनिर्दिष्ट किसी उद्योग को एक बार में अधिकतम कितनी अवधि के लिए सार्वजनिक उपयोगिता सेवा घोषित कर सकती है ?
- (a)तीन मास
- (b)छह मास
- (c)एक वर्ष
- (d)दो वर्ष
उत्तर(b) छह मास
- practice — not a real PYQ
औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 की धारा 2(ढ) के अनुसार निम्नलिखित में से कौन-सी सेवा किसी सरकारी घोषणा के बिना ही सार्वजनिक उपयोगिता सेवा है ?
- (a)सीमेंट उद्योग
- (b)सूती वस्त्र उद्योग
- (c)डाक, तार और दूरभाष सेवा
- (d)पाइराइट उत्खनन
उत्तर(c) डाक, तार और दूरभाष सेवा