निम्नलिखित में से किस निर्णय में सर्वोच्च न्यायालय ने औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 के अंतर्गत ‘उद्योग’ की परिभाषा के संबंध में ‘ट्रिपल टेस्ट’ निर्धारित किया है ?
- (a)बम्बई राज्य बनाम अस्पताल मज़दूर सभा, एआईआर (AIR) 1960 एससी 610
- (b)बैंगलोर जल आपूर्ति एवं मल-व्यवस्था बोर्ड बनाम आर. राजप्पा, एआईआर (AIR) 1978 एससी 548
- (c)उ.प्र. राज्य बनाम जय बीर सिंह, (2005)5 एससीसी 1
- (d)मेसर्स भारती एयरटेल लिमिटेड बनाम ए.एस. राघवेंद्र [2023 की सिविल अपील सं. 5187]
उत्तर
क्यों
सही उत्तर — B, (b) बैंगलोर जल आपूर्ति एवं मल-व्यवस्था बोर्ड बनाम आर. राजप्पा, एआईआर (AIR) 1978 एससी 548 — 'ट्रिपल टेस्ट' इसी निर्णय की देन है, और वह इस अधिनियम के सबसे प्रसिद्ध निर्णयों में गिना जाता है।
पृष्ठभूमि यह है कि धारा 2(ट) 'उद्योग' की परिभाषा बहुत विस्तृत शब्दों में देती है — नियोजकों का कोई भी कारबार, व्यापार, उपक्रम, विनिर्माण या वृत्ति, और कर्मकारों की कोई भी वृत्ति, सेवा, नियोजन, हस्तशिल्प या औद्योगिक उपजीविका। इतनी चौड़ी भाषा में यह तय करना कठिन हो जाता है कि अस्पताल, विश्वविद्यालय, नगर निकाय, धर्मार्थ संस्था या वकील का कार्यालय उद्योग है या नहीं — और यह प्रश्न व्यावहारिक रूप से निर्णायक है, क्योंकि अधिनियम का पूरा तंत्र तभी चलता है जब प्रतिष्ठान उद्योग हो।
सात न्यायाधीशों की पीठ ने इसी को सुलझाने के लिए तीन कसौटियाँ दीं, जिन्हें एक साथ पूरा होना चाहिए : 1. कोई क्रमबद्ध, व्यवस्थित क्रियाकलाप हो; 2. वह नियोजक और कर्मचारी के सहयोग से संगठित किया गया हो; 3. उसका उद्देश्य मानवीय आवश्यकताओं और इच्छाओं की पूर्ति के लिए वस्तुओं या सेवाओं का उत्पादन अथवा वितरण हो।
इन्हीं तीन शर्तों को 'ट्रिपल टेस्ट' कहा जाता है, और यही इस प्रश्न का उत्तर है।
निर्णय ने कुछ और बातें भी स्थिर कीं, जो प्रायः साथ ही पूछी जाती हैं। लाभ कमाने का उद्देश्य होना आवश्यक नहीं — धर्मार्थ और नि:शुल्क सेवा देने वाले उपक्रम भी उद्योग हो सकते हैं। जहाँ किसी निकाय के कई विभाग हों और उनमें से कुछ ही उद्योग जैसे हों, वहाँ 'प्रधान प्रकृति' की कसौटी लगाई जाएगी, यानी निकाय के मुख्य कार्य को देखकर निर्णय होगा। और राज्य के विशुद्ध प्रभुतासंपन्न कार्य, संकुचित अर्थ में, इस परिभाषा से बाहर रहेंगे।
एक तथ्य और, जो इस विषय को पूरा करता है : इस निर्णय के बाद विधायिका ने 1982 के संशोधन से 'उद्योग' की एक नई और अपवाद-सहित परिभाषा अधिनियम में रखी, पर वह उपबंध प्रवृत्त नहीं कराया गया। इसलिए आज भी व्यवहार में वही परिभाषा चलती है जिसकी व्याख्या 1978 के इस निर्णय ने की थी।
अन्य विकल्प क्यों गलत हैं
- (a)बम्बई राज्य बनाम अस्पताल मज़दूर सभा, एआईआर (AIR) 1960 एससी 610 — यह निर्णय इस विषय की नींव है, पर 'ट्रिपल टेस्ट' उसकी देन नहीं। इसमें प्रश्न यह था कि राज्य द्वारा चलाए जा रहे अस्पताल-समूह को अधिनियम के अर्थ में उद्योग माना जाए या नहीं, और न्यायालय ने माना कि हाँ। उस निर्णय में जो कसौटी दी गई वह इस रूप में थी कि क्रियाकलाप उसी ढंग से संगठित हो जिस ढंग से व्यापार या कारबार संगठित होता है, और वह कर्मचारियों की सहायता से समुदाय को भौतिक सेवाएँ देने के लिए क्रमबद्ध रूप से चलाया जाता हो। यह कसौटी बाद के दो दशकों तक चली, पर उसके प्रयोग में विरोधाभास बने रहे और अलग-अलग पीठों ने अलग-अलग निष्कर्ष निकाले। उसी अस्थिरता को समाप्त करने के लिए 1978 में सात न्यायाधीशों की पीठ बैठी और उसने तीन शर्तों वाली वह कसौटी दी जिसे आज ट्रिपल टेस्ट कहा जाता है। इसलिए यह विकल्प सही निर्णय है, पर पहले चरण का, अंतिम का नहीं।
- (c)उ.प्र. राज्य बनाम जय बीर सिंह, (2005)5 एससीसी 1 — यह निर्णय ट्रिपल टेस्ट देता नहीं, बल्कि उसी पर प्रश्नचिह्न लगाता है — इसलिए इसे चुनना दिशा ही उलट देना है। इसमें विवाद यह था कि राज्य का सामाजिक वानिकी विभाग उद्योग है या नहीं, और पाँच न्यायाधीशों की पीठ ने 1978 वाली विस्तृत व्याख्या पर संदेह प्रकट किया। पीठ का कहना था कि इतनी चौड़ी परिभाषा से कल्याणकारी और लोक-सेवा वाले उपक्रमों पर वही औद्योगिक अनुशासन लागू हो जाता है जो कारबार के लिए बना था, और विधायिका की 1982 वाली संशोधित परिभाषा प्रवृत्त न होने से स्थिति और उलझ गई है। इसलिए उसने पूरे प्रश्न को पुनर्विचार के लिए एक बड़ी पीठ के पास भेज दिया। जब तक वह पुनर्विचार न हो, 1978 का निर्णय ही विधि है — पर विधि देने वाला निर्णय वही है, यह नहीं।
- (d)मेसर्स भारती एयरटेल लिमिटेड बनाम ए.एस. राघवेंद्र [2023 की सिविल अपील सं. 5187] — यह विकल्प सबसे नया दिखने के कारण आकर्षक है, पर उसका विषय ही दूसरा है। यह मामला इस बारे में था कि किसी विशेष कर्मचारी को अधिनियम के अर्थ में 'कर्मकार' माना जाए या नहीं, क्योंकि उसके कर्तव्य प्रबंधकीय प्रकृति के थे या नहीं, यह विवाद में था। यानी वह धारा 2(ट) की 'उद्योग' वाली परिभाषा नहीं, धारा 2(फ) की 'कर्मकार' वाली परिभाषा से जुड़ा है। दोनों परिभाषाओं का काम अलग है : उद्योग तय करता है कि प्रतिष्ठान अधिनियम के दायरे में है या नहीं, और कर्मकार तय करता है कि उस प्रतिष्ठान का कौन-सा व्यक्ति अधिनियम की रक्षा पाता है। परीक्षा में ये दोनों परिभाषाएँ जान-बूझकर एक साथ रखी जाती हैं, इसलिए प्रश्न पढ़ते समय पहले यह तय कीजिए कि पूछा किस परिभाषा के बारे में जा रहा है।
अवधारणा
औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 का पूरा तंत्र तीन परिभाषाओं पर टिका है, और उन्हीं पर सबसे अधिक मुक़दमे भी हुए हैं।
पहली है 'उद्योग', धारा 2(ट) में। वह तय करती है कि प्रतिष्ठान इस अधिनियम के दायरे में है या नहीं। यदि प्रतिष्ठान उद्योग नहीं है तो न वहाँ का विवाद औद्योगिक विवाद है, न छँटनी और ले-ऑफ के उपबंध लागू होते हैं, न श्रम न्यायालय की अधिकारिता बनती है।
दूसरी है 'कर्मकार', धारा 2(फ) में। वह तय करती है कि उस उद्योग का कौन-सा व्यक्ति अधिनियम की रक्षा पाएगा। मुख्यतः प्रबंधकीय और प्रशासनिक कार्य करने वाले, तथा निर्धारित वेतन से ऊपर पर्यवेक्षीय कार्य करने वाले, इस परिभाषा से बाहर हैं।
तीसरी है 'औद्योगिक विवाद', धारा 2(ठ) में — नियोजकों और कर्मकारों के बीच, या कर्मकारों के आपस में, नियोजन, अनियोजन, नियोजन की शर्तों या श्रम की दशाओं से जुड़ा विवाद।
इन तीनों में 'उद्योग' सबसे विवादग्रस्त रही, क्योंकि उसकी भाषा सबसे चौड़ी है और उसका परिणाम सबसे बड़ा। न्यायालयों को अस्पताल, विश्वविद्यालय, नगरपालिका, धर्मार्थ संस्था, अनुसंधान संस्थान, क्लब और सरकारी विभाग, सबके बारे में यह तय करना पड़ा है। 1978 का सात-न्यायाधीशीय निर्णय इसी क्रम का शिखर है : उसने कसौटी को तीन स्पष्ट शर्तों में बाँधा, लाभ के उद्देश्य को अप्रासंगिक बताया, मिश्रित निकायों के लिए प्रधान प्रकृति की कसौटी दी, और प्रभुतासंपन्न कार्यों को संकुचित अर्थ में बाहर रखा। परीक्षा में इसी निर्णय से जुड़ा प्रश्न बार-बार लौटता है।
इस विवाद की जड़ भारत के अपने आर्थिक इतिहास में है। 1947 में जब यह अधिनियम बना तो 'उद्योग' का चित्र स्पष्ट था — कारख़ाना, खान, बागान, रेल। पर स्वतंत्रता के बाद राज्य स्वयं सबसे बड़ा नियोजक बन गया, और वह केवल कारख़ाने नहीं चला रहा था : अस्पताल, विश्वविद्यालय, जल-मल बोर्ड, परिवहन निगम, अनुसंधान संस्थान, वानिकी विभाग। इन सबमें हज़ारों कर्मचारी थे, और उनके विवादों का कोई ठिकाना तब तक नहीं बनता जब तक यह तय न हो कि वे प्रतिष्ठान उद्योग हैं या नहीं।
न्यायालय के सामने इसमें एक असली तनाव था। परिभाषा को चौड़ा पढ़ें तो कल्याणकारी और शैक्षिक संस्थाएँ भी हड़ताल, ताला-बंदी, छँटनी-प्रतिकर और अधिकरण-प्रक्रिया के उसी ढाँचे में आ जाती हैं जो व्यापारिक प्रतिष्ठानों के लिए बना था। संकरा पढ़ें तो लाखों कर्मचारी उस सुरक्षा से बाहर रह जाते हैं जो उन्हीं के जैसे काम करने वाले दूसरे कर्मचारियों को मिलती है।
1978 का निर्णय इस तनाव का उत्तर कर्मचारी के पक्ष में देता है — वह परिभाषा को चौड़ा रखता है और अपवाद बहुत थोड़े छोड़ता है। विधायिका ने 1982 में एक संकरी, अपवाद-सहित परिभाषा बनाकर संतुलन बदलने का प्रयास किया, पर वह उपबंध प्रवृत्त ही नहीं किया गया। 2005 में एक पीठ ने पुनर्विचार के लिए मामला बड़ी पीठ को भेजा। इस तरह यह प्रश्न न्यायपालिका और विधायिका के बीच लंबे समय से खुला हुआ है, और यही उसे परीक्षा के लिए स्थायी रूप से उपयोगी बनाता है।
मुख्य तथ्य
- 'ट्रिपल टेस्ट' 1978 के बैंगलोर जल आपूर्ति एवं मल-व्यवस्था बोर्ड वाले निर्णय की देन है, जिसे सात न्यायाधीशों की पीठ ने दिया था।
- तीनों शर्तें एक साथ पूरी होनी चाहिए : क्रमबद्ध क्रियाकलाप; नियोजक और कर्मचारी के सहयोग से संगठित; और मानवीय आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए वस्तुओं या सेवाओं का उत्पादन अथवा वितरण।
- लाभ कमाने का उद्देश्य आवश्यक नहीं — धर्मार्थ और नि:शुल्क सेवा देने वाले उपक्रम भी उद्योग की परिभाषा में आ सकते हैं।
- मिश्रित निकायों के लिए 'प्रधान प्रकृति' की कसौटी लगती है, और राज्य के विशुद्ध प्रभुतासंपन्न कार्य, संकुचित अर्थ में, परिभाषा से बाहर रहते हैं।
- 1960 का अस्पताल मज़दूर सभा वाला निर्णय इस विषय की नींव है — उसने राज्य के अस्पताल-समूह को उद्योग माना, पर तीन शर्तों वाली कसौटी उसकी नहीं है।
- 1982 के संशोधन ने 'उद्योग' की एक नई, अपवाद-सहित परिभाषा अधिनियम में रखी, पर वह उपबंध प्रवृत्त नहीं कराया गया, इसलिए व्यवहार में पुरानी परिभाषा ही चलती है।
आगे की तैयारी
सामान्य भ्रम
- 'उद्योग' और 'कर्मकार' की परिभाषाओं को आपस में मिला देना यहाँ का मुख्य जाल है। प्रश्न पढ़ते ही तय कीजिए कि पूछा किस परिभाषा के बारे में जा रहा है।
- 1960 और 1978 के निर्णय एक ही विषय के हैं, पर कसौटी का नाम केवल 1978 वाले से जुड़ा है। वर्ष याद रखिए, विषय से मत पहचानिए।
- 2005 वाला निर्णय कसौटी देता नहीं, उस पर पुनर्विचार माँगता है। 'निर्धारित किया' पूछे जाने पर वह उत्तर नहीं हो सकता।
- सबसे नया निर्णय सबसे प्रासंगिक नहीं होता। विकल्पों में एक हाल का मामला रखकर परखा जाता है कि अभ्यर्थी उसका विषय जानता है या केवल उसकी तिथि।
औद्योगिक विवाद अधिनियम के निर्णयों पर प्रश्न तीन साँचों में आते हैं। पहला वही है जो यहाँ है — कसौटी या सिद्धांत का नाम देकर पूछना कि वह किस निर्णय में दिया गया; इसका उत्तर तभी निकलता है जब निर्णय का नाम, वर्ष और उसका एक-पंक्ति योगदान, तीनों साथ याद हों। दूसरा साँचा उलटा होता है — निर्णय का नाम देकर उसका सिद्धांत पूछना, जहाँ विकल्पों में मिलती-जुलती कसौटियाँ रखी जाती हैं। तीसरा साँचा कथन-सूची का है, जिसमें परिभाषा से जुड़े तीन-चार कथन देकर सही कथन पूछे जाते हैं, और उनमें एक कथन प्रायः यह होता है कि लाभ का उद्देश्य आवश्यक है या नहीं। तीनों के लिए एक छोटी तालिका पर्याप्त है : निर्णय का नाम, वर्ष, पीठ का आकार, और उसका एक वाक्य में योगदान। इसी परीक्षा-परिवार में इस अधिनियम की प्रक्रिया और अधिकरणों पर भी प्रश्न आ चुके हैं, इसलिए परिभाषाओं के साथ विवाद-निपटान की शृंखला भी उसी तालिका में जोड़ लीजिए।
संबंधित PYQ
EPFO_APFC_2023_Q35The Right of workers to resort to strike is the
- (a) Fundamental Right
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उत्तर(c) Common Law Right
कर्मकारों के हड़ताल पर जाने का अधिकार किस कोटि का अधिकार है, यह पूछता है — इसी अधिनियम की वह अगली परत, जो परिभाषा तय हो जाने के बाद आती है।
EPFO_EOAO_2023_Q100Under the provisions of the Industrial Disputes Act, 1947, right of legal representation before a Labour Court, or Industrial Tribunal or National Industrial Tribunal is :
- (a) A statutory right
- (b) Not at all permissible
- (c) Can be permitted by the forum if the other party does not object or gives consent
- (d) May be permitted if such permission is granted by the High Court of the State/Union Territory
उत्तर(c) Can be permitted by the forum if the other party does not object or gives consent
श्रम न्यायालय, औद्योगिक अधिकरण या राष्ट्रीय औद्योगिक अधिकरण के समक्ष विधिक प्रतिनिधित्व का अधिकार किस प्रकार का है, यह पूछता है — विवाद-निपटान की प्रक्रिया वाली परत।
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- (a) It is concluded on the date when a memorandum of settlement is signed by the parties.
- (b) It is concluded on the date when it ends in failure resulting in no memorandum of settlement signed between the parties.
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उत्तर(b) It is concluded on the date when it ends in failure resulting in no memorandum of settlement signed between the parties.
इसी अधिनियम के अधीन सुलह कार्यवाही के समापन से जुड़े कथनों में ग़लत कथन पूछता है — वही निपटान-शृंखला, जिसका आरंभ इस परिभाषा से होता है।
अभ्यास
- practice — not a real PYQ
औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 के अंतर्गत 'उद्योग' की परिभाषा पर दिए गए 'ट्रिपल टेस्ट' के अनुसार निम्नलिखित में से कौन-सी बात आवश्यक नहीं है ?
- (a)क्रमबद्ध और व्यवस्थित क्रियाकलाप
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- (d)वस्तुओं या सेवाओं का उत्पादन अथवा वितरण
उत्तर(c) लाभ कमाने का उद्देश्य
- practice — not a real PYQ
राज्य द्वारा चलाए जा रहे अस्पताल-समूह को औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 के अर्थ में उद्योग मानने वाला 1960 का निर्णय किस नाम से जाना जाता है ?
- (a)बम्बई राज्य बनाम अस्पताल मज़दूर सभा
- (b)बैंगलोर जल आपूर्ति एवं मल-व्यवस्था बोर्ड बनाम आर. राजप्पा
- (c)उ.प्र. राज्य बनाम जय बीर सिंह
- (d)बैंक ऑफ इंडिया बनाम टी.एस. केलावाला
उत्तर(a) बम्बई राज्य बनाम अस्पताल मज़दूर सभा