एक व्यक्ति ‘X’, आयु 48 वर्ष, एक खदान में काम कर रहा था, जहाँ भूमिगत काम के दौरान उसके साथ घातक दुर्घटना हो गई । जिस समय यह दुर्भाग्यपूर्ण दुर्घटना हुई, उसको ₹ 12,000 मासिक मज़दूरी मिल रही थी । कर्मचारी प्रतिकर अधिनियम, 1923 के अधीन उसको कितनी क्षतिपूर्ति राशि देय है ? (उपयुक्त गुणक है 159·80)
- (a)₹ 6,40,680
- (b)₹ 8,30,700
- (c)₹ 9,58,800
- (d)₹ 10,43,760
उत्तर
क्यों
सही उत्तर — C, (c) ₹ 9,58,800 — यह अधिनियम की धारा 4(1)(क) के सूत्र का सीधा परिणाम है, और गणना तीन चरणों में पूरी हो जाती है।
पहला चरण — सही सूत्र चुनना। मृत्यु की दशा में प्रतिकर मासिक मज़दूरी के पचास प्रतिशत को समुचित गुणक से गुणा करके निकाला जाता है, अथवा एक लाख बीस हज़ार रुपये, इन दोनों में जो अधिक हो वह। यहाँ ध्यान दीजिए कि पचास प्रतिशत मृत्यु का अंक है; स्थायी पूर्ण नि:शक्तता का अंक साठ प्रतिशत है, और दोनों को आपस में बदल देना इस प्रकार के प्रश्न की सबसे आम भूल है।
दूसरा चरण — मज़दूरी की जाँच। धारा 4 के साथ चलने वाला स्पष्टीकरण कहता है कि यदि कर्मचारी की मासिक मज़दूरी उस राशि से अधिक है जो केंद्र सरकार अधिसूचना से विनिर्दिष्ट करे, तो इस गणना के लिए उसकी मासिक मज़दूरी उतनी ही मानी जाएगी। वह अधिसूचित सीमा पंद्रह हज़ार रुपये है। यहाँ श्रीमान X की मज़दूरी ₹ 12,000 है, जो सीमा से नीचे है, इसलिए पूरी मज़दूरी ज्यों की त्यों ली जाएगी और सीमा का इस मामले में कोई प्रभाव नहीं पड़ता। यह जाँच फिर भी करनी चाहिए, क्योंकि यही वह जगह है जहाँ प्रश्न प्रायः ऊँची मज़दूरी रखकर परखता है।
तीसरा चरण — गणना। मासिक मज़दूरी का पचास प्रतिशत = ₹ 12,000 का आधा = ₹ 6,000 ₹ 6,000 × 159·80 = ₹ 9,58,800 यह राशि एक लाख बीस हज़ार रुपये की न्यूनतम सीमा से कहीं अधिक है, इसलिए वही देय होगी।
गुणक कहाँ से आता है, यह भी जान लीजिए। वह अनुसूची IV में आयु के अनुसार दिया गया है और आयु बढ़ने के साथ घटता जाता है, क्योंकि वह उन वर्षों का प्रतिनिधित्व करता है जो कर्मचारी के आगे शेष थे। प्रश्न ने गुणक स्वयं दे दिया है, इसलिए यहाँ अनुसूची देखने की आवश्यकता नहीं; आयु 48 वर्ष केवल इसलिए दी गई है कि गुणक उसी से मेल खाता है।
एक अंतिम बात, जो शब्दों में छिपी है। प्रश्न पूछता है कि 'उसको' कितनी क्षतिपूर्ति राशि देय है, और मृत कर्मचारी को कोई राशि दी नहीं जा सकती। अधिनियम की धारा 8 इसी को संभालती है : मृत्यु की दशा में प्रतिकर नियोजक द्वारा आयुक्त के पास निक्षिप्त किया जाता है, और आयुक्त उसे आश्रितजनों में बाँटता है। आश्रित को सीधा किया गया भुगतान इस अधिनियम के अधीन प्रतिकर का भुगतान नहीं माना जाता। इसलिए 'उसको देय' का अर्थ है 'उसके संबंध में देय', और उत्तर की राशि उससे बदलती नहीं।
अन्य विकल्प क्यों गलत हैं
- (a)₹ 6,40,680 — यह राशि सूत्र के किसी भी पठन से नहीं निकलती, और यही उसे पहचानने का सबसे तेज़ तरीक़ा है। इस मामले में केवल चार राशियाँ ऐसी हैं जो अधिनियम की किसी न किसी व्याख्या से बन सकती थीं : मृत्यु के पचास प्रतिशत से ₹ 9,58,800; यदि कोई भूल से स्थायी पूर्ण नि:शक्तता वाला साठ प्रतिशत लगा दे तो ₹ 11,50,560; यदि कोई मज़दूरी को अनावश्यक रूप से पंद्रह हज़ार की सीमा तक बढ़ा दे तो पचास प्रतिशत पर ₹ 11,98,500 और साठ प्रतिशत पर ₹ 14,38,200। ₹ 6,40,680 इनमें से कोई नहीं है। वह न किसी वैध प्रतिशत से बनती है, न किसी वैध मज़दूरी से, और वह न्यूनतम सीमा वाली एक लाख बीस हज़ार की राशि भी नहीं है। ऐसे विकल्प का काम केवल यह देखना होता है कि अभ्यर्थी ने गणना की या अनुमान लगाया।
- (b)₹ 8,30,700 — यह राशि भी सूत्र से नहीं बनती। इसे जाँचने का सरल तरीक़ा उलटी दिशा से चलना है : किसी भी उत्तर को गुणक 159·80 से भाग दीजिए और देखिए कि जो अंक निकले वह मासिक मज़दूरी का कोई साफ़ प्रतिशत है या नहीं। सही उत्तर पर यह भाग ठीक ₹ 6,000 देता है, जो ₹ 12,000 का आधा है — पूरा सूत्र एक पंक्ति में सिद्ध हो जाता है। ₹ 8,30,700 पर यह भाग कोई ऐसी संख्या नहीं देता जो मज़दूरी से किसी नियत अनुपात में हो। साथ ही यह ध्यान रखिए कि धारा 4(1)(क) की दूसरी शाखा, यानी एक लाख बीस हज़ार रुपये की न्यूनतम राशि, यहाँ काम नहीं आती, क्योंकि सूत्र से निकली राशि उससे कहीं अधिक है; न्यूनतम राशि केवल तब निर्णायक होती है जब मज़दूरी बहुत कम हो या गुणक बहुत छोटा।
- (d)₹ 10,43,760 — यह चारों में सबसे बड़ी राशि है और इसीलिए सबसे आकर्षक भी, क्योंकि मृत्यु सबसे गंभीर परिणाम है और अभ्यर्थी का मन सबसे बड़ी संख्या की ओर जाता है। अधिनियम इस अंतर्दृष्टि से नहीं चलता। धारा 4 में मृत्यु का प्रतिशत पचास है और स्थायी पूर्ण नि:शक्तता का साठ, यानी जीवित पर स्थायी रूप से नि:शक्त कर्मचारी के लिए ऊँचा प्रतिशत रखा गया है, क्योंकि उसे आजीवन उपचार और सहायता की आवश्यकता बनी रहती है। इसलिए 'मृत्यु है, इसलिए सबसे बड़ी राशि' वाला अनुमान यहाँ उलटा पड़ता है। और यदि कोई साठ प्रतिशत लगाकर ही गणना करे तो उत्तर ₹ 11,50,560 आता, जो इस विकल्प में है ही नहीं — यानी यह विकल्प उस भूल का भी उत्तर नहीं है।
अवधारणा
कर्मचारी प्रतिकर अधिनियम, 1923 की धारा 4 प्रतिकर की राशि को पूरी तरह सूत्र से बाँध देती है, और यही इस क़ानून की सबसे परीक्षा-योग्य धारा है।
तीन दशाएँ और तीन सूत्र हैं। मृत्यु की दशा में मासिक मज़दूरी का पचास प्रतिशत गुणक से गुणा, अथवा एक लाख बीस हज़ार रुपये, जो अधिक हो। स्थायी पूर्ण नि:शक्तता में मासिक मज़दूरी का साठ प्रतिशत गुणक से गुणा, अथवा एक लाख चालीस हज़ार रुपये, जो अधिक हो। स्थायी आंशिक नि:शक्तता में, यदि क्षति अनुसूची I के भाग II में है, तो उसी राशि का उतना प्रतिशत जितना अनुसूची में अर्जन-क्षमता की हानि के रूप में लिखा है। अस्थायी नि:शक्तता में मासिक भुगतान होता है, एकमुश्त राशि नहीं।
सूत्र के तीन घटक हैं और तीनों पर प्रश्न बनते हैं। पहला, मासिक मज़दूरी — जिस पर केंद्र सरकार की अधिसूचित ऊपरी सीमा लगती है, इस समय पंद्रह हज़ार रुपये। दूसरा, प्रतिशत — पचास या साठ, दशा के अनुसार। तीसरा, गुणक — जो अनुसूची IV में आयु के अनुसार दिया है और आयु बढ़ने के साथ घटता है।
राशि निकल जाने के बाद प्रक्रिया की दो बातें और महत्वपूर्ण हैं। मृत्यु की दशा में राशि आयुक्त के पास निक्षिप्त होती है और वही उसे आश्रितजनों में बाँटता है। और मृत्यु की दशा में सबसे छोटे आश्रित को अंत्येष्टि के व्यय के लिए एक निर्धारित राशि भी अलग से मिलती है। इन दोनों का उद्देश्य एक ही है — यह सुनिश्चित करना कि धन उन तक पहुँचे जिनके लिए वह है।
मृत्यु की दशा में प्रतिकर की गणना को समझने के लिए यह जानना उपयोगी है कि उसका उद्देश्य दंड नहीं, प्रतिस्थापन है। जो कर्मचारी मारा गया वह अपने परिवार के लिए हर महीने एक आय ला रहा था, और वह आय अब बंद हो गई है। सूत्र उसी बंद हो गई आय का वर्तमान मूल्य निकालने का प्रयास करता है — मासिक मज़दूरी का एक अंश लेकर, उसे एक ऐसे गुणक से गुणा करके जो शेष कार्य-वर्षों को दर्शाता है।
यही कारण है कि गुणक आयु से जुड़ा है और आयु के साथ घटता जाता है। सोलह वर्ष के कर्मचारी के आगे बहुत वर्ष शेष हैं, इसलिए उसका गुणक सबसे ऊँचा है; पैंसठ वर्ष के कर्मचारी के आगे बहुत कम, इसलिए सबसे नीचा। अड़तालीस वर्ष की आयु इसी ढलान के बीच में आती है।
मज़दूरी पर ऊपरी सीमा लगाने के पीछे का तर्क अलग है। यह क़ानून मुख्यतः उन कर्मचारियों के लिए बना है जिनके पास कोई और सुरक्षा-कवच नहीं है, और ऊँचे वेतन वालों के लिए सामान्यतः बीमा और अन्य व्यवस्थाएँ रहती हैं। सीमा लगाने से नियोजक का दायित्व भी पूर्वानुमेय रहता है और बीमा कराना संभव होता है, जो इस अधिनियम की व्यावहारिक रीढ़ है।
एक व्यावहारिक बात और : सीमा और गुणक दोनों समय-समय पर बदले जाते रहे हैं, इसलिए बहुत पुराने प्रश्नों की गणनाएँ आज के आँकड़ों से मेल नहीं खातीं। सुरक्षित तरीक़ा यही है कि प्रश्न जो गुणक दे उसी को लें, और मज़दूरी की सीमा वर्तमान अधिसूचना के अनुसार पंद्रह हज़ार रुपये मानें — इसी परीक्षा-परिवार के एक और पेपर की गणना, जिसकी आधिकारिक कुंजी उपलब्ध है, ठीक इसी सीमा और इसी गुणक पर बैठती है।
मुख्य तथ्य
- धारा 4(1)(क) : मृत्यु की दशा में प्रतिकर मासिक मज़दूरी के पचास प्रतिशत को समुचित गुणक से गुणा करके, अथवा एक लाख बीस हज़ार रुपये, इन दोनों में जो अधिक हो, वह देय होता है।
- धारा 4(1)(ख) : स्थायी पूर्ण नि:शक्तता की दशा में प्रतिशत साठ है और न्यूनतम राशि एक लाख चालीस हज़ार रुपये — मृत्यु वाले अंकों से यही जोड़ा प्रायः बदलकर पूछा जाता है।
- गणना के लिए मासिक मज़दूरी की ऊपरी सीमा केंद्र सरकार की अधिसूचना से आती है और इस समय पंद्रह हज़ार रुपये है; उससे कम मज़दूरी पूरी की पूरी ली जाती है।
- यहाँ की गणना : ₹ 12,000 का पचास प्रतिशत ₹ 6,000, और ₹ 6,000 को 159·80 से गुणा करने पर ₹ 9,58,800 — जो न्यूनतम सीमा से कहीं अधिक है।
- समुचित गुणक अनुसूची IV में आयु के अनुसार दिया गया है और आयु बढ़ने के साथ घटता है, क्योंकि वह शेष कार्य-वर्षों का प्रतिनिधित्व करता है।
- धारा 8 : मृत्यु की दशा में प्रतिकर आयुक्त के पास निक्षिप्त किया जाता है और वही उसे आश्रितजनों में बाँटता है; आश्रित को सीधा किया गया भुगतान इस अधिनियम के अधीन प्रतिकर का भुगतान नहीं माना जाता।
आगे की तैयारी
सामान्य भ्रम
- पचास और साठ प्रतिशत की अदला-बदली इस गणना का मुख्य जाल है। पचास मृत्यु का है और साठ स्थायी पूर्ण नि:शक्तता का, न कि उलटा।
- मज़दूरी की सीमा हर बार जाँचिए, पर उसे बलपूर्वक लगाइए मत। सीमा तभी काम करती है जब वास्तविक मज़दूरी उससे अधिक हो; यहाँ वह कम है।
- गुणक प्रश्न में दिया हो तो अनुसूची देखने की आवश्यकता नहीं। आयु प्रायः केवल इसलिए दी जाती है कि दिया गया गुणक उससे मेल खाता है।
- उत्तर की जाँच उलटी दिशा से कीजिए — राशि को गुणक से भाग दीजिए और देखिए कि वह मासिक मज़दूरी का कोई साफ़ अनुपात बनती है या नहीं।
इस अधिनियम पर गणना वाला प्रश्न लगभग सदा एक ही ढाँचे में आता है : एक कर्मचारी, उसकी आयु, उसकी मासिक मज़दूरी, घटना का प्रकार, और कोष्ठक में दिया गया समुचित गुणक। हल का क्रम भी सदा वही रहता है — पहले घटना से प्रतिशत तय कीजिए, फिर मज़दूरी को अधिसूचित सीमा से मिलाइए, फिर गुणा कीजिए, और अंत में न्यूनतम राशि से तुलना कर लीजिए। जो अभ्यर्थी यह क्रम एक बार बना लेता है, उसके लिए हर वर्ष का ऐसा प्रश्न एक जैसा हो जाता है। दूसरा रूप उलटा होता है — राशि दे दी जाती है और मज़दूरी या गुणक पूछ लिया जाता है, जिसमें वही सूत्र पीछे की ओर चलाना पड़ता है। तीसरा रूप गुणात्मक होता है — 'मृत्यु की दशा में प्रतिकर किसे और किस प्रकार दिया जाएगा', जहाँ धारा 8 का आयुक्त के पास निक्षेप वाला नियम उत्तर होता है। इसी परीक्षा-परिवार में इन तीनों में से दो रूप पहले पूछे जा चुके हैं, और उनमें से एक की आधिकारिक कुंजी उपलब्ध होने के कारण यहाँ की विधि बाहर से भी जाँची जा सकती है।
संबंधित PYQ
EPFO_APFC_2023_Q29What is the amount of compensation that is to be paid to an employee who is totally and permanently disabled as a result from injury under the provisions of the Employees’ Compensation Act, 1923? (Hints : Monthly wages drawn were ₹22,500 and relevant factor is 159·80)
- (a) ₹ 14,38,200
- (b) ₹ 23,97,000
- (c) ₹ 21,57,300
- (d) ₹ 7,67,040
उत्तर(a) ₹ 14,38,200
ठीक इसी सूत्र पर बना प्रश्न, पर स्थायी पूर्ण नि:शक्तता की दशा में और ऊँची मज़दूरी के साथ, जहाँ मज़दूरी की अधिसूचित सीमा वास्तव में लागू होती है — और उसकी आधिकारिक कुंजी यहाँ अपनाई गई विधि की स्वतंत्र पुष्टि है।
EPFO_APFC_2023_Q26What is the time limit prescribed under the provisions of the Employees’ Compensation Act, 1923 from the date of reference within which the Commissioner is required to dispose of the matter relating to compensation and intimate the decision to the employee?
- (a) Six months
- (b) One year
- (c) Two months
- (d) Three months
उत्तर(d) Three months
इसी अधिनियम के अधीन आयुक्त को प्रतिकर का मामला कितने समय में निपटाना है, यह पूछता है — राशि तय हो जाने के बाद की प्रक्रिया वाली कड़ी।
EPFO_EOAO_2020_Q101What is the maximum amount of gratuity payable to the employees under the Payment of Gratuity Act, 1972 ?
- (a) ₹ 5,00,000
- (b) ₹ 10,00,000
- (c) ₹ 15,00,000
- (d) ₹ 20,00,000
उत्तर(d) ₹ 20,00,000
उपदान संदाय अधिनियम, 1972 के अधीन देय अधिकतम उपदान पूछता है — दूसरा क़ानून, वही शैली, जहाँ राशि पर एक ऊपरी सीमा लगी हुई है।
अभ्यास
- practice — not a real PYQ
कर्मचारी प्रतिकर अधिनियम, 1923 के अधीन मृत्यु की दशा में प्रतिकर की गणना मासिक मज़दूरी के कितने प्रतिशत को समुचित गुणक से गुणा करके की जाती है ?
- (a)चालीस प्रतिशत
- (b)पचास प्रतिशत
- (c)साठ प्रतिशत
- (d)पचहत्तर प्रतिशत
उत्तर(b) पचास प्रतिशत
- practice — not a real PYQ
कर्मचारी प्रतिकर अधिनियम, 1923 के अधीन कर्मचारी की मृत्यु हो जाने पर नियोजक द्वारा प्रतिकर की राशि किसके पास निक्षिप्त की जाती है ?
- (a)आश्रितजनों के पास सीधे
- (b)आयुक्त के पास
- (c)कारख़ाना निरीक्षक के पास
- (d)श्रम न्यायालय के पास
उत्तर(b) आयुक्त के पास