बिना किसी जटिलता के एक नेत्र की हानि, जबकि दूसरा प्रसामान्य हो, कर्मचारी प्रतिकर अधिनियम, 1923 की अनुसूची I के अंतर्गत किस प्रकार की क्षति मानी जाती है ?
- (a)स्थायी पूर्ण नि:शक्तता
- (b)स्थायी आंशिक नि:शक्तता
- (c)अस्थायी आंशिक नि:शक्तता
- (d)डॉक्टरी परीक्षण के आधार पर निर्णय लिया जाएगा
उत्तर
क्यों
सही उत्तर — B, (b) स्थायी आंशिक नि:शक्तता — यह क्षति अनुसूची I के भाग II में गिनाई गई है, और उस भाग में गिनाई गई हर क्षति को अधिनियम स्वयं स्थायी आंशिक नि:शक्तता मानता है।
पहले यह देखिए कि अनुसूची I दो भागों में क्यों बँटी है। भाग I उन क्षतियों की सूची है जिन्हें स्थायी पूर्ण नि:शक्तता माना जाता है — जैसे दोनों हाथों की हानि, दोनों आँखों की दृष्टि की ऐसी हानि जिससे व्यक्ति कोई भी ऐसा काम न कर सके जिसके लिए दृष्टि आवश्यक है, और उसी कोटि की अन्य क्षतियाँ; इनके सामने अर्जन-क्षमता की हानि सौ प्रतिशत लिखी होती है। भाग II उन क्षतियों की सूची है जिन्हें स्थायी आंशिक नि:शक्तता माना जाता है, और हर क्षति के सामने अर्जन-क्षमता की हानि का एक निश्चित प्रतिशत छपा होता है।
एक नेत्र की हानि, जबकि दूसरा प्रसामान्य हो और कोई जटिलता न हो, भाग II की प्रविष्टियों में है, और उसके सामने अर्जन-क्षमता की हानि चालीस प्रतिशत दी गई है। इसलिए यह स्थायी आंशिक नि:शक्तता है।
अब उपधारणा की भूमिका समझिए, क्योंकि यही इस प्रश्न का असली विषय है। धारा 2(1) में 'आंशिक नि:शक्तता' की परिभाषा के साथ एक परंतुक है जो कहता है कि अनुसूची I के भाग II में विनिर्दिष्ट हर क्षति के बारे में यह समझा जाएगा कि उससे स्थायी आंशिक नि:शक्तता हुई है। इसी प्रकार 'पूर्ण नि:शक्तता' की परिभाषा का परंतुक कहता है कि भाग I में विनिर्दिष्ट हर क्षति से, तथा भाग II की उन क्षतियों के ऐसे संयोजन से जिनकी कुल अर्जन-क्षमता-हानि सौ प्रतिशत या अधिक हो, स्थायी पूर्ण नि:शक्तता हुई समझी जाएगी।
उपधारणा का व्यावहारिक अर्थ बड़ा है : सूचीबद्ध क्षति में यह पूछने की आवश्यकता ही नहीं रहती कि इस विशेष कर्मचारी की कमाई वास्तव में कितनी घटी। अनुसूची का प्रतिशत अपने आप लागू हो जाता है, और उसी प्रतिशत पर प्रतिकर की गणना होती है — स्थायी पूर्ण नि:शक्तता में जितना प्रतिकर बनता, उसका उतना प्रतिशत। इससे विवाद घटते हैं और भुगतान शीघ्र होता है, जो इस अधिनियम का पूरा उद्देश्य है।
इसलिए यहाँ न चिकित्सा-मूल्यांकन की आवश्यकता है, न अस्थायी और स्थायी के बीच किसी विवेचन की। क्षति सूची में है, सूची भाग II की है, और भाग II का अर्थ स्थायी आंशिक नि:शक्तता है।
अन्य विकल्प क्यों गलत हैं
- (a)स्थायी पूर्ण नि:शक्तता — स्थायी पूर्ण नि:शक्तता अनुसूची I के भाग I की कोटि है, और उस भाग में आँख से जुड़ी प्रविष्टि दोनों आँखों की है, एक की नहीं — दोनों आँखों की दृष्टि की ऐसी हानि जिससे व्यक्ति कोई भी ऐसा काम न कर सके जिसके लिए दृष्टि आवश्यक है। एक नेत्र की हानि, जबकि दूसरा प्रसामान्य हो, इस कसौटी पर नहीं उतरती : दूसरी आँख से काम करने की क्षमता बनी रहती है, और अधिनियम भी उसे चालीस प्रतिशत की हानि मानता है, सौ प्रतिशत की नहीं। यहाँ एक अपवाद ध्यान में रखिए — भाग II की क्षतियों का ऐसा संयोजन, जिनकी कुल हानि सौ प्रतिशत या उससे अधिक हो जाए, स्थायी पूर्ण नि:शक्तता माना जाता है। यानी दोनों आँखें अलग-अलग दुर्घटनाओं में जाएँ तब भी परिणाम पूर्ण नि:शक्तता का हो सकता है; पर एक अकेली आँख की हानि पर यह अपवाद लागू नहीं होता।
- (c)अस्थायी आंशिक नि:शक्तता — यहाँ 'आंशिक' तो सही है पर 'अस्थायी' ग़लत, और यही एक शब्द पूरा विकल्प गिरा देता है। अस्थायी आंशिक नि:शक्तता वह है जो कुछ समय के लिए उसी नियोजन में कर्मचारी की अर्जन-क्षमता घटाती है जिसमें वह दुर्घटना के समय लगा था — जैसे मोच, हड्डी का ऐसा टूटना जो जुड़ जाए, या घाव जो भर जाए। नेत्र की हानि इस कोटि में नहीं आ सकती, क्योंकि वह लौटती नहीं; और उससे भी बड़ी बात यह है कि प्रश्न का निर्णय इस चिकित्सा-तर्क से नहीं, अनुसूची की उपधारणा से होता है। धारा 2(1) का परंतुक कहता है कि अनुसूची I के भाग II में विनिर्दिष्ट हर क्षति से स्थायी आंशिक नि:शक्तता हुई समझी जाएगी। जो क्षति भाग II में लिखी है उसे अस्थायी कहने का विकल्प अधिनियम छोड़ता ही नहीं।
- (d)डॉक्टरी परीक्षण के आधार पर निर्णय लिया जाएगा — यह विकल्प एक ऐसे नियम को यहाँ ले आता है जो वास्तव में मौजूद तो है, पर दूसरी परिस्थिति के लिए। जो क्षति अनुसूची I में गिनाई नहीं गई है, उसमें अर्जन-क्षमता की हानि का प्रतिशत अर्हित चिकित्सा-व्यवसायी के मूल्यांकन से तय होता है — वहाँ डॉक्टरी परीक्षण ही निर्णायक है। इसी प्रकार अधिनियम नियोजक को यह अधिकार भी देता है कि क्षति के बाद कर्मचारी को नि:शुल्क चिकित्सा परीक्षण के लिए बुलाए। पर प्रस्तुत क्षति सूचीबद्ध है, और सूचीबद्ध क्षति में अधिनियम ने प्रश्न पहले ही तय कर रखा है : कोटि और प्रतिशत दोनों अनुसूची से आते हैं, किसी परीक्षण से नहीं। यही उपधारणा इस क़ानून की सबसे बड़ी सुविधा है, क्योंकि वह विवाद और विलंब दोनों घटाती है। इसलिए यह विकल्प सही उत्तर है, पर एक दूसरे प्रश्न का।
अवधारणा
कर्मचारी प्रतिकर अधिनियम, 1923 की पूरी बनावट चार कड़ियों की एक शृंखला है : दायित्व, नि:शक्तता की कोटि, प्रतिकर की राशि, और भुगतान की प्रक्रिया।
पहली कड़ी दायित्व है। धारा 3 कहती है कि यदि किसी कर्मचारी को नियोजन के दौरान और नियोजन से उद्भूत दुर्घटना से क्षति पहुँचती है तो नियोजक प्रतिकर देने के लिए दायी होगा। यह दायित्व नियोजक की उपेक्षा सिद्ध करने पर नहीं टिकता — यही इस क़ानून की सबसे बड़ी देन है। धारा 3 में कुछ अपवाद भी हैं, जैसे तीन दिन से कम की अशक्तता, तथा नशे या सुरक्षा-नियम के जानबूझकर उल्लंघन से हुई ऐसी क्षति जो मृत्यु या स्थायी पूर्ण नि:शक्तता में न बदले।
दूसरी कड़ी कोटि है, और यही इस प्रश्न का विषय है। नि:शक्तता चार कोटियों में बँटती है : अस्थायी आंशिक, अस्थायी पूर्ण, स्थायी आंशिक और स्थायी पूर्ण। दो कसौटियाँ हैं — क्षति लौटने वाली है या नहीं, और वह अर्जन-क्षमता को कुछ घटाती है या पूरी तरह समाप्त करती है। अनुसूची I दो भागों में इसी को स्थिर कर देती है।
तीसरी कड़ी राशि है। मृत्यु में मासिक मज़दूरी का पचास प्रतिशत गुणक से गुणा, स्थायी पूर्ण नि:शक्तता में साठ प्रतिशत गुणक से गुणा, और स्थायी आंशिक नि:शक्तता में उसी का उतना प्रतिशत जितना अनुसूची बताती है। गुणक आयु से आता है और अनुसूची IV में दिया है।
चौथी कड़ी प्रक्रिया है : आयुक्त के समक्ष दावा, मृत्यु की दशा में राशि का आयुक्त के पास निक्षेप, और निर्धारित समय में निपटान।
1923 का यह अधिनियम भारत के श्रम-क़ानूनों में एक मोड़ है, क्योंकि उसने पहली बार यह सिद्धांत अपनाया कि औद्योगिक दुर्घटना का बोझ उद्योग उठाएगा, घायल कर्मचारी नहीं।
इससे पहले घायल श्रमिक के पास केवल साधारण अपकृत्य विधि का रास्ता था, जिसमें उसे नियोजक की उपेक्षा सिद्ध करनी पड़ती थी, और नियोजक के पास बचाव के तीन पुराने हथियार थे — कर्मचारी की अपनी उपेक्षा, सहकर्मी की भूल, और जोखिम की स्वीकृति। इन तीनों के रहते खान, रेल और कारख़ाने के अधिकांश दावे विफल हो जाते थे। यह अधिनियम उन बचावों को हटाकर एक नि:शर्त दायित्व खड़ा करता है, बदले में प्रतिकर की राशि को एक निश्चित सूत्र से बाँध देता है।
अनुसूची I इसी सौदे का दूसरा आधा भाग है। यदि प्रतिकर सूत्र से मिलना है तो नि:शक्तता का माप भी सूत्र से आना चाहिए, वरना हर मामला चिकित्सा-साक्ष्य की लंबी लड़ाई बन जाएगा। इसलिए विधायिका ने सामान्य क्षतियों की एक तालिका बनाकर हर एक के सामने अर्जन-क्षमता की हानि का प्रतिशत लिख दिया। एक अंगूठा, एक तर्जनी, एक कान की श्रवण-शक्ति, एक नेत्र — इन सबके प्रतिशत तय हैं।
2009 में इस अधिनियम का नाम कर्मकार प्रतिकर अधिनियम से बदलकर कर्मचारी प्रतिकर अधिनियम किया गया, और दायरा भी बढ़ाया गया। ध्यान रखिए कि जिस कर्मचारी पर कर्मचारी राज्य बीमा अधिनियम, 1948 लागू है, उसे उसी योजना से नि:शक्तता हितलाभ मिलता है, इस अधिनियम से प्रतिकर नहीं — दोनों एक साथ नहीं चलते।
मुख्य तथ्य
- अनुसूची I दो भागों में है : भाग I की क्षतियाँ स्थायी पूर्ण नि:शक्तता मानी जाती हैं, और भाग II की क्षतियाँ स्थायी आंशिक नि:शक्तता, हर एक के सामने अर्जन-क्षमता की हानि का निश्चित प्रतिशत लिखा होता है।
- एक नेत्र की हानि, जबकि दूसरा प्रसामान्य हो और कोई जटिलता न हो, भाग II की प्रविष्टि है और उसके सामने अर्जन-क्षमता की हानि चालीस प्रतिशत दी गई है।
- धारा 2(1) का परंतुक : भाग II में विनिर्दिष्ट हर क्षति से स्थायी आंशिक नि:शक्तता हुई समझी जाएगी — यह उपधारणा है, इसलिए अलग से चिकित्सा-मूल्यांकन की आवश्यकता नहीं रहती।
- भाग II की उन क्षतियों का संयोजन, जिनकी कुल अर्जन-क्षमता-हानि सौ प्रतिशत या अधिक हो जाए, स्थायी पूर्ण नि:शक्तता माना जाता है।
- जो क्षति अनुसूची में गिनाई नहीं गई है, उसमें अर्जन-क्षमता की हानि का प्रतिशत अर्हित चिकित्सा-व्यवसायी के मूल्यांकन से तय होता है।
- स्थायी आंशिक नि:शक्तता का प्रतिकर वही प्रतिशत होता है, जो अनुसूची बताती है, उस राशि का जो स्थायी पूर्ण नि:शक्तता की दशा में देय होती।
आगे की तैयारी
सामान्य भ्रम
- भाग I और भाग II की अदला-बदली इस अध्याय का मुख्य जाल है। भाग I पूर्ण है, भाग II आंशिक — और प्रश्न प्रायः एक आँख या एक हाथ की क्षति रखकर पूर्ण वाला विकल्प सामने रख देता है।
- 'स्थायी' और 'अस्थायी' का अंतर विकल्पों में केवल एक अक्षर का होता है। सूचीबद्ध क्षति सदा स्थायी है, क्योंकि अधिनियम ने उसे स्थायी मान रखा है।
- सूचीबद्ध क्षति में चिकित्सा-मूल्यांकन का विकल्प आकर्षक लगता है, पर वह नियम केवल सूची से बाहर की क्षतियों के लिए है।
- प्रतिशत और कोटि दो अलग तथ्य हैं। चालीस प्रतिशत की हानि भी स्थायी आंशिक नि:शक्तता ही है; प्रतिशत केवल प्रतिकर की राशि तय करता है, कोटि नहीं।
इस अधिनियम पर प्रश्न तीन साँचों में आते हैं, और तीनों इसी परीक्षा-परिवार में पहले आ चुके हैं। पहला कोटि का साँचा है, जैसा यहाँ है — कोई एक क्षति देकर पूछना कि वह किस प्रकार की नि:शक्तता है; इसका उत्तर हमेशा अनुसूची I के भाग से आता है, चिकित्सा-तर्क से नहीं, और विकल्प जान-बूझकर 'स्थायी और अस्थायी' तथा 'पूर्ण और आंशिक' दो अक्षों पर बनाए जाते हैं। दूसरा गणना का साँचा है — मासिक मज़दूरी, आयु और गुणक देकर प्रतिकर पूछना; वहाँ मृत्यु का पचास प्रतिशत और स्थायी पूर्ण नि:शक्तता का साठ प्रतिशत याद होना चाहिए, और मासिक मज़दूरी की ऊपरी सीमा भी। तीसरा प्रक्रिया का साँचा है — आयुक्त के पास निक्षेप, दावे का निपटान किस अवधि में होगा, और अपील कहाँ जाएगी। तीनों की तैयारी एक ही पृष्ठ पर हो जाती है : ऊपर चार कोटियाँ, बीच में अनुसूची के दोनों भागों के उदाहरण और उनके प्रतिशत, और नीचे धारा 4 का सूत्र तथा प्रक्रिया की समय-सीमाएँ।
संबंधित PYQ
EPFO_APFC_2023_Q29What is the amount of compensation that is to be paid to an employee who is totally and permanently disabled as a result from injury under the provisions of the Employees’ Compensation Act, 1923? (Hints : Monthly wages drawn were ₹22,500 and relevant factor is 159·80)
- (a) ₹ 14,38,200
- (b) ₹ 23,97,000
- (c) ₹ 21,57,300
- (d) ₹ 7,67,040
उत्तर(a) ₹ 14,38,200
इसी अधिनियम के अधीन पूर्णतः और स्थायी रूप से नि:शक्त कर्मचारी को देय प्रतिकर की गणना पूछता है, मासिक मज़दूरी और गुणक देकर — कोटि तय हो जाने के बाद की अगली कड़ी, यानी राशि।
EPFO_APFC_2023_Q26What is the time limit prescribed under the provisions of the Employees’ Compensation Act, 1923 from the date of reference within which the Commissioner is required to dispose of the matter relating to compensation and intimate the decision to the employee?
- (a) Six months
- (b) One year
- (c) Two months
- (d) Three months
उत्तर(d) Three months
इसी अधिनियम के अधीन आयुक्त को प्रतिकर का मामला कितने समय में निपटाकर कर्मचारी को निर्णय की सूचना देनी होती है, यह पूछता है — प्रक्रिया वाली कड़ी।
EPFO_APFC_2023_Q28Any question relating to disablement shall be determined by which one of the following authorities under the Employees’ State Insurance Act, 1948?
- (a) The Insurance Medical Practitioner
- (b) The Social Security Officer
- (c) The Medical Board
- (d) The Medical Appeal Tribunal
उत्तर(c) The Medical Board
कर्मचारी राज्य बीमा अधिनियम, 1948 के अधीन नि:शक्तता का प्रश्न कौन तय करेगा, यह पूछता है — वही विषय दूसरे क़ानून में, जहाँ निर्णय अनुसूची की उपधारणा से नहीं, चिकित्सा बोर्ड से होता है।
अभ्यास
- practice — not a real PYQ
कर्मचारी प्रतिकर अधिनियम, 1923 की अनुसूची I के भाग I में विनिर्दिष्ट क्षतियों के बारे में क्या उपधारणा की जाती है ?
- (a)उनसे अस्थायी आंशिक नि:शक्तता हुई है
- (b)उनसे स्थायी आंशिक नि:शक्तता हुई है
- (c)उनसे स्थायी पूर्ण नि:शक्तता हुई है
- (d)उनका निर्णय आयुक्त चिकित्सा साक्ष्य पर करेगा
उत्तर(c) उनसे स्थायी पूर्ण नि:शक्तता हुई है
- practice — not a real PYQ
कर्मचारी प्रतिकर अधिनियम, 1923 के अधीन ऐसी क्षति में, जो अनुसूची I में गिनाई नहीं गई है, अर्जन-क्षमता की हानि का प्रतिशत कौन तय करता है ?
- (a)अर्हित चिकित्सा-व्यवसायी
- (b)नियोजक स्वयं
- (c)कारख़ाना निरीक्षक
- (d)मुख्य श्रम आयुक्त
उत्तर(a) अर्हित चिकित्सा-व्यवसायी