मज़दूरी संदाय अधिनियम, 1936 के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए : 1. मज़दूरी का भुगतान चालू सिक्कों में किया जा सकता है । 2. मज़दूरी की अवधि साप्ताहिक भुगतान के लिए निर्धारित की जा सकती है । 3. एक हज़ार से अधिक कर्मचारियों वाले प्रतिष्ठानों में मज़दूरी का भुगतान मज़दूरी की अवधि के अंतिम दिन के उपरांत सातवें दिन की समाप्ति से पहले किया जाना है । उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं ?
- (a)केवल 1 और 2
- (b)केवल 1
- (c)केवल 2
- (d)1, 2 और 3
उत्तर
क्यों
सही उत्तर — A, (a) केवल 1 और 2 — तीनों कथनों का अलग-अलग निर्णय कीजिए, क्योंकि यहाँ केवल एक कथन गिराना है और वह सबसे विश्वसनीय दिखने वाला कथन है।
कथन 1 सही है। अधिनियम की धारा 6 कहती है कि सारी मज़दूरी चालू सिक्कों में या चालू नोटों में, या दोनों में, संदत्त की जाएगी। इसके आगे यह भी जोड़ा गया है कि नियोजक, कर्मचारी की लिखित अनुज्ञा लेकर, मज़दूरी चेक से दे सकता है या उसके बैंक खाते में जमा कर सकता है, और समुचित सरकार अधिसूचना से ऐसे प्रतिष्ठान निर्दिष्ट कर सकती है जहाँ भुगतान केवल चेक या खाते में जमा करके ही होगा। पर मूल नियम आज भी वही है जो कथन 1 कहता है — चालू सिक्कों में भुगतान किया जा सकता है।
कथन 2 भी सही है। धारा 4 हर उस व्यक्ति पर, जो धारा 3 के अधीन मज़दूरी देने के लिए उत्तरदायी है, यह दायित्व डालती है कि वह मज़दूरी-अवधि नियत करे, और साथ ही एक ही बंधन लगाती है — कोई मज़दूरी-अवधि एक मास से अधिक नहीं होगी। इसका सीधा अर्थ यह है कि दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक और मासिक, सभी अवधियाँ वैध हैं; क़ानून ऊपर की सीमा बाँधता है, नीचे की नहीं। इसलिए साप्ताहिक भुगतान के लिए मज़दूरी-अवधि नियत की जा सकती है।
कथन 3 ग़लत है, और वही इस प्रश्न का निर्णायक बिंदु है। धारा 5 भुगतान का समय दो भागों में बाँटती है। जिस रेल, कारख़ाने अथवा औद्योगिक या अन्य प्रतिष्ठान में एक हज़ार से कम व्यक्ति नियोजित हैं, वहाँ मज़दूरी-अवधि के अंतिम दिन के बाद सातवें दिन की समाप्ति से पहले भुगतान होना चाहिए; और किसी भी अन्य दशा में, यानी जहाँ एक हज़ार या उससे अधिक व्यक्ति नियोजित हैं, दसवें दिन की समाप्ति से पहले। कथन 3 ने इन दोनों को आपस में बदल दिया है — उसने बड़े प्रतिष्ठान को सातवें दिन की छोटी अवधि दे दी है, जबकि क़ानून ने बड़े प्रतिष्ठान को अधिक समय दिया है, क्योंकि हज़ारों लोगों की मज़दूरी की गणना और वितरण में अधिक समय लगता है।
इसलिए कथन 1 और 2 सही हैं, कथन 3 ग़लत है, और उत्तर विकल्प (a) है।
अन्य विकल्प क्यों गलत हैं
- (b)केवल 1 — यह विकल्प कथन 1 को तो स्वीकार करता है पर कथन 2 को गिरा देता है, और यही उसकी भूल है। धारा 4 मज़दूरी-अवधि पर केवल एक बंधन लगाती है — वह एक मास से अधिक नहीं हो सकती। इस एक बंधन के भीतर नियोजक कोई भी अवधि नियत करने के लिए स्वतंत्र है, और व्यवहार में दैनिक, साप्ताहिक और पाक्षिक अवधियाँ बहुत सामान्य हैं, विशेषकर निर्माण, बीड़ी, कृषि-प्रसंस्करण और परिवहन जैसे कामों में जहाँ श्रमिक मासिक वेतन पर नहीं होता। साप्ताहिक भुगतान इसलिए न केवल अनुज्ञेय है, बल्कि अधिनियम की धारा 5 उसे मान भी लेती है, क्योंकि वहाँ भुगतान की समय-सीमा मज़दूरी-अवधि के अंतिम दिन से गिनी जाती है, चाहे वह अवधि कितनी भी लंबी या छोटी हो। कथन 2 को ग़लत मानने के लिए अधिनियम में कोई आधार नहीं है।
- (c)केवल 2 — यह विकल्प उलटी दिशा से चूकता है — वह कथन 2 को स्वीकार करता है और कथन 1 को गिरा देता है। संभवतः इसका आधार यह धारणा है कि आज मज़दूरी बैंक खाते में ही जानी चाहिए, इसलिए सिक्कों में भुगतान की बात पुरानी पड़ चुकी है। यह धारणा अधिनियम के पाठ से मेल नहीं खाती। धारा 6 का मूल नियम आज भी चालू सिक्कों या चालू नोटों में भुगतान का है; चेक और बैंक खाता उसमें बाद में जोड़े गए विकल्प हैं, और उनके लिए कर्मचारी की लिखित अनुज्ञा चाहिए। हाँ, समुचित सरकार अधिसूचना से कुछ प्रतिष्ठानों के लिए केवल चेक या खाते में भुगतान अनिवार्य कर सकती है, पर वह एक विशेष व्यवस्था है, सामान्य नियम नहीं। कथन 1 अधिनियम की भाषा को ठीक-ठीक दोहराता है।
- (d)1, 2 और 3 — यह विकल्प चारों में सबसे आकर्षक है, क्योंकि तीनों कथन सुनने में विधिसम्मत लगते हैं और अभ्यर्थी प्रायः सोचता है कि सूची में कोई एक कथन गिराने के लिए रखा ही नहीं गया। यहाँ रखा गया है, और वह कथन 3 है। धारा 5 एक हज़ार की संख्या पर दो भाग करती है : एक हज़ार से कम व्यक्तियों वाले प्रतिष्ठान में सातवें दिन तक, और शेष सब में दसवें दिन तक भुगतान। कथन 3 ने एक हज़ार से अधिक वालों के लिए सातवाँ दिन लिख दिया है, जो ठीक उलटा है। इस प्रकार के कथन को पकड़ने का तरीक़ा यह है कि जहाँ भी कोई संख्या और कोई समय-सीमा एक साथ छपी हो, दोनों को अलग-अलग जाँचिए — यहाँ संख्या सही है और समय-सीमा ग़लत, और एक भी अंश ग़लत होने पर पूरा कथन गिर जाता है।
अवधारणा
मज़दूरी संदाय अधिनियम, 1936 का पूरा ढाँचा चार प्रश्नों के उत्तर में बैठ जाता है : भुगतान कौन करेगा, कब करेगा, किस रूप में करेगा, और उसमें से क्या काट सकता है।
कौन — धारा 3 उत्तरदायित्व तय करती है। कारख़ाने में प्रबंधक, कंपनी में नियत व्यक्ति, और अन्य प्रतिष्ठानों में नियोजक स्वयं या उसका नामित व्यक्ति मज़दूरी देने के लिए उत्तरदायी है, और यह उत्तरदायित्व ठेकेदार को सौंपकर टाला नहीं जा सकता।
कब — धारा 4 मज़दूरी-अवधि नियत कराती है और उसे एक मास से अधिक नहीं होने देती; धारा 5 भुगतान की अंतिम तिथि बाँधती है, जो एक हज़ार से कम कर्मचारियों वाले प्रतिष्ठान में सातवाँ दिन और शेष में दसवाँ दिन है। सेवा समाप्त होने पर मज़दूरी दूसरे कार्य-दिवस की समाप्ति से पहले देनी होती है, और सारे भुगतान कार्य-दिवस पर ही होंगे।
किस रूप में — धारा 6 चालू सिक्कों या नोटों में भुगतान का नियम रखती है, और लिखित अनुज्ञा पर चेक या बैंक खाते की छूट देती है।
क्या काट सकता है — धारा 7 से 13 तक कटौतियों का पूरा अध्याय है, जिसमें अनुज्ञेय कटौतियों की गिनती, जुर्माने की शर्तें, और कुल कटौती की ऊपरी सीमा है।
इन चारों में केवल धारा 5 दो अलग-अलग संख्याएँ बोलती है, और इसीलिए वही सबसे अधिक पूछी जाती है। सातवाँ दिन छोटे प्रतिष्ठान का है, दसवाँ बड़े का — यह क्रम याद रखना इस अध्याय की आधी तैयारी है।
यह अधिनियम 1929 की रॉयल कमीशन ऑन लेबर की जाँच से निकली सिफ़ारिशों की उपज है। उस समय की सबसे आम शिकायत मज़दूरी की मात्रा नहीं, उसका विलंब और उसमें से मनमानी कटौती थी — मज़दूरी महीनों रोक ली जाती थी, मनमाने जुर्माने लगाए जाते थे, और भुगतान वस्तुओं में या दुकान की उधारी में समायोजित कर दिया जाता था।
इसलिए यह क़ानून मज़दूरी की दर के बारे में कुछ नहीं कहता। दर का प्रश्न न्यूनतम मज़दूरी अधिनियम, 1948 का विषय है। 1936 का यह अधिनियम केवल यह सुनिश्चित करता है कि जो मज़दूरी बनती है वह समय पर, पूरी और मुद्रा के रूप में मिले। दोनों क़ानूनों का यह विभाजन परीक्षा में बार-बार पूछा जाता है।
दायरे की दृष्टि से भी अधिनियम बदलता रहा है। आरंभ में यह केवल एक निश्चित सीमा से कम मज़दूरी पाने वालों पर लागू था, और वह सीमा समय-समय पर बढ़ाई जाती रही है; आज वह चौबीस हज़ार रुपये मासिक है, और यही संख्या इसी परीक्षा-परिवार के एक पेपर में सीधे पूछी जा चुकी है। इसका अर्थ यह है कि यह अधिनियम मुख्यतः निचली और मध्य आय वाले कर्मचारी की रक्षा करता है, उच्च वेतन वालों की नहीं।
बाद में मज़दूरी संहिता ने इस अधिनियम सहित मज़दूरी से जुड़े कई क़ानूनों को एक जगह समेटने का ढाँचा खड़ा किया है, पर परीक्षा में प्रश्न अब भी मूल अधिनियम की धाराओं से पूछे जाते हैं, जैसा यह प्रश्न स्वयं दिखाता है।
मुख्य तथ्य
- धारा 6 : सारी मज़दूरी चालू सिक्कों या चालू नोटों में, या दोनों में, दी जाएगी; कर्मचारी की लिखित अनुज्ञा से चेक या बैंक खाते में भुगतान भी किया जा सकता है।
- धारा 4 : मज़दूरी-अवधि नियत करना अनिवार्य है और कोई मज़दूरी-अवधि एक मास से अधिक नहीं हो सकती — इसलिए दैनिक, साप्ताहिक और पाक्षिक अवधियाँ वैध हैं।
- धारा 5 : एक हज़ार से कम व्यक्तियों वाले प्रतिष्ठान में मज़दूरी-अवधि के अंतिम दिन के बाद सातवें दिन तक, और शेष सब में दसवें दिन तक भुगतान करना होगा।
- धारा 5 : सेवा समाप्त हो जाने पर अर्जित मज़दूरी सेवा-समाप्ति के दिन से दूसरे कार्य-दिवस की समाप्ति से पहले देनी होती है, और सभी भुगतान कार्य-दिवस पर ही किए जाएँगे।
- यह अधिनियम मज़दूरी की दर तय नहीं करता — वह न्यूनतम मज़दूरी अधिनियम, 1948 का विषय है। यह केवल भुगतान का समय, रूप और उसमें से कटौतियाँ नियंत्रित करता है।
- अधिनियम के दायरे में आने के लिए मासिक मज़दूरी की एक ऊपरी सीमा है, जो समय-समय पर बढ़ाई जाती रही है और इस समय चौबीस हज़ार रुपये प्रति मास है।
आगे की तैयारी
सामान्य भ्रम
- सातवें और दसवें दिन की अदला-बदली इस अध्याय का सबसे आम जाल है। छोटा प्रतिष्ठान सातवें दिन तक, बड़ा दसवें दिन तक — बड़े को अधिक समय मिलता है, कम नहीं।
- मज़दूरी-अवधि पर केवल ऊपरी सीमा है, एक मास की। नीचे कोई सीमा नहीं, इसलिए साप्ताहिक या दैनिक अवधि को अवैध मान लेना भूल है।
- चेक और बैंक खाते वाला उपबंध मूल नियम को नहीं हटाता। चालू सिक्कों में भुगतान आज भी अधिनियम की मुख्य व्यवस्था है।
- किसी कथन में संख्या और समय-सीमा एक साथ छपी हो तो दोनों अलग-अलग जाँचिए। यहाँ एक हज़ार की संख्या सही है और सातवें दिन की सीमा ग़लत, और एक अंश ग़लत होने पर पूरा कथन गिर जाता है।
मज़दूरी संदाय अधिनियम पर प्रश्न तीन साँचों में आते हैं। पहला कथन-सूची है, जैसा यहाँ है, जिसमें दो-तीन कथन धाराओं का सीधा पाठ होते हैं और एक कथन में कोई एक संख्या या एक समय-सीमा उलट दी जाती है; ऐसे प्रश्न में विकल्प-समुच्चय देखकर अनुमान लगाना काम नहीं आता, हर कथन का अलग निर्णय करना पड़ता है। दूसरा साँचा सीधी संख्या का है — 'अधिनियम के दायरे में आने के लिए अधिकतम मासिक मज़दूरी कितनी', 'अभिलेख कितने वर्ष सुरक्षित रखने होंगे', 'सेवा-समाप्ति पर कितने दिन में भुगतान' — और इसी परिवार के पेपरों में ये दोनों रूप पहले पूछे जा चुके हैं। तीसरा साँचा कटौतियों का है, जिसमें कुछ मदें देकर पूछा जाता है कि उनमें से कौन-सी कटौतियाँ अनुज्ञेय हैं। तीनों के लिए एक ही तैयारी काम करती है : धारा 3, 4, 5, 6 और 7 को एक पंक्ति में लिखकर उनके साथ की संख्याएँ याद कर लीजिए, और हर संख्या के आगे यह भी लिख लीजिए कि वह किस स्थिति पर लागू होती है।
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उत्तर(d) Rupees twenty-four thousand
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अभ्यास
- practice — not a real PYQ
मज़दूरी संदाय अधिनियम, 1936 के अधीन जिस प्रतिष्ठान में एक हज़ार या उससे अधिक व्यक्ति नियोजित हैं, वहाँ मज़दूरी-अवधि के अंतिम दिन के बाद किस दिन की समाप्ति से पहले मज़दूरी का भुगतान करना होता है ?
- (a)दूसरे दिन
- (b)सातवें दिन
- (c)दसवें दिन
- (d)पंद्रहवें दिन
उत्तर(c) दसवें दिन
- practice — not a real PYQ
मज़दूरी संदाय अधिनियम, 1936 की धारा 4 के अनुसार कोई मज़दूरी-अवधि अधिकतम कितनी लंबी हो सकती है ?
- (a)एक सप्ताह
- (b)एक पखवाड़ा
- (c)एक मास
- (d)तीन मास
उत्तर(c) एक मास