ऐसी कितनी तीन-अंकीय संख्याएँ हैं, जिनमें प्रत्येक संख्या का मध्य अंक उसके प्रथम अंक और तृतीय अंक के योगफल के बराबर है ?
- (a)40
- (b)45
- (c)50
- (d)55
उत्तर
क्यों
सही उत्तर — B, (b) 45 — ऐसी तीन-अंकीय संख्याएँ पैंतालीस हैं।
संख्या के तीन अंकों को प्रथम, मध्य और तृतीय कहिए। शर्त यह है कि मध्य अंक शेष दोनों का योग हो।
अब वह चरण, जो गिनती को सरल कर देता है : स्वतंत्र अंक कौन-से हैं, यह तय कीजिए। प्रथम और तृतीय अंक चुन लेने पर मध्य अंक अपने-आप निश्चित हो जाता है, इसलिए गिनने के लिए केवल यही दो अंक बचते हैं और मध्य अंक अलग से गिनने की आवश्यकता नहीं। यह गणना का एक सामान्य नियम है — पहले यह पूछिए कि कितनी राशियाँ स्वतंत्र रूप से चुनी जा सकती हैं, और शेष को उन्हीं का परिणाम मानकर छोड़ दीजिए।
इन दोनों पर दो शर्तें हैं। पहली, प्रथम अंक शून्य नहीं हो सकता, क्योंकि तब संख्या तीन-अंकीय रह ही नहीं जाएगी; इसलिए वह 1 से 9 तक कुछ भी हो सकता है। दूसरी, मध्य अंक भी एक अंक ही होना चाहिए, यानी दोनों का योग नौ से अधिक न हो। दूसरी शर्त छिपी हुई है — प्रश्न उसे कहता नहीं — पर वह इसलिए लगती है कि दस या उससे बड़ा 'अंक' होता ही नहीं।
अब प्रथम अंक के हर मान पर तृतीय अंक की संभावनाएँ गिनिए। प्रथम अंक 1 हो तो तृतीय अंक 0 से 8 तक, यानी नौ संभावनाएँ — ये संख्याएँ 110, 121, 132 से चलकर 198 तक जाती हैं। प्रथम अंक 2 हो तो 0 से 7 तक, आठ — 220 से 275 तक। इसी तरह आगे बढ़ते हुए प्रथम अंक 9 पर केवल एक ही संभावना बचती है, तृतीय अंक 0, यानी अकेली संख्या 990, जो इस समूह की सबसे बड़ी संख्या भी है।
इसलिए कुल गिनती है 9 + 8 + 7 + 6 + 5 + 4 + 3 + 2 + 1 = 45।
यही पहली नौ प्राकृत संख्याओं का योग है, जिसे 9 × 10 ⁄ 2 से भी निकाला जा सकता है। ऐसे प्रश्नों में यह योग बार-बार लौटता है, इसलिए उसे पहचान लेना समय बचाता है।
दूसरे रास्ते से भी जाँच लीजिए, और दो स्वतंत्र रास्तों का एक ही उत्तर पर आना सबसे अच्छी पुष्टि है। इस बार मध्य अंक से आरंभ कीजिए। उसे s मानिए; तब प्रथम और तृतीय अंक का योग s होना चाहिए, और प्रथम कम से कम 1 होना चाहिए, इसलिए प्रथम अंक 1 से s तक कुछ भी हो सकता है — यानी s तरीक़े। s का मान 0 काम का नहीं, क्योंकि तब प्रथम अंक भी शून्य होना पड़ेगा। इसलिए s को 1 से 9 तक चलाकर जोड़िए : 1 + 2 + 3 + … + 9, फिर वही 45।
अन्य विकल्प क्यों गलत हैं
- (a)40 — चालीस गिनती इस प्रश्न की किसी भी पूरी गणना से नहीं निकलती, और यही इस विकल्प की पहचान है। सबसे सुरक्षित रास्ता यह है कि गिनती को सूची के रूप में लिख लिया जाए : प्रथम अंक 1 पर नौ संख्याएँ, 2 पर आठ, 3 पर सात, और इसी क्रम से घटते हुए 9 पर एक। इन नौ संख्याओं का योग 45 है, और यह पहली नौ प्राकृत संख्याओं का योग होने के कारण याद भी रखा जा सकता है। यह विकल्प इसलिए रखा गया लगता है कि गिनती जल्दबाज़ी में अधूरी छोड़ देने पर मन कोई गोल संख्या स्वीकार कर लेता है। सूची लिखकर जोड़ लेने से ऐसी चूक बचती है।
- (c)50 — पचास भी किसी संगत गणना का परिणाम नहीं है। इसे परखने का सबसे तेज़ तरीक़ा यह है कि दोनों स्वतंत्र रास्तों से गिनती मिलाई जाए। पहला रास्ता प्रथम अंक पर चलता है और 9 से 1 तक घटती संभावनाएँ देता है। दूसरा रास्ता मध्य अंक पर चलता है : मध्य अंक s के लिए प्रथम अंक 1 से s तक कुछ भी हो सकता है, इसलिए s तरीक़े बनते हैं, और s को 1 से 9 तक चलाकर जोड़ने पर फिर 45 आता है। दो स्वतंत्र गिनतियों का एक ही उत्तर देना सबसे मज़बूत पुष्टि है, और वह 45 पर टिकती है, 50 पर नहीं।
- (d)55 — पचपन ठीक वह गिनती है जो तब निकलती है जब प्रथम अंक के शून्य होने पर रोक भूल जाए। यदि प्रथम अंक 0 से 9 तक कुछ भी हो सकता, तो मध्य अंक s के लिए प्रथम अंक के s + 1 विकल्प बनते, और s को 0 से 9 तक चलाने पर योग 1 + 2 + … + 10 = 55 हो जाता। पर ऐसी संख्याएँ तीन-अंकीय होती ही नहीं — 0, 3 और 3 वाली रचना वास्तव में दो अंकों की संख्या 33 है। तीन-अंकीय होने का अर्थ ही यह है कि पहला अंक शून्य न हो, और यही एक शर्त गिनती को 55 से घटाकर 45 कर देती है।
अवधारणा
गिनती के प्रश्नों में पहला और सबसे महत्वपूर्ण निर्णय यह होता है कि किन राशियों को स्वतंत्र माना जाए। जो राशि दूसरों से अपने-आप तय हो जाती है, उसे गिनने की आवश्यकता नहीं होती।
यहाँ तीन अंक हैं, पर स्वतंत्र केवल दो हैं। प्रथम और तृतीय चुनते ही मध्य निश्चित हो जाता है, इसलिए पूरी गिनती दो अंकों की जोड़ियों की गिनती बन जाती है।
दूसरा चरण शर्तों को सूचीबद्ध करने का है। यहाँ दो शर्तें हैं और दोनों अलग-अलग स्रोतों से आती हैं। एक शर्त 'तीन-अंकीय' शब्द से आती है — पहला अंक शून्य नहीं हो सकता। दूसरी शर्त इस तथ्य से आती है कि मध्य स्थान पर भी एक ही अंक बैठ सकता है, इसलिए योग नौ से अधिक नहीं हो सकता। दूसरी शर्त प्रश्न में लिखी नहीं है, वह अंक-प्रणाली से निकलती है, और प्रायः यही छूटती है।
तीसरा चरण गिनती को किसी एक चर पर व्यवस्थित करने का है। किसी एक अंक के हर मान पर शेष की संभावनाएँ गिनिए और जोड़ दीजिए। यहाँ दोनों में से किसी भी अंक को आधार बनाया जा सकता है और उत्तर वही आता है — यह स्वयं एक अच्छी जाँच है।
गिनती और क्रमचय-संचय की छाया वाले प्रश्न इस पेपर के संख्यात्मक खंड में नियमित रूप से आते हैं, पर वे प्रायः सूत्र से नहीं, व्यवस्थित सूची से हल होते हैं। यह प्रश्न उसी श्रेणी का अच्छा उदाहरण है : इसमें कोई सूत्र नहीं लगता, केवल क्रमबद्ध गिनती लगती है।
स्तंभ की भाषा भी ध्यान देने योग्य है। यहाँ कोई बीजीय अक्षर नहीं दिया गया; अंकों के स्थान हिन्दी शब्दों से नामित हैं — मध्य अंक, प्रथम अंक, तृतीय अंक। इसलिए पढ़ते ही उन्हें अपने चिह्नों में लिख लेना उपयोगी है, नहीं तो शर्त दिशा बदल सकती है — यह गड़बड़ा सकता है कि योग मध्य अंक के बराबर है या मध्य अंक योग के।
विकल्पों की बनावट भी सोची हुई है : वे पाँच-पाँच के अंतर पर बढ़ते हैं, इसलिए गिनती में थोड़ी-सी भी चूक सीधे दूसरे विकल्प पर पहुँचा देती है। ऐसे प्रश्नों में अनुमान लगाना विशेष रूप से महँगा पड़ता है।
सबसे बड़ा विकल्प यहाँ एक विशेष भूमिका निभाता है — वह ठीक वह गिनती है जो पहले अंक की शून्य वाली रोक भूल जाने पर बनती है।
मुख्य तथ्य
- संख्या के तीन अंकों में स्वतंत्र केवल दो हैं — प्रथम और तृतीय; मध्य अंक उन्हीं के योग से अपने-आप तय हो जाता है।
- प्रथम अंक शून्य नहीं हो सकता, क्योंकि तीन-अंकीय होने की यही शर्त है; इसलिए वह 1 से 9 तक ही हो सकता है।
- मध्य स्थान पर भी एक ही अंक बैठता है, इसलिए प्रथम और तृतीय का योग नौ से अधिक नहीं हो सकता — यह शर्त प्रश्न में लिखी नहीं है, अंक-प्रणाली से निकलती है।
- प्रथम अंक 1 से 9 तक चलाने पर संभावनाएँ क्रमशः 9, 8, 7, …, 1 बनती हैं, जिनका योग 45 है, यानी 9 × 10 ⁄ 2।
- मध्य अंक को आधार बनाकर गिनने पर भी वही उत्तर आता है : मध्य अंक s के लिए s जोड़ियाँ बनती हैं, और s को 1 से 9 तक जोड़ने पर 45।
आगे की तैयारी
सामान्य भ्रम
- पहले अंक के शून्य होने की रोक भूल जाना, जिससे गिनती दस बढ़ जाती है और तीन-अंकीय न रहने वाली रचनाएँ भी गिन ली जाती हैं।
- यह छिपी शर्त छोड़ देना कि प्रथम और तृतीय अंक का योग नौ से अधिक नहीं हो सकता, क्योंकि दस या उससे बड़ा 'अंक' होता ही नहीं।
- शर्त की दिशा उलट देना — यह मान लेना कि प्रथम और तृतीय का योग मध्य अंक के बजाय किसी और राशि के बराबर है, या मध्य अंक को स्वतंत्र रूप से चुनने लगना।
- तीनों अंकों को स्वतंत्र मानकर गिनना; यहाँ केवल दो अंक स्वतंत्र हैं और तीसरा उन्हीं का परिणाम है, इसलिए गिनती दो ही चरों पर चलती है।
अंकों की रचना पर आधारित प्रश्न इस परीक्षा में तीन शक्लों में आते हैं। पहली शक्ल गिनती की है, जैसा यह प्रश्न है। दूसरी विभाज्यता की है, जिसमें कुछ अंक अज्ञात रखकर पूछा जाता है कि वे क्या हो सकते हैं। तीसरी स्थानीय मान की है, जिसमें अंकों को उलटने या बदलने पर संख्या में होने वाला परिवर्तन पूछा जाता है।
तीनों में एक ही तैयारी काम आती है : संख्या को उसके अंकों के रूप में लिख लीजिए और हर स्थान की सीमाएँ अलग से नोट कर लीजिए। तीन-अंकीय संख्या के लिए पहला अंक 1 से 9 तक और शेष 0 से 9 तक — यह पहली ही पंक्ति में लिख लेना चाहिए।
गिनती वाली शक्ल में आगे की विधि यही है कि किसी एक अंक को आधार बनाकर उसके हर मान पर शेष की संभावनाएँ गिनी जाएँ। यदि समय हो तो दूसरे अंक को आधार बनाकर वही गिनती दोहरा लीजिए; दो स्वतंत्र रास्तों का एक ही उत्तर देना पूरी पुष्टि है।
छोटे उदाहरण लिखकर देख लेना भी सहायक है — जैसे 110, 121, 132 — जिससे शर्त की दिशा पक्की हो जाती है।
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अभ्यास
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ऐसी कितनी तीन-अंकीय संख्याएँ हैं, जिनमें प्रत्येक संख्या का तृतीय अंक उसके प्रथम अंक और मध्य अंक के योगफल के बराबर है ?
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- (b)40
- (c)45
- (d)55
उत्तर(c) 45 — प्रथम अंक 1 से 9 तक और मध्य अंक 0 से आगे लिया जा सकता है, बशर्ते उनका योग नौ से अधिक न हो; प्रथम अंक 1 पर नौ, 2 पर आठ, इसी क्रम से 9 पर एक संभावना बनती है, और उनका योग 45 है।