तीन भिन्न धनात्मक पूर्णांक a, b और c इस प्रकार हैं कि b – a = c – b और a + b + c = 12 है । इस प्रकार के संभव समूहों (a, b, c) की अधिकतम संख्या क्या है ?
- (a)1
- (b)2
- (c)3
- (d)4
उत्तर
क्यों
सही उत्तर — C, (c) 3 — ऐसे तीन ही समूह संभव हैं।
पहले शर्त b – a = c – b का अर्थ समझिए। इसका सीधा अर्थ है कि तीनों संख्याएँ समांतर श्रेढ़ी में हैं, यानी बीच वाली संख्या पहली और तीसरी के ठीक बीचोबीच है। इसे पुनर्व्यवस्थित कीजिए : b – a = c – b ⟹ 2b = a + c।
अब वह चरण आता है जो पूरा प्रश्न खोल देता है। दूसरी शर्त कहती है a + b + c = 12। इसमें a + c के स्थान पर 2b रख दीजिए : 2b + b = 12, यानी 3b = 12 और b = 4।
यह कोई संयोग नहीं, बल्कि समांतर श्रेढ़ी का एक सामान्य गुण है, और उसे अलग से याद रखने योग्य है : विषम संख्या में पदों वाली किसी भी समांतर श्रेढ़ी का योग, पदों की संख्या और बीच वाले पद के गुणनफल के बराबर होता है। तीन पदों की श्रेढ़ी में इसीलिए योग सदा बीच वाले पद का तीन गुना होता है, और बीच वाला पद योग को तीन से भाग देकर एक ही पंक्ति में निकल आता है। यही कारण है कि यहाँ b सबसे पहले तय हुआ, a या c नहीं।
अब केवल यह देखना बचता है कि उसके दोनों ओर कितनी दूरी पर संख्याएँ रखी जा सकती हैं। सर्वनिष्ठ अंतर d मानिए, तो तीनों संख्याएँ 4 – d, 4 और 4 + d होंगी। दो शर्तें लगती हैं। पहली, तीनों भिन्न होनी चाहिए, इसलिए d शून्य नहीं हो सकता। दूसरी, तीनों धनात्मक पूर्णांक होनी चाहिए, इसलिए 4 – d कम से कम 1 होना चाहिए, यानी d अधिक से अधिक 3।
इसलिए d के संभव मान 1, 2 और 3 हैं, और तीनों समूह बनते हैं : (3, 4, 5), (2, 4, 6) और (1, 4, 7)। तीनों का योग जाँच लीजिए — बारह-बारह — और तीनों में अंतर बराबर है। इसलिए उत्तर 3 है।
एक बात पर रुकना ज़रूरी है, क्योंकि वह गिनती को दोगुना कर सकती थी। प्रश्न ने त्रिक को कोष्ठक में क्रमित रूप में छापा है, (a, b, c), और यदि क्रम को महत्व दिया जाए तो d ऋणात्मक भी हो सकता है — (5, 4, 3) भी b – a = c – b को पूरा करता है और उसका योग भी बारह है। उस पाठ पर उत्तर छह होता। पर प्रश्न 'समूह' शब्द का प्रयोग करता है, और समूह में क्रम का महत्व नहीं होता, इसलिए वही तीन संख्याएँ उलटे क्रम में रखकर अलग नहीं गिनी जातीं। विकल्प-सूची इसी पाठ की पुष्टि भी कर देती है : उसमें छह है ही नहीं, अधिकतम चार तक जाती है। जहाँ पाठ में दुविधा हो, वहाँ विकल्प प्रायः यह बता देते हैं कि परीक्षक किस पाठ पर चल रहा है।
अन्य विकल्प क्यों गलत हैं
- (a)1 — एक समूह तब गिना जाता है जब केवल लगातार संख्याओं वाला उदाहरण दिखे — (3, 4, 5) — और यह न सूझे कि सर्वनिष्ठ अंतर एक से बड़ा भी हो सकता है। समांतर श्रेढ़ी की शर्त केवल इतना कहती है कि दोनों अंतर बराबर हों; वह यह नहीं कहती कि अंतर एक ही हो। इसलिए (2, 4, 6) और (1, 4, 7) भी उतने ही वैध हैं — दोनों में अंतर क्रमशः दो और तीन है, दोनों ओर बराबर, और दोनों का योग बारह। इस भूल से बचने का तरीक़ा यही है कि हल को d के रूप में लिखा जाए और फिर d के सभी अनुमेय मान गिने जाएँ, न कि उदाहरण खोजकर संतोष कर लिया जाए।
- (b)2 — दो समूह तब निकलते हैं जब गिनती d = 2 पर रोक दी जाए और d = 3 वाला समूह छूट जाए। ऐसा प्रायः तब होता है जब सबसे छोटी संख्या के लिए मन में कोई अनकही सीमा मान ली जाए, जैसे यह कि वह दो से कम न हो। प्रश्न ऐसी कोई शर्त नहीं रखता; वह केवल इतना कहता है कि तीनों भिन्न धनात्मक पूर्णांक हों, और 1 भी धनात्मक पूर्णांक है। इसलिए (1, 4, 7) पूरी तरह वैध समूह है — तीनों भिन्न, तीनों धनात्मक, अंतर दोनों ओर तीन, और योग बारह। सीमाएँ प्रश्न से लीजिए, अपनी अपेक्षा से नहीं।
- (d)4 — चार समूह तब आते हैं जब d = 4 भी गिन लिया जाए, यानी (0, 4, 8)। यह समूह समांतर श्रेढ़ी की शर्त और योग की शर्त, दोनों पूरी करता है — इसीलिए यह जाल इतना आकर्षक है — पर वह तीसरी शर्त तोड़ देता है : प्रश्न धनात्मक पूर्णांक माँगता है, और शून्य धनात्मक नहीं होता। शून्य न धनात्मक है, न ऋणात्मक। यही एक शब्द d की ऊपरी सीमा 4 से घटाकर 3 कर देता है और उत्तर 4 से 3 पर ले आता है। इसलिए ऐसे प्रश्नों में 'धनात्मक', 'प्राकृत', 'पूर्ण' और 'भिन्न' जैसे शब्दों को रेखांकित कर लेना चाहिए; हर शब्द एक शर्त है।
अवधारणा
तीन संख्याओं के समांतर श्रेढ़ी में होने का एक बहुत उपयोगी परिणाम है : बीच वाली संख्या शेष दोनों का समांतर माध्य होती है। इसीलिए तीनों का योग सदा बीच वाली संख्या का तिगुना होता है।
इसी कारण ऐसे प्रश्नों में तीन अज्ञातों की आवश्यकता ही नहीं पड़ती। तीनों को a, b, c लिखने के बजाय b – d, b और b + d लिख लीजिए; योग निकालते ही d कट जाता है और केवल 3b बचता है। इस युक्ति से समीकरण एक ही रह जाता है।
इसके बाद काम गिनती का है, और वहाँ प्रश्न के हर विशेषण को शर्त की तरह पढ़ना पड़ता है। 'भिन्न' का अर्थ है d शून्य नहीं। 'धनात्मक' का अर्थ है सबसे छोटी संख्या कम से कम एक। 'पूर्णांक' का अर्थ है d भिन्नात्मक नहीं।
अंत में एक और भेद ध्यान देने योग्य है : क्या क्रम मायने रखता है। यदि क्रमित त्रिक गिने जाते, तो हर समूह दो बार आता — बढ़ते क्रम में और घटते क्रम में — और उत्तर छह होता। प्रश्न 'समूह' कहता है और उसके विकल्प भी चार से आगे नहीं जाते, इसलिए यहाँ अक्रमित गिनती ही अभीष्ट है।
इस प्रश्न में गणित थोड़ा है और पढ़ने की सावधानी अधिक। स्तंभ की एक ही पंक्ति में तीन शर्तें छिपी हैं — संख्याएँ भिन्न हों, धनात्मक पूर्णांक हों, और समांतर श्रेढ़ी में हों — और चौथी शर्त योग की है। चारों में से किसी एक को छोड़ देने पर उत्तर बदल जाता है, और चारों विकल्प ठीक इन्हीं चूकों के अनुरूप बने हैं।
यही इस प्रश्न को पढ़ाने योग्य बनाता है। विकल्प 1, 2, 3 और 4 केवल आस-पास के मान नहीं हैं; उनमें से हर एक किसी न किसी शर्त की अनदेखी का परिणाम है। इसलिए उत्तर निकालने के बाद यह जाँच लेना उपयोगी है कि आपने कौन-कौन सी शर्तें लगाईं।
छपाई पर भी ध्यान दीजिए। बीजीय शर्तें रोमन लिपि में, अपनी अलग पंक्ति में छपी हैं और उनमें हर चिह्न के दोनों ओर रिक्त स्थान है। ऋण चिह्न लंबे डैश के रूप में छपा है, हाइफ़न के रूप में नहीं। क्रमित त्रिक गोल कोष्ठकों में अल्पविराम के साथ दिया गया है।
समांतर श्रेढ़ी पर आधारित प्रश्न इस परीक्षा में नियमित रूप से आते हैं, कभी पदों का योग निकालने के रूप में और कभी इस तरह गिनती के रूप में।
मुख्य तथ्य
- b – a = c – b का अर्थ है कि तीनों संख्याएँ समांतर श्रेढ़ी में हैं, और उसे पुनर्व्यवस्थित करने पर 2b = a + c मिलता है।
- योग की शर्त में यही रखने पर 3b = 12 और b = 4 निकलता है — बीच वाली संख्या तुरंत तय हो जाती है।
- तीनों संख्याएँ 4 – d, 4 और 4 + d के रूप में लिखी जा सकती हैं, जहाँ d सर्वनिष्ठ अंतर है।
- भिन्न होने की शर्त से d शून्य नहीं हो सकता और धनात्मक होने की शर्त से 4 – d कम से कम 1 होना चाहिए, इसलिए d के मान 1, 2 और 3 हैं।
- तीनों समूह हैं (3, 4, 5), (2, 4, 6) और (1, 4, 7); शून्य वाला समूह (0, 4, 8) इसलिए नहीं गिना जाता कि शून्य धनात्मक नहीं होता।
आगे की तैयारी
सामान्य भ्रम
- सर्वनिष्ठ अंतर को केवल एक मान लेना और लगातार संख्याओं वाला अकेला उदाहरण (3, 4, 5) गिनकर रुक जाना; अंतर 2 और 3 भी चलते हैं।
- शून्य को धनात्मक मान लेना, जिससे d = 4 पर (0, 4, 8) भी गिना जाने लगता है और उत्तर एक अधिक हो जाता है; शून्य न धनात्मक है न ऋणात्मक।
- वही तीन संख्याएँ उलटे क्रम में रखकर अलग समूह गिन लेना; क्रम गिनने पर उत्तर छह होता, और विकल्प-सूची में छह है ही नहीं — यही बताता है कि परीक्षक किस पाठ पर चल रहा है।
- बीच वाले पद को अंत में निकालने की कोशिश करना; तीन पदों की समांतर श्रेढ़ी में योग सदा बीच वाले पद का तीन गुना होता है, इसलिए b सबसे पहले और एक ही पंक्ति में निकल आता है।
समांतर श्रेढ़ी पर इस परीक्षा में दो प्रकार के प्रश्न आते हैं। पहला प्रकार सूत्र-आधारित है — कोई पद या पदों का योग निकालना। दूसरा प्रकार यही है, जिसमें श्रेढ़ी की शर्त एक बाधा की तरह दी जाती है और उसके साथ कुछ और शर्तें जोड़कर संभावनाएँ गिनवाई जाती हैं।
दूसरे प्रकार में विधि लगभग हमेशा एक ही रहती है : पदों को माध्य और सर्वनिष्ठ अंतर के रूप में लिखिए, दी हुई समीकरण से माध्य निकालिए, और फिर बची हुई शर्तों से अंतर के अनुमेय मान गिनिए।
सबसे अधिक अंक यहीं कटते हैं कि कोई एक शर्त छूट जाती है। इसलिए स्तंभ पढ़ते समय हर विशेषण के नीचे रेखा खींच लेने की आदत डालिए — 'भिन्न', 'धनात्मक', 'पूर्णांक', 'क्रमागत' — और अंत में गिनते समय एक-एक करके जाँच लीजिए कि सबका पालन हुआ या नहीं।
अंत में सभी संभावनाएँ लिखकर देख लेना भी अच्छा रहता है, क्योंकि इस प्रकार के प्रश्नों में उनकी संख्या प्रायः बहुत कम होती है और लिख लेने से गिनती की भूल बचती है।
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- (b) 725
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समांतर श्रेढ़ी के पदों पर आधारित प्रश्न, जिसमें चुने हुए पदों के योग से पूरी श्रेढ़ी का योग निकालना होता है।
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- (a) 8
- (b) 9
- (c) 10
- (d) 11
उत्तर(c) 10
दी हुई शर्तों के भीतर सभी संभावनाएँ गिनने वाला प्रश्न, जो व्यवस्थित गिनती की वही आदत माँगता है।
अभ्यास
- practice — not a real PYQ
तीन भिन्न धनात्मक पूर्णांक समांतर श्रेढ़ी में हैं और उनका योग 18 है । ऐसे कितने समूह संभव हैं ?
- (a)3
- (b)4
- (c)5
- (d)6
उत्तर(c) 5 — योग बीच वाली संख्या का तिगुना होता है, इसलिए वह 6 है; संख्याएँ 6 – d, 6 और 6 + d हैं, और 6 – d कम से कम 1 होने से d के मान 1 से 5 तक हैं, यानी पाँच समूह।