यदि 2 फरवरी, 2025 को रविवार था, तो 1 फरवरी, 2024 को कौन-सा दिन था ?
- (a)शनिवार
- (b)सोमवार
- (c)बृहस्पतिवार
- (d)शुक्रवार
उत्तर
क्यों
सही उत्तर — C, (c) बृहस्पतिवार — 1 फरवरी, 2024 को बृहस्पतिवार था।
पहले यह देख लीजिए कि दोनों तिथियों में दो चीज़ें अलग हैं — दिनांक भी और वर्ष भी। इसलिए केवल एक दिन पीछे हटना पर्याप्त नहीं; पूरे अंतराल के दिन गिनने पड़ेंगे।
अंतराल दो टुकड़ों में गिनिए। पहला टुकड़ा 1 फरवरी, 2024 से 1 फरवरी, 2025 तक का पूरा वर्ष है। दूसरा टुकड़ा उसके बाद का एक दिन, यानी 2 फरवरी, 2025 तक।
यहीं वह चरण आता है जो उत्तर तय करता है : पहला टुकड़ा 365 दिन का नहीं, 366 दिन का है। कारण यह कि 2024 एक अधिवर्ष है — वह चार से विभाज्य है और शताब्दी वर्ष नहीं — इसलिए उसमें 29 फरवरी आती है, और वह तिथि इसी अंतराल के भीतर पड़ती है, क्योंकि अंतराल 1 फरवरी, 2024 से आरंभ होकर 2025 तक जाता है।
इस बिंदु पर एक बात रेखांकित कर लीजिए, क्योंकि इसी पर ऐसे प्रश्न सबसे अधिक बिगड़ते हैं। असली शर्त यह नहीं है कि वर्ष अधिवर्ष है या नहीं; असली शर्त यह है कि 29 फरवरी अंतराल के भीतर पड़ती है या नहीं। यही अंतराल यदि 1 मार्च, 2024 से 1 मार्च, 2025 तक होता, तो 2024 के अधिवर्ष होते हुए भी उसमें 29 फरवरी नहीं आती — वह आरंभ से पहले ही बीत चुकी होती — और अंतराल 365 दिन का ही रहता। इसलिए हर बार यह पूछिए कि 29 फरवरी कहाँ पड़ रही है, न कि केवल यह कि वर्ष कौन-सा है।
अब सप्ताह के चक्र में लौटिए। सप्ताह सात दिन का है, इसलिए दिनों की गिनती में केवल सात से भाग देने पर बचा शेष महत्व रखता है; उसी शेष को विषम दिन कहते हैं। साधारण वर्ष में 365 दिन होते हैं और 365 को सात से भाग देने पर 1 शेष बचता है, इसलिए साधारण वर्ष में 1 विषम दिन; अधिवर्ष में 366 दिन और शेष 2, इसलिए 2 विषम दिन। यहाँ पहला टुकड़ा अधिवर्ष का दिन समेटे हुए है, इसलिए 2 विषम दिन, और उसके बाद का एक दिन जोड़कर कुल 3 विषम दिन।
इसे सीधे भी जाँच लीजिए : कुल दिन 366 + 1 = 367, और 364 पूरे बावन सप्ताह हैं, इसलिए 367 में शेष भी 3 ही बचते हैं। दोनों रास्ते एक ही उत्तर पर आते हैं।
अर्थ यह हुआ कि 2 फरवरी, 2025 का दिन, 1 फरवरी, 2024 के दिन से तीन दिन आगे है। चूँकि हमें पहले वाली तिथि निकालनी है, इसलिए पीछे लौटना होगा। रविवार से तीन दिन पीछे लौटिए — शनिवार, शुक्रवार, बृहस्पतिवार। इसलिए उत्तर बृहस्पतिवार है।
जाँच : बृहस्पतिवार में तीन दिन जोड़िए — शुक्रवार, शनिवार, रविवार। यही प्रश्न में दिया गया दिन है।
अन्य विकल्प क्यों गलत हैं
- (a)शनिवार — शनिवार तब निकलता है जब दोनों तिथियों को एक ही वर्ष का मान लिया जाए और केवल एक दिन पीछे हटा जाए — रविवार से एक दिन पीछे शनिवार। पर स्तंभ में वर्ष भी बदल रहा है : एक तिथि 2025 की है और दूसरी 2024 की। इसीलिए इस प्रश्न में सबसे पहले दोनों तिथियाँ पूरी लिखकर देख लेनी चाहिए कि दिनांक और वर्ष, दोनों में से क्या-क्या बदला है। यहाँ दोनों बदले हैं, इसलिए अंतराल एक दिन का नहीं, तीन सौ सड़सठ दिन का है। इस चूक का पता जाँच से तुरंत चल जाता है : शनिवार में तीन दिन जोड़ने पर मंगलवार आता है, रविवार नहीं।
- (b)सोमवार — सोमवार भी उसी एक दिन वाली चूक से आता है, बस दिशा उलटी हो जाती है — रविवार से एक दिन आगे सोमवार। दिशा तय करने का नियम सीधा है : जो तिथि पहले आती है उसका दिन निकालना हो तो ज्ञात दिन से पीछे लौटना पड़ता है, और जो बाद में आती है उसका निकालना हो तो आगे बढ़ना पड़ता है। यहाँ 1 फरवरी, 2024 पहले की तिथि है, इसलिए रविवार से पीछे जाना है, आगे नहीं। जाँच फिर वही है : सोमवार में तीन विषम दिन जोड़ने पर बृहस्पतिवार आता है, रविवार नहीं, इसलिए यह मान दी हुई सूचना से मेल ही नहीं खाता।
- (d)शुक्रवार — शुक्रवार सबसे निकट का जाल है, क्योंकि इसमें विधि पूरी तरह सही होती है और केवल एक तथ्य छूट जाता है — अधिवर्ष। यदि पूरे वर्ष को 365 दिन मान लिया जाए तो कुल दिन 366 होंगे, जिनमें विषम दिन 2 बचते हैं, और रविवार से दो दिन पीछे शुक्रवार आ जाता है। पर 2024 चार से विभाज्य है और शताब्दी वर्ष नहीं, इसलिए वह अधिवर्ष है, और 29 फरवरी, 2024 ठीक इसी अंतराल के भीतर पड़ती है। वही एक अतिरिक्त दिन विषम दिनों को 2 से 3 कर देता है और उत्तर को शुक्रवार से बृहस्पतिवार पर ले जाता है। इसीलिए ऐसे प्रश्नों में सबसे पहले यह देखना चाहिए कि 29 फरवरी अंतराल के भीतर आती है या नहीं।
अवधारणा
कैलेंडर के प्रश्नों की पूरी विधि एक ही विचार पर टिकी है : सप्ताह सात दिन का चक्र है, इसलिए दिनों की संख्या को सात से भाग देने पर जो शेष बचता है, वही दिन आगे या पीछे खिसकाता है। इस शेष को विषम दिन कहते हैं।
इससे दो उपयोगी परिणाम निकलते हैं। साधारण वर्ष में 365 दिन होते हैं और 365 को सात से भाग देने पर शेष 1 बचता है, इसलिए साधारण वर्ष में एक विषम दिन होता है — कोई तिथि अगले वर्ष एक दिन आगे खिसक जाती है। अधिवर्ष में 366 दिन होते हैं और शेष 2 बचता है, इसलिए दो विषम दिन होते हैं।
अधिवर्ष का नियम भी साथ ही याद रखिए : जो वर्ष चार से विभाज्य हो वह अधिवर्ष है, पर शताब्दी वर्ष तभी अधिवर्ष होता है जब वह चार सौ से भी विभाज्य हो। इसीलिए 1900 अधिवर्ष नहीं था और 2000 था।
सबसे महत्वपूर्ण सावधानी यह है कि अधिवर्ष का अतिरिक्त दिन तभी गिना जाता है जब 29 फरवरी अंतराल के भीतर पड़े। केवल यह देख लेना कि वर्ष अधिवर्ष है, पर्याप्त नहीं — तिथियों की स्थिति भी देखनी पड़ती है।
कैलेंडर के प्रश्न तार्किक विवेचन के खंड की एक स्थिर श्रेणी हैं, और उनका सबसे आम रूप यही है : एक तिथि का दिन देकर दूसरी तिथि का दिन पूछना।
इस विशेष प्रश्न को कठिन बनाने वाली बात यह है कि दी हुई और पूछी गई तिथियाँ दोनों ही बातों में भिन्न हैं — दिनांक में भी और वर्ष में भी। यदि दोनों का दिनांक एक होता तो हिसाब केवल वर्ष के विषम दिनों का रह जाता; और यदि वर्ष एक होता तो केवल दिनांक का अंतर गिनना पड़ता। यहाँ दोनों को जोड़ना पड़ता है, और यही परीक्षक की मंशा है।
दूसरी विशेषता अधिवर्ष की स्थिति है। पूछी गई तिथि फरवरी की पहली है, यानी अधिवर्ष के 29 फरवरी से पहले; और दी हुई तिथि अगले वर्ष की फरवरी की दूसरी है, यानी उसके बाद। इसलिए 29 फरवरी ठीक बीच में पड़ती है और गिनी जाएगी। यदि तिथियाँ मार्च की होतीं तो स्थिति बदल सकती थी।
विकल्पों में एक बात दर्ज करने योग्य है : बृहस्पतिवार दीर्घ रूप में छपा है, गुरुवार के रूप में नहीं।
मुख्य तथ्य
- सप्ताह सात दिन का चक्र है, इसलिए दिनों की कुल संख्या को सात से भाग देने पर बचा हुआ शेष ही दिन खिसकाता है; इसी शेष को विषम दिन कहते हैं।
- 1 फरवरी, 2024 से 2 फरवरी, 2025 तक कुल 367 दिन हैं — 366 दिन का पूरा वर्ष और उसके बाद का एक दिन।
- 367 को सात से भाग देने पर शेष 3 बचता है, इसलिए बाद वाली तिथि का दिन पहली तिथि के दिन से तीन दिन आगे है।
- 2024 अधिवर्ष है क्योंकि वह चार से विभाज्य है और शताब्दी वर्ष नहीं; 29 फरवरी, 2024 इसी अंतराल के भीतर पड़ती है, इसलिए वह दिन गिना जाएगा।
- शताब्दी वर्ष तभी अधिवर्ष होता है जब वह चार सौ से विभाज्य हो — इसीलिए 1900 अधिवर्ष नहीं था और 2000 था।
आगे की तैयारी
सामान्य भ्रम
- दोनों तिथियों को एक ही वर्ष का मान लेना और केवल दिनांक का अंतर गिनना; यहाँ दिनांक और वर्ष दोनों अलग हैं, इसलिए पूरा अंतराल गिनना पड़ता है।
- दिशा उलट देना; पहले आने वाली तिथि का दिन निकालने के लिए ज्ञात दिन से पीछे लौटना पड़ता है, आगे नहीं — यही चूक रविवार से तीन आगे जाकर बुधवार दे देती है।
- अधिवर्ष की परख को वर्ष पर लगा देना, अंतराल पर नहीं; असली प्रश्न यह है कि 29 फरवरी अंतराल के भीतर पड़ रही है या नहीं। 1 मार्च 2024 से 1 मार्च 2025 का अंतराल 2024 के अधिवर्ष होते हुए भी 365 दिन का ही है।
- विषम दिनों की गिनती में सप्ताह के गुणज को शेष मान लेना; 364 पूरे बावन सप्ताह हैं और शेष उसी के ऊपर गिना जाता है।
कैलेंडर के प्रश्न तीन शक्लों में आते हैं। पहली शक्ल वही है जो यहाँ है — एक तिथि का दिन देकर दूसरी का पूछना। दूसरी शक्ल में कोई तिथि देकर सीधे उसका दिन पूछा जाता है, बिना कोई संदर्भ दिए। तीसरी शक्ल में पूछा जाता है कि किसी वर्ष का कैलेंडर किस दूसरे वर्ष के कैलेंडर से मिलेगा।
पहली शक्ल का हल तीन चरणों में होता है : दोनों तिथियों के बीच कुल दिन गिनिए, उन्हें सात से भाग देकर विषम दिन निकालिए, और फिर दिशा तय करके दिन खिसकाइए। तीनों चरणों में सबसे अधिक भूल पहले चरण में होती है, और उसका कारण लगभग हमेशा अधिवर्ष ही होता है।
इसलिए एक आदत बना लीजिए : गिनती शुरू करने से पहले पूछिए कि अंतराल में कोई 29 फरवरी आती है या नहीं। यदि आती है तो एक दिन अलग से जोड़ लीजिए।
और अंत में जाँच अवश्य कीजिए। निकाले हुए दिन में उतने ही विषम दिन जोड़कर देखिए कि प्रश्न में दिया गया दिन वापस आ रहा है या नहीं। यह जाँच दिशा की भूल भी पकड़ लेती है और गिनती की भी।
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अभ्यास
- practice — not a real PYQ
यदि 1 मार्च, 2024 को शुक्रवार था, तो 1 मार्च, 2025 को कौन-सा दिन होगा ?
- (a)शुक्रवार
- (b)शनिवार
- (c)रविवार
- (d)बृहस्पतिवार
उत्तर(b) शनिवार — 1 मार्च, 2024 से 1 मार्च, 2025 का अंतराल 29 फरवरी के बाद से आरंभ होता है, इसलिए उसमें कोई अधिवर्ष-दिन नहीं आता और वह 365 दिन का है; 365 को सात से भाग देने पर शेष 1 बचता है, इसलिए दिन एक आगे खिसककर शनिवार हो जाता है।