एक व्यवसाय में, A, B और C ने 2 : 3 : 5 के अनुपात में निवेश किया, परन्तु अंत में उन सभी ने समान लाभ अर्जित किया । यदि लाभ, राशि के साथ-साथ निवेश की अवधि के समानुपातिक है, तो उनके निवेश की अवधि का अनुपात क्या होगा ?
- (a)5 : 3 : 2
- (b)2 : 3 : 5
- (c)10 : 15 : 6
- (d)15 : 10 : 6
उत्तर
क्यों
सही उत्तर — D, (d) 15 : 10 : 6 — निवेश की अवधियों का अनुपात यही होगा।
प्रश्न स्वयं नियम दे देता है : लाभ राशि के साथ-साथ अवधि के भी समानुपाती है। इसका अर्थ है कि किसी साझेदार का लाभ उसकी राशि और उसकी अवधि के गुणनफल पर निर्भर करता है। इसी गुणनफल को साझेदारी में पूँजी-मास कहा जाता है, और साझेदारी के लगभग सारे प्रश्न इसी एक राशि के इर्द-गिर्द घूमते हैं।
अब वह चरण, जो उत्तर तय करता है : तीनों ने समान लाभ अर्जित किया, इसलिए तीनों का राशि गुणा अवधि बराबर होना चाहिए। राशियाँ 2, 3 और 5 के अनुपात में हैं, इसलिए 2 × t1 = 3 × t2 = 5 × t3।
जब गुणनफल समान हो तो अवधियाँ राशियों के व्युत्क्रमानुपाती हो जाती हैं : t1 : t2 : t3 = 1⁄2 : 1⁄3 : 1⁄5।
इन तीनों भिन्नों को पूर्णांक में बदलने के लिए 2, 3 और 5 के लघुत्तम समापवर्त्य 30 से गुणा कीजिए : (1⁄2)×30 = 15, (1⁄3)×30 = 10, (1⁄5)×30 = 6।
इसलिए अनुपात 15 : 10 : 6 हुआ।
एक छोटा-सा रास्ता भी है, जो भिन्न और लघुत्तम समापवर्त्य दोनों बचा देता है और परीक्षा में समय बचाता है। जब तीन राशियाँ a : b : c के अनुपात में हों और लाभ बराबर हो, तो अवधियाँ हमेशा bc : ca : ab के अनुपात में होती हैं — यानी हर पद के लिए शेष दो का गुणनफल लीजिए। यहाँ 2 : 3 : 5 के लिए यह होगा 3×5 : 5×2 : 2×3, यानी 15 : 10 : 6, सीधे। कारण वही है : प्रत्येक को abc से गुणा कर देने पर 1⁄a, 1⁄b, 1⁄c ठीक इन्हीं गुणनफलों में बदल जाते हैं।
जाँच सबसे सरल है और इस प्रश्न में सबसे उपयोगी भी : राशि और अवधि का गुणनफल तीनों के लिए निकालिए — 2×15 = 30, 3×10 = 30, 5×6 = 30। तीनों बराबर, इसलिए तीनों का लाभ भी बराबर होगा, जैसा प्रश्न कहता है।
यही जाँच शेष विकल्पों पर लगाइए तो वे तुरंत गिरते हैं, और यह देखना उपयोगी है कि वे किस तरह गढ़े गए हैं। विकल्प (b) स्तंभ का अपना ही अनुपात लौटा देता है — उससे गुणनफल 4, 9, 25 बनते हैं, जो बराबर नहीं। विकल्प (c) में वही तीन संख्याएँ हैं जो सही उत्तर में हैं, पर पहले दो पद आपस में बदले हुए; उससे गुणनफल 20, 45, 30 बनते हैं। और (a) केवल दिए हुए अनुपात को उलटकर रख देता है, जो व्युत्क्रमानुपात नहीं होता — अनुपात उलटना और हर पद का व्युत्क्रम लेना दो अलग क्रियाएँ हैं, और यही इस प्रश्न का सबसे बड़ा जाल है।
अन्य विकल्प क्यों गलत हैं
- (a)5 : 3 : 2 — यह सबसे आम जाल है, क्योंकि यहाँ 'व्युत्क्रम' शब्द को उलटा क्रम समझ लिया जाता है। 2 : 3 : 5 को उलटकर 5 : 3 : 2 लिख देना व्युत्क्रमानुपात नहीं है; व्युत्क्रमानुपात का अर्थ है प्रत्येक पद का प्रतिलोम लेना, यानी 1⁄2 : 1⁄3 : 1⁄5, जो 15 : 10 : 6 बनता है। अंतर देखने का सबसे साफ़ तरीक़ा वही गुणनफल की जाँच है : इस विकल्प पर राशि गुणा अवधि निकालिए तो 2×5 = 10, 3×3 = 9 और 5×2 = 10 आता है। तीनों बराबर नहीं हैं, इसलिए तीनों का लाभ भी बराबर नहीं होगा और प्रश्न की मूल शर्त ही टूट जाती है।
- (b)2 : 3 : 5 — यह विकल्प स्तंभ का अपना अनुपात ज्यों का त्यों दोहरा देता है, यानी यह मान लेता है कि जिसने अधिक राशि लगाई उसने अधिक समय भी दिया। यह ठीक उलटी दिशा है। जब लाभ राशि और अवधि दोनों के समानुपाती हो और लाभ सबका बराबर हो, तो अधिक राशि लगाने वाले को कम समय ही देना पड़ेगा — तभी दोनों का गुणनफल बराबर बैठेगा। गुणनफल की जाँच इसे तुरंत काट देती है : 2×2 = 4, 3×3 = 9 और 5×5 = 25 — तीनों बहुत असमान। यह विकल्प इसलिए रखा गया है कि जल्दबाज़ी में स्तंभ का परिचित अनुपात ही उत्तर जैसा लगने लगता है।
- (c)10 : 15 : 6 — इस विकल्प में सही अनुपात के पहले दो पद आपस में बदल गए हैं — 15 : 10 : 6 के स्थान पर 10 : 15 : 6। यह भूल तब होती है जब भिन्नों को पूर्णांक बनाते समय क्रम पर ध्यान न रहे : 1⁄2 सबसे बड़ी भिन्न है, इसलिए उसी से सबसे बड़ा पद 15 बनना चाहिए, और वह पहले साझेदार का है, जिसकी राशि सबसे कम है। यहाँ भी गुणनफल की जाँच निर्णय कर देती है : 2×10 = 20, 3×15 = 45 और 5×6 = 30 — तीनों अलग-अलग। ध्यान दीजिए कि यह विकल्प और सही विकल्प एक ही तीन संख्याओं से बने हैं, इसलिए यहाँ अंकों का क्रम ही पूरा अंतर है।
अवधारणा
साझेदारी के प्रश्नों की पूरी नींव एक ही राशि पर टिकी है : पूँजी और उसके लगे रहने का समय, दोनों का गुणनफल। इसी को पूँजी-मास कहते हैं, और लाभ इसी अनुपात में बाँटा जाता है।
इससे दो स्थितियाँ बनती हैं। यदि सबकी अवधि समान हो तो समय एक उभयनिष्ठ गुणक बनकर कट जाता है और लाभ केवल पूँजी के अनुपात में बँटता है — यही सरल साझेदारी है। यदि अवधियाँ भिन्न हों तो हर साझेदार के लिए पूँजी और अवधि का गुणनफल अलग से निकालना पड़ता है, जिसे मिश्रित साझेदारी कहते हैं।
यह प्रश्न इसी नियम को उल्टी दिशा में चलाता है। यहाँ लाभ का अनुपात दिया है — बराबर-बराबर — और पूँजी का अनुपात भी दिया है; निकालनी अवधि है। जब गुणनफल स्थिर रखना हो तो दो राशियाँ व्युत्क्रमानुपाती हो जाती हैं।
व्युत्क्रमानुपात को ठीक-ठीक समझ लेना यहाँ निर्णायक है। a : b : c का व्युत्क्रमानुपात 1⁄a : 1⁄b : 1⁄c होता है, जिसे लघुत्तम समापवर्त्य से गुणा करके पूर्णांक में लाया जाता है। यह c : b : a नहीं होता — दोनों केवल तभी संयोग से मिलते हैं जब पद विशेष प्रकार के हों।
साझेदारी के प्रश्न इस परीक्षा के अंकगणित खंड में नियमित रूप से आते हैं, और लेखाशास्त्र के खंड से उनका सीधा संबंध भी है, क्योंकि साझेदारी फ़र्म में लाभ का बँटवारा वहीं का विषय है।
व्यावहारिक अर्थ भी समझने योग्य है। यदि तीन लोग अलग-अलग राशि लगाकर बराबर लाभ चाहते हैं, तो कम राशि लगाने वाले को अधिक समय तक निवेश बनाए रखना होगा। यहाँ पहले साझेदार की राशि सबसे कम है, इसलिए उसकी अवधि सबसे लंबी — पंद्रह इकाइयाँ — और तीसरे की राशि सबसे अधिक है, इसलिए उसकी अवधि सबसे छोटी, छह इकाइयाँ।
प्रश्न की रचना में एक बात विशेष है : विकल्प (c) और (d) एक ही तीन संख्याओं को अलग-अलग क्रम में रखते हैं, और विकल्प (b) स्तंभ का ही अनुपात दोहरा देता है। इसका अर्थ है कि परीक्षक गणना नहीं, क्रम और दिशा की समझ परख रहा है। ऐसे प्रश्नों में उत्तर लिखने से पहले यह पूछ लेना चाहिए कि कौन-सा पद किस साझेदार का है।
अनुपात यहाँ पुस्तिका की शैली में, दोनों कोलनों के आसपास रिक्त स्थान के साथ छपे हैं।
मुख्य तथ्य
- साझेदारी में लाभ पूँजी और अवधि के गुणनफल के अनुपात में बँटता है; इसी गुणनफल को पूँजी-मास कहते हैं।
- लाभ बराबर होने का अर्थ है कि तीनों के लिए पूँजी गुणा अवधि बराबर है, इसलिए अवधियाँ पूँजी के व्युत्क्रमानुपाती हो जाती हैं।
- 2 : 3 : 5 का व्युत्क्रमानुपात 1⁄2 : 1⁄3 : 1⁄5 है, जिसे 30 से गुणा करने पर 15 : 10 : 6 बनता है।
- व्युत्क्रमानुपात लेने का अर्थ हर पद का प्रतिलोम लेना है, पदों का क्रम उलट देना नहीं — 5 : 3 : 2 व्युत्क्रमानुपात नहीं है।
- जाँच का सबसे सरल तरीक़ा यह है कि हर साझेदार के लिए पूँजी गुणा अवधि निकाला जाए; सही उत्तर पर तीनों 30 आते हैं।
आगे की तैयारी
सामान्य भ्रम
- व्युत्क्रमानुपात के स्थान पर अनुपात को केवल उलट देना — 2 : 3 : 5 का उल्टा 5 : 3 : 2 है, पर व्युत्क्रम 1⁄2 : 1⁄3 : 1⁄5 है, और ये दो अलग क्रियाएँ हैं। यही इस प्रश्न का मुख्य जाल है।
- स्तंभ में दिया गया पूँजी का अनुपात ही उत्तर मान लेना, जिससे लाभ बराबर होने की शर्त टूट जाती है — जाँच लीजिए, तब गुणनफल 4, 9 और 25 बनते हैं, जो बराबर नहीं।
- भिन्नों को पूर्णांक बनाते समय पदों का क्रम बदल देना; विकल्प (c) में वही तीन संख्याएँ हैं जो सही उत्तर में हैं, केवल पहले दो पद आपस में बदले हुए।
- यह जाँच छोड़ देना कि राशि और अवधि का गुणनफल तीनों के लिए बराबर आता है या नहीं; यह एक पंक्ति की जाँच है और चारों विकल्पों में से तीन को तुरंत काट देती है।
साझेदारी के प्रश्न तीन दिशाओं में चलते हैं। सबसे आम दिशा यह है कि पूँजी और अवधि देकर लाभ का बँटवारा पूछा जाए। दूसरी दिशा में लाभ और पूँजी देकर अवधि पूछी जाती है, जैसा यहाँ हुआ है। तीसरी दिशा में लाभ और अवधि देकर पूँजी पूछी जाती है।
तीनों में एक ही सूत्र काम करता है, इसलिए उसे दिशा-रहित ढंग से याद रखिए : लाभ का अनुपात बराबर होता है पूँजी गुणा अवधि के अनुपात के। जो राशि पूछी गई हो, उसे इसी समीकरण से अलग कर लीजिए।
जहाँ लाभ बराबर हो वहाँ हल और भी छोटा हो जाता है, क्योंकि गुणनफल स्थिर रहता है और शेष दो राशियाँ व्युत्क्रमानुपाती हो जाती हैं। यह युक्ति अन्य जगह भी काम आती है — जैसे समान कार्य में व्यक्तियों की संख्या और लगने वाला समय।
अंतिम सुझाव वही है जो इस प्रश्न में सबसे तेज़ है : उत्तर चुनने से पहले हर विकल्प पर गुणनफल की जाँच कर लीजिए। एक पंक्ति में सही विकल्प अलग हो जाता है।
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- (a)4 : 5
- (b)5 : 4
- (c)16 : 25
- (d)25 : 16
उत्तर(b) 5 : 4 — लाभ बराबर होने से 4 × t1 = 5 × t2, इसलिए t1 : t2 = 1⁄4 : 1⁄5, जो 20 से गुणा करने पर 5 : 4 बनता है; जाँच में दोनों का गुणनफल 20-20 आता है।