एक सिनेमा हॉल में, तीन वर्गों की सीटें हैं : हीरा, स्वर्ण और रजत । सप्ताह के कार्य-दिवस को इन वर्गों में प्रति टिकट की कीमत क्रमशः ₹ 500, ₹ 300 और ₹ 200 है । परन्तु सप्ताहांत में यह कीमतें बढ़ाकर क्रमशः ₹ 800, ₹ 500 और ₹ 300 की जाती हैं । हॉल में हीरा सीटों की संख्या ठीक 10 है, जबकि रजत सीटों की संख्या स्वर्ण सीटों की संख्या से दोगुनी है । यदि हॉल सभी शो में पूरा भरा है, तो एक सप्ताहांत में निम्नलिखित में से प्रति शो अतिरिक्त कमाई कितनी है ?
- (a)₹ 20,000
- (b)₹ 23,000
- (c)₹ 26,000
- (d)₹ 30,000
उत्तर
क्यों
सही उत्तर — B, (b) ₹ 23,000 — पर यहाँ रास्ता सीधा नहीं है, और वही इस प्रश्न की असली सीख है।
पहले जो दिया है उसे लिखिए। हीरा सीटें ठीक 10 हैं। स्वर्ण सीटों की संख्या दी ही नहीं गई; उसे G मान लीजिए। रजत सीटें उसकी दोगुनी हैं, यानी 2G।
अब हर वर्ग में प्रति टिकट की बढ़ोतरी निकालिए : हीरा में 800 − 500 = 300, स्वर्ण में 500 − 300 = 200, और रजत में 300 − 200 = 100। ध्यान दीजिए कि 'अतिरिक्त कमाई' निकालने के लिए दोनों दिनों की पूरी कमाई अलग-अलग निकालकर घटाने की आवश्यकता नहीं; सीधे कीमतों का अंतर लेकर सीटों से गुणा कर देना पर्याप्त है, और इससे आधा काम बच जाता है। हॉल हर शो में पूरा भरता है, इसलिए एक शो की अतिरिक्त कमाई होगी 10 × 300 + G × 200 + 2G × 100 = 3000 + 200G + 200G = 3000 + 400G।
यहीं वह चरण आता है जो उत्तर तय करता है, और उसे साफ़-साफ़ कह देना चाहिए : यह प्रश्न अपने आँकड़ों से हल नहीं होता। G का मान कहीं दिया ही नहीं गया, इसलिए 3000 + 400G से कोई एक संख्या निकल ही नहीं सकती। जितनी स्वर्ण सीटें मान लीजिए, उतना ही उत्तर बदल जाएगा। ऐसे प्रश्न में विकल्प केवल उत्तर की सूची नहीं रह जाते; वे स्वयं एक अतिरिक्त शर्त बन जाते हैं, और हल विकल्पों में से होकर जाता है।
लुप्त शर्त वही है जो प्रश्न ने कहने की आवश्यकता नहीं समझी : सीटें गिनी जाती हैं, इसलिए G पूर्ण संख्या होगी। हर विकल्प में से 3000 घटाकर 400 से भाग दीजिए और देखिए कहाँ पूर्णांक बचता है : ₹ 20,000 पर G = 17,000 ⁄ 400 = 42·5; ₹ 23,000 पर G = 20,000 ⁄ 400 = 50; ₹ 26,000 पर G = 23,000 ⁄ 400 = 57·5; और ₹ 30,000 पर G = 27,000 ⁄ 400 = 67·5।
केवल एक विकल्प पूर्णांक देता है, और वही उत्तर है। ईमानदारी से यह भी जोड़ लीजिए कि उत्तर अकेला इसीलिए है कि चारों विकल्पों में से ठीक एक ही यह शर्त पूरी करता है; यदि दो विकल्प पूर्णांक देते तो प्रश्न का कोई निश्चित उत्तर होता ही नहीं। इसलिए यह गणना का प्रश्न कम और विकल्प-परीक्षण का प्रश्न अधिक है।
जाँच कर लीजिए। G = 50 लेने पर रजत सीटें 100 हुईं। कार्य-दिवस की कमाई 10×500 + 50×300 + 100×200 = ₹ 40,000, और सप्ताहांत की 10×800 + 50×500 + 100×300 = ₹ 63,000। अंतर ठीक ₹ 23,000।
अन्य विकल्प क्यों गलत हैं
- (a)₹ 20,000 — यह मान ठीक उतना है जितना सही उत्तर में से हीरा वर्ग का अंश निकाल देने पर बचता है — 23,000 में से 3,000 घटाकर 20,000। इसलिए यह प्रायः तब आता है जब हिसाब स्वर्ण और रजत तक सीमित रह जाए और हीरा सीटों की बढ़ोतरी जोड़ना छूट जाए, या हीरा की संख्या 10 को अनदेखा कर दिया जाए। व्यंजक 3000 + 400G में यह मान रखकर देखिए : 400G = 17,000 और G = 42·5 आता है, यानी आधी सीट, जो हो नहीं सकती। सीटों की संख्या पूर्णांक होनी ही चाहिए, और यही एक शर्त इस विकल्प को काट देती है।
- (c)₹ 26,000 — यह मान रखने पर 400G = 23,000 और G = 57·5 निकलता है — फिर आधी सीट, इसलिए यह भी असंभव है। ऐसे मान प्रायः तब बनते हैं जब बढ़ोतरी की गणना में कोई एक वर्ग खिसक जाए, जैसे रजत के लिए 100 के स्थान पर कोई और अंतर ले लिया जाए, या रजत सीटों को स्वर्ण की दोगुनी के बजाय बराबर मान लिया जाए। इस प्रश्न में सबसे भरोसेमंद जाँच यही है कि निकाला हुआ G पूर्णांक बने और उसे मूल आँकड़ों में रखकर दोनों दिनों की कमाई अलग-अलग निकालने पर वही अंतर लौट आए।
- (d)₹ 30,000 — यह सबसे बड़ा मान है और रखने पर 400G = 27,000 तथा G = 67·5 देता है, जो फिर पूर्णांक नहीं है। यह विकल्प तब भी आकर्षक लग सकता है जब कोई अतिरिक्त कमाई के स्थान पर कुल कमाई का कोई अंश निकाल ले, क्योंकि प्रश्न में दो दिनों की छह कीमतें दी गई हैं और भ्रम की गुंजाइश है। इसलिए पढ़ते समय यह रेखांकित कर लेना चाहिए कि 'अतिरिक्त कमाई' का अर्थ केवल बढ़ोतरी है, पूरी कमाई नहीं — यानी हर वर्ग में सप्ताहांत की कीमत में से कार्य-दिवस की कीमत घटाकर सीटों से गुणा करना है।
अवधारणा
इस प्रश्न में दो अलग-अलग बातें एक साथ सिखाई जा सकती हैं।
पहली अतिरिक्त कमाई की अवधारणा है। जब सब सीटें दोनों दिन भरती हैं तो पूरी कमाई दो बार निकालने की ज़रूरत नहीं; केवल प्रति टिकट की बढ़ोतरी को सीटों से गुणा कर देना पर्याप्त है। इससे हिसाब आधा हो जाता है और भूल की गुंजाइश घट जाती है।
दूसरी बात इससे बड़ी है : आँकड़ों की पूर्णता। यहाँ स्वर्ण सीटों की संख्या दी ही नहीं गई, इसलिए अतिरिक्त कमाई एक निश्चित संख्या नहीं, G पर निर्भर एक व्यंजक बनती है। ऐसे प्रश्न में विकल्प केवल उत्तर नहीं रह जाते; वे स्वयं एक अतिरिक्त शर्त बन जाते हैं।
काम इस प्रकार करता है : व्यंजक 3000 + 400G बनाइए, हर विकल्प को उसके बराबर रखिए, और देखिए कि G क्या निकलता है। सीटों की संख्या पूर्णांक और धनात्मक होनी चाहिए, इसलिए जो विकल्प भिन्नात्मक G देते हैं वे स्वतः कट जाते हैं। यही युक्ति गणित में कई जगह काम आती है — जब समाधान को किसी भौतिक शर्त का पालन करना हो, तो वही शर्त उत्तर चुन देती है।
इस प्रश्न की रचना पर एक बात दर्ज करने योग्य है : दिए हुए आँकड़ों से अकेले उत्तर नहीं निकलता। स्वर्ण सीटों की संख्या कहीं नहीं दी गई, और उसके बिना अतिरिक्त कमाई का कोई एक मान नहीं बनता। उत्तर तभी निकलता है जब विकल्पों को भी आँकड़े का हिस्सा मान लिया जाए और उनमें से वही चुना जाए जो सीटों की संख्या पूर्णांक बनाए।
यह किसी दोष का आरोप नहीं, प्रश्न पढ़ने की एक व्यावहारिक सलाह है। परीक्षा में ऐसे प्रश्न मिलते हैं, और वहाँ आँकड़े ढूँढ़ते रह जाना समय गँवाना होता है। जैसे ही लगे कि कोई राशि दी ही नहीं गई, उसे चर मानकर व्यंजक बना लीजिए और विकल्पों की ओर बढ़ जाइए।
स्तंभ की भाषा पर भी ध्यान दीजिए। तीन वर्गों की कीमतें दो बार 'क्रमशः' कहकर दी गई हैं, इसलिए कीमतों का क्रम अर्थपूर्ण है और उसे बदला नहीं जा सकता — पहली कीमत हीरा की, दूसरी स्वर्ण की और तीसरी रजत की। रुपये का चिह्न पुस्तिका में अंक से पहले, एक रिक्त स्थान के साथ छपा है, और हज़ार साधारण अल्पविराम से अलग किए गए हैं।
मुख्य तथ्य
- हीरा सीटें 10 दी गई हैं, पर स्वर्ण सीटों की संख्या कहीं नहीं दी गई; रजत सीटें उसकी दोगुनी हैं, इसलिए स्वर्ण को G मानने पर रजत 2G होंगी।
- प्रति टिकट बढ़ोतरी हीरा में ₹ 300, स्वर्ण में ₹ 200 और रजत में ₹ 100 है, इसलिए प्रति शो अतिरिक्त कमाई 3000 + 400G बनती है।
- चारों विकल्पों में से केवल ₹ 23,000 ही G को पूर्ण संख्या देता है, अर्थात् G = 50; शेष तीन आधी सीट का असंभव मान देते हैं।
- G = 50 पर रजत सीटें 100 होती हैं; कार्य-दिवस की कुल कमाई ₹ 40,000 और सप्ताहांत की ₹ 63,000 निकलती है, जिनका अंतर ₹ 23,000 है।
- जहाँ सब सीटें दोनों दिन भरती हों, वहाँ केवल प्रति टिकट की बढ़ोतरी को सीटों से गुणा कर देना पर्याप्त है — पूरी कमाई दो बार निकालने की आवश्यकता नहीं।
आगे की तैयारी
सामान्य भ्रम
- स्वर्ण सीटों की संख्या स्तंभ में ढूँढ़ते रह जाना; वह दी ही नहीं गई, और उसे चर मानकर विकल्पों से पूर्णांक की शर्त लगाना ही एकमात्र रास्ता है।
- 'अतिरिक्त कमाई' को कुल कमाई समझ लेना, जबकि पूछ केवल बढ़ोतरी की है — कीमतों का अंतर लेकर सीटों से गुणा करना पर्याप्त है।
- रजत सीटों को स्वर्ण के बराबर मान लेना, जबकि वे दोगुनी हैं और यही 400G का गुणांक बनाता है।
- आँकड़े अधूरे देखकर प्रश्न छोड़ देना; जहाँ एक चर शेष रह जाए और विकल्प संख्याएँ हों, वहाँ प्रायः कोई छिपी हुई शर्त — पूर्णांक होना, धनात्मक होना, किसी सीमा में होना — विकल्पों में से केवल एक को बचाती है।
कीमत और मात्रा वाले प्रश्न इस पेपर में नियमित रूप से आते हैं, और उनकी दो शक्लें सबसे आम हैं। पहली में सारे आँकड़े दिए होते हैं और केवल सावधानी से गुणा-जोड़ करना होता है। दूसरी में एक राशि जानबूझकर छोड़ दी जाती है, और यही वह शक्ल है जो यहाँ आई है।
दूसरी शक्ल का सामना करने का तरीक़ा यह है : छूटी हुई राशि को चर मानकर उत्तर का व्यंजक बनाइए, फिर देखिए कि उस चर पर कौन-सी स्वाभाविक शर्त लगती है। सीटों, व्यक्तियों, दिनों और वस्तुओं की गिनती में वह शर्त प्रायः यही होती है कि मान पूर्णांक और धनात्मक हो।
इसके बाद विकल्पों को व्यंजक में रखकर परखिए। यह विधि उल्टी लगती है, पर वस्तुनिष्ठ परीक्षा में पूरी तरह वैध है और अक्सर सबसे तेज़ भी।
अंत में जाँच अवश्य कीजिए : निकाले हुए चर को मूल आँकड़ों में रखकर दोनों स्थितियों की राशि अलग-अलग निकालिए और उनका अंतर मिलाइए। इससे गुणांक की कोई भूल तुरंत पकड़ में आ जाती है।
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उत्तर(c) 60 — प्रथम श्रेणी से अतिरिक्त कमाई 20 × 100 = ₹ 2,000 है, इसलिए द्वितीय श्रेणी से ₹ 3,000 आनी चाहिए; 3000 ÷ 50 = 60 सीटें।