निम्नलिखित में से कौन-सी उत्तर ध्रुवीय प्रदेश (आर्कटिक) में स्थायी तुषार भूमि (पर्माफ्रॉस्ट) के पिघलने से संबंधित प्रमुख पर्यावरणीय चिंता है ?
- (a)स्वदेशी समुदायों का विस्थापन
- (b)मीथेन और कार्बन डाइऑक्साइड का निकलना/निस्तार
- (c)आक्रामक प्रजातियों का फैलना
- (d)पराबैंगनी (UV) विकिरण में वृद्धि
उत्तर
क्यों
सही उत्तर — B, (b) मीथेन और कार्बन डाइऑक्साइड का निकलना/निस्तार — स्थायी तुषार भूमि के पिघलने की सबसे बड़ी पर्यावरणीय चिंता यही है, और उसका कारण यह है कि वह भूमि केवल जमी हुई मिट्टी नहीं, जमा हुआ कार्बन-भंडार है।
पहले परिभाषा स्पष्ट कर लीजिए, क्योंकि उसी से बाक़ी सब निकलता है। स्थायी तुषार भूमि वह भूमि है जो लगातार कम से कम दो वर्षों तक शून्य डिग्री सेल्सियस या उससे नीचे बनी रहे। उसके ऊपर एक पतली परत होती है जो हर गर्मी में पिघलती और हर जाड़े में जमती है, और उसे सक्रिय परत कहते हैं। तापमान बढ़ने पर यह सक्रिय परत गहरी होती जाती है, यानी वह सामग्री भी पिघलने लगती है जो सदियों से जमी हुई थी।
हज़ारों वर्षों से उत्तर ध्रुवीय प्रदेश में पेड़-पौधे और जीव मरकर मिट्टी में दबते रहे, पर ठंड के कारण उनका अपघटन कभी पूरा नहीं हुआ। इसलिए वहाँ कार्बनिक पदार्थ बिना गले-सड़े जमा होता चला गया, और वैज्ञानिक आकलनों के अनुसार उसमें वायुमंडल की वर्तमान कार्बन-मात्रा से भी अधिक कार्बन बँधा हुआ है।
पिघलने के साथ यह भंडार सूक्ष्मजीवों के लिए खुल जाता है, और यहाँ एक भेद ध्यान देने योग्य है, क्योंकि वही बताता है कि विकल्प में दो गैसों के नाम साथ क्यों हैं। जहाँ ऑक्सीजन उपलब्ध होती है — यानी सूखी, जल-निकास वाली भूमि में — वहाँ अपघटन वायवीय होता है और कार्बन डाइऑक्साइड निकलती है। जहाँ पिघलने से पानी भर जाता है और ऑक्सीजन नहीं पहुँचती — जैसे थर्मोकार्स्ट झीलों और दलदलों में — वहाँ अवायवीय अपघटन होता है और मीथेन बनती है। इसलिए एक ही प्रक्रिया, भूमि की जल-स्थिति के अनुसार, दो अलग-अलग गैसें देती है। दोनों ही हरितगृह गैसें हैं, और मीथेन की ऊष्मा रोकने की क्षमता कार्बन डाइऑक्साइड से कई गुना अधिक मानी जाती है — विशेषकर छोटी अवधि में, क्योंकि मीथेन वायुमंडल में अपेक्षाकृत जल्दी टूट जाती है और इसलिए बीस वर्ष की अवधि में उसका प्रभाव सौ वर्ष की अवधि की तुलना में कहीं अधिक दिखता है।
सबसे गंभीर बात इसका चक्रीय स्वरूप है। तापमान बढ़ने से तुषार भूमि पिघलती है, पिघलने से गैसें निकलती हैं, और गैसों से तापमान और बढ़ता है। इसी स्वप्रेरित चक्र को धनात्मक प्रतिपुष्टि कहते हैं, और यही इस समस्या को विश्वव्यापी बना देता है — गैसें वहाँ निकलती हैं, पर उनका प्रभाव पूरी पृथ्वी पर पड़ता है। शेष तीनों विकल्पों में कोई ऐसा नहीं जो इस तरह वापस अपने ही कारण को बढ़ाता हो, और यही (b) को 'प्रमुख' बनाता है।
अन्य विकल्प क्यों गलत हैं
- (a)स्वदेशी समुदायों का विस्थापन — यह परिणाम वास्तविक है और उसे कम करके नहीं आँकना चाहिए — यही इस प्रश्न का सबसे विवाद-योग्य विकल्प है। तुषार भूमि पिघलने पर उसके ऊपर टिकी हर चीज़ का आधार बैठ जाता है : ज़मीन धँसती है, मकान, सड़कें, हवाई पट्टियाँ और पाइपलाइनें टेढ़ी होकर टूटने लगती हैं, तट कटता है, और शिकार तथा बारहसिंगा-पालन पर टिके जीवन का ढर्रा बिगड़ जाता है। अनेक बस्तियों को इसी कारण हटाना पड़ा है। यानी यह विकल्प कोई गढ़ी हुई बात नहीं कहता; वह पिघलने का एक दर्ज और गंभीर परिणाम है। हमारा उत्तर इसे इसलिए नहीं लेता कि प्रश्न में एक विशेषण है, और वही विशेषण निर्णय करता है : 'प्रमुख पर्यावरणीय चिंता'। विस्थापन मानवीय और सामाजिक परिणाम है। वह पर्यावरण में हुए परिवर्तन के कारण घटित होता है, पर वह स्वयं पर्यावरण में हुआ परिवर्तन नहीं। पर्यावरणीय चिंता उस बदलाव को कहेंगे जो भौतिक तंत्र में ही होता है — गैसों का वायुमंडल में जाना, ताप-संतुलन का बदलना, पारिस्थितिकी का बदलना। जो अभ्यर्थी (a) की ओर खिंचता है वह प्रायः प्रश्न का 'पर्यावरणीय' शब्द पढ़े बिना केवल 'चिंता' पढ़ लेता है, और तब दोनों विकल्प बराबर लगने लगते हैं। पैमाने का अंतर भी इसी दिशा में जाता है। विस्थापन उन्हीं समुदायों तक सीमित है जो उस भूमि पर बसे हैं, जबकि जमा कार्बन का निकलना पूरे पृथ्वी-तंत्र को छूता है और स्वयं तापन को और बढ़ाकर उसी विस्थापन का कारण भी बनता रहता है। जहाँ एक विकल्प दूसरे का कारण हो, वहाँ 'प्रमुख' पूछे जाने पर उत्तर कारण होता है, परिणाम नहीं।
- (c)आक्रामक प्रजातियों का फैलना — उत्तर ध्रुवीय प्रदेश के गरम होने से दक्षिण की प्रजातियाँ उत्तर की ओर बढ़ रही हैं, और झाड़ियों तथा वृक्षों का टुंड्रा में फैलना दर्ज भी हुआ है। पर यह प्रक्रिया मुख्यतः तापमान बढ़ने का सामान्य परिणाम है, तुषार भूमि के पिघलने से बँधी हुई विशिष्ट चिंता नहीं। प्रश्न ठीक इसी विशिष्टता पर टिका है : वह पूछ रहा है कि पिघलने से जुड़ी प्रमुख चिंता क्या है, न कि उत्तर ध्रुवीय गरमाहट की कोई भी चिंता। इसके अलावा यह प्रभाव क्षेत्रीय पारिस्थितिकी तक सीमित है, जबकि जमा कार्बन का निकलना पूरे पृथ्वी-तंत्र के ताप-संतुलन को छूता है, इसलिए उसका स्थान इस सूची में सबसे ऊपर है।
- (d)पराबैंगनी (UV) विकिरण में वृद्धि — यह विकल्प बिलकुल दूसरी समस्या से उठाकर लाया गया है। पराबैंगनी विकिरण का बढ़ना समतापमंडल की ओज़ोन-परत के क्षय से जुड़ा है, और उस क्षय का कारण क्लोरोफ़्लोरो कार्बन तथा ऐसी ही अन्य गैसें हैं, जिन्हें मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल के अंतर्गत चरणबद्ध रूप से हटाया गया है। स्थायी तुषार भूमि के पिघलने से ओज़ोन-परत का कोई सीधा संबंध नहीं है। यह जाल इसलिए बनता है कि दोनों विषय 'वैश्विक पर्यावरण' के छाते के नीचे साथ-साथ पढ़ाए जाते हैं और अभ्यर्थी उन्हें एक-दूसरे से जोड़ लेता है। ओज़ोन-क्षय और वैश्विक तापन दो अलग समस्याएँ हैं, अलग कारणों और अलग संधियों वाली।
अवधारणा
स्थायी तुषार भूमि उस भूमि को कहते हैं जो लगातार कम से कम दो वर्ष तक शून्य डिग्री सेल्सियस या उससे नीचे बनी रहे। वह उत्तर ध्रुवीय प्रदेश के बड़े भाग में — साइबेरिया, अलास्का और कनाडा में — तथा ऊँचे पर्वतीय क्षेत्रों में मिलती है। ऊपर की एक पतली परत गर्मियों में पिघलकर फिर जम जाती है और उसे सक्रिय परत कहते हैं; उसके नीचे की भूमि वर्ष भर जमी रहती है।
इस भूमि का पर्यावरणीय महत्व उसमें बँधे कार्बन से है। ठंड ने वहाँ अपघटन रोक रखा है, इसलिए मरे हुए पौधों और जीवों का कार्बन वहीं जमा होता चला गया। जब तक भूमि जमी है, यह कार्बन वायुमंडल से बाहर बंद पड़ा है।
पिघलना इस बंदी को खोल देता है। सूक्ष्मजीव सक्रिय हो जाते हैं और अपघटन शुरू हो जाता है। ऑक्सीजन की उपस्थिति में कार्बन डाइऑक्साइड और उसकी अनुपस्थिति में मीथेन बनती है, और जलमग्न, दलदली भागों में दूसरी स्थिति ही बनती है।
पिघलने का एक भौतिक परिणाम भी है : बर्फ़ के पिघलने से भूमि की मात्रा घटती है और सतह असमान रूप से धँस जाती है, जिससे गड्ढे और झीलें बन जाती हैं।
यह विषय जलवायु परिवर्तन की चर्चा में इसलिए महत्वपूर्ण माना जाता है कि यह मनुष्य के नियंत्रण से बाहर जाने वाली प्रक्रियाओं का उदाहरण है। उत्सर्जन घटाना हमारे हाथ में है, पर एक बार तुषार भूमि बड़े पैमाने पर पिघलने लगे तो उससे निकलने वाली गैसें अपने-आप और गरमाहट पैदा करती हैं। ऐसी ही प्रक्रियाओं को जलवायु-विज्ञान में मोड़-बिंदु कहा जाता है।
उत्तर ध्रुवीय प्रदेश की एक और विशेषता यह है कि वह पृथ्वी के औसत से कहीं तेज़ गति से गरम हो रहा है। इसका एक कारण बर्फ़ का पिघलना ही है : सफ़ेद बर्फ़ सूर्य के प्रकाश को लौटा देती थी, और उसके हटते ही गहरा रंग वाली भूमि या समुद्र अधिक ऊष्मा सोखने लगते हैं। यह भी एक प्रतिपुष्टि चक्र है।
भारत के लिए यह विषय दूर का नहीं है। हिमालय के ऊँचे भागों में भी पर्वतीय तुषार भूमि है, और उसके पिघलने से ढलानों का अस्थिर होना तथा हिमनद-झीलों का ख़तरा बढ़ना जुड़े हुए विषय हैं।
मुख्य तथ्य
- स्थायी तुषार भूमि वह भूमि है जो लगातार कम से कम दो वर्ष तक शून्य डिग्री सेल्सियस या उससे नीचे बनी रहे; उसके ऊपर की गर्मियों में पिघलने वाली परत सक्रिय परत कहलाती है।
- ठंड के कारण वहाँ कार्बनिक पदार्थ का अपघटन रुका रहा, इसलिए उसमें वायुमंडल की वर्तमान कार्बन-मात्रा से भी अधिक कार्बन बँधा हुआ आँका जाता है।
- पिघलने पर ऑक्सीजन की उपस्थिति में कार्बन डाइऑक्साइड और जलमग्न, अवायवीय भागों में मीथेन बनती है — दोनों हरितगृह गैसें हैं।
- मीथेन की ऊष्मा रोकने की क्षमता सौ वर्ष की अवधि में कार्बन डाइऑक्साइड से कई गुना अधिक मानी जाती है, यद्यपि वह वायुमंडल में कम समय तक टिकती है।
- पराबैंगनी विकिरण का बढ़ना ओज़ोन-परत के क्षय से जुड़ा है, जिसका कारण क्लोरोफ़्लोरो कार्बन जैसी गैसें हैं — यह वैश्विक तापन से अलग समस्या है।
आगे की तैयारी
सामान्य भ्रम
- 'चिंता' पढ़कर 'पर्यावरणीय' शब्द छोड़ देना; विस्थापन एक वास्तविक और गंभीर परिणाम है, पर वह सामाजिक है, और वही एक शब्द दोनों विकल्पों को अलग खानों में रखता है।
- ओज़ोन-क्षय और वैश्विक तापन को एक समस्या मान लेना; पराबैंगनी विकिरण का बढ़ना क्लोरोफ़्लोरो कार्बन से जुड़ा है और उसका तुषार भूमि के पिघलने से कोई सीधा संबंध नहीं।
- अधिवर्षी गरमाहट के हर परिणाम को तुषार भूमि के पिघलने का परिणाम मान लेना; प्रजातियों का उत्तर की ओर बढ़ना तापमान का सामान्य परिणाम है, इस विशेष प्रक्रिया की चिंता नहीं।
- यह मान लेना कि पिघलने से केवल एक ही गैस निकलती है; भूमि सूखी हो तो वायवीय अपघटन से कार्बन डाइऑक्साइड और जल भर जाए तो अवायवीय अपघटन से मीथेन बनती है, और इसीलिए विकल्प में दोनों नाम साथ हैं।
पर्यावरण के प्रश्नों में 'प्रमुख' या 'मुख्य' जैसे शब्द निर्णायक होते हैं, क्योंकि विकल्पों में प्रायः एक से अधिक सच्चे परिणाम रख दिए जाते हैं और चुनाव महत्व के आधार पर करना पड़ता है। इसलिए पहले यह तय कीजिए कि प्रश्न किस कसौटी पर सबसे बड़ा परिणाम माँग रहा है — पर्यावरणीय, आर्थिक या सामाजिक।
दूसरा उपयोगी सूत्र यह है कि विकल्पों में से कोई एक प्रायः किसी दूसरी ही पर्यावरणीय समस्या से उठाकर रखा जाता है। यहाँ पराबैंगनी विकिरण वही भूमिका निभा रहा है। ऐसे विकल्प को पहचानकर तुरंत हटा देना चाहिए।
इसी विषय के अन्य रूप भी लौटते हैं : हरितगृह गैसों को उनकी तापन-क्षमता के क्रम में रखवाना, किसी प्रक्रिया को प्रतिपुष्टि चक्र के रूप में पहचानवाना, या कथन-सूची देकर उत्तर ध्रुवीय परिवर्तन के अलग-अलग परिणाम परखवाना।
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- (a) 1 only
- (b) 2 only
- (c) Both 1 and 2
- (d) Neither 1 nor 2
उत्तर(c) Both 1 and 2
भारत की जलवायु प्रतिबद्धताओं पर कथन-सूची वाला प्रश्न, जो इसी विषय का नीतिगत पक्ष जाँचता है।
अभ्यास
- practice — not a real PYQ
स्थायी तुषार भूमि के पिघलने को जलवायु तंत्र की धनात्मक प्रतिपुष्टि का उदाहरण क्यों माना जाता है ?
- (a)क्योंकि पिघलने से भूमि की उर्वरता बढ़ जाती है
- (b)क्योंकि पिघलने से निकली हरितगृह गैसें तापमान और बढ़ाती हैं, जिससे पिघलना और तेज़ हो जाता है
- (c)क्योंकि पिघली हुई भूमि सूर्य का प्रकाश अधिक लौटाने लगती है
- (d)क्योंकि पिघलने से समुद्र का जलस्तर घट जाता है
उत्तर(b) क्योंकि पिघलने से निकली हरितगृह गैसें तापमान और बढ़ाती हैं, जिससे पिघलना और तेज़ हो जाता है — प्रक्रिया का परिणाम उसी प्रक्रिया के कारण को बल देता है, और यही धनात्मक प्रतिपुष्टि की परिभाषा है।