निम्नलिखित कथनों में से कौन-सा वसीय अम्लों के संबंध में सही है ?
- (a)अधिकांश वसीय अम्लों के एक छोर पर कार्बोक्सिल समूह और दूसरे छोर पर मेथिल समूह विद्यमान होते हैं ।
- (b)संतृप्त वसीय अम्लों के कार्बन परमाणुओं के बीच द्वि-आबंधों (डबल बॉन्ड) की सम संख्या होती है ।
- (c)संतृप्त वसीय अम्लों के कार्बन परमाणुओं के बीच द्वि-आबंधों (डबल बॉन्ड) की विषम संख्या होती है ।
- (d)मोनोअसंतृप्त वसीय अम्लों में उतने हाइड्रोजन परमाणु विद्यमान हो सकते हैं, जितनी उनकी क्षमता हो ।
उत्तर
क्यों
सही उत्तर — A, (a) अधिकांश वसीय अम्लों के एक छोर पर कार्बोक्सिल समूह और दूसरे छोर पर मेथिल समूह विद्यमान होते हैं । — यही वसीय अम्ल की मूल बनावट है, और चारों विकल्पों में केवल यही कथन उस बनावट को ठीक-ठीक कहता है।
वसीय अम्ल कार्बन परमाणुओं की एक लंबी शृंखला है, जिसके एक सिरे पर कार्बोक्सिल समूह (–COOH) लगा होता है। वही सिरा अम्लीय गुण देता है और वहीं से यह अणु ग्लिसरॉल से जुड़कर वसा बनाता है। शृंखला का दूसरा सिरा सादा हाइड्रोकार्बन है और वह मेथिल समूह (–CH3) पर समाप्त होता है। इस तरह एक ही अणु के दो सिरे स्वभाव में विपरीत होते हैं — एक जल-स्नेही और ध्रुवीय, दूसरा जल-विरागी और अध्रुवीय — और यही द्वैत वसा तथा कोशिका-झिल्ली की पूरी रचना का आधार है।
इन दो सिरों का भेद केवल वर्णन की बात नहीं, नामकरण की जड़ है। पोषण में ओमेगा-3 और ओमेगा-6 जैसे नाम इसीलिए बनते हैं कि गिनती मेथिल वाले सिरे से शुरू की जाती है — ग्रीक वर्णमाला का अंतिम अक्षर ओमेगा उसी अंतिम कार्बन को दिया गया है, और अंक बताता है कि पहला द्वि-आबंध वहाँ से कितनी दूर है। यदि दूसरा सिरा मेथिल न होता तो यह पूरी नाम-पद्धति खड़ी ही न होती। रसायनज्ञ की गिनती इसके उलट कार्बोक्सिल सिरे से चलती है, और दोनों गिनतियों का साथ-साथ चलना ही 18:1 और ओमेगा-9 जैसे दो नामों को एक ही अणु का नाम बना देता है।
शेष तीनों विकल्प संतृप्तता के इर्द-गिर्द घूमते हैं, और उन्हें एक ही परिभाषा-शृंखला से काटा जा सकता है। संतृप्त वसीय अम्ल वह है जिसके कार्बनों के बीच एक भी द्वि-आबंध न हो — शृंखला हाइड्रोजन से पूरी तरह भरी हो। एकल-असंतृप्त में ठीक एक द्वि-आबंध होता है, और बहु-असंतृप्त में दो या अधिक। इस एक वाक्य से (b) और (c) दोनों उसी क्षण गिर जाते हैं, क्योंकि दोनों संतृप्त अणु में द्वि-आबंध गिनने चलते हैं जहाँ गिनती शून्य है; और (d) भी गिर जाता है, क्योंकि 'क्षमता भर हाइड्रोजन' संतृप्त अणु की परिभाषा है, एकल-असंतृप्त की नहीं।
एक बात और, क्योंकि परीक्षक ठीक उसी पर खेल रहा है : वसीय अम्लों में सम संख्या वाली बात सच है, पर वह कार्बन परमाणुओं के बारे में है, द्वि-आबंधों के बारे में नहीं। प्राकृतिक वसीय अम्लों में प्रायः कार्बनों की संख्या सम होती है — पामिटिक अम्ल में सोलह, स्टिऐरिक में अठारह — और इसका कारण यह है कि शरीर इन्हें दो-दो कार्बन के खंडों में जोड़कर बनाता है। विकल्प (b) इसी सच्ची बात को उठाकर ग़लत राशि पर चिपका देता है।
कथन (a) में 'अधिकांश' शब्द भी सोच-समझकर रखा गया है। कुछ असामान्य वसीय अम्ल ऐसे भी होते हैं जिनके दोनों सिरों पर कार्बोक्सिल समूह होता है, या जिनकी शृंखला में शाखा या वलय होता है। इसीलिए कथन को 'सभी' कहकर नहीं, 'अधिकांश' कहकर रखा गया है, और उसी सावधानी के कारण वह पूरी तरह सही बैठता है।
अन्य विकल्प क्यों गलत हैं
- (b)संतृप्त वसीय अम्लों के कार्बन परमाणुओं के बीच द्वि-आबंधों (डबल बॉन्ड) की सम संख्या होती है । — यह विकल्प इस प्रश्न का सबसे विवाद-योग्य विकल्प है, और उसे ऐसा ही माना जाना चाहिए। अक्षरशः पढ़िए तो कथन को सच सिद्ध किया जा सकता है : संतृप्त वसीय अम्ल में द्वि-आबंधों की संख्या ठीक शून्य होती है, और शून्य एक सम संख्या है — दो से विभाज्य, कोई शेष नहीं। इस पाठ पर 'संतृप्त वसीय अम्लों में द्वि-आबंधों की सम संख्या होती है' एक रिक्त रूप से सत्य वाक्य बन जाता है, और जो अभ्यर्थी यहाँ रुककर सोचता है वह सही सोच रहा है, ग़लत नहीं। फिर भी हमारा उत्तर (a) ही है, और कारण विकल्प-पत्र के भीतर ही मिल जाता है। परीक्षक ने (b) और (c) को जोड़े में रखा है — एक ही वाक्य, एक में 'सम' और दूसरे में 'विषम'। ऐसा जोड़ा बनाने का अर्थ ही यह है कि उससे किसी वास्तविक गिनती की सम-विषम प्रकृति पूछी जा रही है; यदि उत्तर 'शून्य सम है' होता तो (c) कोई विकल्प ही न होता, वह स्वतः असंभव होता, और परीक्षक जानबूझकर एक असंभव विकल्प के साथ एक रिक्त-सत्य विकल्प नहीं रखता। दूसरा कारण यह कि यह वाक्य पाठक के मन में जो चित्र बनाता है — संतृप्त अणु में दो, चार या छह द्वि-आबंध — वह चित्र सर्वथा ग़लत है, और एक कथन को 'सही' कहने का अर्थ उसका अभीष्ट अर्थ सही होना है, केवल उसका तार्किक रूप बच जाना नहीं। तीसरा और निर्णायक कारण तुलना का है। ऐसे प्रश्न में जहाँ केवल एक कथन सही ठहरना है, विकल्प (a) एक सकारात्मक, बिना शर्त सही रचनात्मक तथ्य कहता है, जबकि (b) अधिक से अधिक एक तकनीकी बचाव पर टिकता है। जहाँ एक विकल्प सीधे सही हो और दूसरा केवल रिक्त अर्थ में, वहाँ उत्तर पहला होता है।
- (c)संतृप्त वसीय अम्लों के कार्बन परमाणुओं के बीच द्वि-आबंधों (डबल बॉन्ड) की विषम संख्या होती है । — यह (b) का दर्पण-प्रतिबिंब है और उसी भूल का उल्टा रूप है। संतृप्त वसीय अम्ल में द्वि-आबंध होते ही नहीं, इसलिए उनकी संख्या विषम होने का प्रश्न ही नहीं उठता — विषम संख्या का अर्थ होगा कि कम से कम एक द्वि-आबंध है, और एक भी द्वि-आबंध आते ही अणु संतृप्त नहीं रह जाता, असंतृप्त हो जाता है। दोनों विकल्पों को साथ रखकर परीक्षक यह जाँचता है कि अभ्यर्थी सम और विषम में उलझ जाता है या यह पहचान लेता है कि गिनती शून्य है। जहाँ दो विकल्प एक ही कथन के दो विपरीत रूप हों, वहाँ प्रायः दोनों ही उस बात को छोड़ रहे होते हैं जो असल में पूछी जा रही है।
- (d)मोनोअसंतृप्त वसीय अम्लों में उतने हाइड्रोजन परमाणु विद्यमान हो सकते हैं, जितनी उनकी क्षमता हो । — यह कथन ठीक उलटी बात कहता है। जो वसीय अम्ल अपनी क्षमता भर हाइड्रोजन धारण करता है, वही संतृप्त कहलाता है — 'संतृप्त' शब्द का अर्थ ही यह है कि अब और हाइड्रोजन नहीं समा सकता। मोनोअसंतृप्त अम्ल में एक द्वि-आबंध होता है, और द्वि-आबंध बनने का अर्थ है कि दो कार्बन परमाणुओं ने अपने-अपने एक हाइड्रोजन छोड़कर आपस में दूसरा बंध बना लिया। इसलिए उतनी ही लंबी संतृप्त शृंखला की तुलना में मोनोअसंतृप्त अणु में दो हाइड्रोजन कम रहते हैं। यह विकल्प जिस गुण का वर्णन करता है, वह विकल्प में नामित वर्ग का नहीं, संतृप्त वर्ग का गुण है।
अवधारणा
वसीय अम्ल वसा की मूल इकाई है। बनावट में वह एक लंबी कार्बन-शृंखला है, जिसके एक सिरे पर कार्बोक्सिल समूह और दूसरे सिरे पर मेथिल समूह होता है। तीन वसीय अम्ल जब ग्लिसरॉल से जुड़ते हैं तो ट्राइग्लिसराइड बनता है, और भोजन तथा शरीर की अधिकांश वसा उसी रूप में रहती है।
वर्गीकरण द्वि-आबंधों की गिनती पर टिका है। जिस शृंखला में कार्बन-कार्बन द्वि-आबंध एक भी नहीं है वह संतृप्त है; जिसमें ठीक एक है वह मोनोअसंतृप्त; और जिसमें दो या अधिक हैं वह बहुअसंतृप्त। हर द्वि-आबंध बनने पर दो हाइड्रोजन कम हो जाते हैं, इसलिए असंतृप्तता बढ़ने का अर्थ है हाइड्रोजन का घटना।
यही बनावट भौतिक गुणों को भी तय करती है। संतृप्त शृंखलाएँ सीधी होती हैं और पास-पास सटकर जम जाती हैं, इसीलिए संतृप्त वसा कमरे के तापमान पर ठोस मिलती है। असंतृप्त शृंखला में द्वि-आबंध के स्थान पर एक मोड़ आ जाता है, जिससे अणु ठीक से सट नहीं पाते और वह वसा तेल के रूप में द्रव रहती है।
इस प्रश्न की रचना पर ध्यान देना चाहिए। यह 'कौन-सा कथन सही है' वाला प्रश्न है, पर ऊपर कोई क्रमांकित सूची नहीं है और न कोई कूट-पंक्ति — कथन स्वयं ही चारों विकल्प हैं, और हर विकल्प एक पूरा वाक्य है जो दंड पर समाप्त होता है। इसलिए यहाँ विकल्प-समुच्चय जोड़ने का काम नहीं, हर वाक्य को अलग-अलग सही या ग़लत ठहराने का काम है।
विषय की दृष्टि से यह पोषण और स्वास्थ्य की चर्चा से जुड़ता है, जो परीक्षा में लगातार लौटती है। संतृप्त वसा, असंतृप्त वसा और ट्रांस वसा का भेद, ओमेगा-3 तथा ओमेगा-6 का महत्व, और वनस्पति तेल के हाइड्रोजनीकरण से बनने वाली वनस्पति घी जैसी वसा — ये सब इसी बुनियादी बनावट से निकलते हैं।
चारों विकल्पों में से तीन एक ही धुरी पर घूमते हैं, यानी द्वि-आबंध और हाइड्रोजन की गिनती पर, और केवल एक विकल्प अणु की बनावट की बात करता है। यह असंतुलन स्वयं एक संकेत है कि परीक्षक द्वि-आबंध की गिनती पर भ्रम पैदा करना चाहता है।
मुख्य तथ्य
- वसीय अम्ल एक लंबी कार्बन-शृंखला है जिसके एक सिरे पर कार्बोक्सिल समूह और दूसरे सिरे पर मेथिल समूह रहता है; यही उसकी परिभाषक बनावट है।
- ओमेगा-3 और ओमेगा-6 जैसे नाम मेथिल वाले सिरे से गिनती करने पर बनते हैं, इसीलिए दूसरे सिरे का मेथिल होना नाम-पद्धति की जड़ है।
- संतृप्त वसीय अम्ल में कार्बन-कार्बन द्वि-आबंध एक भी नहीं होता; मोनोअसंतृप्त में ठीक एक और बहुअसंतृप्त में दो या अधिक होते हैं।
- हर द्वि-आबंध बनने पर शृंखला से दो हाइड्रोजन घट जाते हैं, इसलिए अपनी क्षमता भर हाइड्रोजन रखने वाला अणु संतृप्त होता है, असंतृप्त नहीं।
- अधिकांश प्राकृतिक वसीय अम्लों में कार्बन परमाणुओं की संख्या सम होती है, क्योंकि शृंखला दो-दो कार्बन जोड़कर बनाई जाती है — सम संख्या की बात यहाँ लागू होती है, द्वि-आबंधों पर नहीं।
आगे की तैयारी
सामान्य भ्रम
- द्वि-आबंधों की गिनती को कार्बन परमाणुओं की गिनती से मिला देना; सम संख्या वाली बात कार्बन के बारे में सच है।
- यह मान लेना कि 'अधिकतम हाइड्रोजन' असंतृप्त अणु का गुण है, जबकि वह संतृप्त अणु की परिभाषा है।
- विकल्पों को समुच्चय समझकर जोड़ने लगना, जबकि यहाँ हर विकल्प स्वयं एक स्वतंत्र कथन है।
जीव-रसायन के प्रश्न इस परीक्षा में प्रायः किसी अणु की बनावट और उसके वर्गीकरण पर आते हैं, और उनका सबसे आम रूप यही है : चार कथन देकर उनमें से एक सही चुनवाना, जहाँ दो कथन एक ही बात के विपरीत रूप हों।
इस रचना को पहचान लेना ही आधी तैयारी है। जब दो विकल्प केवल एक शब्द में भिन्न हों — यहाँ 'सम' और 'विषम' — तो प्रायः वे दोनों उस बात को छोड़ रहे होते हैं जो असल में पूछी जा रही है, और उत्तर बचे हुए विकल्पों में मिलता है। इसलिए पहले उस जोड़ी को अलग रखिए और शेष दो को ध्यान से पढ़िए।
आगे इसी विषय पर तीन तरह के प्रश्न बनते हैं : किसी वसीय अम्ल का नाम देकर उसे संतृप्त या असंतृप्त बताना, तेल और घी के द्रव या ठोस होने का कारण पूछना, और ओमेगा-3 तथा ओमेगा-6 के स्रोत पूछना। तीनों की जड़ यही एक बनावट है।
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अभ्यास
- practice — not a real PYQ
समान लंबाई की कार्बन-शृंखला वाले दो वसीय अम्लों में से एक संतृप्त है और दूसरा मोनोअसंतृप्त । दोनों के हाइड्रोजन परमाणुओं की संख्या के बारे में निम्नलिखित में से कौन-सा कथन सही है ?
- (a)मोनोअसंतृप्त अणु में दो हाइड्रोजन अधिक होते हैं
- (b)मोनोअसंतृप्त अणु में दो हाइड्रोजन कम होते हैं
- (c)दोनों में हाइड्रोजन की संख्या समान होती है
- (d)मोनोअसंतृप्त अणु में हाइड्रोजन होते ही नहीं
उत्तर(b) मोनोअसंतृप्त अणु में दो हाइड्रोजन कम होते हैं — एक द्वि-आबंध बनने का अर्थ है कि दो पड़ोसी कार्बन अपने-अपने एक हाइड्रोजन छोड़कर आपस में दूसरा बंध बना लेते हैं, इसलिए उतनी ही लंबी संतृप्त शृंखला की तुलना में दो हाइड्रोजन घट जाते हैं।