निम्नलिखित में से कौन-सी फेफड़ों और छाती के बीच के स्थान, फुप्फुस गुहा को भरने वाले पदार्थ की सही प्रकृति है ?
- (a)द्रव
- (b)शुष्क वायु
- (c)आर्द्र वायु
- (d)वसायुक्त मांसपेशी
उत्तर
क्यों
सही उत्तर — A, (a) द्रव — फुप्फुस गुहा में एक पतली द्रव-परत रहती है, जिसे फुप्फुसीय द्रव कहते हैं। स्वस्थ वयस्क में उसकी मात्रा बहुत थोड़ी होती है, कुछ मिलीलीटर भर, और वह दो झिल्लियों के बीच एक महीन फ़िल्म की तरह फैली रहती है। यह द्रव रक्त-प्लाज़्मा से छनकर बनता है और लसीका तंत्र उसे लगातार सोखता रहता है, जिससे उसकी मात्रा स्थिर बनी रहे।
रचना इस प्रकार है। फेफड़े की सतह पर एक झिल्ली चिपकी रहती है, जिसे आंतरांग फुप्फुसावरण कहते हैं, और छाती की भीतरी दीवार पर दूसरी झिल्ली लगी रहती है, जिसे पार्श्विक फुप्फुसावरण कहते हैं। इन्हीं दोनों के बीच की सँकरी जगह फुप्फुस गुहा है। वह कोई खुली कोठरी नहीं, बल्कि लगभग बंद और अत्यंत पतली जगह है, जिसे संभाव्य अवकाश कहा जाता है — यानी ऐसी जगह जो सामान्यतः होती ही नहीं, और केवल तब जगह बनती है जब उसमें कुछ भर जाए।
इस द्रव के दो काम हैं, और दोनों साँस लेने के लिए आवश्यक हैं। पहला काम चिकनाई का है : हर साँस के साथ फेफड़ा छाती की दीवार पर सरकता है, और द्रव के बिना यह रगड़ पीड़ादायक हो जाती। दूसरा काम अधिक सूक्ष्म है — पतली द्रव-फ़िल्म का पृष्ठ तनाव दोनों झिल्लियों को आपस में इस तरह बाँध देता है जैसे दो काँच की पट्टियाँ बीच में पानी की बूँद रखकर चिपक जाती हैं। वे एक-दूसरे पर सरक तो सकती हैं, पर अलग नहीं हो सकतीं। इसी बंधन के कारण छाती फैलते ही फेफड़ा भी फैलता है।
यहीं इस प्रश्न का असली उत्तर छिपा है, और वह भौतिकी का है। फुप्फुस गुहा के भीतर का दाब वायुमंडलीय दाब से थोड़ा कम रहता है, क्योंकि फेफड़ा अपनी प्रत्यास्थता से भीतर की ओर सिकुड़ना चाहता है और छाती की दीवार बाहर की ओर फैलना चाहती है; दोनों के विपरीत खिंचाव बीच की जगह को खींचकर वहाँ ऋण दाब बना देते हैं। द्रव असंपीड्य होता है, इसलिए वह इस खिंचाव को झेलकर भी अपनी पतली परत बनाए रखता है और बंधन टूटने नहीं देता। कोई भी गैस, चाहे शुष्क हो या आर्द्र, संपीड्य है — वह इसी ऋण दाब में फैल जाएगी, दोनों झिल्लियों को अलग कर देगी, और वही काम असंभव कर देगी जिसके लिए यह जगह बनी है।
इसीलिए यहाँ वायु का होना सामान्य नहीं, रोग का लक्षण है : गुहा में हवा भर जाए तो बंधन टूट जाता है, फेफड़ा अपनी प्रत्यास्थता से सिकुड़ जाता है, और उस अवस्था को वायुवक्ष कहते हैं। चारों विकल्पों में केवल (a) ही ऐसा पदार्थ नामित करता है जो असंपीड्य भी है और सरकने भी देता है।
अन्य विकल्प क्यों गलत हैं
- (b)शुष्क वायु — फुप्फुस गुहा में शुष्क वायु का होना स्वस्थ शरीर की स्थिति नहीं, बल्कि एक चिकित्सकीय आपात स्थिति है। चोट लगने या फेफड़े की सतह फटने पर जब इस बंद जगह में हवा घुस आती है तो उसे वायुवक्ष कहते हैं, और उसका परिणाम यही होता है कि द्रव-फ़िल्म का पृष्ठ तनाव समाप्त हो जाता है, फेफड़े और छाती की दीवार का बंधन टूट जाता है, और फेफड़ा अपनी प्रत्यास्थता के कारण सिकुड़ जाता है। यानी यह विकल्प जिस अवस्था का वर्णन करता है, वह ठीक वह अवस्था है जिसमें साँस लेना बिगड़ जाता है। इसके अलावा यह गुहा श्वास-नली से जुड़ी हुई नहीं है, इसलिए साँस की हवा वहाँ पहुँचती ही नहीं।
- (c)आर्द्र वायु — यह विकल्प वही भूल करता है जो (b) करता है, और एक विशेषण जोड़कर उसे अधिक विश्वसनीय बना देता है। 'आर्द्र वायु' सुनकर लगता है कि यह फेफड़े के भीतर की हवा की बात है, क्योंकि श्वास-मार्ग में हवा सचमुच नम होती जाती है। पर वह हवा वायुकोष्ठिकाओं के भीतर होती है, फुप्फुस गुहा में नहीं। गुहा उन कोष्ठिकाओं से बाहर है, दो झिल्लियों के बीच है, और सामान्य अवस्था में उसमें हवा किसी भी रूप में नहीं होती। यहाँ ध्यान देने योग्य बात यह है कि (b) और (c) केवल पहले शब्द में भिन्न हैं; जब दो विकल्प एक ही ग़लत विचार के दो रूप हों, तो सामान्यतः उत्तर उनमें नहीं होता।
- (d)वसायुक्त मांसपेशी — वसायुक्त मांसपेशी इस स्थान पर होती ही नहीं, और यदि होती तो वह उस काम को असंभव बना देती जिसके लिए यह जगह बनी है। फुप्फुस गुहा दो झिल्लियों के बीच की अत्यंत पतली जगह है, जिसमें फेफड़े को छाती की दीवार पर स्वतंत्र रूप से सरकना होता है; कोई ठोस ऊतक बीच में आ जाए तो यह सरकना रुक जाएगा। साँस लेने में लगी मांसपेशियाँ — पसलियों के बीच की अंतरपर्शुक मांसपेशियाँ और नीचे का डायाफ़्राम — इस गुहा के भीतर नहीं, बाहरी झिल्ली के भी बाहर हैं, और वे छाती के ढाँचे को हिलाकर अप्रत्यक्ष रूप से फेफड़े को फैलाती हैं।
अवधारणा
फेफड़े छाती के भीतर एक दोहरी सीरम-झिल्ली में लिपटे रहते हैं। भीतरी झिल्ली, जिसे आंतरांगी फुप्फुसावरण कहते हैं, फेफड़े की सतह से चिपकी रहती है; बाहरी झिल्ली, भित्तीय फुप्फुसावरण, छाती की भीतरी दीवार और डायाफ़्राम के ऊपर लगी रहती है। दोनों के बीच की सँकरी जगह फुप्फुस गुहा है और उसी में फुप्फुसीय द्रव भरा रहता है।
इस व्यवस्था का यांत्रिक अर्थ समझ लेना पूरे श्वसन-अध्याय की कुंजी है। फेफड़े में स्वयं कोई मांसपेशी नहीं होती जो उसे फैला सके; वह प्रत्यास्थ थैले की तरह है, जो अपने-आप सिकुड़ने की प्रवृत्ति रखता है। उसे फैलाने का काम छाती का ढाँचा करता है, और छाती का खिंचाव फेफड़े तक इसी द्रव-बंधन के माध्यम से पहुँचता है।
गुहा के भीतर का दाब वायुमंडलीय दाब से कुछ कम रहता है, और यही ऋणात्मक दाब फेफड़े को फैला हुआ बनाए रखता है। जहाँ यह व्यवस्था बिगड़ती है वहीं रोग खड़े होते हैं : गुहा में हवा भर जाए तो वायुवक्ष, और द्रव अधिक मात्रा में जमा हो जाए तो फुप्फुस बहाव।
मानव शरीर-रचना के प्रश्न इस परीक्षा में प्रायः किसी एक संरचना का नाम देकर उसका स्थान, बनावट या भरने वाला पदार्थ पूछते हैं। यहाँ प्रश्न ने स्वयं ही संकेत दे दिया है : वह फुप्फुस गुहा को 'फेफड़ों और छाती के बीच का स्थान' कहकर परिभाषित करता है। यही परिभाषा उत्तर की ओर ले जाती है, क्योंकि दो सतहों के बीच सरकन वाली जगह में चिकनाई चाहिए, और चिकनाई द्रव ही दे सकता है।
शरीर में ऐसी सीरम-गुहाएँ अकेली नहीं हैं। हृदय के चारों ओर हृदयावरण की गुहा है और उदर में पेरिटोनियम की गुहा; तीनों की बनावट एक जैसी है — दो झिल्लियाँ, बीच में थोड़ा-सा द्रव, और उसी द्रव से मिलने वाली चिकनाई। एक जगह का सिद्धांत समझ लेने पर तीनों के प्रश्न हल हो जाते हैं।
हिन्दी स्तंभ के चारों विकल्प इस पृष्ठ पर सबसे छोटे हैं — एक या दो शब्द के — और उनमें कोई अंग्रेज़ी पद कोष्ठक में नहीं दिया गया, जबकि इसी पृष्ठ के बाक़ी प्रश्न कहीं न कहीं अंग्रेज़ी शब्द कोष्ठक में देते हैं।
मुख्य तथ्य
- फुप्फुस गुहा दो झिल्लियों के बीच की जगह है — भीतरी झिल्ली फेफड़े पर चिपकी और बाहरी छाती की दीवार पर लगी — और उसमें फुप्फुसीय द्रव भरा रहता है।
- स्वस्थ वयस्क में यह द्रव बहुत थोड़ी मात्रा में, कुछ मिलीलीटर भर, एक महीन फ़िल्म की तरह फैला रहता है; गुहा इसीलिए संभाव्य अवकाश कहलाती है।
- द्रव के दो काम हैं : हर साँस पर होने वाली रगड़ को कम करना, और पृष्ठ तनाव से दोनों झिल्लियों को बाँधे रखना ताकि छाती फैलते ही फेफड़ा फैले।
- गुहा के भीतर का दाब वायुमंडलीय दाब से कुछ कम रहता है, और यही ऋणात्मक दाब फेफड़े को फैली हुई अवस्था में बनाए रखता है।
- गुहा में हवा भर जाने की अवस्था वायुवक्ष कहलाती है और उसमें फेफड़ा सिकुड़ जाता है; द्रव की अधिकता की अवस्था फुप्फुस बहाव कहलाती है।
आगे की तैयारी
सामान्य भ्रम
- फुप्फुस गुहा को श्वास-मार्ग का ही हिस्सा मान लेना; वह वायुकोष्ठिकाओं से बाहर की, लगभग बंद जगह है और श्वास-नली से जुड़ी हुई नहीं, इसलिए साँस की हवा वहाँ पहुँचती ही नहीं।
- 'आर्द्र वायु' को इसलिए चुन लेना कि साँस की हवा नम होती है — वह नमी फेफड़े के भीतर है, गुहा में नहीं, और (b) तथा (c) एक ही ग़लत विचार के दो रूप हैं।
- यह भूल जाना कि फेफड़े में अपनी कोई मांसपेशी नहीं होती; उसका फैलाव छाती के ढाँचे से आता है, और वह भी केवल इसलिए कि द्रव-फ़िल्म दोनों झिल्लियों को बाँधे रखती है।
- द्रव की भूमिका को केवल चिकनाई तक सीमित मान लेना; उससे भी बड़ा काम असंपीड्य होना है — गैस उसी ऋण दाब में फैलकर दोनों झिल्लियों को अलग कर देती, और वही वायुवक्ष की अवस्था है।
शरीर-रचना के प्रश्न इस पेपर में दो ढंग से आते हैं। एक ढंग पहचान का है — कोई संरचना गिनाकर पूछना कि वह किस तंत्र की है या कौन-सी उसमें नहीं आती। दूसरा ढंग यही है, जो यहाँ अपनाया गया : संरचना का नाम देकर उसका भरने वाला पदार्थ, स्थान या कार्य पूछना।
इस दूसरे ढंग में सबसे उपयोगी आदत यह है कि संरचना के काम से उत्तर निकाला जाए, न कि रटी हुई सूची से। जहाँ दो सतहों को एक-दूसरे पर सरकना हो, वहाँ चिकनाई चाहिए और वह द्रव से ही मिलती है — यही तर्क घुटने के जोड़ की श्लेष्म गुहा, हृदयावरण की गुहा और यहाँ, तीनों जगह चलता है।
विकल्पों की बनावट भी सहायता करती है। यहाँ दो विकल्प वायु के हैं और केवल विशेषण में भिन्न हैं, एक ठोस ऊतक का है, और एक द्रव का। जब दो विकल्प एक ही विचार के दो रूप हों, तो प्रायः वे साथ-साथ ग़लत होते हैं और उत्तर बचे हुए दो में से किसी एक में मिलता है।
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किसी विशेष ऊतक को उसकी बनावट और स्थान से जोड़ने वाला प्रश्न — वही कौशल, जो यहाँ गुहा को उसके भरने वाले पदार्थ से जोड़ने में लगता है।
अभ्यास
- practice — not a real PYQ
फुप्फुस गुहा में भरे द्रव के कारण छाती के फैलने पर फेफड़ा भी फैल जाता है । इसका सबसे सही कारण निम्नलिखित में से कौन-सा है ?
- (a)द्रव फेफड़े को भीतर से भरकर उसे फुला देता है
- (b)पतली द्रव-फ़िल्म का पृष्ठ तनाव दोनों झिल्लियों को आपस में बाँधे रखता है
- (c)द्रव फेफड़े की मांसपेशियों को संकुचित होने का संकेत देता है
- (d)द्रव वायुकोष्ठिकाओं तक ऑक्सीजन पहुँचाता है
उत्तर(b) पतली द्रव-फ़िल्म का पृष्ठ तनाव दोनों झिल्लियों को आपस में बाँधे रखता है — दो काँच की पट्टियाँ बीच में पानी की बूँद रखकर जिस तरह चिपक जाती हैं, उसी तरह यह फ़िल्म फेफड़े को छाती की दीवार से जोड़े रखती है, इसलिए दीवार का खिंचाव फेफड़े तक पहुँच जाता है।