निम्नलिखित में से कौन-सी ऐसी सही विधि है, जो जीपीएस (GPS) द्वारा लक्ष्य की अवस्थिति ज्ञात करने के लिए प्रयोग में लाई जाती है ?
- (a)त्रिपार्श्विकरण (ट्राइलेटरेशन) विधि, जो ऐसे त्रिभुज की भुजाओं की लंबाई का मापन करती है, जहाँ लक्ष्य अवस्थिति त्रिभुज का एक शीर्ष है
- (b)विस्तारण (डाइलेशन) विधि, जिसमें दो पहले से ही ज्ञात सीमाचिन्हों से लक्ष्य अवस्थिति की दूरी का मापन होता है
- (c)पूर्वनिर्दिष्ट भू-स्थिर उपग्रह से लक्ष्य की दूरी का मापन
- (d)पूर्वनिर्दिष्ट ध्रुवीय उपग्रह से लक्ष्य की दूरी का मापन
उत्तर
क्यों
सही उत्तर — A, (a) त्रिपार्श्विकरण (ट्राइलेटरेशन) विधि, जो ऐसे त्रिभुज की भुजाओं की लंबाई का मापन करती है, जहाँ लक्ष्य अवस्थिति त्रिभुज का एक शीर्ष है — जीपीएस अवस्थिति दूरियों से निकालता है, कोणों से नहीं, और दूरियों से स्थान निकालने की विधि का नाम ही त्रिपार्श्विकरण है।
नाम स्वयं यह भेद बता देता है, और यही इस प्रश्न की सबसे उपयोगी पकड़ है। लैटिन में latus का अर्थ भुजा है, इसलिए tri-lateration यानी तीन भुजाओं से निकालना; जबकि angulus का अर्थ कोण है, इसलिए tri-angulation यानी तीन कोणों से निकालना। सर्वेक्षण में दोनों विधियाँ चलती हैं, पर जीपीएस के पास कोण नापने का कोई साधन है ही नहीं — उसके पास केवल समय है, और समय सीधे दूरी में बदलता है। इसलिए जीपीएस अनिवार्य रूप से भुजाओं वाली विधि है।
क्रम इस प्रकार चलता है। हर जीपीएस उपग्रह लगातार एक संकेत प्रसारित करता है जिसमें उसकी अपनी अवस्थिति और भेजने का ठीक समय दर्ज होता है। अभिग्राही उस संकेत को पाकर देखता है कि उसे आने में कितना समय लगा, और उस समय को प्रकाश की गति से गुणा करके उपग्रह से अपनी दूरी निकाल लेता है।
एक उपग्रह से दूरी जान लेने पर अभिग्राही केवल इतना जानता है कि वह उस उपग्रह के चारों ओर खिंचे एक गोले की सतह पर कहीं है। दूसरे उपग्रह से दूसरी दूरी मिलने पर दोनों गोलों की काट एक वृत्त रह जाती है, और तीसरे उपग्रह से वह वृत्त सिमटकर बहुत थोड़े बिंदुओं पर आ जाता है, जिनमें से एक पृथ्वी की सतह पर होता है और शेष असंगत होकर छँट जाते हैं। इस प्रकार तीन दूरियाँ मिलकर स्थान तय कर देती हैं — यही त्रिपार्श्विकरण है।
व्यवहार में चौथा उपग्रह भी चाहिए, और उसका कारण अंकों में देखने लायक है। प्रकाश एक सेकंड में लगभग तीन लाख किलोमीटर चलता है, यानी एक माइक्रोसेकंड में लगभग तीन सौ मीटर। इसलिए अभिग्राही की घड़ी में एक माइक्रोसेकंड की भी त्रुटि हुई तो अवस्थिति सैकड़ों मीटर खिसक जाएगी। उपग्रह में परमाणु घड़ी बैठाई जा सकती है, हाथ के अभिग्राही में नहीं; इसलिए घड़ी की त्रुटि को एक चौथा अज्ञात मानकर चौथी दूरी से हल कर लिया जाता है। पर विधि का नाम और उसका आधार इससे बदलता नहीं : मापी गई दूरियाँ ही रहती हैं।
विकल्प (a) की शब्दावली थोड़ी ढीली है — गोलों की काट को 'त्रिभुज की भुजाएँ' कहना सरलीकरण है — पर वह विधि का सही नाम लेता है और सही राशि, यानी लंबाई, का नाम लेता है। ऐसे प्रश्न में शब्दों की ढील नहीं, नामित विधि देखी जाती है।
अन्य विकल्प क्यों गलत हैं
- (b)विस्तारण (डाइलेशन) विधि, जिसमें दो पहले से ही ज्ञात सीमाचिन्हों से लक्ष्य अवस्थिति की दूरी का मापन होता है — 'विस्तारण' नाम की कोई अवस्थिति-निर्धारण विधि है ही नहीं; यह शब्द जीपीएस की एक असली संज्ञा से मिलता-जुलता गढ़ा गया है — 'शुद्धता का तनुकरण' (dilution of precision), जो यह बताता है कि उपग्रह आकाश में कैसे बिखरे हैं और उससे परिणाम कितना भरोसेमंद रहेगा। वह अवस्थिति निकालने की विधि नहीं, परिणाम की गुणवत्ता का माप है। इस विकल्प की दूसरी भूल गिनती की है : समतल पर दो ज्ञात बिंदुओं से दूरियाँ जान लेने पर भी दो संभव स्थान बचे रह जाते हैं, एक नहीं। इसीलिए किसी भी दूरी-आधारित विधि में कम से कम तीन संदर्भ चाहिए, और जीपीएस में घड़ी की त्रुटि के कारण चार।
- (c)पूर्वनिर्दिष्ट भू-स्थिर उपग्रह से लक्ष्य की दूरी का मापन — यह विकल्प दो अलग-अलग कारणों से गिरता है। पहला यह कि जीपीएस भू-स्थिर उपग्रहों पर आधारित है ही नहीं; उसके उपग्रह लगभग बीस हज़ार किलोमीटर की मध्यम कक्षा में हैं, छह कक्षा-तलों में बँटे हैं और लगभग बारह घंटे में एक चक्कर पूरा करते हैं, जिससे पृथ्वी के हर भाग पर हर समय पर्याप्त उपग्रह दिखते रहें। दूसरा और अधिक बुनियादी कारण यह है कि किसी एक उपग्रह से दूरी जान लेना कभी स्थान नहीं बताता — वह केवल एक गोले की सतह बताता है। यह जाल इसलिए बना है कि भारत की गगन जैसी संवर्धन प्रणालियाँ भू-स्थिर उपग्रहों का उपयोग करती हैं, पर वे सुधार-संदेश भेजती हैं, अवस्थिति स्वयं नहीं निकालतीं।
- (d)पूर्वनिर्दिष्ट ध्रुवीय उपग्रह से लक्ष्य की दूरी का मापन — ध्रुवीय कक्षा के उपग्रह पृथ्वी के ध्रुवों के ऊपर से गुज़रते हैं और घूमती पृथ्वी की पट्टी-दर-पट्टी छवि लेते जाते हैं; यही कारण है कि उनका असली क्षेत्र सुदूर संवेदन, मौसम प्रेक्षण और भू-सर्वेक्षण है, नौवहन नहीं। जीपीएस के उपग्रह ध्रुवीय नहीं, लगभग पचपन अंश झुकी मध्यम कक्षाओं में हैं, और उनका पूरा विन्यास इस उद्देश्य से बना है कि किसी भी क्षण पृथ्वी के अधिकांश भाग से चार या अधिक उपग्रह एक साथ दिखें। इसके अलावा यह विकल्प विकल्प (c) की ही भूल दोहराता है — एक उपग्रह से नापी गई दूरी स्थान नहीं देती, केवल एक गोला देती है।
अवधारणा
अवस्थिति निकालने की दो शास्त्रीय विधियाँ हैं, और उनके नाम अक्सर आपस में बदल दिए जाते हैं। त्रिकोणन (triangulation) कोणों पर चलता है : ज्ञात दो बिंदुओं से लक्ष्य की दिशा नापिए, और त्रिभुज हल कर लीजिए। त्रिपार्श्विकरण (trilateration) दूरियों पर चलता है : ज्ञात बिंदुओं से लक्ष्य की दूरियाँ नापिए, और उन्हीं से स्थान निकाल लीजिए। जीपीएस दूसरा करता है।
दूरी नापने का साधन समय है। हर उपग्रह में परमाणु घड़ी लगी है और वह अपने संकेत में भेजने का समय तथा अपनी कक्षीय अवस्थिति दोनों भर देता है। अभिग्राही उसी संकेत की एक प्रतिलिपि अपने भीतर बनाकर मिलान करता है, विलंब निकालता है, और विलंब को प्रकाश की गति से गुणा कर देता है।
इसी में एक अड़चन है। अभिग्राही की घड़ी सस्ती है, इसलिए उसकी नापी दूरी में एक अज्ञात त्रुटि जुड़ी रहती है — इसीलिए उसे छद्म-दूरी (pseudorange) कहते हैं। अक्षांश, देशांतर और ऊँचाई — तीन अज्ञात — के साथ यह चौथा अज्ञात जुड़ जाता है, और चार अज्ञातों के लिए चार समीकरण चाहिए। यही कारण है कि तीन उपग्रह सैद्धांतिक न्यूनतम हैं और चार व्यावहारिक न्यूनतम।
उपग्रह-आधारित नौवहन अब केवल दिशा बताने का साधन नहीं रह गया है। उसके संकेत में जो अत्यंत शुद्ध समय भरा रहता है, उसका उपयोग दूरसंचार जालों को समकालिक रखने, विद्युत ग्रिड की निगरानी करने और वित्तीय लेन-देन पर समय-मुहर लगाने तक में होता है। इसीलिए इस विषय के प्रश्न प्रौद्योगिकी और अर्थव्यवस्था दोनों की ओर से आते हैं।
अमेरिका की जीपीएस के अलावा रूस की ग्लोनास, यूरोप की गैलीलियो और चीन की बेइदोऊ वैश्विक प्रणालियाँ हैं। भारत की अपनी प्रणाली नाविक (NavIC) क्षेत्रीय है, जिसमें सात उपग्रह हैं — कुछ भू-स्थिर कक्षा में और कुछ झुकी हुई भू-तुल्यकाली कक्षा में। इसके अतिरिक्त भारत की गगन एक संवर्धन प्रणाली है, जो जीपीएस के संकेतों में सुधार भेजकर उन्हें विमानन योग्य शुद्धता तक ले आती है।
प्रश्न का हिन्दी स्तंभ विधि का नाम कोष्ठक में लिप्यंतरित करके देता है, इसलिए 'त्रिपार्श्विकरण' पढ़कर भी अभ्यर्थी को 'ट्राइलेटरेशन' मिल जाता है — यही वह शब्द है जिस पर पूरा प्रश्न टिका है।
मुख्य तथ्य
- जीपीएस त्रिपार्श्विकरण पर चलता है, यानी मापी गई दूरियों पर; त्रिकोणन कोणों पर चलता है और उपग्रह नौवहन में उसका उपयोग नहीं होता।
- दूरी सीधे नहीं नापी जाती — अभिग्राही संकेत के आने में लगे समय को प्रकाश की गति से गुणा करके उपग्रह से अपनी दूरी निकालता है।
- एक उपग्रह से दूरी एक गोला देती है, दो से एक वृत्त, और तीन से कुछ ही बिंदु; इसलिए स्थान के लिए कम से कम तीन उपग्रह चाहिए।
- चौथा उपग्रह अभिग्राही की घड़ी की त्रुटि निकालने के लिए चाहिए, इसीलिए नापी गई दूरी को छद्म-दूरी कहा जाता है।
- जीपीएस के उपग्रह लगभग बीस हज़ार किलोमीटर की मध्यम कक्षा में, छह कक्षा-तलों में और लगभग पचपन अंश के झुकाव पर हैं — न भू-स्थिर, न ध्रुवीय।
आगे की तैयारी
सामान्य भ्रम
- त्रिपार्श्विकरण को त्रिकोणन समझ लेना; latus यानी भुजा से बना पहला शब्द दूरियाँ नापता है, angulus यानी कोण से बना दूसरा शब्द कोण नापता है, और जीपीएस के पास कोण नापने का साधन ही नहीं है।
- यह मान लेना कि किसी एक उपग्रह से दूरी जान लेने पर स्थान मिल जाता है, जबकि वह केवल एक गोला देती है; और तीन के बजाय चार उपग्रहों की ज़रूरत को विधि का हिस्सा समझ लेना, जबकि चौथा केवल अभिग्राही की घड़ी की त्रुटि सुलझाने के लिए है।
- भू-स्थिर उपग्रहों की भूमिका को अवस्थिति-निर्धारण मान लेना; गगन जैसी संवर्धन प्रणालियों में वे केवल सुधार-संदेश भेजते हैं।
उपग्रह नौवहन पर प्रश्न तीन शक्लों में लौटते हैं। पहली शक्ल यही है — विधि का नाम पूछना, और विकल्पों में एक असली नाम के साथ तीन गढ़े हुए या ग़लत जगह रखे नाम देना। दूसरी शक्ल कथन-सूची की होती है, जिसमें उपग्रहों की संख्या, कक्षा की ऊँचाई या प्रणाली के उपयोगों पर अलग-अलग कथन जाँचने पड़ते हैं। तीसरी शक्ल भारत की अपनी प्रणालियों पर होती है, जहाँ नाविक और गगन का भेद पूछा जाता है।
तीनों में एक ही तैयारी काम आती है : प्रणाली का कार्य-क्रम चरण दर चरण याद रखिए — संकेत में समय, समय से दूरी, दूरियों से गोले, गोलों की काट से स्थान, और चौथा उपग्रह घड़ी के लिए।
इस विशेष प्रश्न में एक और सहारा है। विकल्प (c) और (d) केवल एक शब्द में भिन्न हैं, और दोनों की रचना एक जैसी है — 'एक निर्दिष्ट उपग्रह से दूरी'। जब दो विकल्प एक ही ग़लत विचार के दो रूप हों, तो सामान्यतः उत्तर उनमें नहीं होता।
संबंधित PYQ
EPFO_APFC_2016_Q79Consider the following statements on Global Positioning System (GPS) : 1. GPS allows accurate time-stamping on ATM transactions. 2. GPS relies on a set of satellites for transferring signals worldwide. Which of the above statements is/are correct ?
- (a) 1 only
- (b) 2 only
- (c) Both 1 and 2
- (d) Neither 1 nor 2
उत्तर(c) Both 1 and 2
जीपीएस पर कथन-सूची वाला प्रश्न, जिसमें उपग्रहों की भूमिका और समय-मुहर जैसे व्यावहारिक उपयोग अलग-अलग परखे जाते हैं।
अभ्यास
- practice — not a real PYQ
जीपीएस अभिग्राही को अपनी अवस्थिति निकालने के लिए सामान्यतः कम से कम चार उपग्रहों की आवश्यकता क्यों पड़ती है, जबकि ज्यामिति की दृष्टि से तीन दूरियाँ स्थान तय कर देती हैं ?
- (a)क्योंकि चौथा उपग्रह अभिग्राही की घड़ी की त्रुटि निकालने के लिए चाहिए
- (b)क्योंकि चौथा उपग्रह संकेत की शक्ति बढ़ाता है
- (c)क्योंकि तीन उपग्रह केवल ऊँचाई बताते हैं, अक्षांश और देशांतर नहीं
- (d)क्योंकि चौथा उपग्रह मानचित्र का आँकड़ा भेजता है
उत्तर(a) क्योंकि चौथा उपग्रह अभिग्राही की घड़ी की त्रुटि निकालने के लिए चाहिए — अक्षांश, देशांतर और ऊँचाई के तीन अज्ञातों के साथ घड़ी की त्रुटि चौथा अज्ञात बन जाती है, और चार अज्ञात हल करने के लिए चार दूरियाँ चाहिए।