ड्रोन झुंड (स्वॉर्म) हमले के प्रत्युपाय हेतु विद्युत-चुम्बकीय (EM) ड्रोन जाम एक प्रभावी प्रक्रिया है, जिसमें ड्रोन का जीपीएस और उसकी संचार प्रणाली विघटित किए जाते हैं । ईएम ड्रोन जाम करने के लिए निम्नलिखित में से कौन-सी सही आवृत्ति परास (फ्रीक्वेंसी रेंज) है ?
- (a)दूर-अवरक्त (फार-इन्फ्रारेड) आवृत्ति
- (b)सूक्ष्मतरंग (माइक्रोवेव) आवृत्ति
- (c)दृश्यमान (विज़िबल) आवृत्ति
- (d)अवरक्त (इन्फ्रारेड) आवृत्ति
उत्तर
क्यों
सही उत्तर — B, (b) सूक्ष्मतरंग (माइक्रोवेव) आवृत्ति — जाम करने का पहला नियम यही है कि जाम उसी आवृत्ति पर करना पड़ता है जिस पर लक्ष्य-कड़ी काम कर रही है। हर अभिग्राही के सामने एक संकीर्ण छन्ना लगा होता है जो अपनी पट्टी के बाहर की हर चीज़ पहले ही काट देता है; इसलिए दूसरी पट्टी में भेजी गई कितनी भी ऊर्जा उस तक पहुँचती ही नहीं। उत्तर तय करने के लिए इसलिए यही पूछना होगा कि ड्रोन की जीपीएस और संचार कड़ियाँ किस परास में चलती हैं।
यहाँ एक बात पर ध्यान दीजिए, क्योंकि उसी से विकल्प कटते हैं : प्रश्न दो अलग-अलग कड़ियों का नाम लेता है — जीपीएस और संचार प्रणाली — और एक ही ऐसा परास माँगता है जो दोनों को समेट ले। जीपीएस के नागरिक संकेत लगभग 1575 मेगाहर्ट्ज़ और 1227 मेगाहर्ट्ज़ पर आते हैं, यानी रेडियो वर्णक्रम के उस L-बैंड में जो सूक्ष्मतरंग क्षेत्र का ही भाग है। ड्रोन को उड़ाने वाली नियंत्रण-कड़ी और उससे लौटता वीडियो सामान्यतः 2·4 गीगाहर्ट्ज़ और 5·8 गीगाहर्ट्ज़ की खुली पट्टियों पर चलते हैं। ये अंक आपस में अलग हैं, पर सूक्ष्मतरंग खंड इतना चौड़ा है — मोटे तौर पर 300 मेगाहर्ट्ज़ से 300 गीगाहर्ट्ज़ तक — कि दोनों उसी एक नाम के भीतर आ जाते हैं। इसीलिए इस प्रश्न का उत्तर एक पट्टी का नाम बन सकता है, किसी एक आवृत्ति का अंक नहीं।
जामर का काम इन्हीं पट्टियों पर इतनी शोर-ऊर्जा भर देना है कि ड्रोन का अभिग्राही असली संकेत को शोर से अलग न कर सके। इस दृष्टि से जीपीएस सबसे कमज़ोर कड़ी है, और कारण भौतिक है : उपग्रह लगभग बीस हज़ार किलोमीटर ऊपर से भेजता है, और पृथ्वी तक पहुँचते-पहुँचते उसका संकेत परिवेश के तापीय शोर से भी नीचे दब चुका होता है। अभिग्राही उसे केवल इसलिए पढ़ पाता है कि वह पहले से ज्ञात कूट-अनुक्रम से संकेत का सहसंबंध बिठाकर उसे शोर के ऊपर उठा लेता है। कुछ सौ मीटर दूर से चलाया गया छोटा-सा जामर इस अनुपात को उलट देने भर के लिए पर्याप्त होता है, क्योंकि उसकी ऊर्जा को हज़ारों किलोमीटर नहीं चलना पड़ता। संकेत टूटते ही ड्रोन अपनी अवस्थिति नहीं जान पाता या संचालक से कट जाता है, और सामान्यतः वापसी, ठहराव या उतरने की अपनी पूर्व-निर्धारित प्रक्रिया पर चला जाता है।
शेष तीनों विकल्प अवरक्त या दृश्य प्रकाश के क्षेत्र हैं, जिनकी आवृत्तियाँ इन रेडियो कड़ियों से लाखों गुना ऊँची हैं। वहाँ ड्रोन की कोई कड़ी चलती ही नहीं, इसलिए वहाँ ऊर्जा भेजने से जीपीएस या संचार पर कोई असर नहीं पड़ता।
अन्य विकल्प क्यों गलत हैं
- (a)दूर-अवरक्त (फार-इन्फ्रारेड) आवृत्ति — दूर-अवरक्त तरंगें सूक्ष्मतरंगों से आगे, प्रकाश की ओर बढ़ते हुए क्षेत्र में आती हैं और उनका मुख्य संबंध ऊष्मा से है — तापीय प्रतिबिंबन, ऊष्मा-संसूचन और खगोलीय प्रेक्षण इसी परास के काम हैं। ड्रोन की जीपीएस कड़ी और उसकी नियंत्रण-कड़ी इस परास में कुछ भी नहीं भेजतीं, इसलिए यहाँ शोर भरने से उनका संकेत छूता तक नहीं। जाम की पूरी अवधारणा एक ही आवृत्ति-पट्टी पर असली संकेत के ऊपर शोर चढ़ा देने की है; अलग परास में भेजी गई ऊर्जा अभिग्राही के छन्ने से ही बाहर रह जाती है। इस परास का उपयोग ड्रोन को खोजने में हो सकता है, उसकी कड़ी तोड़ने में नहीं।
- (c)दृश्यमान (विज़िबल) आवृत्ति — दृश्य आवृत्तियाँ प्रकाश की हैं, और प्रकाश ड्रोन की संचार या नौवहन कड़ी नहीं चलाता। इस परास का उपयोग ड्रोन-रोधी उपायों में होता तो है, पर बिलकुल दूसरे ढंग से — तीव्र प्रकाश या लेज़र से उसके कैमरे को चौंधिया देना, या पर्याप्त शक्ति हो तो उसके ढाँचे को क्षति पहुँचाना। यह प्रकाशिक प्रतिकार है, विद्युत-चुम्बकीय जाम नहीं, और प्रश्न स्पष्ट रूप से जीपीएस और संचार प्रणाली को विघटित करने की बात करता है। इसके अलावा प्रकाश धूल, कोहरे और बादल से रुक जाता है और उसे लक्ष्य पर सीधी दृष्टि चाहिए, जबकि रेडियो जामर को एक विस्तृत क्षेत्र में शोर भर देना होता है।
- (d)अवरक्त (इन्फ्रारेड) आवृत्ति — अवरक्त परास का सबसे परिचित उपयोग बहुत छोटी दूरी के नियंत्रण में है, जैसे दूरदर्शन का रिमोट, और ऊष्मा-आधारित संसूचन में, जैसे तापीय कैमरे और ऊष्मा का पीछा करने वाली मिसाइलें। ड्रोन का संचालक-संपर्क और जीपीएस अभिग्रहण इस परास में होते ही नहीं, इसलिए यहाँ जामर चलाना निशाना चूकना है। ध्यान रहे कि यह विकल्प और विकल्प (a) एक ही परिवार के दो हिस्से हैं — अवरक्त और उसका लंबी तरंगदैर्ध्य वाला छोर, दूर-अवरक्त — और दोनों को साथ रखकर परीक्षक यह जाँचता है कि अभ्यर्थी वर्णक्रम में रेडियो-सूक्ष्मतरंग और प्रकाशिक क्षेत्र का भेद जानता है या नहीं।
अवधारणा
विद्युत-चुम्बकीय वर्णक्रम एक सतत पट्टी है, जिसे आवृत्ति के अनुसार खंडों में बाँटा गया है। सबसे नीचे रेडियो तरंगें हैं; उनके ऊपर सूक्ष्मतरंगें, जिनकी आवृत्ति मोटे तौर पर 300 मेगाहर्ट्ज़ से 300 गीगाहर्ट्ज़ तक और तरंगदैर्ध्य लगभग एक मीटर से एक मिलीमीटर तक मानी जाती है; उसके बाद अवरक्त, फिर दृश्य प्रकाश, और आगे पराबैंगनी, X-किरण तथा गामा किरण।
लगभग सारा आधुनिक बेतार संचार सूक्ष्मतरंग परास में ही बैठता है, क्योंकि यहाँ पर्याप्त चौड़ाई भी मिलती है और तरंगें वायुमंडल से पार भी हो जाती हैं। उपग्रह कड़ियाँ, चल-दूरभाष, वाई-फ़ाई, रडार और उपग्रह-आधारित नौवहन — सब इसी क्षेत्र के भीतर हैं।
जाम करना (जैमिंग) इसी तथ्य पर टिका है। किसी कड़ी को तोड़ने के लिए उसी पट्टी में इतनी शोर-ऊर्जा भेजी जाती है कि अभिग्राही के लिए संकेत-से-शोर अनुपात गिर जाए और वह असली संदेश निकाल ही न सके। इसीलिए जामर की आवृत्ति लक्ष्य की आवृत्ति से बँधी होती है — वह चुनने की चीज़ नहीं, लक्ष्य से तय होने वाली चीज़ है।
ड्रोन के झुंड से बचाव आज की सामरिक चर्चा का एक जीवंत विषय है, और उसी कारण परीक्षा में आया है। बड़ी संख्या में सस्ते, छोटे ड्रोन एक साथ भेजने पर परंपरागत वायु-रक्षा महँगी और अक्षम पड़ जाती है, क्योंकि हर ड्रोन पर एक मिसाइल चलाना व्यावहारिक नहीं।
इसलिए प्रतिकार की दो श्रेणियाँ बनी हैं। एक श्रेणी भौतिक है — जाल फेंकना, गोली या लेज़र से गिराना। दूसरी श्रेणी विद्युत-चुम्बकीय है, और उसमें दो अलग-अलग युक्तियाँ आती हैं : जाम करना, जिसमें संकेत को शोर से ढका जाता है, और छल-संकेत भेजना, जिसमें ड्रोन को नक़ली जीपीएस संकेत देकर ग़लत जगह पर उतरने के लिए बहका दिया जाता है। दूसरी युक्ति अधिक चतुर है, पर दोनों का क्षेत्र वही सूक्ष्मतरंग परास है।
प्रश्न का हिन्दी वाक्य दो भागों में है — पहले वह बताता है कि जाम एक कारगर प्रतिउपाय है, फिर पूछता है कि वह किस आवृत्ति परास पर किया जाता है। पहला भाग उत्तर नहीं देता, केवल परिदृश्य बनाता है।
मुख्य तथ्य
- सूक्ष्मतरंगों की आवृत्ति मोटे तौर पर 300 मेगाहर्ट्ज़ से 300 गीगाहर्ट्ज़ तक मानी जाती है, और उनकी तरंगदैर्ध्य लगभग एक मीटर से एक मिलीमीटर तक होती है।
- जीपीएस के नागरिक संकेत लगभग 1575 मेगाहर्ट्ज़ और 1227 मेगाहर्ट्ज़ पर आते हैं, यानी L-बैंड में, जो सूक्ष्मतरंग क्षेत्र का ही एक भाग है।
- छोटे ड्रोन की नियंत्रण-कड़ी और वीडियो-कड़ी प्रायः 2·4 गीगाहर्ट्ज़ और 5·8 गीगाहर्ट्ज़ की खुली पट्टियों पर चलती हैं, जो सूक्ष्मतरंग परास में हैं।
- जाम करने का सिद्धांत यह है कि लक्ष्य की अपनी पट्टी में इतनी शोर-ऊर्जा भरी जाए कि अभिग्राही का संकेत-से-शोर अनुपात गिर जाए; इसलिए जामर की आवृत्ति लक्ष्य से तय होती है।
- उपग्रह से आने वाले जीपीएस संकेत पृथ्वी तक बहुत क्षीण पहुँचते हैं, इसीलिए पास से भेजी गई अपेक्षाकृत कम शक्ति भी उन्हें ढक देने के लिए पर्याप्त होती है।
आगे की तैयारी
सामान्य भ्रम
- यह मान लेना कि जामर की आवृत्ति स्वतंत्र रूप से चुनी जाती है; वह लक्ष्य-कड़ी की आवृत्ति से बँधी होती है, क्योंकि अभिग्राही का छन्ना अपनी पट्टी के बाहर की ऊर्जा भीतर आने ही नहीं देता।
- अवरक्त और दूर-अवरक्त को दो अलग-अलग संभावित उत्तर मानकर उन्हीं में से चुनने में लग जाना, जबकि दोनों ही रेडियो-संचार के परास से बाहर हैं और प्रश्न उसी एक रेखा पर कटता है।
- जाम और छल (स्पूफ़िंग) को एक मान लेना : जाम असली संकेत को शोर से ढकता है और ड्रोन को अंधा कर देता है, जबकि छल में नक़ली किन्तु विश्वसनीय दिखने वाला जीपीएस संकेत भेजकर ड्रोन को झूठी अवस्थिति पर भरोसा करा दिया जाता है — दोनों उसी सूक्ष्मतरंग पट्टी पर होते हैं, पर परिणाम अलग है।
- लेज़र से ड्रोन गिराने को भी जाम मान लेना; वह प्रकाशिक प्रतिकार है, विद्युत-चुम्बकीय जाम नहीं।
इस पेपर में विज्ञान के प्रश्न प्रायः किसी सामयिक तकनीकी परिदृश्य से खुलते हैं और फिर उसके भीतर छिपे एक बुनियादी सिद्धांत पर आ टिकते हैं। यहाँ परिदृश्य ड्रोन-झुंड का है, पर परखा जा रहा तथ्य वर्णक्रम का क्रम है।
इसी विषय के दूसरे रूप भी लौटते रहते हैं : किसी तरंग-परास की तरंगदैर्ध्य पूछना, दो परासों को क्रम में रखवाना, या किसी तकनीक को उसके वर्णक्रमीय क्षेत्र से जोड़ना — जैसे रडार, वाई-फ़ाई और उपग्रह कड़ी को सूक्ष्मतरंग में, तापीय कैमरे को अवरक्त में।
उत्तर तक पहुँचने का भरोसेमंद रास्ता वही है जो यहाँ अपनाया गया : पहले पूछिए कि जिस प्रणाली को बाधित करना है वह किस परास में काम करती है, फिर वही परास चुन लीजिए। इससे विकल्पों को याद रखने की ज़रूरत नहीं पड़ती, तर्क अपने-आप एक ही विकल्प पर ले जाता है।
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- (a) infrared waves and radio waves.
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उत्तर(a) infrared waves and radio waves.
सूक्ष्मतरंगों की तरंगदैर्ध्य वर्णक्रम में किन दो पड़ोसियों के बीच पड़ती है, यही पूछने वाला प्रश्न — वही क्रम जो यहाँ उत्तर तय करता है।
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- (c) Both 1 and 2
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उत्तर(c) Both 1 and 2
जीपीएस पर कथन-सूची वाला प्रश्न, जो उपग्रह-आधारित नौवहन के काम करने के ढंग और उसके व्यावहारिक उपयोगों की जाँच करता है।
अभ्यास
- practice — not a real PYQ
जीपीएस जामर को जिस आवृत्ति पर शोर भेजना पड़ता है, वह किस बात से तय होती है ? नीचे दिए विकल्पों में से सही कारण चुनिए ।
- (a)जामर की अपनी शक्ति से, क्योंकि अधिक शक्ति वाले जामर ऊँची आवृत्ति पर चलते हैं
- (b)उस कड़ी की आवृत्ति से, जिसे बाधित करना है, क्योंकि शोर उसी पट्टी में भरना पड़ता है
- (c)ड्रोन की ऊँचाई से, क्योंकि ऊँचाई बढ़ने पर आवृत्ति घटती है
- (d)वातावरण के तापमान से, क्योंकि तापमान आवृत्ति बदल देता है
उत्तर(b) उस कड़ी की आवृत्ति से, जिसे बाधित करना है, क्योंकि शोर उसी पट्टी में भरना पड़ता है — अभिग्राही अपनी पट्टी से बाहर की ऊर्जा को छानकर हटा देता है, इसलिए दूसरी परास में भेजा गया शोर संकेत तक पहुँचता ही नहीं।