2024 – 25 में भारतीय अर्थव्यवस्था में, सकल मूल्य वर्धित में वर्तमान कीमतों के आधार पर सेवा क्षेत्र के योगदान का आकलन कितना है ?
- (a)25%
- (b)35%
- (c)45%
- (d)55%
उत्तर
क्यों
सही उत्तर — D, (d) 55%।
2024-25 के लिए वर्तमान कीमतों पर सकल मूल्य वर्धित में सेवा क्षेत्र का हिस्सा लगभग 55 प्रतिशत आँका गया है। आर्थिक समीक्षा 2024-25 यह आँकड़ा 55·3 प्रतिशत रखती है और यह भी दर्ज करती है कि बीते दशक में कुल सकल मूल्य वर्धित में इस क्षेत्र का योगदान 2013-14 के 50·6 प्रतिशत से बढ़कर इस स्तर तक पहुँचा है। दिए गए चार विकल्प दस-दस प्रतिशत बिंदु के अंतर पर रखे गए हैं, और उनमें 55 प्रतिशत ही अकेला ऐसा है जो इस आकलन की पहुँच में आता है।
यह आँकड़ा रटने के बजाय समझने योग्य है, क्योंकि भारतीय अर्थव्यवस्था के बारे में यही सबसे महत्वपूर्ण संरचनात्मक तथ्य है। सकल मूल्य वर्धित उत्पादन का वह माप है जो आधारभूत कीमतों पर लिया जाता है — अर्थात् उत्पाद-कर जोड़ने और सब्सिडी घटाने से पहले — और वह तीन बड़े क्षेत्रों में बँटता है। कृषि और संबद्ध गतिविधियाँ उसका लगभग छठा हिस्सा लेती हैं। उद्योग, जिसमें विनिर्माण, खनन, निर्माण और बिजली तथा अन्य उपयोगिता सेवाएँ आती हैं, एक-तिहाई से कुछ कम। शेष और सबसे बड़ा हिस्सा सेवाओं का है — व्यापार, होटल, परिवहन और संचार; वित्तीय, स्थावर संपदा और वृत्तिक सेवाएँ; तथा लोक प्रशासन, रक्षा और अन्य सेवाएँ।
इस हिस्से की दो बातें प्रायः पूछी जाती हैं। पहली यह कि वह लगातार बढ़ा है: बीते लगभग तीन दशकों में सेवाएँ पूरी अर्थव्यवस्था से तेज़ बढ़ी हैं, और इसीलिए दस वर्षों में यह हिस्सा लगभग पाँच प्रतिशत बिंदु आगे खिसका है। दूसरी बात रोज़गार के साथ उसका बेमेल है। सेवाएँ मूल्य वर्धित का लगभग 55 प्रतिशत पैदा करती हैं पर कार्यबल का उससे बहुत छोटा हिस्सा नियोजित करती हैं, जबकि कृषि में यह उलटा है — उत्पादन का मामूली हिस्सा और कामगारों का बड़ा हिस्सा। उत्पादन-हिस्से और रोज़गार-हिस्से का यही अंतर भारत के संरचनात्मक रूपांतरण की हर चर्चा का मानक आरंभ-बिंदु है।
प्रश्न के रूप पर एक टिप्पणी: यह वाक्य प्रश्नवाचक चिह्न पर समाप्त होता है और आँकड़ा माँगता है, इसलिए चुना हुआ विकल्प उत्तर देता है, वाक्य पूरा नहीं करता।
अन्य विकल्प क्यों गलत हैं
- (a)25% — 25 प्रतिशत सेवा क्षेत्र के हिस्से से बहुत नीचे है और उस आँकड़े के अधिक निकट है जो उद्योग सकल मूल्य वर्धित में देता है। यह वैसा आँकड़ा है जो अभ्यर्थी तब बनाता है जब वह सेवाओं के उत्पादन-हिस्से को सेवाओं के रोज़गार-हिस्से से मिला देता है, जो कहीं छोटा है, या जब वह अकेले विनिर्माण का हिस्सा याद कर लेता है, जो उससे भी छोटा है — विनिर्माण वर्षों से सकल मूल्य वर्धित के लगभग छठे हिस्से के आसपास ही रहा है, उन आकांक्षाओं से बहुत पीछे जो लगातार नीतिगत घोषणाओं में उसके लिए व्यक्त की जाती रही हैं। इसलिए यह विकल्प एक असली आँकड़ा है, बस ग़लत क्षेत्र का।
- (b)35% — 35 प्रतिशत सेवा क्षेत्र के हिस्से को बीस प्रतिशत बिंदु कम करके बताता है, और वह पूरे उद्योग के हिस्से के काफ़ी निकट बैठता है — विनिर्माण, खनन, निर्माण और उपयोगिता सेवाएँ मिलाकर, जिनका संयुक्त हिस्सा सकल मूल्य वर्धित के एक-तिहाई से कुछ कम है। यह विकल्प किसी दूसरे क्षेत्र के लिए सही होता, और यही उसे केवल ख़ारिज करने के बजाय नाम लेकर समझाने योग्य बनाता है: जिस अभ्यर्थी को क्षेत्रवार हिस्से याद तो हैं पर वह उन्हें ग़लत क्षेत्र से जोड़ देता है, वह या तो यहाँ आकर गिरेगा या पहले विकल्प पर। ऐसे प्रश्न में क्षेत्र और आँकड़े को जोड़े के रूप में याद रखना ही बचाव है।
- (c)45% — 45 प्रतिशत ग़लत विकल्पों में सबसे निकट है और वही विकल्प है जिसे वह अभ्यर्थी चुनेगा जो सेवा क्षेत्र के हिस्से को आज की स्थिति से नहीं, कुछ वर्ष पहले की स्मृति से बोल रहा है। यह हिस्सा आधे का आँकड़ा उस काल से बहुत पहले पार कर चुका था जिसके बारे में यह प्रश्न पूछता है — 2013-14 में ही वह 50·6 प्रतिशत था — और तब से लगातार बढ़ता रहा है। 45 प्रतिशत चुनने का अर्थ ऐसा आँकड़ा काम में लेना है जो एक दशक पहले भी पुराना पड़ चुका था, और विकल्पों के बीच रखा गया दस प्रतिशत बिंदु का अंतर ठीक इसी उद्देश्य से है कि ऐसी देरी लगभग-सही उत्तर नहीं, पूरा ग़लत उत्तर बने।
अवधारणा
सकल मूल्य वर्धित वह माप है जो क्षेत्रवार विश्लेषण के लिए काम में लिया जाता है। यह उत्पादित वस्तुओं और सेवाओं का मूल्य है, जो आधारभूत कीमतों पर लिया जाता है — अर्थात् उत्पाद-कर जोड़ने और उत्पाद-सब्सिडी घटाने से पहले। बाज़ार कीमतों पर सकल घरेलू उत्पाद = आधारभूत कीमतों पर सकल मूल्य वर्धित + उत्पाद-कर – उत्पाद-सब्सिडी; इसी कारण दोनों शृंखलाएँ भिन्न होती हैं और इसी कारण क्षेत्रवार हिस्से हमेशा पहली से उद्धृत किए जाते हैं।
आज भारत में सकल मूल्य वर्धित का तीन-क्षेत्रीय विभाजन मोटे तौर पर ऐसा है: कृषि और संबद्ध गतिविधियाँ लगभग छठा हिस्सा; उद्योग, अर्थात् विनिर्माण, खनन, निर्माण तथा बिजली और अन्य उपयोगिता सेवाएँ, एक-तिहाई से कुछ कम; और शेष सेवाएँ, लगभग 55 प्रतिशत।
सेवाओं के भीतर सबसे बड़े घटक हैं — व्यापार, होटल, परिवहन, संचार और प्रसारण; वित्तीय, स्थावर संपदा तथा वृत्तिक सेवाएँ; और लोक प्रशासन, रक्षा तथा अन्य सेवाएँ।
दीर्घकालिक प्रवृत्ति ही असली बात है। 1990 के दशक से सेवाएँ शेष अर्थव्यवस्था से तेज़ बढ़ी हैं, जिससे उनका हिस्सा लगभग 40 प्रतिशत से बढ़कर लगभग 55 प्रतिशत हुआ, और यह बदलाव मुख्यतः कृषि की क़ीमत पर आया। बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में भारत का रास्ता इस अर्थ में असामान्य है कि यहाँ सेवाएँ तब फैलीं जब विनिर्माण बड़ा हिस्सा बना ही नहीं था, इसलिए देश लंबे विनिर्माण-चरण से गुज़रे बिना कृषि-प्रधान से सेवा-प्रधान संरचना में पहुँच गया — विनिर्माण का हिस्सा बढ़ाने पर जो नीतिगत ज़ोर है, उसके पीछे यही निरीक्षण है।
साथ रखने योग्य तथ्य रोज़गार का है। सेवाएँ कार्यबल के अल्पांश से उत्पादन का बहुमत पैदा करती हैं और कृषि इसके उलट, और इन दोनों अनुपातों का अंतर ही दोनों क्षेत्रों में प्रति कामगार उत्पादकता के अंतर का माप है।
उत्पादन में क्षेत्रवार हिस्से इन पेपरों में किसी न किसी रूप में हर बार पूछे जाते हैं, और प्रश्न प्रायः यहाँ की तरह दूर-दूर रखे गए विकल्पों के साथ बनते हैं, ताकि लगभग सही आँकड़ा भी पर्याप्त हो। यह एक साथ रियायत भी है और जाल भी: इसका अर्थ यह है कि प्रश्न बिना सटीकता के भी हल हो सकता है, पर यह भी कि पुराना पड़ चुका आँकड़ा सत्य से एक पूरा विकल्प दूर पड़ेगा, दशमलव की भूल जितना नहीं।
वर्तमान आँकड़ों का भरोसेमंद स्रोत संघ बजट से पहले प्रस्तुत होने वाली आर्थिक समीक्षा है, और उसका सेवा-अध्याय उस वर्ष का हिस्सा तथा वृद्धि दर, दोनों देता है। इन पेपरों की तैयारी करने वाले को हर समीक्षा से तीन संख्याएँ उठा लेनी चाहिए — क्षेत्रवार हिस्से, वृद्धि दरें, और मुख्य राजकोषीय तथा मुद्रास्फीति के आँकड़े — और हर संख्या के साथ उसका वर्ष भी दर्ज करना चाहिए, क्योंकि ये प्रश्न हमेशा कोई एक वर्ष निर्दिष्ट करते हैं।
प्रश्न की एक और बात ध्यान देने योग्य है। यह वर्तमान कीमतों पर हिस्सा पूछता है, स्थिर कीमतों पर नहीं। दोनों शृंखलाओं में क्षेत्रवार हिस्से थोड़े अलग निकलते हैं, क्योंकि सापेक्ष कीमतें समय के साथ बदलती हैं; इसलिए 'वर्तमान कीमतों के आधार पर' कोई अलंकार नहीं, प्रश्न की शर्त है और उसी शृंखला का आँकड़ा उत्तर देता है।
मुख्य तथ्य
- आर्थिक समीक्षा 2024-25 सेवा क्षेत्र का हिस्सा 2024-25 के लिए सकल मूल्य वर्धित का 55·3 प्रतिशत आँकती है, जो 2013-14 के 50·6 प्रतिशत से बढ़ा है।
- सकल मूल्य वर्धित आधारभूत कीमतों पर मापा जाता है; बाज़ार कीमतों पर सकल घरेलू उत्पाद = सकल मूल्य वर्धित + उत्पाद-कर – उत्पाद-सब्सिडी, और इसी कारण क्षेत्रवार हिस्से परंपरागत रूप से सकल मूल्य वर्धित से उद्धृत होते हैं।
- शेष दो क्षेत्र मोटे तौर पर — कृषि और संबद्ध गतिविधियाँ लगभग छठा हिस्सा, और उद्योग एक-तिहाई से कुछ कम, जिसमें विनिर्माण, खनन, निर्माण तथा उपयोगिता सेवाएँ आती हैं।
- सेवाएँ कार्यबल के अल्पांश से उत्पादन का बहुमत पैदा करती हैं, जबकि कृषि उत्पादन के मामूली हिस्से के लिए कामगारों का बड़ा हिस्सा लगाती है — यही उत्पादकता का अंतर भारत के संरचनात्मक रूपांतरण के केंद्र में है।
- भारत में सेवाओं का हिस्सा तब बढ़ा जब विनिर्माण उत्पादन का बड़ा हिस्सा बना ही नहीं था, और बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में उसके संरचनात्मक रास्ते की यही असामान्य विशेषता है।
- बिजली, गैस, जल आपूर्ति और अन्य उपयोगिता सेवाएँ राष्ट्रीय लेखा में उद्योग के अंतर्गत आती हैं, सेवा क्षेत्र में नहीं — यह वर्गीकरण प्रायः भ्रम पैदा करता है।
आगे की तैयारी
सामान्य भ्रम
- सेवा क्षेत्र का वह हिस्सा बोल देना जो कई वर्ष पहले याद किया था; यह आँकड़ा एक दशक से भी पहले 50 प्रतिशत पार कर चुका है और तब से बढ़ता रहा है।
- सेवाओं के उत्पादन-हिस्से को सेवाओं के रोज़गार-हिस्से से मिला देना, जो उससे बहुत छोटा है।
- जब प्रश्न उद्योग का पूछे तब अकेले विनिर्माण का हिस्सा बोल देना, या जब वह सेवाओं का पूछे तब उद्योग का।
- सकल मूल्य वर्धित और सकल घरेलू उत्पाद को मिला देना; क्षेत्रवार हिस्से परंपरागत रूप से पहले से उद्धृत होते हैं और दूसरे से लेने पर वे थोड़े भिन्न निकलते हैं।
- प्रश्न में निर्दिष्ट वर्ष और 'वर्तमान कीमतों' वाली शर्त को अनदेखा कर देना; ये हिस्से हर वर्ष कुछ दशमलव अंक खिसकते हैं और स्थिर कीमतों वाली शृंखला में अलग निकलते हैं।
इन पेपरों के अर्थव्यवस्था वाले प्रश्न उन आँकड़ों पर बनते हैं जो आर्थिक समीक्षा और बजट दस्तावेज़ों में छपते हैं, और वे वर्ष के साथ पूछे जाते हैं। विकल्प प्रायः इतने दूर-दूर रखे जाते हैं कि लगभग याद किया हुआ आँकड़ा काम कर जाए — अर्थात् अंक उसे मिलते हैं जिसने वर्तमान समीक्षा देखी है, न कि उसे जिसने दशमलव रट लिए हैं। ऐसे एक-दो प्रश्न प्रति पेपर क्षेत्रवार हिस्सों, वृद्धि दरों या राजकोषीय घाटे पर आने की अपेक्षा रखिए, और उनकी तैयारी गद्य में नहीं, मुख्य संख्याओं की एक छोटी तालिका के रूप में कीजिए, जिसमें हर संख्या के सामने उसका वर्ष लिखा हो। दूसरा प्रचलित रूप वही आँकड़े कथन के भीतर रखकर पूछने का है — 'सेवा क्षेत्र का योगदान लगभग इतना है' — जहाँ जाल आँकड़े में नहीं, उस शर्त में रखा जाता है जो उसके साथ छपी है: वर्तमान बनाम स्थिर कीमतें, या सकल मूल्य वर्धित बनाम सकल घरेलू उत्पाद।
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उत्तर(c) Both 1 and 2
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राष्ट्रीय लेखा में 'बिजली, गैस, जल आपूर्ति और अन्य उपयोगिता सेवाएँ' किस क्षेत्र के अंतर्गत गिनी जाती हैं ?
- (a)कृषि
- (b)उद्योग
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- (d)इनमें से किसी में नहीं
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- (a)सकल घरेलू उत्पाद = सकल मूल्य वर्धित + उत्पाद-कर – सब्सिडी
- (b)सकल घरेलू उत्पाद = सकल मूल्य वर्धित – उत्पाद-कर + सब्सिडी
- (c)सकल घरेलू उत्पाद = सकल मूल्य वर्धित + मध्यवर्ती उपभोग
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उत्तर(a) सकल घरेलू उत्पाद = सकल मूल्य वर्धित + उत्पाद-कर – सब्सिडी — यही दोनों के बीच का मानक संबंध है, और इसी कारण क्षेत्रवार हिस्सेदारी की तुलना सकल मूल्य वर्धित पर की जाती है, जिसमें कर-सब्सिडी का विरूपण नहीं आता।