भारत में सामाजिक संरक्षण के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए : 1. अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन द्वारा जारी विश्व सामाजिक संरक्षण रिपोर्ट (WSPR) 2024 – 26 का आकलन है कि भारत के सामाजिक संरक्षण का क्षेत्र 2021 से 2024 तक दोगुना हो गया है । 2. श्रम और रोज़गार मंत्रालय का आकलन है कि केंद्र सरकार की योजनाओं द्वारा लगभग 65% जनसंख्या कम-से-कम किसी एक प्रकार के सामाजिक संरक्षण, चाहे वह नकद हो अथवा अनुग्रह हो, के क्षेत्र में आती है । उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं ?
- (a)केवल 1
- (b)केवल 2
- (c)1 और 2 दोनों
- (d)न तो 1 और न ही 2
उत्तर
क्यों
सही उत्तर — C, (c) 1 और 2 दोनों। दोनों कथन एक ही घोषणा से आते हैं और दोनों ठीक हैं।
कथन 1 सही है। अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन की 'विश्व सामाजिक संरक्षण रिपोर्ट 2024 – 26' भारत का सामाजिक संरक्षण कवरेज 2024 में 48·8 प्रतिशत बताती है, जबकि 2021 में वह 24·4 प्रतिशत था। दूसरा आँकड़ा पहले का ठीक आधा है, इसलिए इन तीन वर्षों में क्षेत्र दोगुना हुआ — कथन यही कह रहा है। श्रम और रोज़गार मंत्रालय की अपनी विज्ञप्ति इसी तथ्य से आरंभ होती है — 2021 के 24·4 प्रतिशत से बढ़कर 2024 में 48·8 प्रतिशत — और इस वृद्धि का श्रेय स्वास्थ्य बीमा, पेंशन और रोज़गार-सहायता के विस्तार को देती है। भारत की यह बढ़त इतनी बड़ी थी कि उसने अकेले वैश्विक कवरेज के आँकड़े को लगभग पाँच प्रतिशत बिंदु ऊपर उठा दिया।
कथन 2 सही है और वह उसी विषय का एक दूसरा माप है — इसीलिए दोनों आपस में टकराते नहीं। श्रम और रोज़गार मंत्रालय के अनुसार लगभग 92 करोड़ लोग, यानी जनसंख्या का लगभग 65 प्रतिशत, केंद्र सरकार की योजनाओं के माध्यम से किसी-न-किसी एक प्रकार के सामाजिक संरक्षण के दायरे में हैं, चाहे वह नकद हो या वस्तु-रूप में। कथन का हर अंश मेल खाता है: आकलन करने वाला प्राधिकरण, अनुपात, 'नकद अथवा अनुग्रह' वाली शर्त, और केंद्रीय योजनाओं तक सीमित रहने की शर्त।
48·8 प्रतिशत और 65 प्रतिशत के बीच का जो विरोध दिखता है, समझने लायक़ बात वही है। अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन का सत्यापित आँकड़ा लाभों की एक संकरी श्रेणी गिनता है, जबकि ऊँचा आँकड़ा वस्तु-रूप में मिलने वाले लाभ भी सम्मिलित करता है — खाद्य सुरक्षा और आवास उनमें हैं — जिन्हें अंतर्राष्ट्रीय माप उसी ढंग से नहीं पकड़ता। कवरेज की दो अलग परिभाषाएँ एक ही जनसंख्या के दो अलग प्रतिशत बना देती हैं, और जो कथन हर आँकड़े को अपने स्रोत और अपनी शर्तों सहित बताता है वह दोनों बार सही होता है। यही इस प्रश्न का पूरा तर्क है।
अन्य विकल्प क्यों गलत हैं
- (a)केवल 1 — यह अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन का आँकड़ा स्वीकार करता है और मंत्रालय का अस्वीकार कर देता है। मंत्रालय का आकलन उसी विज्ञप्ति में अभिलिखित है जिसमें अंतर्राष्ट्रीय आँकड़ा दिया गया है, और कथन उसकी शब्दावली को बहुत पास से दोहराता है — जनसंख्या का लगभग 65 प्रतिशत, किसी एक प्रकार के सामाजिक संरक्षण के दायरे में, नकद अथवा वस्तु-रूप में, केंद्र सरकार की योजनाओं के माध्यम से। अभ्यर्थी इसे प्रायः इसलिए अस्वीकार करता है कि 65 प्रतिशत पहले कथन के 48·8 प्रतिशत से इतना ऊपर बैठता है कि दोनों असंगत लगते हैं। वे असंगत नहीं हैं: वे अलग-अलग चीज़ें गिनते हैं, और कथन में लिखी 'अनुग्रह' वाली शर्त ही उस अंतर का सुराग़ है।
- (b)केवल 2 — यह मंत्रालय का आँकड़ा स्वीकार करता है और रिपोर्ट का अस्वीकार कर देता है। भारत के संदर्भ में दोगुना होना उसी 'विश्व सामाजिक संरक्षण रिपोर्ट 2024 – 26' का प्रमुख निष्कर्ष है, और यहाँ गणित लगभग नहीं, ठीक-ठीक है — 2021 में 24·4 प्रतिशत और 2024 में 48·8 प्रतिशत, यानी बिलकुल दुगुना। कथन रिपोर्ट का श्रेय भी ठीक अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन को देता है और उसका संस्करण भी ठीक 2024 – 26 बताता है। इसमें अस्वीकार करने योग्य कुछ नहीं है, और इसे अस्वीकार करने का अर्थ प्रायः यह होता है कि अभ्यर्थी आँकड़े जाँचने के बजाय सुधार के पैमाने पर ही संदेह कर रहा है।
- (d)न तो 1 और न ही 2 — यह दोनों कथन अस्वीकार करता है, जिसके लिए रिपोर्ट के भारत-संबंधी प्रमुख निष्कर्ष और मंत्रालय के अपने प्रकाशित आकलन, दोनों का एक साथ ग़लत होना आवश्यक होगा। दोनों में से कोई ग़लत नहीं है। यह विकल्प उस अभ्यर्थी की स्वाभाविक शरण है जिसने यह देख लिया कि 48·8 प्रतिशत और 65 प्रतिशत एक ही मात्रा का वर्णन नहीं कर सकते और इससे यह निष्कर्ष निकाल लिया कि इनमें से कम-से-कम एक झूठा होगा। उस निरीक्षण से निकलने वाला सही निष्कर्ष ठीक उलटा है: जो दो आँकड़े भिन्न हैं वे अवश्य ही अलग-अलग चीज़ें माप रहे हैं, और यहाँ वह अंतर — वस्तु-रूप में मिलने वाले लाभ — स्वयं दूसरे कथन में लिखा हुआ है।
अवधारणा
सामाजिक संरक्षण का कवरेज कोई एक संख्या नहीं है, और ये प्रश्न वास्तव में यही जाँचते हैं कि आप जानते हैं कि क्यों नहीं है।
अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन की 'विश्व सामाजिक संरक्षण रिपोर्ट' इस विषय का मानक वैश्विक आकलन है। वह किसी जनसंख्या के उस अनुपात को मापती है जो कम-से-कम एक सामाजिक संरक्षण लाभ से प्रभावी रूप से आच्छादित है, और इसके लिए वह सहमत श्रेणियों का एक समुच्चय काम में लेती है — वृद्धावस्था, रुग्णता, मातृत्व, दिव्यांगता, नियोजन-जन्य क्षति, बेरोज़गारी, तथा परिवार और बाल लाभ। किसी देश का कवरेज वह तभी गिनती है जब आँकड़े इन श्रेणियों के विरुद्ध सत्यापित किए जा सकें। 2024 – 26 का संस्करण भारत का कवरेज 2024 में 48·8 प्रतिशत और 2021 में 24·4 प्रतिशत दर्ज करता है।
राष्ट्रीय आकलन इससे चौड़ा हो सकता है। श्रम और रोज़गार मंत्रालय का लगभग 92 करोड़ लोगों, यानी जनसंख्या के लगभग 65 प्रतिशत, वाला आँकड़ा नकद के साथ-साथ वस्तु-रूप में दिए जाने वाले लाभ भी गिनता है — वैसी सहायता, जैसी खाद्य सुरक्षा और आवास कार्यक्रम देते हैं — और स्वयं को केंद्र सरकार की योजनाओं तक सीमित रखता है।
इसलिए दोनों के बीच के अंतर का एक निश्चित कारण है: लाभ किसे गिना जा रहा है। अंतर का एक तीसरा स्रोत, जो आगे के संशोधनों के लिए महत्व रखता है, यह है कि केंद्रीय योजनाओं के साथ राज्यों की योजनाएँ गिनी गई हैं या नहीं — क्योंकि भारत का बहुत बड़ा सामाजिक संरक्षण राज्यों के हाथ से पहुँचता है।
ईपीएफ़ओ के अभ्यर्थी के लिए यह करेंट अफ़ेयर्स नहीं, विषय-ज्ञान है। भारत के मापे गए कवरेज में सबसे बड़ा योगदान उन्हीं योजनाओं का है जिन्हें यह संगठन स्वयं चलाता है — कर्मचारी भविष्य निधि तथा प्रकीर्ण उपबंध अधिनियम, 1952 के अंतर्गत भविष्य निधि, पेंशन और बीमा योजनाएँ — और उनके साथ कर्मचारी राज्य बीमा का। जिस आँकड़ा-संकलन से सुधरे हुए अंक निकले, वह एक विशिष्ट पहचान-संख्या के सहारे बड़ी केंद्रीय योजनाओं के अभिलेख आपस में मिलाकर किया गया था, ताकि एक से अधिक योजना में आने वाला व्यक्ति एक ही बार गिना जाए।
इन पेपरों का करेंट अफ़ेयर्स बहुत हद तक श्रम और रोज़गार मंत्रालय की अपनी घोषणाओं से उठाया जाता है, जो उसी मंत्रालय के संगठनों के लिए होने वाली भर्ती परीक्षा में अस्वाभाविक नहीं है। सामाजिक संरक्षण की रिपोर्टें, रोज़गार के आँकड़े, वेतन संहिताएँ और भविष्य निधि प्रशासन बार-बार लौटते हैं, और कथन प्रायः प्रेस विज्ञप्ति की भाषा के बहुत पास रखे जाते हैं।
इसका एक व्यावहारिक परिणाम है। जहाँ कोई कथन किसी सरकारी विज्ञप्ति को लगभग शब्दशः दोहराता हो — रिपोर्ट का नाम, वर्ष, प्रतिशत और शर्तें सहित — वहाँ उसके बदले हुए होने की तुलना में सही होने की संभावना कहीं अधिक है, क्योंकि परीक्षक ने उसे रचा नहीं, किसी स्रोत से उठाया है। जहाँ बदलाव होता भी है, वह प्रायः किसी संख्या में या किसी श्रेय में होता है, और दोनों को विज्ञप्ति की स्मृति से जाँचा जा सकता है।
यह प्रश्न दो कथनों वाले उस समुच्चय का भी अच्छा उदाहरण है जिसमें कथन असंगत दिखते हैं और होते नहीं। यह बनावट उस अभ्यर्थी को पुरस्कृत करती है जो केवल मुख्य संख्याएँ नहीं, बल्कि शर्तें पढ़ता है — 'चाहे वह नकद हो अथवा अनुग्रह हो', 'केंद्र सरकार की योजनाओं द्वारा' — क्योंकि दोनों आँकड़ों में मेल यही शर्तें बिठाती हैं। संख्या पढ़ना आसान है; शर्त पढ़ना ही यहाँ अंक देता है।
मुख्य तथ्य
- अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन की 'विश्व सामाजिक संरक्षण रिपोर्ट 2024 – 26' भारत का सामाजिक संरक्षण कवरेज 2024 में 48·8 प्रतिशत दर्ज करती है, जबकि 2021 में वह 24·4 प्रतिशत था — तीन वर्षों में ठीक दुगुना।
- श्रम और रोज़गार मंत्रालय का आकलन है कि लगभग 92 करोड़ लोग, यानी जनसंख्या का लगभग 65 प्रतिशत, केंद्र सरकार की योजनाओं के माध्यम से किसी एक प्रकार के सामाजिक संरक्षण के दायरे में हैं, चाहे वह नकद हो या वस्तु-रूप में।
- दोनों आँकड़े इसलिए अलग हैं कि वे अलग-अलग चीज़ें गिनते हैं: अंतर्राष्ट्रीय माप सत्यापित लाभ-श्रेणियों पर आधारित है, जबकि राष्ट्रीय आकलन वस्तु-रूप में मिलने वाले लाभ — जैसे खाद्य सुरक्षा और आवास सहायता — भी सम्मिलित करता है।
- भारत का सुधार इतना बड़ा था कि उसने मापे गए वैश्विक सामाजिक संरक्षण कवरेज को लगभग पाँच प्रतिशत बिंदु ऊपर उठा दिया।
- मापे गए आँकड़े में सुधार एक आँकड़ा-संकलन के बाद आया, जिसमें बड़ी केंद्रीय योजनाओं के लाभार्थी-अभिलेख एक विशिष्ट पहचान-संख्या के सहारे आपस में मिलाए गए, ताकि एक से अधिक योजना में आने वाला व्यक्ति एक ही बार गिना जाए।
- अंतर का एक तीसरा संभावित कारण यह भी है कि राज्यों की अपनी योजनाएँ केंद्रीय योजनाओं के साथ गिनी गई हैं या नहीं — भारत का बहुत बड़ा सामाजिक संरक्षण राज्यों के हाथ से पहुँचता है।
आगे की तैयारी
सामान्य भ्रम
- 48·8 प्रतिशत और 65 प्रतिशत को एक ही मात्रा के दो प्रतिद्वंद्वी आकलन मानकर उनमें से एक को गिरा देना; वे कवरेज की दो अलग परिभाषाएँ माप रहे हैं।
- दूसरे कथन की शर्तों को बिना पढ़े निकल जाना — 'नकद अथवा अनुग्रह', 'केंद्र सरकार की योजनाओं द्वारा' — जबकि पहले कथन से उसका मेल यही शर्तें बिठाती हैं।
- दोगुना होने वाला आँकड़ा मंत्रालय के नाम और 65 प्रतिशत वाला आँकड़ा अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन के नाम कर देना, जिससे दोनों स्रोत आपस में उलट जाते हैं।
- यह मान लेना कि इतना बड़ा बताया गया सुधार अतिशयोक्ति ही होगा; 2021 और 2024 के आँकड़े ठीक दो-से-एक के अनुपात में खड़े हैं।
- रिपोर्ट का संस्करण भ्रमित कर देना; यह 'विश्व सामाजिक संरक्षण रिपोर्ट 2024 – 26' है, और वर्ष-युग्म ही उसकी पहचान है।
सामाजिक सुरक्षा इस भर्ती का केंद्रीय विषय है, और उस पर करेंट अफ़ेयर्स के प्रश्न विशिष्ट घोषणा के स्तर पर बनते हैं: कौन-सी रिपोर्ट, कौन-सा वर्ष, कितना प्रतिशत, और आकलन करने वाला कौन। कथन प्रायः तीन नहीं, दो होते हैं, और विकल्प-सूची 'केवल 1 / केवल 2 / दोनों / न तो … न ही' वाली सीढ़ी होती है; दोनों कथन प्रायः एक ही प्रेस विज्ञप्ति से उठाए जाते हैं, इसलिए जिसने वह विज्ञप्ति पढ़ी है वह दोनों को एक साथ पहचान लेता है। जहाँ पेपर दो ऐसे आँकड़े रख दे जो आपस में टकराते दिखें, वहाँ मेल बिठाने वाली बात लगभग हमेशा कथन में ही छपी किसी शर्त में होती है — कौन-सी लाभ-श्रेणियाँ गिनी गईं, शासन का कौन-सा स्तर लिया गया, या माप किस वर्ष का है। इसलिए ऐसे प्रश्न में पहला काम संख्याओं की तुलना नहीं, शर्तों की तुलना है। इसी विषय का दूसरा रूप योजना-पहचान का है — कौन-सी योजना किस मंत्रालय की, किस वर्ष से, और किसके लिए।
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