निम्नलिखित में से किसने भीमबेटका के गुफाचित्र की खोज की थी ?
- (a)आर्चिबाल्ड कार्लाइल
- (b)अलेक्जेंडर कनिंघम
- (c)वी.एस. वाकणकर
- (d)मॉर्टिमर व्हीलर
उत्तर
क्यों
सही उत्तर — C, (c) वी.एस. वाकणकर।
विष्णु श्रीधर वाकणकर वही पुरातत्ववेत्ता हैं जिन्होंने भीमबेटका के शैलचित्रों को पहचाना। भोपाल के दक्षिण की विंध्य-भूमि से रेल द्वारा गुज़रते हुए उन्हें ऐसी चट्टानी संरचनाएँ दिखीं जो उन्हें स्पेन और फ़्रांस में देखे हुए चित्रित शैलाश्रयों की याद दिला गईं; वे दल के साथ लौटे और 1957 में उन्होंने प्रागैतिहासिक शैलाश्रयों के एक समूह की सूचना दी। एनसीईआरटी की पाठ्यपुस्तक इसी खोज को 1957-58 लिखती है, इसलिए दोनों रूप एक ही घटना के हैं और उनमें से किसी एक को देखकर घबराने की आवश्यकता नहीं। आगे चलकर उन्होंने वहाँ के चित्रों को सात कालों में वर्गीकृत किया और तर्क दिया कि उनमें सबसे प्राचीन उच्च पुरापाषाण काल के हैं। स्थल मध्य प्रदेश के रायसेन ज़िले में, भोपाल से लगभग 45 किलोमीटर दक्षिण-पूर्व में है; तब से पूरे संकुल में साढ़े सात सौ से अधिक शैलाश्रय गिने जा चुके हैं, जिनमें लगभग चार सौ में चित्र हैं, और 2003 में उसे यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में रखा गया।
एक सावधान उत्तर में दो परिसीमाएँ भी आनी चाहिए।
पहली, भीमबेटका वाकणकर से पहले अज्ञात नहीं था। ब्रिटिश अधिकारी डब्ल्यू. किन्केड ने 1888 के एक शोध-लेख में स्थानीय स्तर पर जुटाई सूचना के बल पर उसका उल्लेख किया था, पर उन्होंने उसे बौद्ध स्थल बताया और प्रागैतिहासिक चित्रकला की उन्हें कोई कल्पना नहीं थी। वाकणकर पहले पुरातत्ववेत्ता थे जो इन शैलाश्रयों तक पहुँचे और यह पहचान सके कि वे क्या हैं — प्रश्न में 'खोज' का यही अर्थ है, और यही भेद इस प्रश्न को उत्तर देता है।
दूसरी, स्थल का विस्तार उससे भी बाद में सामने आया। संकुल की व्यापकता और महत्व 1970 के दशक में जाकर स्थापित और प्रकाशित हुए। 1957 जिस बात का चिह्न है वह शैलचित्रों की पहचान है, और वह पहचान वाकणकर की है।
प्रश्न का जाल पहले विकल्प में रखा गया है, और वह इसलिए चलता है कि एक दूसरी, बिलकुल असली खोज को इस खोज से मिला दिया जाता है — यह भेद नीचे विकल्प (a) की टिप्पणी में खोलकर रखा गया है।
अन्य विकल्प क्यों गलत हैं
- (a)आर्चिबाल्ड कार्लाइल — यही वह विकल्प है जो अच्छी तैयारी वाले अभ्यर्थी को पकड़ता है, क्योंकि इसके पीछे का तथ्य सच है और उसी अध्याय में पढ़ाया जाता है जिसमें भीमबेटका। एनसीईआरटी का वाक्य है कि भारत में शैलचित्रों की सबसे पहली खोज 1867-68 में आर्चिबाल्ड कार्लाइल ने की, जो स्पेन में आल्तामीरा की खोज से बारह वर्ष पहले थी। पर उन्हें जो शैलाश्रय मिले वे मिर्ज़ापुर क्षेत्र की कैमूर पहाड़ियों में थे, भीमबेटका में नहीं; और उन्हें जिस खोज का श्रेय है वह एक विषय के रूप में भारतीय शैलचित्रकला की खोज है, इस स्थल की नहीं। जिस अभ्यर्थी ने 1867-68 और आल्तामीरा वाला वाक्य रट रखा है और जिसके सामने शैलकला का कोई प्रश्न आता है, वह यही नाम लिखेगा — जब तक कि दोनों खोजों को अलग-अलग रखकर याद न किया गया हो। यह भी ध्यान दीजिए कि पुस्तिका नाम कार्लाइल छापती है, और अलग-अलग विवरणों में इस वर्तनी में अंतर मिलता है।
- (b)अलेक्जेंडर कनिंघम — अलेक्जेंडर कनिंघम भारतीय पुरातत्व को एक सरकारी विद्या-शाखा के रूप में खड़ा करने वाले व्यक्ति थे: 1861 में वे पुरातत्व सर्वेक्षक नियुक्त हुए और 1871 में विभाग के पुनर्गठन पर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के पहले महानिदेशक बने; चीनी यात्रियों के मार्ग-विवरणों के सहारे किए गए उनके बौद्ध स्थलों के सर्वेक्षण इस विषय की नींव हैं। उनका काम खड़े स्मारकों, अभिलेखों, स्तूपों और सिक्कों का है, प्रागैतिहासिक चित्रकला का नहीं, और वे भीमबेटका के शैलाश्रयों की पहचान से लगभग एक शताब्दी पहले के हैं। यह विकल्प इसलिए रखा गया है कि भारत में किसी भी पुरातात्विक खोज के प्रश्न पर सबसे पहले यही नाम स्मरण में आता है — और यही उसे जाल बनाता है।
- (d)मॉर्टिमर व्हीलर — सर मॉर्टिमर व्हीलर 1944 से 1948 तक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के महानिदेशक रहे, और उनका नाम हड़प्पा तथा मोहनजोदड़ो के उत्खनन, कोरोमंडल तट के अरिकामेडु और कर्नाटक के ब्रह्मगिरि से जुड़ा है, साथ ही स्तर-विन्यास पद्धति के प्रवर्तन और भारतीय पुरातत्ववेत्ताओं की एक पूरी पीढ़ी के प्रशिक्षण से। इनमें से कुछ भी भीमबेटका को नहीं छूता, और उनका कार्यकाल इन शैलाश्रयों की सूचना दिए जाने से नौ वर्ष पहले समाप्त हो चुका था। पिछले विकल्प की तरह यह भी भारतीय पुरातत्व का एक प्रसिद्ध नाम इस अपेक्षा से रखता है कि जिसे विशिष्ट उत्तर मालूम नहीं है वह प्रतिष्ठा के आधार पर चुन लेगा।
अवधारणा
भारतीय शैलकला और उससे जुड़े नामों को सावधानी से अलग-अलग रखना चाहिए, क्योंकि परीक्षक उन्हें ठीक एक-दूसरे के सामने रखता है।
आर्चिबाल्ड कार्लाइल, जो कनिंघम के सहायक थे, ने 1867-68 में मिर्ज़ापुर क्षेत्र की कैमूर पहाड़ियों में भारत के शैलचित्रों की पहली खोज की — स्पेन में आल्तामीरा की चित्रित गुफ़ा मिलने से बारह वर्ष पहले। उनके बारे में जो बात सामान्यतः कही जाती है वह यही प्राथमिकता है, और वह दावा सामान्य रूप से भारतीय शैलकला के बारे में है, किसी एक स्थल के बारे में नहीं।
वी.एस. वाकणकर ने 1957 में भीमबेटका के शैलाश्रयों को पहचाना और उनकी सूचना दी, और आगे चलकर वहाँ के चित्रों को सात कालों में बाँटा। भीमबेटका उपमहाद्वीप का सबसे बड़ा और सबसे प्रसिद्ध शैलकला-संकुल है।
स्वयं स्थल: भीमबेटका मध्य प्रदेश के रायसेन ज़िले में विंध्य की दक्षिणी सीमा पर, भोपाल से लगभग 45 किलोमीटर दक्षिण-पूर्व में, साल और सागौन के वन के भीतर है। साढ़े सात सौ से अधिक शैलाश्रय ज्ञात हैं और उनमें लगभग चार सौ चित्रित हैं। चित्र उच्च पुरापाषाण और मध्यपाषाण काल से लेकर ताम्रपाषाण, आद्य-ऐतिहासिक और मध्यकाल तक फैले हैं, इसलिए एक ही शैलाश्रय में हज़ारों वर्ष के अंतर वाला काम मिल सकता है। रंग खनिज थे — लाल के लिए हेमेटाइट, काले के लिए मैंगनीज़ और कोयला, सफ़ेद के लिए चूना-पत्थर — और इसी कारण वे ओट वाली सतहों पर टिके रहे। विषयों में आखेट के दृश्य, पशु, नर्तक, और बाद की परतों में तलवार तथा भाला लिए घुड़सवार आते हैं। यूनेस्को ने 2003 में इसे सूची में रखा।
जो भेद पकड़ना है वह यह है: भारत में शैलकला की पहली खोज कार्लाइल की है और 1860 के दशक की; भीमबेटका की खोज वाकणकर की है और 1957 की।
प्रागैतिहासिक कला इन पेपरों के कला-संस्कृति खंड का छोटा पर भरोसेमंद हिस्सा है, और भीमबेटका वह स्थल है जिस पर वह सबसे अधिक बार बैठाई जाती है — कभी इसी तरह के एक-उत्तर वाले प्रश्न के रूप में, और कभी भारतीय चित्रकला के कालानुक्रम की एक प्रविष्टि के रूप में, जैसा इसी पृष्ठ पर दो प्रश्न आगे किया गया है।
यहाँ की विकल्प-सूची इस बात का अच्छा उदाहरण है कि एक-उत्तर वाले सांस्कृतिक प्रश्न कैसे बनाए जाते हैं। एक विकल्प उत्तर है; एक किसी पड़ोसी विषय का सच्चा तथ्य है, जो उन्हें पकड़ने के लिए रखा गया है जिन्होंने अध्याय पढ़ा तो है पर उसके भीतर भेद नहीं किया; और दो उसी क्षेत्र के प्रतिष्ठित नाम हैं, जो उन्हें पकड़ने के लिए हैं जिन्होंने अध्याय पढ़ा ही नहीं और जो प्रसिद्धि के आधार पर चुनेंगे। इनमें बीच वाला प्रकार ही ख़तरनाक है, और उसके विरुद्ध एकमात्र बचाव यह है कि खोजों को उनके स्थल और तिथि के साथ याद रखा जाए, नामों की सूची के रूप में नहीं।
एक और बात 'खोज' शब्द की है। किसी स्थल के बारे में तीन अलग-अलग घटनाएँ प्रायः एक ही शब्द में समेट दी जाती हैं — पहला उल्लेख, पहली पहचान, और विस्तार की स्थापना। भीमबेटका में ये तीनों तीन अलग तिथियों पर हैं: 1888 का उल्लेख, 1957 की पहचान, और 1970 के दशक में विस्तार का सामने आना। जहाँ प्रश्न 'खोज' पूछता हो, वहाँ यह देखना पड़ता है कि इन तीनों में से कौन-सी घटना अभीष्ट है; यहाँ अभीष्ट पहचान है, क्योंकि विकल्पों में वही एक नाम है जो पहचान से जुड़ा है।
मुख्य तथ्य
- वी.एस. वाकणकर पहले पुरातत्ववेत्ता थे जो भीमबेटका के शैलाश्रयों तक पहुँचे और उनका प्रागैतिहासिक महत्व पहचाना; उन्होंने 1957 में उनकी सूचना दी, स्पेन और फ़्रांस में देखे हुए चित्रित स्थलों जैसी चट्टानी संरचनाएँ देखकर वहाँ लौटने के बाद।
- आर्चिबाल्ड कार्लाइल ने भारत में शैलचित्रों की पहली खोज 1867-68 में मिर्ज़ापुर क्षेत्र की कैमूर पहाड़ियों में की, आल्तामीरा की खोज से बारह वर्ष पहले — यह भीमबेटका की खोज से अलग खोज है।
- डब्ल्यू. किन्केड ने 1888 के एक शोध-लेख में भीमबेटका का उल्लेख किया था, पर उसे बौद्ध स्थल बताया; संकुल का विस्तार और महत्व 1970 के दशक में जाकर स्थापित हुआ।
- भीमबेटका मध्य प्रदेश के रायसेन ज़िले में, भोपाल से लगभग 45 किलोमीटर दक्षिण-पूर्व में है; साढ़े सात सौ से अधिक शैलाश्रय ज्ञात हैं, जिनमें लगभग चार सौ चित्रित हैं, और यूनेस्को ने 2003 में उसे विश्व धरोहर घोषित किया।
- अलेक्जेंडर कनिंघम भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के पहले महानिदेशक थे (सर्वेक्षक नियुक्ति 1861, महानिदेशक 1871) और मॉर्टिमर व्हीलर 1944 से 1948 तक महानिदेशक रहे — दोनों भारतीय पुरातत्व के बड़े नाम, पर दोनों का भीमबेटका से कोई संबंध नहीं।
- भीमबेटका के चित्र उच्च पुरापाषाण और मध्यपाषाण से लेकर मध्यकाल तक फैले हैं और खनिज रंगों से बने हैं — लाल के लिए हेमेटाइट, काले के लिए मैंगनीज़ और कोयला, सफ़ेद के लिए चूना-पत्थर।
आगे की तैयारी
सामान्य भ्रम
- भीमबेटका का श्रेय कार्लाइल को दे देना, क्योंकि भारत में शैलचित्रों की पहली खोज उन्हीं की है; दोनों खोजों में लगभग नब्बे वर्ष और कई सौ किलोमीटर का अंतर है।
- विशिष्ट तथ्य न जानने पर विकल्प-सूची का सबसे प्रसिद्ध नाम चुन लेना — कनिंघम और व्हीलर वाले विकल्प ठीक इसी के लिए रखे गए हैं।
- 1888 में भीमबेटका के बौद्ध स्थल के रूप में उल्लेख को उसकी प्रागैतिहासिक चित्रित संकुल के रूप में पहचान से मिला देना; ये दो अलग घटनाएँ हैं और उनके बीच सत्तर वर्ष का अंतर है।
- स्थल के विस्तार की पहचान को 1957 में रख देना; वह 1970 के दशक की बात है, और 1957 शैलचित्रों की पहचान का वर्ष है।
- भीमबेटका की खोज का वर्ष कहीं 1957 और कहीं 1957-58 पढ़कर यह मान लेना कि दो अलग घटनाएँ हैं; एनसीईआरटी 1957-58 लिखता है और दोनों रूप एक ही खोज के हैं।
इन पेपरों के एक-उत्तर वाले सांस्कृतिक प्रश्न चार नामों या चार स्थानों से बनते हैं, जिनमें एक सही होता है, एक किसी सचमुच पड़ोसी तथ्य से जुड़ा होता है, और दो प्रतिष्ठित पर असंगत होते हैं। इस बनावट का अर्थ यह है कि प्रश्न उस अभ्यर्थी को अधिक दंड देता है जिसने अध्याय ढीले ढंग से पढ़ा है, बनिस्बत उसके जिसने पढ़ा ही नहीं — क्योंकि ढीला पाठ जो चीज़ बचाकर रखता है वही पड़ोसी तथ्य है। इसलिए तैयारी में हर खोज, उत्खनन या श्रेय को उसके स्थल और तिथि के साथ बाँधना चाहिए, और उन जोड़ों के प्रति सतर्क रहना चाहिए जिन्हें ये पेपर आमने-सामने रखते हैं — पहली शैलचित्र-खोज बनाम भीमबेटका, कनिंघम बनाम व्हीलर, एलोरा बनाम एलिफ़ेंटा। एक और सामान्य रूप यह है कि इसी स्थल पर तिथि, राज्य, ज़िला या यूनेस्को-सूची के वर्ष का प्रश्न बना दिया जाए, इसलिए भीमबेटका के साथ चार बातें एक इकाई की तरह रखिए: रायसेन ज़िला, 1957 की पहचान, वाकणकर, और 2003 की यूनेस्को सूची।
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