1920 से 1935 तक के स्वतंत्रता संग्राम के संबंध में निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं ? 1. बिहार और बंगाल में, असहयोग आंदोलन की प्रभाविता किसानों की सहभागिता के कारण थी । 2. बिहार में वे किसान सभा के नेतृत्व में बाग़ान-मालिकों के विरुद्ध संगठित थे । 3. बंगाल के मिदनापुर में, माहिष्य किसान, बीरेंद्रनाथ ससमल के नेतृत्व में यूनियन बोर्ड के करों के विरुद्ध एकजुट हुए । नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर उत्तर चुनिए :
- (a)1, 2 और 3
- (b)केवल 2 और 3
- (c)केवल 1
- (d)केवल 3
उत्तर
क्यों
सही उत्तर — A, (a) 1, 2 और 3। तीनों कथन असहयोग आंदोलन के पूर्वी प्रांतों वाले मानक विवरण को दोहराते हैं, और वे वस्तुतः तीन स्वतंत्र दावे नहीं, एक ही तर्क के तीन हिस्से हैं।
कथन 1 वह तर्क रखता है। बिहार और बंगाल में आंदोलन को बल गाँवों से मिला। कांग्रेस का 1920 वाला कार्यक्रम — स्कूल, अदालत, परिषद और विदेशी कपड़े का बहिष्कार — शहरों और पेशेवर वर्गों के लिए बना था, और जहाँ वह उनसे आगे गया वहाँ पहले से मौजूद कृषि-संबंधी शिकायतों से जुड़कर गया। इन दोनों प्रांतों में वैसी शिकायतें जीवित थीं, और वहाँ आंदोलन की प्रभाविता की व्याख्या अकेले बहिष्कार-कार्यक्रम से नहीं, किसानों की सहभागिता से की जाती है।
कथन 2 उसी तर्क का बिहार वाला उदाहरण है। बिहार में किसान बाग़ान-मालिकों के विरुद्ध किसान सभा के झंडे तले संगठित हुए। उत्तरी बिहार में यूरोपीय बाग़ान-मालिकों के विरुद्ध आंदोलन की परंपरा उन्हीं नील-संबंधी शिकायतों तक जाती है जो 1917 में गांधीजी को चंपारण लाई थीं, और 1920-22 में कांग्रेस का आंदोलन उन्हीं ज़िलों में सबसे मज़बूत रहा जहाँ पहले ऐसा आंदोलन और किसान सभा की गतिविधि हो चुकी थी।
कथन 3 बंगाल वाला उदाहरण है, और तीनों में सबसे ठोस। मिदनापुर ज़िले में माहिष्य किसान 1919 में उन यूनियन बोर्डों के करों के विरुद्ध संगठित हो चुके थे जो उसी वर्ष के बंगाल ग्राम स्वशासन अधिनियम के अंतर्गत बने थे, और उनके नेता बीरेंद्रनाथ ससमल थे, जिन्होंने कांथी और तामलुक अनुमंडलों में अभियान चलाया। वह आंदोलन आगे चलकर असहयोग में मिल गया, और वह सफल भी हुआ: 17 दिसंबर 1921 तक ज़िले के 227 में से 226 यूनियन बोर्ड समाप्त कर दिए गए थे और अंतिम अगले वर्ष गया।
तीनों टिकते हैं, इसलिए उत्तर वही विकल्प है जो तीनों को लेता है।
पढ़ने की एक बात। कथन 2 'बिहार में वे किसान सभा के नेतृत्व में…' से शुरू होता है और उस सर्वनाम का कोई कर्ता उसी कथन के भीतर नहीं है; वह कथन 1 के किसानों को उठाता है। तीनों कथन एक निरंतर गद्यांश की तरह पढ़े जाने के लिए बने हैं, और उन्हें उसी तरह परखा भी जाना चाहिए।
अन्य विकल्प क्यों गलत हैं
- (b)केवल 2 और 3 — यह सामान्य प्रतिज्ञा को गिराकर दोनों उदाहरण रख लेता है, और इससे प्रश्न की बनावट ही उलट जाती है: कथन 2 और 3 प्रमाण हैं, और कथन 1 वह बात है जिसके वे प्रमाण हैं। यह मानना संभव नहीं कि बिहार में किसान सभा के तले किसान बाग़ान-मालिकों के विरुद्ध संगठित हुए और मिदनापुर में माहिष्य किसान यूनियन बोर्ड करों के विरुद्ध उठे, और साथ ही यह भी माना जाए कि इन दो प्रांतों में आंदोलन की प्रभाविता किसानों की सहभागिता से नहीं आई — क्योंकि दूसरा और तीसरा कथन ठीक उसी सहभागिता का नाम ले रहे हैं जिसका दावा पहला करता है। इसके अतिरिक्त कथन 2 का सर्वनाम कथन 1 के किसानों की ओर ही इशारा करता है, इसलिए कथन 1 हटाने पर कथन 2 का कोई कर्ता ही नहीं बचता।
- (c)केवल 1 — यह सामान्य दावा स्वीकार करता है और उसके दोनों उदाहरण अस्वीकार कर देता है। मिदनापुर वाला प्रसंग तो पूरे आंदोलन के सबसे अच्छी तरह प्रलेखित प्रसंगों में है: बीरेंद्रनाथ ससमल ने 1919 के बंगाल ग्राम स्वशासन अधिनियम के अंतर्गत बने यूनियन बोर्डों के विरुद्ध कांथी और तामलुक के माहिष्य किसानों का नेतृत्व किया, अभियान असहयोग में मिल गया, और 1921 के अंत तक ज़िले के 227 में से लगभग हर यूनियन बोर्ड समाप्त हो गया। इसी अभियान के कारण ससमल 'देशप्राण' कहलाए। जो विकल्प इसे ग़लत बताता है, वह बंगाल में आंदोलन की सबसे सफल स्थानीय कार्रवाई को ही फेंक देता है।
- (d)केवल 3 — यह केवल मिदनापुर वाला उदाहरण रखता है, और तीनों ग़लत विकल्पों में सबसे बचाव-योग्य है — कथन 3 सबसे ठोस है और सबसे आसानी से जाँचा जा सकता है, इसलिए सतर्क अभ्यर्थी उसे मानकर शेष पर संदेह कर सकता है। यह जो चूक जाता है वह यह है कि बिहार वाला आधा चित्र भी उसी तरह के प्रमाण पर खड़ा है: वहाँ किसान-संगठन किसान सभा के नाम से चला और उसका निशाना बाग़ान-मालिक थे, उस प्रांत में जहाँ चंपारण की नील-संबंधी शिकायतों के बाद से बाग़ान-विरोधी आंदोलन ही सामान्य ढर्रा रहा। कथन 2 को अस्वीकार करना प्रायः इसलिए होता है कि अभ्यर्थी बिहार प्रांतीय किसान सभा की औपचारिक स्थापना की तिथि से उसे तौलता है, जबकि कथन प्रश्न के 1920 से 1935 वाले दायरे में किसानों के संगठित होने का ढंग बता रहा है, किसी संस्था की स्थापना-तिथि नहीं।
अवधारणा
असहयोग आंदोलन प्रायः उसके राष्ट्रीय कार्यक्रम के रास्ते पढ़ाया जाता है, जबकि दिलचस्प ऐतिहासिक प्रश्न यह है कि वह इतनी असमानता से क्यों फैला। इसका सामान्य उत्तर यह है कि वह वहीं जड़ें जमा सका जहाँ वह पहले से संगठित किसी स्थानीय शिकायत से जुड़ पाया।
इससे चार बड़े ढर्रे बने। अवध में वह बेदख़ली और अत्यधिक लगान के विरुद्ध चल रही काश्तकार-गोलबंदी में मिल गया। आंध्र में उसने पहाड़ी क्षेत्रों की वन-संबंधी शिकायतों का सहारा लिया। बंगाल में, और सबसे बढ़कर मिदनापुर में, वह नए बने यूनियन बोर्डों के विरुद्ध कर-बंदी अभियान में मिला। और बिहार में वह यूरोपीय बाग़ान-मालिकों के विरुद्ध पहले से बनी हुई धारा पर बहा।
मिदनापुर सबसे स्पष्ट उदाहरण है, क्योंकि वह समय में बँधा हुआ है। 1919 के बंगाल ग्राम स्वशासन अधिनियम ने उस ज़िले में 227 यूनियन बोर्ड बनाए, जिन्हें कर लगाने का अधिकार था। कांथी के माहिष्य वकील बीरेंद्रनाथ ससमल ने कर न देने का नेतृत्व किया; ज़िले का प्रमुख कृषक समुदाय माहिष्य होने के कारण संख्या-बल वहीं से आया; और असहयोग की घोषणा होते ही यह अभियान उसका हिस्सा बन गया। 1921 के अंत तक लगभग सारे बोर्ड समाप्त हो गए, जो किसी स्थानीय सविनय अवज्ञा अभियान का अपना घोषित लक्ष्य पूरी तरह पा लेने का दुर्लभ उदाहरण है।
पूरे काल के लिए इसका पाठ यह है कि किसी प्रांत में राष्ट्रीय कार्यक्रम कितना असरदार होगा, यह कार्यक्रम का नहीं, वहाँ के स्थानीय संगठन का प्रश्न है। कथन 1 ठीक यही प्रतिज्ञा करता है, और कथन 2 तथा 3 वे दो उदाहरण हैं जो मानक विवरण उसके लिए देता है।
इस प्रश्न की विशेषता यह है कि उसके तीन कथन अलग-अलग तौले जाने वाले स्वतंत्र दावे नहीं, बल्कि एक निरंतर गद्यांश हैं — एक सामान्य प्रतिज्ञा और उसके बाद दो उदाहरण, जिसमें दूसरे कथन का सर्वनाम पहले की ओर लौटता है। उन्हें अलग-अलग काटकर पढ़ने पर कथन 2 व्याकरण की दृष्टि से अधूरा लगता है और कथन 1 बिना आधार का सामान्यीकरण।
प्रश्न का दायरा — '1920 से 1935 तक के स्वतंत्रता संग्राम के संबंध में' — चौड़ा है, और यही चौड़ाई कथन 2 को टिकाती है। किसान सभा के नाम पर बिहार में किसान-संगठन इन पंद्रह वर्षों में लगातार चला, असहयोग काल से 1930 के दशक तक, और कथन उस संगठन की दिशा बता रहा है — बाग़ान-मालिकों के विरुद्ध — किसी विशेष संस्था के गठन का वर्ष नहीं।
पृष्ठभूमि की कड़ी भी उपयोगी है: बिहार में किसान-संगठन का सिलसिला चंपारण (1917) से चलकर 1929 में स्वामी सहजानंद सरस्वती की बिहार प्रांतीय किसान सभा तक पहुँचा, जो आगे 1936 में लखनऊ में बनी अखिल भारतीय किसान सभा का आधार बनी और जिसके पहले अध्यक्ष स्वयं सहजानंद सरस्वती थे।
इस परिवार के इतिहास-प्रश्न राष्ट्रीय कथा के बजाय लगातार इसी क्षेत्रीय ब्योरे को चुनते हैं। जो अभ्यर्थी कांग्रेस अधिवेशनों का क्रम तो जानता है पर मिदनापुर या चंपारण में क्या हुआ यह नहीं, उसे ये पेपर कठिन लगेंगे; उपाय यह है कि हर राष्ट्रीय आंदोलन के साथ उसके दो-तीन प्रलेखित स्थानीय रूप भी तैयार किए जाएँ।
मुख्य तथ्य
- असहयोग का बहिष्कार-कार्यक्रम शहरों और पेशेवर वर्गों के लिए बना था; जहाँ वह उससे आगे गया वहाँ पहले से मौजूद कृषि-संबंधी शिकायतों से जुड़कर गया — यही कारण है कि उसकी ताक़त प्रांत-दर-प्रांत इतनी भिन्न रही।
- बिहार में किसान बाग़ान-मालिकों के विरुद्ध किसान सभा के झंडे तले संगठित हुए, उस प्रांत में जहाँ बाग़ान-विरोधी आंदोलन की परंपरा उन्हीं नील-संबंधी शिकायतों तक जाती है जो 1917 में गांधीजी को चंपारण लाई थीं।
- बंगाल ग्राम स्वशासन अधिनियम, 1919 ने मिदनापुर ज़िले में कर लगाने के अधिकार वाले 227 यूनियन बोर्ड बनाए, और उसी कर से इंकार ज़िले का असहयोग में योगदान बना।
- कांथी के माहिष्य वकील बीरेंद्रनाथ ससमल ने कांथी और तामलुक अनुमंडलों में यूनियन बोर्ड-विरोधी आंदोलन चलाया; 17 दिसंबर 1921 तक 227 में से 226 बोर्ड समाप्त हो चुके थे और अंतिम अगले वर्ष गया। इसी कारण वे 'देशप्राण' कहलाए।
- कथन 2 का सर्वनाम 'वे' अपने भीतर किसी का नाम नहीं लेता और कथन 1 के किसानों को उठाता है — तीनों कथन तीन स्वतंत्र दावे नहीं, एक निरंतर गद्यांश हैं।
- बिहार में किसान-संगठन की धारा चंपारण (1917) से बिहार प्रांतीय किसान सभा (1929, स्वामी सहजानंद सरस्वती) होते हुए अखिल भारतीय किसान सभा (लखनऊ, 1936) तक जाती है।
आगे की तैयारी
सामान्य भ्रम
- कथन 2 को किसी प्रांतीय किसान सभा के औपचारिक गठन की तिथि से तौलना, जबकि कथन 1920 से 1935 के बीच किसानों के संगठित होने का ढंग बता रहा है, किसी संस्था की स्थापना-तिथि नहीं।
- तीनों कथनों को स्वतंत्र मानकर पढ़ना, जिससे कथन 2 का सर्वनाम निराधार रह जाता है और कथन 1 बिना प्रमाण का सामान्यीकरण लगने लगता है।
- यह मान लेना कि असहयोग आंदोलन पूरी तरह शहरी था और इसलिए किसान-सहभागिता वाले हर कथन को अस्वीकार कर देना।
- मिदनापुर के यूनियन बोर्ड कर को चौकीदारी कर या भू-राजस्व समझ लेना; अभियान एक नई वैधानिक स्थानीय संस्था द्वारा लगाए गए विशिष्ट कर के विरुद्ध था।
- मिदनापुर के अभियान को संग्राम के किसी बाद के चरण से जोड़ देना; माहिष्य गोलबंदी 1919 की है और 1921 से वह असहयोग में मिली।
इस परिवार के स्वतंत्रता-संग्राम वाले प्रश्न राष्ट्रीय कथा के स्तर पर नहीं, प्रांत और ज़िले के स्तर पर बनते हैं, और उनमें ऐसे व्यक्ति और संस्थाएँ नाम से आती हैं जो केवल विस्तृत विवरण पढ़ने वाले को मिलती हैं — यहाँ ससमल और यूनियन बोर्ड, पहले के एक पेपर में केरल का करषक संघम्। कथन प्रायः किसी मानक पाठ्यपुस्तक की भाषा के बहुत पास रखे जाते हैं, इसलिए जिसने एक पुस्तक ध्यान से पढ़ी है वह उन्हें लगभग शब्दशः पहचान लेता है। ये पेपर ऐसे प्रश्नों को भी पसंद करते हैं जिनके कथन मिलकर एक ही तर्क बनाते हों, ताकि उदाहरण मान लेना पर प्रतिज्ञा अस्वीकार कर देना — या उलटा — एक आंतरिक रूप से असंगत उत्तर बना दे; इसलिए कोई विकल्प चुनने से पहले उसे इसी असंगति की कसौटी पर परखना तेज़ जाँच है। जाल बनाने का सबसे आम तरीक़ा एक ही है — नेता, ज़िला, समुदाय या कर का नाम आपस में बदल देना। इसलिए हर स्थानीय आंदोलन के साथ चार बातें एक इकाई के रूप में याद रखिए: कौन-सा प्रांत, कौन-सा समुदाय, कौन नेता, और किसके विरुद्ध।
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EPFO_EOAO_2017_Q27Which one of the following is not a feature of the Non-Cooperation Movement?
- (a) Economic boycott was intense and successful.
- (b) The middle class participated in very large numbers in the movement.
- (c) It was marked by uneven geographical spread and regional variations.
- (d) Along with Non-Cooperation, other Gandhian social reform movements like the anti-liquor campaign achieved some success.
उत्तर(b) The middle class participated in very large numbers in the movement.
असहयोग आंदोलन की कौन-सी बात उसकी विशेषता नहीं है — उसी आंदोलन के स्वरूप और उसके असमान भौगोलिक फैलाव पर सीधा प्रश्न।
EPFO_EOAO_2020_Q34During 1931, under whose leadership, did a strong Kisan Sabha Movement develop in the Gaya District of Bihar ?
- (a) Yadunandan Sharma
- (b) Sahajanand
- (c) Sheetla Sahai
- (d) Tilka Manjhi
उत्तर(a) Yadunandan Sharma
1931 में गया ज़िले में किसान सभा आंदोलन किसके नेतृत्व में विकसित हुआ — बिहार की किसान सभा की वही कड़ी, अगले दशक में।
EPFO_EOAO_2017_Q24What were the peasant associations set up in Kerala in the 1930s called?
- (a) Kisan Sabha
- (b) Kirti Kisan
- (c) Karshaka Sangam
- (d) Kisan Morcha
उत्तर(c) Karshaka Sangam
1930 के दशक में केरल की किसान संस्थाओं का नाम — नाम से पुकारे जाने वाले क्षेत्रीय कृषक संगठनों में इस परिवार की वही रुचि।
अभ्यास
- practice — not a real PYQ
बिहार प्रांतीय किसान सभा (1929) का नेतृत्व निम्नलिखित में से किसने किया था ?
- (a)स्वामी सहजानंद सरस्वती
- (b)बाबा रामचंद्र
- (c)एन. जी. रंगा
- (d)मदारी पासी
उत्तर(a) स्वामी सहजानंद सरस्वती — उन्होंने 1929 में बिहार प्रांतीय किसान सभा खड़ी की और 1936 में अखिल भारतीय किसान सभा के पहले अध्यक्ष बने; बाबा रामचंद्र और मदारी पासी अवध तथा एका आंदोलन से जुड़े थे और एन. जी. रंगा आंध्र से।
- practice — not a real PYQ
असहयोग काल में मिदनापुर के माहिष्य किसानों का आंदोलन किस कर के विरुद्ध था ?
- (a)नमक कर
- (b)चौकीदारी कर
- (c)यूनियन बोर्ड कर
- (d)आयकर
उत्तर(c) यूनियन बोर्ड कर — बंगाल ग्राम स्वशासन अधिनियम के अंतर्गत बने यूनियन बोर्डों के करों का माहिष्य किसानों ने बीरेंद्रनाथ ससमल के नेतृत्व में संगठित बहिष्कार किया; चौकीदारी कर बिहार के सविनय अवज्ञा काल से अधिक जुड़ा है।