निम्नलिखित पर विचार कीजिए : 1. दक्कन विद्रोह 2. संथाल विद्रोह 3. खेरवार आंदोलन 4. रम्पा विद्रोह उपर्युक्त का सही कालानुक्रम निम्नलिखित में से क्या है (प्रारंभिक से आरंभ करते हुए) ?
- (a)1-2-3-4
- (b)4-3-2-1
- (c)2-3-1-4
- (d)1-3-2-4
उत्तर
क्यों
सही उत्तर — C, (c) 2-3-1-4 — अर्थात् संथाल विद्रोह, खेरवार आंदोलन, दक्कन विद्रोह, रम्पा विद्रोह। चारों को एक साथ न देखकर एक-एक करके तिथि पर बिठाइए।
संथाल विद्रोह (हूल), 1855-56। दामिन-इ-कोह के संथाल — वह क्षेत्र जो आज झारखंड का संथाल परगना है — सिदो और कान्हू मुर्मू के नेतृत्व में महाजनों, ज़मींदारों और कंपनी के अधिकारियों के विरुद्ध उठे। विद्रोह की घोषणा की तिथि परंपरागत रूप से 30 जून 1855 मानी जाती है और 1856 में उसे दबा दिया गया। इसी के बाद संथाल परगना को अलग ज़िला बनाकर संथालों के लिए विशेष प्रशासनिक व्यवस्था दी गई। यह चारों में सबसे पुराना है, और दूसरे नंबर की घटना से लगभग बीस वर्ष पहले का।
खेरवार आंदोलन, 1874। इसे सफ़ा हर आंदोलन भी कहते हैं। यह उन्हीं संथाल परगना के संथालों में भगीरथ मांझी के नेतृत्व में उठा एक सामाजिक-धार्मिक सुधार आंदोलन था, जो आगे चलकर भूराजस्व बंदोबस्त के विरोध और एक समानांतर संथाल सत्ता खड़ी करने के प्रयास में बदल गया। भारत सरकार का इंडियन कल्चर पोर्टल इसे 1874 के भगीरथ मांझी आंदोलन के रूप में दर्ज करता है।
दक्कन विद्रोह, 1875। इसे दक्कन दंगे भी कहा जाता है। यह मई और जून 1875 में सुपा गाँव से शुरू होकर बंबई दक्कन के पूना और अहमदनगर ज़िलों में फैला, जहाँ किसानों ने साहूकारों के घरों और दुकानों पर हमला करके अपने विरुद्ध रखे बंधपत्र और अदालती डिक्रियाँ छीनीं और नष्ट कीं। जाँच के लिए दक्कन दंगा आयोग बैठा और उसी की सिफ़ारिशों पर दक्कन कृषक राहत अधिनियम, 1879 आया।
रम्पा विद्रोह, 1879-80। विशाखापत्तनम एजेंसी के रम्पा क्षेत्र की पहाड़ी जनजातियाँ मार्च 1879 में उस मनसबदार की वसूली और ताड़ी उतारने पर लगे प्रतिबंधों के विरुद्ध उठीं; उपद्रव पड़ोस की गोलगोंडा पहाड़ियों और भद्राचलम तालुक तक फैला और 1880 में दबाया गया। रम्पा नाम का दूसरा और अधिक प्रसिद्ध विद्रोह 1922-24 में अल्लूरी सीताराम राजू के नेतृत्व में हुआ — पर दोनों में से कोई भी लिया जाए, वह इन चारों में सबसे बाद का ही रहता है।
इसलिए क्रम बनता है 1855, 1874, 1875, 1879 — यानी 2-3-1-4।
विकल्प-सूची की एक बनावट इस प्रश्न को दिखने से कहीं तेज़ बना देती है। संथाल विद्रोह चारों में सबसे पुराना है और उससे आरंभ होने वाला विकल्प केवल एक है। इसलिए अकेली यह जानकारी कि 1855 सबसे पहली तिथि है, शेष तीन को क्रम में लगाए बिना ही उत्तर तय कर देती है — और यही कालानुक्रम के हर प्रश्न में सबसे किफ़ायती क़दम है।
अन्य विकल्प क्यों गलत हैं
- (a)1-2-3-4 — यह सूची के छपे हुए क्रम को ज्यों का त्यों दोहरा देता है, और उसी कारण दक्कन विद्रोह (1875) को संथाल विद्रोह (1855-56) से बीस वर्ष पहले बिठा देता है। ध्यान दीजिए कि इस विकल्प में केवल एक ही प्रविष्टि ग़लत जगह पर है — संथाल, खेरवार और रम्पा का आपसी क्रम इसमें ठीक बैठता है — पर कालानुक्रम के प्रश्न में आंशिक शुद्धता का कोई मूल्य नहीं होता, क्योंकि उत्तर पूरे क्रम पर दिया जाता है। कालानुक्रम के प्रश्नों में पहला विकल्प प्रायः छपा हुआ क्रम ही होता है, और उसे उम्मीदवार के रूप में नहीं, एक पहचानने योग्य आकृति के रूप में देखना चाहिए: जिस प्रश्न का उत्तर छपा हुआ क्रम ही हो, वह कुछ जाँचता ही नहीं, इसलिए परीक्षक प्रायः प्रविष्टियाँ जानबूझकर क्रम से हटाकर छापता है।
- (b)4-3-2-1 — यह छपे हुए क्रम को ठीक उलटकर रख देता है — रम्पा (1879-80) सबसे पहले और दक्कन (1875) सबसे बाद में — जबकि प्रश्न कोष्ठक में स्पष्ट कहता है 'प्रारंभिक से आरंभ करते हुए'। इसका बीच का हिस्सा भी स्वतंत्र रूप से ग़लत है: यह खेरवार आंदोलन (1874) को संथाल विद्रोह (1855-56) से पहले रख देता है, जबकि खेरवार उसी समुदाय में उस विद्रोह के दबाए जाने के लगभग दो दशक बाद उठा और आंशिक रूप से उसी के बाद हुए भूराजस्व बंदोबस्त की प्रतिक्रिया था। पूरी तरह उलटा क्रम इन प्रश्नों में प्रायः इसी उद्देश्य से रखा जाता है कि निर्देश-पंक्ति बिना पढ़े उत्तर देने वाला उसमें फँसे।
- (d)1-3-2-4 — यह दक्कन विद्रोह से आरंभ होकर विकल्प (a) वाली भूल दोहराता है, और उसके ऊपर एक दूसरी भूल जोड़ देता है — खेरवार आंदोलन को संथाल विद्रोह से पहले बिठाना, जबकि दोनों एक ही समुदाय के हैं और उनके बीच लगभग उन्नीस वर्ष का अंतर है। इसकी अंतिम दो प्रविष्टियाँ — संथाल और फिर रम्पा — आपस में सही क्रम में हैं, और यही इसे सोचा-समझा उत्तर होने का भ्रम देता है। यह विकल्प इसलिए उपयोगी चेतावनी है: क्रम का कोई हिस्सा सही होने से पूरा क्रम सही नहीं हो जाता, और यहाँ किसी आंशिक अंक की व्यवस्था नहीं होती।
अवधारणा
उन्नीसवीं शताब्दी के कृषक और जनजातीय उभारों पर प्रश्न प्रायः उनके क्रम पर बनते हैं, और वह क्रम तब आसानी से याद रहता है जब उभारों को 'किसके विरुद्ध' के आधार पर समूहों में बाँट लिया जाए।
पहला समूह — साहूकार और भूमि-हस्तांतरण के विरुद्ध उभार: 1855-56 का संथाल विद्रोह, जिसमें तात्कालिक निशाना साहूकार और महाजन थे, और 1875 का दक्कन विद्रोह, जिसमें किसानों ने गुजराती तथा मारवाड़ी साहूकारों के पास रखे बंधपत्र और डिक्रियाँ छीनकर जलाईं। दोनों के बाद क़ानून बने — संथाल परगना को अलग और विशेष प्रशासन वाला क्षेत्र बनाया गया, और दक्कन में 1879 का कृषक राहत अधिनियम आया।
दूसरा समूह — वे उभार जो धार्मिक या सुधारवादी आंदोलन के रूप में शुरू हुए: 1874 का खेरवार या सफ़ा हर आंदोलन, और आगे चलकर 1890 के दशक का बिरसा मुंडा आंदोलन। दोनों में शुद्धीकरण और सामाजिक सुधार के साथ-साथ भूराजस्व की माँग और बाहरी लोगों का विरोध जुड़ा हुआ था।
तीसरा समूह — पहाड़ी और वन क्षेत्रों के उभार, जो बिचौलियों और वन-क़ानूनों के विरुद्ध थे: विशाखापत्तनम एजेंसी का 1879-80 का रम्पा विद्रोह और पड़ोस की गोलगोंडा पहाड़ियों के उभार, जिनकी शिकायतें मनसबदार की वसूली, मैदानी व्यापारियों की शर्तें और घरेलू उपयोग के लिए ताड़ी उतारने को अपराध बना देना थीं।
इस प्रश्न की चार में से दो घटनाएँ संथाल क्षेत्र की हैं और उनके बीच उन्नीस वर्ष का अंतर है — यही वह जोड़ी है जिसे अलग-अलग तिथि के साथ याद रखना अनिवार्य है। 1855 और 1874 बैठ जाने पर इस क्षेत्र के अधिकांश प्रश्न स्वयं तय हो जाते हैं, क्योंकि शेष पड़ाव — नील 1859-60, पाबना 1873, दक्कन 1875, रम्पा 1879 — प्रायः इन्हीं दोनों के सापेक्ष पूछे जाते हैं।
इस प्रश्न में चार प्रविष्टियाँ हैं, तीन नहीं, और हर विकल्प एक पूरा क्रम है। इस बनावट का एक लाभ है: आंशिक जानकारी भी निर्णायक हो सकती है, बशर्ते वह सही चीज़ की जानकारी हो। यहाँ चारों विकल्प अपनी पहली प्रविष्टि में अलग-अलग नहीं हैं, पर संथाल विद्रोह से आरंभ होने वाला केवल एक है — इसलिए एक तिथि तीन विकल्प काट देती है।
यही कालानुक्रम के प्रश्नों की सामान्य विधि है। चारों घटनाओं की तिथि निकालकर पूरा क्रम बनाने के बजाय उस एक घटना को पकड़िए जिसकी तिथि आप निश्चित रूप से जानते हैं — प्रायः सबसे पुरानी या सबसे नई — और देखिए कि उसके बाद कितने विकल्प बचते हैं।
घटनाओं की पृष्ठभूमि भी क्रम याद रखने में सहायक है। संथाल हूल के बाद 1855 में संथाल परगना ज़िला बना; दक्कन में किसानों ने बही-खाते और बंधपत्र जलाए, जिसके बाद दक्कन दंगा आयोग बैठा; और रम्पा में विद्रोह के दमन के बाद उसी मनसबदार को गिरफ़्तार किया गया जिसका शासन विद्रोह का मुख्य कारण माना गया।
छपाई की एक बात भी ध्यान देने योग्य है: इस प्रश्न में क्रम हाइफ़न के साथ छपे हैं (1-2-3-4), जबकि इसी पुस्तिका के अगले कालानुक्रम प्रश्न में वे अल्पविराम के साथ छपे हैं। दोनों परिपाटियाँ इस पुस्तिका में साथ-साथ चलती हैं और उनका कोई अर्थ नहीं है।
मुख्य तथ्य
- संथाल विद्रोह (हूल) दामिन-इ-कोह में सिदो और कान्हू मुर्मू के नेतृत्व में उठा; घोषणा की तिथि परंपरागत रूप से 30 जून 1855 मानी जाती है और 1856 में उसका दमन हुआ। इसी के बाद संथाल परगना अलग ज़िला बना।
- खेरवार आंदोलन, जिसे सफ़ा हर भी कहते हैं, 1874 में संथाल परगना के संथालों में भगीरथ मांझी के नेतृत्व में उठा और उसमें सामाजिक-धार्मिक सुधार भूराजस्व बंदोबस्त के विरोध के साथ जुड़ा हुआ था।
- दक्कन विद्रोह मई-जून 1875 में सुपा गाँव से पूना और अहमदनगर ज़िलों तक फैला; किसानों ने साहूकारों के बंधपत्र और डिक्रियाँ छीनकर नष्ट कीं, और इसी के बाद दक्कन कृषक राहत अधिनियम, 1879 आया।
- रम्पा विद्रोह मार्च 1879 में विशाखापत्तनम एजेंसी के रम्पा क्षेत्र में शुरू हुआ, गोलगोंडा पहाड़ियों और भद्राचलम तक फैला और 1880 में दबा; दूसरा रम्पा विद्रोह 1922-24 में अल्लूरी सीताराम राजू के नेतृत्व में हुआ।
- चारों छपे हुए क्रमों में केवल एक संथाल विद्रोह से आरंभ होता है, इसलिए उसी एक घटना को 1855 पर बिठा लेना शेष तीन को क्रम में लगाए बिना प्रश्न तय कर देता है।
- इन चारों के आसपास के अन्य पड़ाव — कोल विद्रोह 1831-32, नील विद्रोह 1859-60, पाबना 1873 और मुंडा उलगुलान 1899-1900 — प्रायः इन्हीं के सापेक्ष पूछे जाते हैं, इसलिए इन्हें एक ही समय-रेखा पर रखिए।
आगे की तैयारी
सामान्य भ्रम
- उस विकल्प को चुन लेना जो प्रविष्टियों का छपा हुआ क्रम ही दोहराता है। कालानुक्रम के प्रश्न में छपा हुआ क्रम लगभग कभी सही क्रम नहीं होता, क्योंकि तब प्रश्न कुछ जाँचता ही नहीं।
- संथाल विद्रोह (1855-56) और खेरवार आंदोलन (1874) को एक मान लेना। दोनों एक ही समुदाय के और एक ही क्षेत्र के हैं, पर उनके बीच लगभग बीस वर्ष का अंतर है और खेरवार बाद का है।
- रम्पा को 1922-24 का मानकर यह निष्कर्ष निकालना कि कोई दूसरी घटना सबसे बाद की होगी। रम्पा के दोनों विद्रोहों में से कोई भी लिया जाए, वह इन चारों में सबसे बाद का ही रहता है।
- दक्कन विद्रोह को मराठा इतिहास से जोड़कर अठारहवीं या उन्नीसवीं शताब्दी के आरंभ की घटना मान लेना; ये दंगे 1875 के हैं और उनका संबंध साहूकारी ऋण से है, राजनीतिक सत्ता से नहीं।
- किसी क्रम को इसलिए स्वीकार कर लेना कि उसकी अंतिम दो प्रविष्टियाँ ठीक बैठ रही हैं। कालानुक्रम का उत्तर पूरे क्रम पर तय होता है और उसमें आंशिक शुद्धता का कोई मूल्य नहीं।
इस परिवार के पेपरों में कालानुक्रम लगभग हर बार आता है — कभी चार आंदोलनों के रूप में, कभी चार संस्थाओं या योजनाओं के रूप में। प्रविष्टियाँ इस तरह चुनी जाती हैं कि उनमें से दो समय में एक-दूसरे के बहुत पास हों, जैसे यहाँ 1874 का खेरवार और 1875 का दक्कन विद्रोह, ताकि केवल दशक जान लेने से उत्तर न बन सके। फिर भी प्रश्न सधता इसलिए है कि विकल्प हर स्थान पर एक-दूसरे से भिन्न नहीं होते: जो अभ्यर्थी सबसे पुरानी या सबसे नई प्रविष्टि निश्चित रूप से बिठा सकता है, वह प्रायः एक ही क़दम में दो या तीन विकल्प काट देता है। यह क़दम अलग से अभ्यास करने योग्य है, क्योंकि स्वाभाविक प्रवृत्ति चारों की तिथि निकालने की होती है और उसी में वह जोड़ी समय खा जाती है जो केवल एक वर्ष के अंतर पर है। यही विषय दो और रूपों में लौटता है — सुमेलन, जिसमें आंदोलन के सामने उसका नेता, क्षेत्र या वर्ष रखवाया जाता है, और कथन-कूट, जिसमें किसी एक आंदोलन के बारे में तीन कथन देकर सही छँटवाए जाते हैं। तीनों रूपों के लिए काम आने वाली तैयारी एक ही है: हर आंदोलन के साथ चार बातें एक इकाई की तरह याद रखिए — वर्ष, क्षेत्र, नेता और शत्रु।
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- (a) 1 and 3 only
- (b) 2 and 3 only
- (c) 1 and 4 only
- (d) 2 and 4 only
उत्तर(c) 1 and 4 only
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उत्तर(b) सिदो और कान्हू — संथाल हूल (1855-56) का नेतृत्व सिदो और कान्हू मुर्मू ने किया; बिरसा मुंडा का उलगुलान 1899-1900 का है, भगीरथ मांझी खेरवार आंदोलन के नेता थे और अल्लूरी सीताराम राजू 1922-24 के रम्पा विद्रोह के।
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- (b)दक्कन कृषक राहत अधिनियम, 1879
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उत्तर(b) दक्कन कृषक राहत अधिनियम, 1879 — विद्रोह के बाद बैठे दक्कन दंगा आयोग की सिफ़ारिशों पर यह अधिनियम आया, जिसने किसानों की भूमि की कुर्की और ऋण-वसूली पर अंकुश लगाए।