विशाखापत्तनम के पहाड़ी क्षेत्र में, जो सामान्यतया गुडेम क्षेत्र के नाम से जाना जाता है, में नियमित अंतराल पर ब्रिटिश अधिकारियों के विरुद्ध होने वाले विद्रोह निम्नलिखित में से किस/किन कारण/कारणों से हुए थे ? 1. मुत्तादारों के गोलकुंडा ज़मींदारी के भूपति परिवार के साथ सामंती संबंध 2. गोलकुंडा की गद्दी पर पूर्व-ज़मींदारी परिवार की स्थापना 3. ब्रिटिश अधिकारियों द्वारा भूपति परिवार को वार्षिक गुज़ारा भत्ता देने से इंकार करना नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर उत्तर चुनिए :
- (a)1 और 2
- (b)2 और 3
- (c)1 और 3
- (d)केवल 3
उत्तर
क्यों
सही उत्तर — A, (a) 1 और 2 — और इसका निर्णय अनुमान से नहीं, अभिलेख से होता है। इन विद्रोहों का समकालीन विवरण W. Francis द्वारा 1907 में संकलित 'Madras District Gazetteer, Vizagapatam' के गोलगोंडा तालुक अध्याय में है, और वही तीनों कथनों का फ़ैसला कर देता है। (गजेटियर में स्थान Golgonda और परिवार Bhúpati लिखा है, जबकि प्रश्न में गोलकुंडा और भूपति छपा है — वर्तनी का यह अंतर भ्रमित न करे।)
कथन 1 सही है। मुत्तादार — जिन्हें पहाड़ी सरदार भी कहा गया — पहाड़ी 'मुत्ताओं' के मुखिया थे और गोलगोंडा ज़मींदारी के भूपति परिवार से सामंती संबंध में बँधे थे। 1836 में जब ज़मींदारी जम्मा देवम्मा नामक स्त्री को सौंपी जाने लगी, सरदारों ने आपत्ति की कि उनसे परामर्श नहीं हुआ और इससे पहले कभी किसी स्त्री ने उन पर शासन नहीं किया। 1845 से 1848 के विद्रोह में उन्होंने उन्नीस वर्ष के चिन्ना भूपति को अपना 'राजा' बनाकर बिठाया; उन्होंने लगान रोक दिया, पहाड़ियाँ बंद कर दीं और तीन वर्ष तक सेना के सामने डटे रहे। पैंतीस वर्ष बाद, 1880 में, गुडेम पातविदि के मुत्तादार तगि वीरय्या दोरा ने अंतिम संदेश भिजवाया कि वह तब तक आत्मसमर्पण नहीं करेगा जब तक 'उसका राजा, चिन्ना भूपति' उसे ऐसा न कहे। यही बंधन इन विद्रोहों की धुरी है, और वह एक पीढ़ी नहीं, तीन पीढ़ियों तक चला।
कथन 2 भी सही है, बशर्ते उसे ठीक दिशा में पढ़ा जाए: वह प्रशासन का कोई कार्य नहीं, विद्रोहियों का घोषित उद्देश्य है। 1836 में ज़मींदारी बर्बादी के कगार पर पहुँची, 1837 में बकाया के लिए नीलाम हुई और सरकार ने ही उसे मात्र 100 रुपये में खरीद लिया; सरदारों की हैसियत एक साधारण अमीन के अधीन आ गई और वे असंतुष्ट होकर भूपति परिवार को बलपूर्वक पुनःस्थापित करने के लिए एकजुट हो गए। 1857-58 के विद्रोह के बारे में गजेटियर कहता है कि उसका उद्देश्य पिछले जैसा ही था। विद्रोह के 'कारणों' की सूची में रखा गया यह कथन इसी अर्थ में पढ़ा जाना चाहिए — वह माँग जिसके लिए बार-बार हथियार उठे।
कथन 3 अभिलेख के सामने नहीं टिकता, और यही (a) और (c) के बीच का निर्णायक बिंदु है। सरकार ने भूपति परिवार को गुज़ारा भत्ता देने से इंकार नहीं किया — उसने बार-बार दिया। 1848 में आत्मसमर्पण पर चिन्ना भूपति को अपने और अपने तीन भाइयों के भरण-पोषण के लिए वार्षिक 4,000 रुपये मूल्य के गाँव दिए गए। 1857-58 के विद्रोह में दोषसिद्ध सन्यासी भूपति का भी उन्हीं गाँवों में हिस्सा जारी रहा, और 1886 में मृत्यु के समय वह 913 रुपये वार्षिक पा रहा था। अंतिम विद्रोह 1891 में सांता भूपति ने किया, जो 'सरकार द्वारा दिए गए भत्ते से असंतुष्ट' था — अर्थात् शिकायत भत्ते की राशि से थी, भत्ता न मिलने से नहीं। भत्ता कम मिलना और भत्ता देने से इंकार करना दो अलग बातें हैं, और कथन 3 ठीक इसी अंतर पर गिरता है।
इसलिए 1 और 2 सही, 3 ग़लत — उत्तर (a)।
अन्य विकल्प क्यों गलत हैं
- (b)2 और 3 — इसमें वह कथन 1 छूट जाता है जो पूरी शृंखला की धुरी है — मुत्तादारों और भूपति परिवार का सामंती संबंध ही बताता है कि पहाड़ी मुखिया एक अपदस्थ ज़मींदार परिवार के लिए क्यों उठ खड़े हुए, और 1845 में 'राजा' बिठाने से लेकर 1880 के तगि वीरय्या दोरा के संदेश तक वही एक कड़ी चलती है। साथ ही यह विकल्प कथन 3 को रखता है, जिसे गजेटियर उलट देता है: 1848 में 4,000 रुपये वार्षिक मूल्य के गाँव दिए गए, 1857-58 के विद्रोह के बाद भी परिवार का हिस्सा जारी रहा, और 1891 का विद्रोही स्वयं मिले हुए भत्ते से असंतुष्ट था।
- (c)1 और 3 — यही सबसे आकर्षक ग़लत विकल्प है, और वह तब चुना जाता है जब कथन 1 ठीक पहचान लिया जाए पर कथन 2 को प्रशासन का कार्य समझ लिया जाए। प्रशासन के कार्य के रूप में पढ़िए तो वह हुआ ही नहीं — 1836 में ज़मींदारी ज़ब्त हुई, 1837 में नीलामी में सरकार ने 100 रुपये में खरीद ली, और किसी भूपति को गद्दी पर बहाल नहीं किया गया। विद्रोहियों के उद्देश्य के रूप में पढ़िए — और विद्रोह के कारणों की सूची इसी पाठ को न्योता देती है — तो वह अभिलेख में दर्ज है। इसके बाद जो बचता है वह कथन 3 है, और भत्ता देने से इंकार का दावा गजेटियर के सामने नहीं टिकता।
- (d)केवल 3 — यह विकल्प पूरे विद्रोह का भार उसी एक कथन पर रख देता है जिसे अभिलेख काटता है, और उन दोनों को छोड़ देता है जिन्हें गजेटियर विस्तार से दर्ज करता है। यह अपने आप में भी अपर्याप्त व्याख्या है: किसी एक परिवार को भत्ता न मिलना एक शिकायत तो समझा सकता है, पर यह नहीं कि दस मुत्ताओं के पहाड़ी मुखिया लगान क्यों रोकते रहे, पहाड़ियाँ क्यों बंद करते रहे, एक दावेदार को 'राजा' क्यों बिठाते रहे, और पैंतालीस वर्ष तक वही क्रम क्यों दोहराता रहा। वह निरंतरता कथन 1 का सामंती बंधन और कथन 2 का पुनःस्थापन-लक्ष्य मिलकर समझाते हैं।
अवधारणा
गुडेम और रम्पा की पहाड़ियों में उठने वाले विद्रोहों को स्थानीय भाषा में 'फ़ितूरी' कहा जाता था। ये कोई एक बार की घटना नहीं थीं। डेविड आर्नल्ड ने अपने प्रसिद्ध निबंध 'Rebellious Hillmen : The Gudem-Rampa Risings, 1839–1924' (सबॉल्टर्न स्टडीज़, खंड I, 1982) में इन्हें लगभग नब्बे वर्ष तक नियमित अंतराल पर दोहराई जाने वाली शृंखला के रूप में दर्ज किया है, और प्रश्न का 'नियमित अंतराल पर' वाक्यांश इसी बात की ओर संकेत करता है। ऐसे बार-बार उठने वाले विद्रोहों का ढाँचा एक जैसा होता है: कोई पुरानी सत्ता-व्यवस्था टूटती है, उसमें ऊपर के पद पर बैठे लोग अपनी हैसियत खोते हैं, और वे अपने पुराने अनुयायियों के साथ मिलकर नई व्यवस्था के विरुद्ध खड़े होते हैं। यही कारण है कि जनजातीय क्षेत्रों के विद्रोहों को केवल 'जनजाति बनाम अंग्रेज़' कहकर समझना अधूरा होता है — उनमें बीच की एक परत, यहाँ मुत्तादारों की, प्रायः निर्णायक होती है।
मुत्तादार पहाड़ी 'मुत्ता' यानी क्षेत्र के वंशानुगत मुखिया थे। अंग्रेज़ों के आने से पहले वे पहाड़ों में वस्तुतः शासक थे और अपने ऊपर के ज़मींदार के लिए नज़राना वसूलते थे। औपनिवेशिक प्रशासन ने उन्हें इस हैसियत से उतारकर वेतनभोगी कर-वसूली अधिकारी बना दिया, और यही अपमान बार-बार होने वाले विद्रोहों की स्थायी पृष्ठभूमि बना। इसके साथ मैदानी व्यापारियों और साहूकारों की अनुचित शर्तें, सरकार का उन व्यापारियों के पक्ष में झुकाव, और ताड़ी उतारने पर लगे प्रतिबंध तथा कर जैसी शिकायतें जुड़ती चली गईं। 1879-80 का रम्पा विद्रोह इसी शृंखला की सबसे बड़ी कड़ियों में से एक था; वह मार्च 1879 में चोडवरम तालुक के पुलिस थानों पर हमलों से शुरू हुआ और उसे दबाने के लिए मद्रास पैदल सेना की छह रेजिमेंट, घुड़सवार सेना, सैपर और हैदराबाद की एक रेजिमेंट लगानी पड़ी। बहुत से विद्रोहियों को अंडमान भेजा गया, और बाद में उस मनसबदार को ही गिरफ़्तार किया गया जिसका शासन विद्रोह का मुख्य कारण माना गया।
मुख्य तथ्य
- इन विद्रोहों का समकालीन अभिलेख W. Francis का 'Madras District Gazetteer, Vizagapatam' (1907) है; उसका गोलगोंडा तालुक अध्याय 1830 के दशक से 1891 तक की पूरी शृंखला दर्ज करता है।
- 1836 में ज़मींदारी संकट में पड़ी और उत्तराधिकार स्त्री को सौंपे जाने पर पहाड़ी सरदारों ने आपत्ति की; 1837 में वह नीलाम होकर मात्र 100 रुपये में सरकार ने ही खरीद ली।
- 1845-48 के विद्रोह में सरदारों ने उन्नीस वर्ष के चिन्ना भूपति को 'राजा' बनाया; आत्मसमर्पण पर उसे और उसके तीन भाइयों को 4,000 रुपये वार्षिक मूल्य के गाँव भरण-पोषण के लिए मिले।
- 1857-58 का विद्रोह सन्यासी भूपति के नेतृत्व में हुआ; दंड के बाद भी उसका हिस्सा जारी रहा और 1886 में मृत्यु के समय वह 913 रुपये वार्षिक पा रहा था।
- 1891 का अंतिम विद्रोह सांता भूपति ने किया, जो मिले हुए भत्ते की राशि से असंतुष्ट था — यानी विवाद भत्ते के आकार का था, उसके इंकार का नहीं।
- गुडेम और रम्पा दोनों मद्रास प्रेसीडेंसी की विशाखापत्तनम (वाइज़ागापटम) पहाड़ी एजेंसी में पड़ते थे, और वहाँ के विद्रोह स्थानीय भाषा में 'फ़ितूरी' कहलाते थे।
- मुत्तादार अंग्रेज़ों से पहले पहाड़ों के वंशानुगत मुखिया और वस्तुतः शासक थे; ब्रिटिश शासन ने उन्हें घटाकर वेतनभोगी कर-वसूली अधिकारी बना दिया।
- 1879-80 का रम्पा विद्रोह मार्च 1879 में चोडवरम तालुक के पुलिस थानों पर हमलों से शुरू हुआ और उसे दबाने में मद्रास पैदल सेना की छह रेजिमेंट तक लगानी पड़ीं।
- 1922-24 का दूसरा रम्पा विद्रोह अल्लूरी सीताराम राजू के नेतृत्व में हुआ और वह मुख्यतः औपनिवेशिक वन-नीति के विरुद्ध था — कारण अलग हैं, इसलिए दोनों रम्पा विद्रोहों को मिलाइए मत।
आगे की तैयारी
सामान्य भ्रम
- कारणों की सूची में दिया गया कथन कभी विद्रोहियों का उद्देश्य होता है और कभी प्रशासन का कार्य; यहाँ कथन 2 उद्देश्य है, और उसे प्रशासन का कार्य पढ़ लेना ही (c) तक ले जाता है।
- 'भत्ता कम मिलना' और 'भत्ता देने से इंकार' को एक मत मानिए — 1891 का विद्रोही मिले हुए भत्ते से असंतुष्ट था, और कथन 3 ठीक इसी अंतर पर गिरता है।
- जहाँ अभिलेख उपलब्ध है वहाँ कथनों की आपसी तार्किक संगति से उत्तर मत निकालिए; यहाँ 'माँग पूरी होना शिकायत नहीं हो सकती' वाला तर्क सही दिखता है और ग़लत उत्तर देता है।
- रम्पा विद्रोह का नाम सुनते ही अल्लूरी सीताराम राजू मत जोड़ लीजिए; वे 1922-24 वाले दूसरे विद्रोह के नेता थे, 1879-80 वाले के नहीं।
जनजातीय और पहाड़ी विद्रोह इस परिवार के पेपरों में दो रूपों में आते हैं। पहला रूप कालानुक्रम का है, जिसमें चार विद्रोह देकर उन्हें प्रारंभिक से आरंभ करते हुए क्रम में रखना होता है। दूसरा रूप यही कथन-कूट वाला है, जिसमें किसी एक विद्रोह के कारणों की सूची दी जाती है और उनमें से एक कारण जानबूझकर उलटी दिशा में लिख दिया जाता है — जैसे किसी शिकायत को सुविधा के रूप में या किसी माँग को कार्रवाई के रूप में। ऐसे प्रश्न में सबसे उपयोगी अभ्यास यह है कि हर कथन से पूछिए, 'क्या यह बात ब्रिटिश शासन के विरुद्ध असंतोष बढ़ाती है या घटाती है ?' जो कथन असंतोष घटाता हो, वह विद्रोह का कारण नहीं हो सकता, और उसे लेने वाले सारे विकल्प एक साथ छँट जाते हैं।
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उत्तर(b) उन्हें वेतनभोगी कर-वसूली अधिकारी बना दिया गया — अंग्रेज़ों से पहले मुत्तादार अपने क्षेत्र के वंशानुगत मुखिया और वस्तुतः शासक थे; हैसियत का यही पतन बार-बार होने वाली फ़ितूरियों की स्थायी पृष्ठभूमि बना।