‘शून्य दोष, शून्य प्रभाव’ भारत सरकार के निम्नलिखित मंत्रालयों में से किसकी पहल है ?
- (a)भारी उद्योग मंत्रालय
- (b)शिक्षा मंत्रालय
- (c)कौशल विकास एवं उद्यमशीलता मंत्रालय
- (d)सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम मंत्रालय
उत्तर
क्यों
सही उत्तर — D, (d) सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम मंत्रालय — 'शून्य दोष, शून्य प्रभाव' इसी मंत्रालय की पहल है, और उसकी प्रमाणन योजना भी वहीं से चलती है।
नाम स्वयं इस पहल का पूरा विचार कह देता है। 'शून्य दोष' का अर्थ है ऐसा विनिर्माण जिसमें उत्पाद में कोई दोष न रहे, यानी गुणवत्ता ऐसी हो कि माल अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में टिक सके और लौटाया न जाए। 'शून्य प्रभाव' का अर्थ है कि उस उत्पादन का पर्यावरण और पारिस्थितिकी पर कोई प्रतिकूल प्रभाव न पड़े। यह वाक्यांश प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का दिया हुआ है और मेक इन इंडिया की दिशा बताने के लिए कहा गया था।
इसे व्यवहार में उतारने के लिए सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम मंत्रालय ने एक प्रमाणन योजना बनाई, जिसे केंद्रीय मंत्री ने 28 अप्रैल 2022 को आरंभ किया। इसमें प्रमाणन तीन स्तरों का है — कांस्य, रजत और स्वर्ण — और इन स्तरों पर परखे जाने वाले मानकों की संख्या क्रमशः पाँच, चौदह और बीस है। उद्यम को पहले एक शपथ लेनी होती है और उसके बाद ही वह किसी स्तर के लिए आवेदन कर सकता है; पंजीकरण निःशुल्क और काग़ज़-रहित है।
मूल्यांकन का ढाँचा भी योजना का अंग है : आकलन केवल उन अभिकरणों से कराया जाता है जो राष्ट्रीय प्रत्यायन बोर्ड से प्रत्यायित हों, और अंतर-विश्लेषण तथा हाथ पकड़कर आगे बढ़ाने का काम भारतीय गुणवत्ता परिषद द्वारा सूचीबद्ध परामर्शी संस्थाओं को दिया जाता है। योजना का दायरा उन विनिर्माणकर्ता उद्यमों तक है जो इसी मंत्रालय के पास पंजीकृत हैं।
इसलिए मंत्रालय पहचानने का सबसे सीधा रास्ता यह है कि यह पहल किसके लिए बनी है — छोटे और मध्यम विनिर्माणकर्ताओं के लिए। जिस वर्ग के लिए योजना बनी हो, प्रायः उसी वर्ग का मंत्रालय उसे चलाता है, और यहाँ वह मेल पूरी तरह बैठता है।
अन्य विकल्प क्यों गलत हैं
- (a)भारी उद्योग मंत्रालय — भारी उद्योग मंत्रालय का क्षेत्र इस पहल से भिन्न है। उसका संबंध पूँजीगत माल, मोटर वाहन और भारी अभियांत्रिकी जैसे क्षेत्रों से तथा अपने अधीन आने वाले केंद्रीय सार्वजनिक उपक्रमों से है। नाम में 'उद्योग' शब्द होने के कारण यह विकल्प आकर्षक लगता है, और जो अभ्यर्थी केवल विनिर्माण शब्द पकड़कर चलता है वह यहीं रुक जाता है। पर 'शून्य दोष, शून्य प्रभाव' का पूरा ढाँचा छोटे और मध्यम उद्यमों को ध्यान में रखकर बना है — प्रमाणन की लागत में सहायता, तीन चरणों वाला सरल स्तर-क्रम, और निःशुल्क पंजीकरण — और ये सब बड़े उद्योगों की आवश्यकताएँ नहीं हैं। मंत्रालय का नाम पढ़ते समय यह पूछिए कि योजना किस आकार के उद्यम के लिए बनी है; उत्तर प्रायः वहीं से निकल आता है।
- (b)शिक्षा मंत्रालय — शिक्षा मंत्रालय का इस पहल से कोई संबंध नहीं। उसका क्षेत्र विद्यालयी और उच्च शिक्षा है — पाठ्यक्रम, विश्वविद्यालय, तकनीकी शिक्षा की परिषदें और शिक्षा से जुड़ी राष्ट्रीय नीतियाँ। यह विकल्प इस प्रश्न में विषय से सबसे दूर खड़ा है और उसका काम केवल विकल्प-सूची भरना है। ऐसे विकल्प हर प्रश्न में एक-दो रखे जाते हैं और उन्हें पहचानकर तुरंत काट देना समय बचाता है। यहाँ काटने की कसौटी सरल है : पहल का विषय उत्पाद की गुणवत्ता और पर्यावरणीय प्रभाव है, और इनमें से कोई भी शिक्षा मंत्रालय के कार्य-आबंटन में नहीं आता। ध्यान दीजिए कि 'गुणवत्ता' शब्द शिक्षा में भी चलता है, और यही एकमात्र कड़ी है जिस पर यह विकल्प टिका है।
- (c)कौशल विकास एवं उद्यमशीलता मंत्रालय — कौशल विकास एवं उद्यमशीलता मंत्रालय का काम कामगारों को प्रशिक्षित करना है, उत्पादों को प्रमाणित करना नहीं। उसके अधीन औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थान, कौशल विकास की राष्ट्रीय योजनाएँ और राष्ट्रीय कौशल विकास निगम आते हैं। यह विकल्प इसलिए आकर्षक है कि उसमें 'उद्यमशीलता' शब्द है और छोटे उद्यम भी उद्यमशीलता से ही जुड़े हैं। पर भेद स्पष्ट है : यह मंत्रालय व्यक्ति की क्षमता पर काम करता है और सूक्ष्म, लघु तथा मध्यम उद्यम मंत्रालय इकाई की क्षमता पर। 'शून्य दोष, शून्य प्रभाव' का प्रमाणन इकाई को मिलता है, किसी व्यक्ति को नहीं। इसी परिवार के एक पहले के पेपर में राष्ट्रीय कौशल विकास निगम पर सीधा प्रश्न आ चुका है, और उसकी आधिकारिक कुंजी उसे इसी मंत्रालय द्वारा स्थापित लाभ-निरपेक्ष कंपनी मानती है।
अवधारणा
'शून्य दोष, शून्य प्रभाव' पहले एक नीतिगत नारा था और बाद में एक औपचारिक प्रमाणन व्यवस्था बना — इस यात्रा को जान लेना इस विषय के हर प्रश्न में काम आता है।
विचार दो हिस्सों का है। पहला हिस्सा गुणवत्ता का है : उत्पाद में कोई दोष न रहे, ताकि वह घरेलू और अंतरराष्ट्रीय दोनों बाज़ारों में टिक सके और लौटाया न जाए। दूसरा हिस्सा स्थिरता का है : उत्पादन प्रक्रिया का पर्यावरण और पारिस्थितिकी पर कोई प्रतिकूल प्रभाव न पड़े — ऊर्जा और जल का किफ़ायती उपयोग, अपशिष्ट का प्रबंधन, प्रदूषण पर नियंत्रण। दोनों को एक साथ रखने का अर्थ यह है कि गुणवत्ता और पर्यावरण को परस्पर विरोधी लक्ष्य नहीं माना जाएगा।
प्रमाणन का ढाँचा तीन स्तरों का है — कांस्य, रजत और स्वर्ण — और ऊपर के स्तर पर मानकों की संख्या बढ़ती जाती है : पाँच, चौदह और बीस। इस सीढ़ीदार रचना का उद्देश्य यह है कि बहुत छोटा उद्यम भी पहले पायदान पर चढ़ सके और धीरे-धीरे आगे बढ़े, बजाय इसके कि एक ही ऊँचा मानक देखकर वह आरंभ ही न करे।
इस पहल को उस बड़े संदर्भ में रखिए जिसमें सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम मंत्रालय काम करता है। उस मंत्रालय के पास उद्यम पंजीकरण की व्यवस्था है, ऋण-गारंटी की योजनाएँ हैं, समूह विकास और प्रौद्योगिकी उन्नयन के कार्यक्रम हैं। इन सबका उद्देश्य एक ही है — छोटे उद्यम को औपचारिक व्यवस्था में लाना और उसे प्रतिस्पर्धा के योग्य बनाना। प्रमाणन उसी शृंखला की एक कड़ी है, क्योंकि प्रमाणपत्र मिलने पर उद्यम को बाज़ार, ऋण और सार्वजनिक ख़रीद तीनों में सुविधा मिलती है।
इस प्रश्न में उत्तर तक पहुँचने का सबसे भरोसेमंद रास्ता पहल के लक्षित वर्ग से होकर जाता है। जब कोई योजना छोटे उद्यमों के लिए बनी हो — निःशुल्क पंजीकरण, तीन चरणों वाला सरल स्तर-क्रम, प्रमाणन की लागत में सहायता — तो उसे चलाने वाला मंत्रालय भी प्रायः उसी वर्ग का होता है। यह कसौटी मंत्रालय-आधारित प्रश्नों में बार-बार काम आती है।
प्रश्न की छपाई में दो बातें ध्यान देने योग्य हैं। पहली, पहल का नाम एकल उद्धरण-चिह्नों के भीतर है और उसके भीतर स्वयं एक अल्पविराम है; वह अल्पविराम नाम का अंग है, किसी सूची का विभाजक नहीं। दूसरी, विकल्प (d) में भी मंत्रालय के नाम के भीतर अल्पविराम आते हैं और वे भी विभाजक नहीं, एक ही मंत्रालय के नाम का हिस्सा हैं। जल्दबाज़ी में इन्हें सूची समझ लेने पर विकल्प का अर्थ बदल जाता है।
चारों विकल्प 'मंत्रालय' पर समाप्त होते हैं, इसलिए पूरा निर्णय उससे पहले वाले शब्दों पर टिका है। इस प्रकार के प्रश्नों में यह अभ्यास उपयोगी है कि प्रत्येक मंत्रालय के साथ दो-तीन प्रमुख योजनाएँ जोड़कर याद रखी जाएँ; परीक्षा में योजना से मंत्रालय और मंत्रालय से योजना — दोनों दिशाओं में पूछा जाता है।
मुख्य तथ्य
- 'शून्य दोष, शून्य प्रभाव' सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम मंत्रालय की पहल है; 'शून्य दोष' का अर्थ दोषरहित उत्पाद और 'शून्य प्रभाव' का अर्थ पर्यावरण तथा पारिस्थितिकी पर कोई प्रतिकूल प्रभाव न पड़ना है।
- यह वाक्यांश प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का दिया हुआ है और मेक इन इंडिया की दिशा बताने के लिए कहा गया था; बाद में इसे एक औपचारिक प्रमाणन योजना का रूप दिया गया।
- प्रमाणन योजना 28 अप्रैल 2022 को आरंभ हुई और उसमें तीन स्तर हैं — कांस्य, रजत और स्वर्ण — जिनमें परखे जाने वाले मानकों की संख्या क्रमशः पाँच, चौदह और बीस है।
- उद्यम को पहले एक शपथ लेनी होती है, उसके बाद ही वह किसी स्तर के लिए आवेदन कर सकता है; पंजीकरण निःशुल्क और काग़ज़-रहित है और योजना का दायरा मंत्रालय के पास पंजीकृत विनिर्माणकर्ता उद्यमों तक है।
- आकलन केवल राष्ट्रीय प्रत्यायन बोर्ड से प्रत्यायित अभिकरण करते हैं, और अंतर-विश्लेषण तथा हाथ पकड़कर आगे बढ़ाने का काम भारतीय गुणवत्ता परिषद द्वारा सूचीबद्ध परामर्शी संस्थाओं को दिया जाता है।
आगे की तैयारी
सामान्य भ्रम
- नाम में 'उद्योग' शब्द देखकर भारी उद्योग मंत्रालय चुन लेना; वह पूँजीगत माल और भारी अभियांत्रिकी से जुड़ा है, छोटे उद्यमों के प्रमाणन से नहीं।
- 'उद्यमशीलता' शब्द के कारण कौशल विकास मंत्रालय चुन लेना; वह व्यक्ति के कौशल पर काम करता है, जबकि यह प्रमाणन इकाई को मिलता है।
- पहल के नाम के भीतर आए अल्पविराम को सूची का विभाजक मान लेना; वह नाम का ही अंग है, और यही बात विकल्प (d) के मंत्रालय-नाम पर भी लागू होती है।
योजनाओं और मंत्रालयों को जोड़ने वाले प्रश्न इस परीक्षा में नियमित हैं और उनके तीन रूप दिखते हैं।
पहला रूप यही है — योजना या नारा देकर मंत्रालय पूछना। ऐसे प्रश्न में लक्षित वर्ग से चलिए : योजना किसके लिए बनी है, यह प्रायः मंत्रालय बता देता है।
दूसरा रूप उल्टा है — कई योजनाओं की सूची देकर पूछना कि उनमें साझा क्या है। इसी परिवार के एक पहले के पेपर में ऋण-संबद्ध पूँजी अनुदान, सूक्ष्म वित्त, राष्ट्रीय विनिर्माण प्रतिस्पर्धात्मकता और समूह विकास — इन चार कार्यक्रमों की सूची देकर यही पूछा गया था, और आधिकारिक कुंजी उन्हें सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों से जुड़े कार्यक्रम बताती है।
तीसरा रूप संस्था का है : किसी निगम, परिषद या बोर्ड का नाम देकर उसका मंत्रालय, विधिक रूप या अधिदेश पूछना। एक पहले के पेपर में राष्ट्रीय कौशल विकास निगम पर ऐसा ही प्रश्न आ चुका है। इसलिए तैयारी में हर योजना के साथ तीन बातें जोड़िए — मंत्रालय, लक्षित वर्ग और आरंभ का वर्ष।
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ऋण-संबद्ध पूँजी अनुदान, सूक्ष्म वित्त, राष्ट्रीय विनिर्माण प्रतिस्पर्धात्मकता और समूह विकास कार्यक्रमों में साझा क्या है — आधिकारिक कुंजी उन्हें सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों से जुड़े कार्यक्रम बताती है।
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- (a) 1 only
- (b) 2 only
- (c) Both 1 and 2
- (d) Neither 1 nor 2
उत्तर(b) 2 only
राष्ट्रीय कौशल विकास निगम पर कथन-आधारित प्रश्न, जिसकी कुंजी उसे कौशल विकास एवं उद्यमशीलता मंत्रालय द्वारा स्थापित लाभ-निरपेक्ष कंपनी मानती है — यहाँ के विकल्प (c) का दायरा वही है।
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'शून्य दोष, शून्य प्रभाव' प्रमाणन योजना में प्रमाणन के तीन स्तर निम्नलिखित में से कौन-से हैं ?
- (a)प्रारंभिक, मध्यम और उन्नत
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उत्तर(b) कांस्य, रजत और स्वर्ण — तीनों स्तरों पर परखे जाने वाले मानकों की संख्या क्रमशः पाँच, चौदह और बीस है, जिससे छोटा उद्यम भी पहले पायदान से आरंभ कर के धीरे-धीरे आगे बढ़ सके।
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