निम्नलिखित में से कौन-सा लेखापरीक्षा में सत्यापन का उद्देश्य नहीं है ?
- (a)खातों की ऐतिहासिक सटीकता की जाँच
- (b)परिसंपत्तियों की विद्यमानता का सत्यापन
- (c)परिसंपत्तियों के मूल्यांकन का सत्यापन
- (d)परिसंपत्तियों के अधिग्रहण के प्राधिकार का सत्यापन
उत्तर
क्यों
सही उत्तर — A, (a) खातों की ऐतिहासिक सटीकता की जाँच — प्रश्न पूछता है कि कौन-सा काम सत्यापन का उद्देश्य नहीं है, और यही वह काम है जो सत्यापन का नहीं, उससे पहले वाली प्रक्रियाओं का है।
सत्यापन का काम पुस्तकों से बाहर निकलकर वस्तु तक जाना है। चिट्ठे में जो परिसंपत्तियाँ और दायित्व दिखाए गए हैं, उनके बारे में लेखापरीक्षक को स्वयं संतुष्ट होना पड़ता है कि वे वास्तव में विद्यमान हैं, इकाई के ही हैं, उसके क़ब्ज़े में हैं, उनका मूल्यांकन उचित है, उन्हें प्राप्त करने का प्राधिकार था, और उन पर कोई अघोषित भार नहीं है। इसी सूची को इस विषय की एक प्रसिद्ध परिभाषा संक्षेप में कहती है : परिसंपत्तियों के सत्यापन का अर्थ है मूल्य, स्वामित्व और हक़, अस्तित्व तथा क़ब्ज़े की, और किसी भार के होने या न होने की जाँच।
खातों की ऐतिहासिक सटीकता जाँचना इससे भिन्न काम है। वह पुस्तकों के भीतर का काम है — प्रविष्टियों को उनके समर्थक प्रलेखों से मिलाना, जोड़ और खतौनी की शुद्धता देखना। पहला काम प्रत्ययन का है और दूसरा नित्य जाँच का। सत्यापन इन दोनों के बाद आता है और मान लेता है कि पुस्तकें जाँची जा चुकी हैं; उसका प्रश्न यह नहीं है कि प्रविष्टि ठीक लिखी गई या नहीं, बल्कि यह है कि जो वस्तु उस प्रविष्टि के पीछे बताई गई है वह सचमुच है भी या नहीं।
इसका महत्त्व एक उदाहरण से साफ़ हो जाता है। मान लीजिए किसी मशीन का बीजक ठीक है, भुगतान ठीक हुआ है, प्रविष्टि सही खाते में सही राशि से गई है — यानी ऐतिहासिक सटीकता निर्दोष है। इसके बावजूद हो सकता है कि वह मशीन बेची जा चुकी हो, चोरी हो गई हो, या किसी ऋण के विरुद्ध गिरवी रखी हो। ये तीनों बातें केवल सत्यापन से पकड़ में आती हैं, प्रत्ययन से नहीं। यही कारण है कि पुस्तकों की जाँच पूरी हो जाने पर भी सत्यापन अलग से करना पड़ता है।
छपाई में भी एक संकेत है : शेष तीनों विकल्प एक ही शब्द से आरंभ होकर एक ही शब्द पर समाप्त होते हैं, जबकि यह विकल्प उस साँचे से बाहर है। यहाँ रूप और अर्थ एक ही दिशा में इशारा करते हैं, यद्यपि केवल रूप पर टिककर उत्तर चुनना कभी सुरक्षित नहीं होता।
अन्य विकल्प क्यों गलत हैं
- (b)परिसंपत्तियों की विद्यमानता का सत्यापन — परिसंपत्तियों की विद्यमानता का सत्यापन तो सत्यापन का सबसे पहला और सबसे स्पष्ट उद्देश्य है, इसलिए यह उत्तर नहीं हो सकता। इसका सीधा तरीक़ा भौतिक निरीक्षण है — मशीन, फ़र्नीचर और स्टॉक देखे जाते हैं, रोकड़ गिनी जाती है, प्रतिभूतियाँ मिलाई जाती हैं। जो परिसंपत्तियाँ छूई नहीं जा सकतीं, उनके लिए दूसरे साक्ष्य लिए जाते हैं : बैंक शेष के लिए बैंक से सीधे पुष्टि, देनदारों के लिए उन्हें पत्र भेजकर प्रतिपुष्टि, निवेश के लिए निक्षेपागार का विवरण। जहाँ परिसंपत्ति किसी तीसरे के पास रखी हो, वहाँ उसी से लिखित पुष्टि माँगी जाती है। यह उद्देश्य इसलिए भी सबसे महत्त्वपूर्ण है कि कपट का सबसे सामान्य रूप ऐसी परिसंपत्तियाँ दिखाना है जो हैं ही नहीं।
- (c)परिसंपत्तियों के मूल्यांकन का सत्यापन — परिसंपत्तियों के मूल्यांकन का सत्यापन भी सत्यापन का अपना उद्देश्य है, इसलिए यह भी उत्तर नहीं है। मूल्यांकन सत्यापन का एक अंग माना जाता है, और कई लेखक उसे सबसे कठिन अंग बताते हैं, क्योंकि वहाँ निर्णय की भूमिका सबसे अधिक है। लेखापरीक्षक को यह देखना पड़ता है कि अपनाया गया आधार उचित है — स्थायी परिसंपत्तियाँ लागत में से मूल्यह्रास घटाकर, माल-सूची लागत और निवल वसूली-योग्य मूल्य में से जो कम हो उस पर, देनदार वसूली-योग्य राशि पर — और यह भी कि वही आधार पिछले वर्ष से लगातार अपनाया गया है। मूल्यांकन की भूल पुस्तकों की सटीकता को नहीं बिगाड़ती, इसलिए वह प्रत्ययन से कभी नहीं पकड़ी जाएगी; उसे पकड़ने का काम सत्यापन का ही है।
- (d)परिसंपत्तियों के अधिग्रहण के प्राधिकार का सत्यापन — परिसंपत्तियों के अधिग्रहण के प्राधिकार का सत्यापन भी सत्यापन का उद्देश्य है, इसलिए यह विकल्प भी उत्तर नहीं हो सकता। इसका अर्थ यह देखना है कि परिसंपत्ति ख़रीदने का निर्णय सक्षम प्राधिकारी ने लिया था — बड़े व्यय के लिए निदेशक मंडल का संकल्प, पूँजीगत बजट में उसका प्रावधान, और संबंधित अनुमोदन-पत्र। इसके साथ स्वामित्व का प्रलेख भी देखा जाता है, ताकि यह पक्का हो कि परिसंपत्ति इकाई के ही नाम है और उस पर कोई भार नहीं। यह उद्देश्य इसलिए रखा गया है कि केवल भुगतान हो जाना पर्याप्त प्रमाण नहीं होता; किसी अनधिकृत ख़रीद का बीजक भी उतना ही ठीक दिख सकता है जितना अधिकृत ख़रीद का। यहीं सत्यापन अभिशासन की जाँच से जुड़ जाता है।
अवधारणा
सत्यापन लेखापरीक्षा का वह चरण है जो चिट्ठे पर केंद्रित है, और उसे प्रत्ययन से अलग रखना इस विषय की सबसे बुनियादी माँग है।
प्रत्ययन आय-व्यय की मदों पर लगता है और पूछता है कि प्रविष्टि के पीछे प्रलेख है या नहीं। सत्यापन परिसंपत्तियों और दायित्वों पर लगता है और पूछता है कि प्रविष्टि के पीछे वस्तु है या नहीं। पहला काम पुस्तकों के भीतर होता है, दूसरा पुस्तकों से बाहर।
सत्यापन के उद्देश्यों को छह शीर्षकों में रखा जाता है। अस्तित्व — परिसंपत्ति चिट्ठे की तिथि पर सचमुच थी। स्वामित्व और हक़ — वह इकाई की ही है, किसी और की नहीं। क़ब्ज़ा — वह इकाई के पास है या किसी अभिरक्षक के पास, और उसका प्रमाण है। मूल्यांकन — उसका मूल्य उचित आधार पर और लगातार उसी आधार पर आँका गया है। प्राधिकार — उसे प्राप्त करने का निर्णय सक्षम प्राधिकारी ने लिया था। भार — उस पर कोई गिरवी या दायित्व है तो वह प्रकट किया गया है।
दायित्वों का सत्यापन इसी का दर्पण है : वहाँ यह देखना पड़ता है कि जो दायित्व दिखाए गए हैं वे वास्तविक हैं, और उससे भी अधिक यह कि कोई दायित्व छिपाया तो नहीं गया। परिसंपत्ति में ख़तरा बढ़ा-चढ़ाकर दिखाने का रहता है और दायित्व में छिपाने का — दोनों का असर एक ही दिशा में जाता है।
मूल्यांकन को कुछ लेखक सत्यापन का अंग मानते हैं और कुछ उसे अलग से गिनाते हैं; व्यवहार में वह सत्यापन के भीतर ही आता है और उसका सबसे कठिन हिस्सा है, क्योंकि वहाँ प्रलेख से आगे जाकर निर्णय करना पड़ता है।
इस प्रश्न की रचना में एक साफ़ संकेत छपा हुआ है। तीन विकल्प एक ही शब्द से आरंभ होते हैं और एक ही शब्द पर समाप्त — बीच का एक ही शब्द बदलता है। चौथा विकल्प उस साँचे से बाहर है : वह न उसी शब्द से आरंभ होता है, न उसी शब्द पर समाप्त। जहाँ तीन विकल्प एक साँचे के हों और एक अलग, वहाँ अलग वाले पर विशेष ध्यान देना चाहिए। पर यह केवल संकेत है, प्रमाण नहीं — परीक्षक कभी-कभी यही साँचा उलटकर भी रखता है, इसलिए निर्णय हमेशा विषय-वस्तु से ही होना चाहिए।
यह प्रश्न स्तंभ का अंतिम है और उसके ऊपर के दो प्रश्नों में से एक और भी निषेधात्मक है। एक ही स्तंभ में तीन नकार आना इस पेपर की सामान्य प्रवृत्ति है — निषेधात्मक प्रश्न इस पुस्तिका में मुख्यतः श्रम विधि और लेखा वाले खंडों में इकट्ठे हैं, और इसका कारण भी समझने योग्य है : जहाँ उत्तर किसी सूची से आता हो, वहाँ यह परखना कि अभ्यर्थी सूची की सीमा जानता है या नहीं, 'क्या इसमें नहीं आता' पूछकर ही सबसे अच्छा होता है।
इसलिए इन खंडों की तैयारी में सूचियाँ शब्दशः याद कर लेना सबसे अधिक फल देता है — सत्यापन के छह उद्देश्य भी ऐसी ही एक सूची है।
मुख्य तथ्य
- सत्यापन के उद्देश्य छह हैं : परिसंपत्ति का अस्तित्व, स्वामित्व और हक़, क़ब्ज़ा, मूल्यांकन, अधिग्रहण का प्राधिकार, तथा उस पर किसी भार के होने या न होने की जाँच।
- खातों की ऐतिहासिक सटीकता जाँचना सत्यापन का उद्देश्य नहीं है — वह प्रत्ययन और नित्य जाँच का काम है, जो पुस्तकों के भीतर होता है और सत्यापन से पहले पूरा हो चुका होता है।
- प्रत्ययन आय-व्यय की मदों पर लगता है और प्रविष्टि के पीछे प्रलेख ढूँढ़ता है; सत्यापन चिट्ठे की परिसंपत्तियों और दायित्वों पर लगता है और प्रविष्टि के पीछे वस्तु ढूँढ़ता है।
- पुस्तकें पूरी तरह शुद्ध होने पर भी परिसंपत्ति बिक चुकी, चोरी हो चुकी या गिरवी रखी हो सकती है — ये तीनों बातें केवल सत्यापन से पकड़ में आती हैं, इसी कारण वह अलग चरण के रूप में रखा गया है।
- दायित्वों के सत्यापन में मुख्य ख़तरा उन्हें छिपाने का होता है, जबकि परिसंपत्तियों में बढ़ा-चढ़ाकर दिखाने का; दोनों का असर वित्तीय स्थिति को वास्तविकता से बेहतर दिखाने की दिशा में जाता है।
आगे की तैयारी
सामान्य भ्रम
- सत्यापन और प्रत्ययन को एक मान लेना; एक वस्तु तक जाता है और दूसरा प्रलेख तक, और परीक्षा प्रायः इसी सीमा-रेखा पर प्रश्न बनाती है।
- मूल्यांकन को सत्यापन से अलग कोई तीसरी चीज़ मान लेना; व्यवहार में वह सत्यापन का ही सबसे कठिन अंग है।
- केवल साँचे से भिन्न दिखने के कारण किसी विकल्प को उत्तर मान लेना; रूप संकेत देता है, निर्णय विषय-वस्तु से होना चाहिए।
सत्यापन पर प्रश्न प्रायः तीन रूपों में आते हैं।
पहला रूप यही है — उद्देश्यों की सूची देकर एक बाहर की मद पहचानना। ऐसे प्रश्न में विकल्पों को दो ढेरों में बाँटिए : जो पुस्तकों के भीतर का काम है और जो वस्तु तक जाने का। सत्यापन दूसरे ढेर का है, इसलिए पहले ढेर की कोई भी मद उत्तर होगी।
दूसरा रूप प्रक्रिया का है : कोई परिसंपत्ति देकर पूछना कि उसका सत्यापन कैसे होगा। रोकड़ के लिए गिनती, बैंक शेष के लिए सीधी पुष्टि, देनदारों के लिए प्रतिपुष्टि, स्थायी परिसंपत्तियों के लिए भौतिक निरीक्षण और स्वामित्व-प्रलेख — यह जोड़ी अलग से याद कर लीजिए।
तीसरा रूप सीमा का है : पूछना कि लेखापरीक्षा में कौन-सा काम शामिल नहीं है। इसी परिवार के एक पहले के पेपर में यही पूछा जा चुका है और उसकी आधिकारिक कुंजी लेखा-पुस्तकें बनाने को लेखापरीक्षक का काम नहीं मानती, जबकि उसी प्रश्न का एक अन्य विकल्प लेन-देनों की प्रामाणिकता और वैधता के सत्यापन को लेखापरीक्षा का अंग मानता है। इससे यह भी स्पष्ट हो जाता है कि सत्यापन और प्रत्ययन दोनों लेखापरीक्षा के भीतर हैं, पर एक-दूसरे के पर्याय नहीं।
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