वर्ष 2025 में पद्म भूषण से सम्मानित श्री जतिन गोस्वामी, निम्नलिखित में से किस नृत्य रूप के प्रतिपादक हैं ?
- (a)भरतनाट्यम
- (b)सत्रिया
- (c)कथकली
- (d)कथक
उत्तर
क्यों
सही उत्तर — B, (b) सत्रिया — श्री जतिन गोस्वामी असम की शास्त्रीय नृत्य शैली सत्रिया के प्रतिपादक हैं, और वर्ष 2025 में उन्हें कला के क्षेत्र में पद्म भूषण से सम्मानित किया गया।
उनका परिचय इसी शैली से बनता है। सत्रिया के लिए उन्हें संगीत नाटक अकादेमी पुरस्कार मिल चुका है और पद्म श्री भी; असम में उन्हें नृत्याचार्य कहकर संबोधित किया जाता है। पद्म भूषण 2025 की सूची में उनका क्षेत्र कला और राज्य असम दर्ज है, और असम के साथ इस सूची में जुड़ा नाम अपने आप सत्रिया की ओर संकेत कर देता है — क्योंकि आठ शास्त्रीय शैलियों में असम से केवल यही एक है।
सत्रिया का जन्म असम के सत्रों में हुआ, जो श्रीमंत शंकरदेव की परंपरा में स्थापित वैष्णव मठ हैं। वहाँ यह नृत्य भक्ति का अंग रहा है, मनोरंजन का नहीं : भोकत नामघर में अंकिया नाट के भाग के रूप में इसे प्रस्तुत करते हैं, संगीत में बरगीत गाए जाते हैं, और वाद्यों में खोल तथा ताल प्रमुख हैं। सदियों तक यह मठों की चारदीवारी के भीतर ही रहा और बाद में मंच पर आया।
संगीत नाटक अकादेमी ने वर्ष 2000 में इसे शास्त्रीय नृत्य के रूप में मान्यता दी, और यह मान्यता पाने वाली आठवीं तथा सबसे नई शैली है। यही कारण है कि पुरानी सूचियों में इसका नाम प्रायः नहीं मिलता, और अभ्यर्थी अक्सर आठ के बदले सात शैलियाँ गिनकर छोड़ देते हैं।
विकल्पों की रचना भी ध्यान देने योग्य है : शेष तीनों शैलियाँ बहुत अधिक प्रसिद्ध हैं, इसलिए वे पहचानी हुई लगती हैं और यही उनका आकर्षण है। ऐसे प्रश्न में सुरक्षित रास्ता व्यक्ति के राज्य से चलना है — शैली और राज्य की जोड़ी याद हो तो उत्तर एक ही चरण में निकल आता है।
अन्य विकल्प क्यों गलत हैं
- (a)भरतनाट्यम — भरतनाट्यम तमिलनाडु की शास्त्रीय शैली है, असम की नहीं। इसका पुराना रूप मंदिरों में प्रस्तुत होने वाला सादिर या दासीअट्टम था, और बीसवीं शताब्दी के आरंभ में इसके पुनरुद्धार का काम रुक्मिणी देवी अरुंडेल तथा ई. कृष्ण अय्यर जैसे लोगों ने किया, जिससे यह मंदिर से मंच तक पहुँचा। इसका सैद्धांतिक आधार नाट्यशास्त्र और अभिनय दर्पण में मिलता है, और इसकी पहचान अराइमंडी नाम की अर्धबैठी मुद्रा, ज्यामितीय रेखाओं तथा अडवु नामक मूल इकाइयों से होती है। यह भारत की सबसे अधिक जानी जाने वाली शास्त्रीय शैलियों में है, और इसी प्रसिद्धि के कारण वह ऐसे प्रश्नों में सबसे पहले चुन लिया जाने वाला विकल्प बन जाता है। पर प्रश्न शैली की प्रसिद्धि नहीं, एक विशेष व्यक्ति की शैली पूछ रहा है।
- (c)कथकली — कथकली केरल की नृत्य-नाट्य शैली है। यह अकेले नृत्य से अधिक एक पूरा रंगमंच है : रामायण और महाभारत की कथाओं पर आधारित आट्टकथा उसका साहित्य है, और उसकी सबसे बड़ी पहचान विस्तृत मुख-सज्जा तथा वेशभूषा है, जिसमें चुट्टी नाम का रचा हुआ मुखौटा-जैसा रूप और भारी शिरोभूषा शामिल हैं। संवाद नहीं होते; कथा मुद्राओं और नेत्र-अभिनय से कही जाती है, और पार्श्व में गायक तथा चेंडा जैसे वाद्य रहते हैं। इस विकल्प का असली ख़तरा उच्चारण का है : कथकली और कथक नाम में केवल एक अक्षर का अंतर है, पर वे दो भिन्न शैलियाँ हैं, दो भिन्न क्षेत्रों की। जल्दबाज़ी में इन्हें एक मान लेना इस प्रश्न की सबसे संभावित भूल है।
- (d)कथक — कथक उत्तर भारत की शास्त्रीय शैली है और असम से उसका कोई संबंध नहीं। नाम कथा कहने वाले कथकों से जुड़ा है, जो मंदिरों में कथा सुनाते हुए नृत्य और अभिनय का प्रयोग करते थे; आगे चलकर यह शैली दरबारों में पहुँची और वहीं उसका वर्तमान रूप बना। इसकी पहचान तेज़ चक्कर, जटिल पदसंचालन और घुँघरुओं पर साधे गए लय-बोल हैं, तथा इसके प्रमुख घराने लखनऊ, जयपुर और बनारस के माने जाते हैं। यहाँ भी वही सावधानी लागू होती है जो पिछले विकल्प में : कथक और कथकली एक ही अक्षर से अलग होते हैं और उन्हें कभी एक नहीं मानना चाहिए। ध्यान दीजिए कि प्रश्न में व्यक्ति का नाम और वर्ष दोनों दिए हैं, और उत्तर तक पहुँचने का सबसे छोटा रास्ता व्यक्ति के राज्य से होकर जाता है।
अवधारणा
संगीत नाटक अकादेमी द्वारा मान्यता प्राप्त आठ शास्त्रीय नृत्य शैलियाँ हैं — भरतनाट्यम, कथक, कथकली, कुचिपुड़ी, ओडिसी, मणिपुरी, मोहिनीअट्टम और सत्रिया। इनमें सत्रिया सबसे बाद में जुड़ी, वर्ष 2000 में, और यही तथ्य परीक्षा में सबसे अधिक काम आता है।
सत्रिया की जड़ें असम के नव-वैष्णव आंदोलन में हैं। पंद्रहवीं-सोलहवीं शताब्दी में श्रीमंत शंकरदेव ने एकशरण नाम धर्म का प्रचार किया और उसके साथ कला के कई रूप विकसित हुए। सत्र वे मठ हैं जो इस परंपरा में बने, और नामघर वह प्रार्थना-गृह जहाँ सामूहिक उपासना होती है। अंकिया नाट शंकरदेव के रचे एकांकी नाटक हैं और भाओना उनकी प्रस्तुति। इन्हीं प्रस्तुतियों के भीतर नृत्य का जो अनुशासित रूप विकसित हुआ, वही सत्रिया है।
इसके संगीत को बरगीत कहते हैं — शंकरदेव और माधवदेव के रचे भक्ति गीत। मुख्य वाद्य खोल नाम का दोमुँहा मृदंग और ताल नाम की झाँझ हैं। परंपरागत रूप से इसे सत्रों में भोकत, यानी ब्रह्मचारी भिक्षु, प्रस्तुत करते थे, इसलिए यह लंबे समय तक पुरुषों तक सीमित रहा; मंच पर आने के बाद इसमें स्त्रियों की भागीदारी भी हुई।
असम की सांस्कृतिक पहचान से जुड़ी दो और बातें इसी संदर्भ में लौटती हैं : माजुली द्वीप, जहाँ अनेक प्रमुख सत्र हैं, और बिहू, जो लोक परंपरा का नृत्य है, शास्त्रीय नहीं। यह भेद ध्यान में रखने योग्य है, क्योंकि असम का नाम आते ही बिहू सबसे पहले याद आता है, जबकि शास्त्रीय शैली सत्रिया है।
यह प्रश्न इस पेपर के समसामयिकी वाले भाग का पहला है, और उसकी बनावट इस भाग की प्रवृत्ति दिखाती है : एक हाल का पुरस्कार लेकर उसे किसी स्थायी सांस्कृतिक तथ्य से जोड़ देना। इससे प्रश्न दो तरफ़ से हल हो सकता है — या तो पुरस्कार-सूची याद हो, या शैली और राज्य की जोड़ी।
दूसरा रास्ता अधिक भरोसेमंद है, क्योंकि पुरस्कार हर वर्ष बदलते हैं जबकि जोड़ियाँ स्थिर रहती हैं। इसलिए तैयारी में आठों शास्त्रीय शैलियों की राज्य-सहित सूची बना लीजिए और उसमें प्रत्येक के दो-दो प्रमुख नाम जोड़ लीजिए। पद्म पुरस्कारों की सूची में क्षेत्र और राज्य दोनों छपते हैं, इसलिए यह जोड़ी वहाँ भी काम आती है।
छपाई की एक बात भी ध्यान देने योग्य है : विकल्प (c) और (d) एक ही शब्द हैं, बस एक में एक अक्षर अधिक है। ऐसे विकल्प जानबूझकर पास-पास रखे जाते हैं, और जल्दबाज़ी में आँख उन्हें एक पढ़ लेती है। जहाँ दो विकल्प इतने मिलते-जुलते हों, वहाँ दोनों को अलग-अलग पढ़कर मन में उनके क्षेत्र भी दोहरा लेना चाहिए। यहाँ चारों नाम देवनागरी में ही छपे हैं और किसी के आगे कोष्ठक में अंग्रेज़ी नहीं दी गई।
मुख्य तथ्य
- श्री जतिन गोस्वामी सत्रिया नृत्य के प्रतिपादक हैं और उन्हें वर्ष 2025 में कला के क्षेत्र में पद्म भूषण मिला; इससे पहले उन्हें संगीत नाटक अकादेमी पुरस्कार और पद्म श्री भी मिल चुके हैं।
- सत्रिया असम की शास्त्रीय नृत्य शैली है, जिसका विकास श्रीमंत शंकरदेव की परंपरा में स्थापित वैष्णव मठों — सत्रों — के भीतर हुआ और जो नामघर में अंकिया नाट के अंग के रूप में प्रस्तुत होती रही।
- संगीत नाटक अकादेमी ने सत्रिया को वर्ष 2000 में शास्त्रीय नृत्य की मान्यता दी; यह मान्यता पाने वाली आठवीं और सबसे नई शैली है, इसलिए पुरानी सूचियों में उसका नाम प्रायः नहीं मिलता।
- सत्रिया का संगीत बरगीत कहलाता है और उसके प्रमुख वाद्य खोल तथा ताल हैं; परंपरागत रूप से इसे सत्रों में भोकत प्रस्तुत करते थे, इसलिए यह लंबे समय तक पुरुषों तक सीमित रहा।
- मान्यता प्राप्त आठ शास्त्रीय शैलियाँ हैं — भरतनाट्यम, कथक, कथकली, कुचिपुड़ी, ओडिसी, मणिपुरी, मोहिनीअट्टम और सत्रिया; असम का लोकप्रिय बिहू लोक परंपरा का नृत्य है, शास्त्रीय नहीं।
आगे की तैयारी
सामान्य भ्रम
- कथक और कथकली को एक मान लेना; दोनों में एक अक्षर का अंतर है, पर वे दो अलग शैलियाँ हैं और दो अलग क्षेत्रों की।
- असम का नाम आते ही बिहू चुन लेना; बिहू लोक नृत्य है और असम की शास्त्रीय शैली सत्रिया है।
- आठ शास्त्रीय शैलियों में सत्रिया को छोड़ देना; वह वर्ष 2000 में जुड़ी है, इसलिए पुरानी सूचियों में उसका नाम नहीं मिलता।
समसामयिकी और संस्कृति को जोड़ने वाले प्रश्न इस परीक्षा में नियमित हैं, और उनके तीन रूप दिखते हैं।
पहला रूप यही है — किसी पुरस्कार-विजेता का नाम देकर उसका क्षेत्र या शैली पूछना। ऐसे प्रश्न में यदि व्यक्ति का नाम याद न हो तो उसके राज्य से चलिए; पुरस्कार-सूचियों में क्षेत्र और राज्य दोनों दर्ज होते हैं और शैली-राज्य की जोड़ी प्रायः निर्णायक हो जाती है।
दूसरा रूप उल्टा है — शैली का नाम देकर उसका राज्य, वाद्य या साहित्य पूछना। यहाँ बरगीत, खोल, अंकिया नाट, आट्टकथा, अडवु जैसे पारिभाषिक शब्द काम आते हैं, इसलिए हर शैली के साथ दो-तीन ऐसे शब्द जोड़कर याद कीजिए।
तीसरा रूप सूची का है : कोई शैली देकर पूछना कि वह शास्त्रीय है या लोक, या कब मान्यता मिली। इसी परीक्षा परिवार में पुरस्कारों पर सीधे प्रश्न आ चुके हैं — एक पेपर में भारत रत्न के नवीनतम प्राप्तकर्ता पर, और एक अन्य में खेल पुरस्कार पर। इसलिए पुरस्कारों की वार्षिक सूची पढ़ते समय क्षेत्र और राज्य के स्तंभ भी देख लीजिए, केवल नाम नहीं।
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- (a)मोहिनीअट्टम
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सत्रिया नृत्य के साथ जुड़े निम्नलिखित में से कौन-से वाद्य और गीत-रूप हैं ?
- (a)चेंडा और आट्टकथा
- (b)खोल, ताल और बरगीत
- (c)मृदंगम और वर्णम
- (d)पखावज और ठुमरी
उत्तर(b) खोल, ताल और बरगीत — खोल दोमुँहा मृदंग है, ताल झाँझ, और बरगीत श्रीमंत शंकरदेव तथा माधवदेव के रचे भक्ति गीत; चेंडा और आट्टकथा कथकली से जुड़े हैं और शेष दो विकल्प अन्य परंपराओं के हैं।