लेखापरीक्षा के संदर्भ में, प्रत्ययन (वाउचिंग) का मूल उद्देश्य क्या है ?
- (a)वित्तीय विवरणों में त्रुटियों का पता लगाना
- (b)आंतरिक नियंत्रणों का मूल्यांकन करना
- (c)लेन-देनों की प्रामाणिकता का सत्यापन करना
- (d)प्रबंधन निष्पादन का आकलन करना
उत्तर
क्यों
सही उत्तर — C, (c) लेन-देनों की प्रामाणिकता का सत्यापन करना — प्रत्ययन का मूल उद्देश्य यही है, और प्रत्ययन शब्द का अर्थ ही इसी में खुल जाता है।
प्रत्ययन का अर्थ है पुस्तकों में की गई प्रविष्टियों को उनके समर्थक प्रलेखों से मिलाकर देखना — बीजक, रसीद, वाउचर, संविदा, कार्यवृत्त, बैंक विवरण। लेखापरीक्षक हर प्रविष्टि के पीछे जाकर यह पूछता है कि क्या यह लेन-देन सचमुच हुआ, क्या यह इसी इकाई का है, क्या इसकी राशि ठीक है, क्या यह सक्षम प्राधिकारी द्वारा अनुमोदित था, क्या यह उसी अवधि का है, और क्या यह सही खाते में सही ढंग से दर्ज हुआ। इन सब प्रश्नों का एक ही सार है — लेन-देन की प्रामाणिकता।
इस विषय की स्थापित परिभाषाएँ भी यही कहती हैं। एक प्रसिद्ध परिभाषा प्रत्ययन को उस तकनीकी प्रक्रिया के रूप में रखती है जिसमें लेन-देन का समर्थन और पुष्टि करने वाले प्रलेखीय साक्ष्य का निरीक्षण किया जाता है। दूसरी, अधिक विस्तृत परिभाषा इस पर बल देती है कि प्रत्ययन केवल रसीदें देख लेना नहीं है, बल्कि व्यवसाय के लेन-देनों की उन प्रलेखीय तथा अन्य साक्ष्यों के साथ जाँच है जो लेखापरीक्षक को यह संतोष दे सकें कि लेन-देन उचित थे, विधिवत् प्राधिकृत थे और पुस्तकों में ठीक-ठीक दर्ज हुए।
इसकी सबसे मज़बूत बाहरी पुष्टि इसी परीक्षा-परिवार के भीतर से मिलती है। एक पुराने पेपर में पूछा गया था कि लेखापरीक्षा में कौन-सा पक्ष सम्मिलित नहीं होता, और उसके विकल्पों में एक विकल्प शब्दशः यही था — लेन-देनों की प्रामाणिकता और वैधता का सत्यापन। आधिकारिक कुंजी ने उसे बाहर नहीं रखा, यानी आयोग का अपना पेपर उसे लेखापरीक्षा का ही अंग मानता है। बिना अपनी कुंजी वाले इस पेपर पर यह सबसे भरोसेमंद पुष्टि उपलब्ध है।
शेष तीनों विकल्प लेखापरीक्षा की दुनिया से ही आते हैं, पर तीनों किसी दूसरी प्रक्रिया के उद्देश्य हैं — और यही इस प्रश्न को कठिन बनाता है।
अन्य विकल्प क्यों गलत हैं
- (a)वित्तीय विवरणों में त्रुटियों का पता लगाना — वित्तीय विवरणों में त्रुटियों का पता लगाना प्रत्ययन का परिणाम हो सकता है, उसका मूल उद्देश्य नहीं। यह भेद लेखापरीक्षा के इतिहास से जुड़ा है : पहले लेखापरीक्षा का उद्देश्य ही त्रुटि और कपट पकड़ना माना जाता था, पर आधुनिक दृष्टि में मुख्य उद्देश्य वित्तीय विवरणों पर राय देना है, और त्रुटि या कपट का पता चलना उसका आनुषंगिक परिणाम। दूसरा भेद स्तर का है : प्रत्ययन प्रविष्टियों के स्तर पर काम करता है, जबकि वित्तीय विवरण उन प्रविष्टियों के जुड़ने के बाद बनते हैं। बीच में शेष निकालना, समायोजन करना और समूहीकरण करना बाक़ी रहता है, और उन चरणों की त्रुटियाँ प्रत्ययन से नहीं पकड़ी जातीं। इसलिए यह विकल्प प्रत्ययन का लक्ष्य नहीं, लेखापरीक्षा के एक संभावित उपोत्पाद का वर्णन है।
- (b)आंतरिक नियंत्रणों का मूल्यांकन करना — आंतरिक नियंत्रणों का मूल्यांकन एक अलग और पहले आने वाला चरण है। लेखापरीक्षक कार्य के आरंभ में यह समझता है कि इकाई में नियंत्रण कैसे बने हैं, फिर अनुपालन प्रक्रियाओं के द्वारा यह परखता है कि वे नियंत्रण वास्तव में चल भी रहे हैं या नहीं। इसका सीधा असर आगे के काम की मात्रा पर पड़ता है : नियंत्रण मज़बूत मिले तो सारभूत जाँच कम की जा सकती है, कमज़ोर मिले तो अधिक। प्रत्ययन उन्हीं सारभूत जाँचों में आता है, यानी वह नियंत्रण-मूल्यांकन का परिणाम है, उसका उद्देश्य नहीं। दोनों को उलट देना इस अनुक्रम को ही उलट देता है। यह विकल्प इसीलिए आकर्षक है कि दोनों काम लेखापरीक्षक ही करता है और दोनों का संबंध भी है — पर संबंध होना उद्देश्य होना नहीं है।
- (d)प्रबंधन निष्पादन का आकलन करना — प्रबंधन के निष्पादन का आकलन वित्तीय लेखापरीक्षा का विषय ही नहीं है। लेखापरीक्षक यह राय देता है कि वित्तीय विवरण इकाई की स्थिति और परिणामों का सही तथा उचित चित्र देते हैं या नहीं; वह यह नहीं बताता कि प्रबंधन ने अच्छा काम किया या बुरा, या कोई निर्णय समझदारी का था या नहीं। यह काम प्रबंधन लेखापरीक्षा, निष्पादन लेखापरीक्षा या प्रचालन लेखापरीक्षा नाम की अलग प्रक्रियाओं का है, जो प्रायः स्वेच्छा से कराई जाती हैं और जिनका ढाँचा तथा रिपोर्ट दोनों अलग होते हैं। इसके अलावा प्रत्ययन का काम व्यक्तिगत लेन-देनों पर होता है, जबकि निष्पादन का आकलन नीतियों और परिणामों के स्तर पर — दोनों एक ही तल पर हैं ही नहीं। इसलिए यह विकल्प विषय से सबसे दूर खड़ा है।
अवधारणा
लेखापरीक्षा में लेन-देन से लेकर राय तक पहुँचने के कई चरण हैं, और प्रत्येक चरण की अपनी तकनीक है। इस प्रश्न को समझने के लिए उन तकनीकों को अलग-अलग पहचान लेना ज़रूरी है।
पहली तकनीक नित्य जाँच है : जोड़, आगे ले जाना, खतौनी और शेष निकालने की गणितीय शुद्धता देखना। यह यांत्रिक काम है और आज अधिकांशतः प्रणाली स्वयं कर लेती है।
दूसरी तकनीक प्रत्ययन है : प्रविष्टियों को उनके समर्थक प्रलेखों से मिलाना। यहाँ छह बातें देखी जाती हैं — लेन-देन का सचमुच होना, उसका इसी इकाई का होना, राशि की शुद्धता, सक्षम प्राधिकारी का अनुमोदन, सही अवधि, और सही खाते में सही ढंग से दर्ज होना। प्रत्ययन मुख्यतः आय-व्यय की मदों पर लगता है।
तीसरी तकनीक सत्यापन है : चिट्ठे में दिखाई गई परिसंपत्तियों और दायित्वों के बारे में स्वयं को संतुष्ट करना — उनका अस्तित्व, स्वामित्व, क़ब्ज़ा, मूल्यांकन, अधिग्रहण का प्राधिकार, और यह कि उन पर कोई भार तो नहीं। सत्यापन पुस्तकों से बाहर निकलकर वस्तु तक जाता है।
चौथी तकनीक मूल्यांकन है, जो सत्यापन के भीतर ही एक अंग है और मूल्य के औचित्य से जुड़ा है।
इन सबसे पहले आंतरिक नियंत्रण का अध्ययन और अनुपालन-परीक्षण होता है, जो यह तय करता है कि आगे की जाँच कितनी गहरी करनी है। इस पूरे क्रम को याद रखने पर ऐसे प्रश्न अपने आप हल हो जाते हैं, क्योंकि हर विकल्प किसी न किसी चरण का नाम होता है और पूछना यह होता है कि वह किस चरण का है।
पृष्ठ के इस स्तंभ में यह अकेला प्रश्न है जो सकारात्मक रूप में पूछा गया है; उसके आगे और पीछे के तीनों प्रश्नों में मोटे अक्षरों का नकार है। इसलिए यहाँ सबसे आम भूल आदत की है — लगातार नकारात्मक प्रश्न पढ़ते-पढ़ते अभ्यर्थी इसे भी नकारात्मक मान बैठता है और सही उत्तर को ही छोड़ देता है। प्रश्न पढ़ते ही यह देख लेना कि नकार है या नहीं, यहाँ केवल सावधानी नहीं, आवश्यकता है।
प्रश्न में पारिभाषिक शब्द हिन्दी में दिया गया है और उसके आगे कोष्ठक में उसका अंग्रेज़ी रूप देवनागरी में लिख दिया गया है, ताकि दोनों माध्यमों के अभ्यर्थी उसे पहचान सकें। इस पुस्तिका में यह आदत बार-बार दिखती है, और वह इस बात की याद दिलाती है कि पारिभाषिक शब्दावली दोनों रूपों में जान लेनी चाहिए — प्रत्ययन और सत्यापन जैसे शब्दों के अंग्रेज़ी रूप भी उतने ही ज़रूरी हैं।
विषय की दृष्टि से यह उपखंड लेखापरीक्षा की बुनियादी शब्दावली पर टिका है — प्रलेखीकरण, प्रत्ययन, सत्यापन। ये तीनों शब्द अलग-अलग चरणों के हैं और परीक्षा उन्हें आपस में बदलकर पूछती है। इसलिए हर शब्द के साथ यह भी याद रखिए कि वह किस चरण पर, किस वस्तु पर, और किस प्रश्न का उत्तर देने के लिए लगता है।
मुख्य तथ्य
- प्रत्ययन का मूल उद्देश्य लेन-देनों की प्रामाणिकता का सत्यापन है — पुस्तकों की प्रविष्टियों को उनके समर्थक प्रलेखों से मिलाकर यह देखना कि लेन-देन सचमुच हुआ, प्राधिकृत था और ठीक दर्ज हुआ।
- प्रत्ययन में छह बातें देखी जाती हैं : लेन-देन का होना, उसका उसी इकाई का होना, राशि की शुद्धता, सक्षम प्राधिकारी का अनुमोदन, सही लेखा-अवधि, और सही खाते में सही ढंग से खतौनी।
- प्रत्ययन मुख्यतः आय और व्यय की मदों पर लगता है, जबकि सत्यापन चिट्ठे की परिसंपत्तियों और दायित्वों पर — यही दोनों शब्दों को अलग करने की सबसे सरल कसौटी है।
- आंतरिक नियंत्रणों का अध्ययन और अनुपालन-परीक्षण प्रत्ययन से पहले आते हैं और यह तय करते हैं कि सारभूत जाँच कितनी गहरी करनी है; इसलिए वे प्रत्ययन के उद्देश्य नहीं, उसकी मात्रा तय करने वाले चरण हैं।
- त्रुटि और कपट का पता चलना आधुनिक लेखापरीक्षा का आनुषंगिक परिणाम है; मुख्य उद्देश्य यह राय देना है कि वित्तीय विवरण सही तथा उचित चित्र प्रस्तुत करते हैं या नहीं।
आगे की तैयारी
सामान्य भ्रम
- पड़ोसी प्रश्नों की आदत में इस सकारात्मक प्रश्न को भी नकारात्मक पढ़ लेना; यहाँ पूछा गया है कि उद्देश्य क्या है, यह नहीं कि क्या नहीं है।
- प्रत्ययन को त्रुटि पकड़ने की प्रक्रिया मान लेना; त्रुटि का मिलना परिणाम है, उद्देश्य लेन-देन की प्रामाणिकता की पुष्टि है।
- आंतरिक नियंत्रण के मूल्यांकन को प्रत्ययन का उद्देश्य समझ लेना; वह उससे पहले का चरण है और उसकी मात्रा तय करता है।
इस विषय पर प्रश्न तीन रूपों में आते हैं, और तीनों एक ही समझ माँगते हैं।
पहला रूप यही है — किसी तकनीक का नाम देकर उसका उद्देश्य पूछना, और विकल्पों में पड़ोसी तकनीकों के उद्देश्य रख देना। ऐसे प्रश्न में हर विकल्प को किसी न किसी चरण के साथ जोड़िए; जो विकल्प पूछी गई तकनीक के चरण पर बैठता है, वही उत्तर है।
दूसरा रूप सीमा का है : पूछना कि लेखापरीक्षा में कौन-सा काम शामिल नहीं है। इसी परिवार के एक पहले के पेपर में यह पूछा जा चुका है और उसकी आधिकारिक कुंजी लेखा-पुस्तकें बनाने को लेखापरीक्षक का काम नहीं मानती, जबकि उसी प्रश्न का एक अन्य विकल्प लेन-देनों की प्रामाणिकता और वैधता के सत्यापन को लेखापरीक्षा का ही अंग मानता है।
तीसरा रूप उदाहरण का है : कोई काम बताकर पूछना कि वह प्रत्ययन है या सत्यापन। जैसे रोकड़ भुगतान की रसीदें जाँचना प्रत्ययन है, पर मशीन का भौतिक निरीक्षण करना और उसका स्वामित्व-प्रलेख देखना सत्यापन। तैयारी में इसी प्रकार के दस उदाहरण बनाकर छाँट लीजिए; परीक्षा में यही अभ्यास सबसे तेज़ी से काम आता है।
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