निम्नलिखित में से कौन-सी क्षतिपूर्ति संविदा नहीं है ?
- (a)अग्नि बीमा संविदा
- (b)जीवन बीमा संविदा
- (c)समुद्री बीमा संविदा
- (d)मोटर बीमा संविदा
उत्तर
क्यों
सही उत्तर — B, (b) जीवन बीमा संविदा — प्रश्न पूछता है कि कौन-सी संविदा क्षतिपूर्ति की संविदा नहीं है, और चारों में जीवन बीमा ही वह है।
क्षतिपूर्ति संविदा का अर्थ है : बीमाकर्ता बीमाकृत को उतना ही देगा जितनी वास्तविक हानि हुई है, ताकि वह उसी आर्थिक स्थिति में लौट आए जिसमें हानि से पहले था — न उससे कम, न उससे अधिक। इसलिए ऐसी संविदा में भुगतान वास्तविक हानि, बीमित राशि और बीमा-योग्य हित — तीनों में से जो कम हो, उसी तक सीमित रहता है। यही कारण है कि अग्नि, समुद्री और मोटर बीमा में दावा चुकाने से पहले हानि का आकलन कराया जाता है।
जीवन बीमा में यह पूरी व्यवस्था लागू नहीं हो सकती, क्योंकि मानव जीवन का कोई मौद्रिक मूल्य आँका ही नहीं जा सकता। किसी की मृत्यु से हुई हानि रुपयों में नापी नहीं जा सकती, इसलिए वहाँ 'वास्तविक हानि' नाम की कोई राशि है ही नहीं जिस तक भुगतान सीमित किया जाए। इसीलिए जीवन बीमा में पहले ही एक निश्चित बीमित राशि तय कर ली जाती है और घटना घटने पर — मृत्यु पर या अवधि पूरी होने पर — वही राशि दे दी जाती है। इसे आश्वासन की संविदा कहा जाता है, क्योंकि जिस घटना का आश्वासन दिया गया है वह किसी न किसी दिन घटेगी ही; अनिश्चितता केवल समय की है।
इसी अंतर से कुछ और भेद निकलते हैं, और परीक्षा उन्हीं को घुमाकर पूछती है। जीवन बीमा में एक व्यक्ति एक से अधिक बीमा-पत्र ले सकता है और मृत्यु पर सबका भुगतान पूरा-पूरा मिलता है, क्योंकि वहाँ अंशदान का सिद्धांत लागू नहीं होता; क्षतिपूर्ति वाली संविदाओं में ऐसा नहीं हो सकता। इसी तरह जीवन बीमा में प्रत्यासन का सिद्धांत भी लागू नहीं होता। और बीमा-योग्य हित का समय भी अलग है : जीवन बीमा में वह संविदा करते समय होना चाहिए, अग्नि बीमा में संविदा के समय और हानि के समय दोनों में, तथा समुद्री बीमा में हानि के समय।
एक और श्रेणी इसी नियम के साथ जाती है : व्यक्तिगत दुर्घटना बीमा भी क्षतिपूर्ति की संविदा नहीं मानी जाती, क्योंकि वहाँ भी अंग या जीवन की हानि का मूल्य पहले से तय राशि के रूप में दिया जाता है।
अन्य विकल्प क्यों गलत हैं
- (a)अग्नि बीमा संविदा — अग्नि बीमा क्षतिपूर्ति की आदर्श संविदा है, इसलिए यह उत्तर नहीं हो सकता। आग से जो संपत्ति नष्ट होती है उसका बाज़ार मूल्य आँका जा सकता है, इसलिए वहाँ 'वास्तविक हानि' एक ठोस राशि है और भुगतान उसी तक सीमित रहता है। बीमित राशि चाहे कितनी भी बड़ी क्यों न हो, बीमाकृत को हानि से अधिक नहीं मिलता — यही क्षतिपूर्ति का मूल है। इसी से जुड़ी दो और व्यवस्थाएँ इस विकल्प को और स्पष्ट कर देती हैं : आग बुझने के बाद बचा हुआ मलबा या माल बीमाकर्ता को मिल जाता है, और यदि उसी संपत्ति का बीमा एक से अधिक कंपनियों से कराया गया हो तो हानि उन सबमें अनुपात के अनुसार बँटती है। दोनों व्यवस्थाएँ इसीलिए हैं कि बीमाकृत एक हानि पर लाभ न कमा ले, और दोनों केवल क्षतिपूर्ति वाली संविदाओं में मिलती हैं।
- (c)समुद्री बीमा संविदा — समुद्री बीमा भी क्षतिपूर्ति की संविदा है, और यहाँ तो विधि स्वयं यह बात शब्दों में कहती है। समुद्री बीमा अधिनियम, 1963 की धारा 3 समुद्री बीमा संविदा को ऐसी संविदा बताती है जिसके द्वारा बीमाकर्ता बीमाकृत को समुद्री हानियों के विरुद्ध क्षतिपूर्ति देने का वचन देता है। जहाज़, माल और भाड़ा — तीनों का मूल्य आँका जा सकता है, इसलिए वहाँ हानि की माप संभव है। व्यवहार में समुद्री बीमा प्रायः मूल्यांकित पत्र के रूप में लिखा जाता है, जिसमें विषय-वस्तु का मूल्य पहले ही तय कर लिया जाता है, ताकि दूर समुद्र में हुई हानि पर बाद में मोल-भाव न करना पड़े; पर वह केवल माप की सुविधा है, क्षतिपूर्ति के स्वरूप से छूट नहीं। इसलिए यह विकल्प वह नहीं है जिसे प्रश्न ढूँढ़ रहा है।
- (d)मोटर बीमा संविदा — मोटर बीमा भी क्षतिपूर्ति की संविदा है, और उसके दोनों भाग इसी स्वरूप के हैं। स्वयं के वाहन की क्षति वाला भाग सीधा है : वाहन की मरम्मत या उसके मूल्य तक भुगतान होता है, और वह मूल्य भी वाहन की आयु के अनुसार घटाकर आँका जाता है, ताकि बीमाकृत को नए वाहन के बराबर राशि पाकर लाभ न हो जाए। तीसरे पक्ष वाला भाग भी क्षतिपूर्ति ही है, यद्यपि वहाँ भरपाई बीमाकृत की अपनी संपत्ति की नहीं, उस दायित्व की होती है जो किसी और को हुई हानि के कारण उस पर आ पड़ा। भारत में यह भाग वैधानिक रूप से अनिवार्य है। जिस संविदा में भुगतान वास्तविक हानि या वास्तविक दायित्व की माप पर टिका हो, वह क्षतिपूर्ति की संविदा है — इसलिए यह विकल्प उत्तर नहीं है।
अवधारणा
बीमा संविदाओं को उनके भुगतान के आधार पर दो वर्गों में बाँटा जाता है, और यह प्रश्न उसी विभाजन-रेखा पर खड़ा है।
पहला वर्ग क्षतिपूर्ति की संविदाओं का है — अग्नि, समुद्री, मोटर, चोरी, दायित्व और वे सब बीमा जो संपत्ति या दायित्व से जुड़े हैं। यहाँ भुगतान वास्तविक हानि की माप पर होता है और वह हानि से अधिक कभी नहीं हो सकता। इसी वर्ग में प्रत्यासन और अंशदान के सिद्धांत लागू होते हैं, क्योंकि दोनों का काम बीमाकृत को दोहरा भुगतान पाने से रोकना है।
दूसरा वर्ग आश्वासन की संविदाओं का है — जीवन बीमा और व्यक्तिगत दुर्घटना बीमा। यहाँ विषय-वस्तु का कोई बाज़ार-मूल्य नहीं है, इसलिए हानि की माप संभव नहीं। इसका हल यह निकाला गया कि राशि पहले ही तय कर ली जाए, और घटना घटने पर वही राशि दे दी जाए। इसीलिए एक व्यक्ति कई बीमा-पत्र ले सकता है और सबका पूरा भुगतान पा सकता है।
एक विधिक सूक्ष्मता भी जानने योग्य है। भारतीय संविदा अधिनियम, 1872 की धारा 124 'क्षतिपूर्ति संविदा' को संकुचित अर्थ में परिभाषित करती है — वह संविदा जिसमें एक पक्ष दूसरे को वचनदाता के अपने आचरण से, या किसी अन्य व्यक्ति के आचरण से, हुई हानि से बचाने का वचन देता है। आग, तूफ़ान या दुर्घटना जैसी घटनाओं से हुई हानि इस परिभाषा के शब्दों में सीधे नहीं आती। इसलिए बीमा संविदाओं को इस धारा के अंतर्गत नहीं, क्षतिपूर्ति के सामान्य सिद्धांत के अंतर्गत रखा जाता है — जो ठीक वही सिद्धांत है जिसे यह प्रश्न पूछ रहा है।
इस भेद का व्यावहारिक असर हर दावे पर दिखता है : एक ओर सर्वेक्षक हानि आँकता है, दूसरी ओर केवल घटना का प्रमाण चाहिए होता है।
पृष्ठ पर यह प्रश्न बीमा वाले उपखंड का दूसरा है और उसके ठीक पहले वाला प्रश्न बीमा के एक सिद्धांत का नाम पूछता है, इसलिए दोनों को साथ पढ़ना उपयोगी है। दोनों की जड़ एक ही जगह है — क्षतिपूर्ति का सिद्धांत — और वह भेद जिसे यह प्रश्न परख रहा है, वही भेद पिछले प्रश्न के दो विकल्पों को भी अलग करता है।
रचना की दृष्टि से यह प्रश्न सीधा है। चारों विकल्प एक ही साँचे के हैं और सबका अंत 'बीमा संविदा' पर होता है, इसलिए पूरा निर्णय पहले शब्द पर टिका है — अग्नि, जीवन, समुद्री, मोटर। तीन विकल्प संपत्ति या दायित्व से जुड़े हैं और एक व्यक्ति से; यह असंगति ही उत्तर की ओर पहला संकेत है।
प्रश्न निषेधात्मक है और नकार मोटे तिरछे अक्षरों में छपा है, जो अभ्यर्थी के पक्ष में जाता है। इसी स्तंभ के अगले दो प्रश्नों में से एक और भी निषेधात्मक है, इसलिए यहाँ यह आदत बना लेना उपयोगी है कि प्रश्न पढ़ते ही नकार के होने या न होने पर निशान लगा दिया जाए। तीन प्रश्नों में दो का निषेधात्मक होना इसी पेपर की एक सामान्य प्रवृत्ति है, जो श्रम विधि और लेखा वाले खंडों में सबसे अधिक दिखती है।
मुख्य तथ्य
- जीवन बीमा क्षतिपूर्ति की संविदा नहीं है, क्योंकि मानव जीवन का मौद्रिक मूल्य नहीं आँका जा सकता; वहाँ पहले से तय बीमित राशि दी जाती है और उसे आश्वासन की संविदा कहा जाता है।
- अग्नि, समुद्री और मोटर बीमा क्षतिपूर्ति की संविदाएँ हैं — भुगतान वास्तविक हानि, बीमित राशि और बीमा-योग्य हित में से जो कम हो उसी तक सीमित रहता है, इसलिए बीमाकृत हानि पर लाभ नहीं कमा सकता।
- समुद्री बीमा अधिनियम, 1963 की धारा 3 समुद्री बीमा संविदा को स्पष्ट रूप से क्षतिपूर्ति देने वाली संविदा बताती है — यह विधि का अपना शब्द है, केवल पाठ्यपुस्तक का वर्गीकरण नहीं।
- प्रत्यासन और अंशदान के सिद्धांत केवल क्षतिपूर्ति वाली संविदाओं में लागू होते हैं; जीवन बीमा में एक व्यक्ति कई बीमा-पत्र लेकर सबका पूरा भुगतान पा सकता है।
- बीमा-योग्य हित का समय तीनों में अलग है : जीवन बीमा में संविदा करते समय, अग्नि बीमा में संविदा के समय और हानि के समय दोनों में, तथा समुद्री बीमा में हानि के समय।
आगे की तैयारी
सामान्य भ्रम
- समुद्री बीमा को मूल्यांकित पत्र के कारण क्षतिपूर्ति से बाहर मान लेना; मूल्य पहले तय करना माप की सुविधा है, स्वरूप का अपवाद नहीं।
- व्यक्तिगत दुर्घटना बीमा को क्षतिपूर्ति वाली संविदा मान लेना; वहाँ भी राशि पहले से तय होती है, हानि आँकी नहीं जाती।
- जीवन बीमा में एक से अधिक बीमा-पत्रों पर अंशदान का सिद्धांत लगा देना; वह सिद्धांत केवल क्षतिपूर्ति वाली संविदाओं में चलता है।
यह विषय दो रूपों में लौटता है। पहला रूप यही है — बीमा के प्रकार गिनाकर पूछना कि कौन-सा क्षतिपूर्ति की संविदा है या कौन-सा नहीं। यहाँ केवल एक कसौटी काम आती है : क्या हानि रुपयों में नापी जा सकती है। जहाँ नाप संभव है वहाँ क्षतिपूर्ति है, जहाँ नहीं वहाँ आश्वासन।
दूसरा रूप सिद्धांतों का है : कोई सिद्धांत देकर पूछना कि वह किस प्रकार के बीमा में लागू होता है। प्रत्यासन और अंशदान इसी रूप में सबसे अधिक आते हैं, और इसी परिवार के एक पहले के पेपर में प्रत्यासन पर सीधा प्रश्न आ चुका है।
तीसरा रूप लेखांकन की ओर से आता है : बीमा दावे की राशि को पूँजीगत या आयगत प्राप्ति ठहराना, या हानि की पूर्ति का लेखा करना। एक पहले के पेपर में आग से पूरी तरह नष्ट मशीन पर मिले दावे का वर्गीकरण पूछा जा चुका है। इसलिए इस विषय को केवल विधि की ओर से नहीं, लेखांकन की ओर से भी देख लीजिए — इस परीक्षा में दोनों खंड आस-पास ही बैठते हैं।
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प्रत्यासन के सिद्धांत पर सीधा प्रश्न — वही सिद्धांत जो केवल क्षतिपूर्ति वाली संविदाओं में लागू होता है और जीवन बीमा में नहीं।
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आग में पूरी तरह नष्ट हुई मशीन पर मिले बीमा दावे को पूँजीगत प्राप्ति मानने वाला प्रश्न — क्षतिपूर्ति का वही विचार लेखांकन की ओर से।
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निजी बीमा और सामाजिक बीमा के प्रारूपिक अंतर, जिनमें संविदात्मक और वैधानिक अधिकारों का भेद भी है।
अभ्यास
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निम्नलिखित में से किस प्रकार के बीमा में एक ही व्यक्ति एक से अधिक बीमा-पत्र लेकर घटना घटने पर प्रत्येक पत्र की पूरी राशि प्राप्त कर सकता है ?
- (a)अग्नि बीमा
- (b)समुद्री बीमा
- (c)जीवन बीमा
- (d)चोरी बीमा
उत्तर(c) जीवन बीमा — यह क्षतिपूर्ति की संविदा नहीं है, इसलिए वहाँ अंशदान का सिद्धांत लागू नहीं होता और हर बीमा-पत्र की पूरी राशि देय होती है; शेष तीनों क्षतिपूर्ति वाली संविदाएँ हैं, जहाँ हानि सब बीमाकर्ताओं में अनुपात के अनुसार बँटती है।
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- (a)₹ 10,00,000
- (b)₹ 8,00,000
- (c)₹ 3,00,000
- (d)₹ 5,00,000
उत्तर(c) ₹ 3,00,000 — क्षतिपूर्ति की संविदा में भुगतान वास्तविक हानि तक सीमित रहता है, चाहे बीमित राशि उससे कितनी भी अधिक क्यों न हो; अधिक बीमा कराने से दावा नहीं बढ़ता।