बीमा संविदा के मामले में, वह सिद्धांत जो अभिव्यक्त करता है कि यह बीमाकृत का कर्तव्य है कि वह बीमाकृत संपत्ति में हानि अथवा क्षति को न्यूनीकृत करने हेतु उचित कदम उठाए, क्या कहलाता है ?
- (a)प्रत्यासन का सिद्धांत
- (b)परम सद्भाव का सिद्धांत
- (c)सहयोग का सिद्धांत
- (d)शमन का सिद्धांत
उत्तर
क्यों
सही उत्तर — D, (d) शमन का सिद्धांत — बीमा का यह सिद्धांत बीमाकृत पर एक कर्तव्य डालता है : हानि हो जाने पर वह उसे यथासंभव कम रखने के उचित कदम उठाए, ठीक वैसे ही जैसे वह तब उठाता जब उस संपत्ति का कोई बीमा ही न होता।
इस सिद्धांत का तर्क सीधा है। बीमा हानि की भरपाई का वादा है, लापरवाही की छूट नहीं। यदि बीमा-पत्र होते ही बीमाकृत यह मानकर हाथ पर हाथ धरे बैठ जाए कि नुक़सान तो बीमाकर्ता भरेगा ही, तो हानि की मात्रा उसकी उदासीनता से बढ़ती चली जाएगी और वह बढ़ी हुई मात्रा भी बीमाकर्ता के सिर आएगी। इसलिए विधि उससे वही सावधानी माँगती है जो एक विवेकशील स्वामी अपनी बिना बीमा वाली संपत्ति के लिए बरतता — आग लगने पर अग्निशमन को बुलाना, बचा हुआ माल हटाकर सुरक्षित करना, टूटी हुई खिड़की को ढँक देना, पानी का बहाव रोकना।
इस कर्तव्य की सीमाएँ भी उतनी ही महत्त्वपूर्ण हैं। बीमाकृत से असाधारण, ख़र्चीले या जोखिम भरे उपाय नहीं माँगे जाते — केवल उचित कदम माँगे जाते हैं, और उचित का अर्थ परिस्थिति से तय होता है। दूसरी ओर, हानि रोकने में उसने जो उचित ख़र्च किया, वह भी सामान्यतः बीमा-दावे का अंग बन जाता है, क्योंकि वह ख़र्च बीमाकर्ता के हित में ही किया गया था।
प्रश्न की भाषा इसी को शब्दशः कहती है : यह बीमाकृत का कर्तव्य है कि वह बीमाकृत संपत्ति में हानि अथवा क्षति को न्यूनीकृत करने हेतु उचित कदम उठाए। 'कर्तव्य', 'उचित कदम' और 'न्यूनीकृत' — ये तीनों शब्द मिलकर एक ही सिद्धांत की ओर इशारा करते हैं, और वह हानि को कम करने का सिद्धांत है, जिसे हिन्दी में शमन और अंग्रेज़ी में mitigation कहते हैं। इसे हानि न्यूनीकरण का सिद्धांत भी कहा जाता है।
यहाँ यह भी ध्यान रखिए कि यह कर्तव्य हानि के बाद का है। बीमा के दूसरे बड़े सिद्धांत या तो संविदा करते समय लागू होते हैं या दावा चुकाने के बाद — यही समय-रेखा चारों विकल्पों को अलग करने का सबसे भरोसेमंद तरीक़ा है।
अन्य विकल्प क्यों गलत हैं
- (a)प्रत्यासन का सिद्धांत — प्रत्यासन का सिद्धांत हानि के बाद नहीं, दावा चुका देने के बाद काम करता है, और उसका कर्तव्य बीमाकृत पर नहीं बीमाकर्ता के अधिकार पर टिका है। जब बीमाकर्ता हानि की पूरी भरपाई कर देता है, तो उस संपत्ति से जुड़े बीमाकृत के अधिकार बीमाकर्ता को मिल जाते हैं — वह बचे हुए मलबे या माल पर अधिकार पा सकता है, और यदि हानि किसी तीसरे व्यक्ति की ग़लती से हुई थी तो उससे वसूली का अधिकार भी। इसका उद्देश्य यह रोकना है कि बीमाकृत एक ही हानि पर दो जगह से पैसा पाकर लाभ कमा ले। इसी परीक्षा-परिवार के एक पहले के पेपर में यह सिद्धांत सीधे पूछा जा चुका है और उसकी आधिकारिक कुंजी उसे बीमाकृत तथा उसकी बीमा कंपनी को मिलने वाली वसूली से जोड़ती है। इसलिए यह विकल्प विषय के भीतर तो है, पर समय-रेखा पर ग़लत जगह खड़ा है।
- (b)परम सद्भाव का सिद्धांत — परम सद्भाव का सिद्धांत संविदा करते समय लागू होता है, हानि होने के बाद नहीं। इसके अनुसार दोनों पक्षों पर, और विशेष रूप से बीमा चाहने वाले पर, यह कर्तव्य है कि वह हर तात्त्विक तथ्य स्वयं बता दे — भले ही उससे पूछा न गया हो। साधारण संविदाओं में ऐसा नहीं होता; वहाँ ख़रीदार को स्वयं सावधान रहना पड़ता है। बीमा में यह उलट इसलिए है कि जोखिम की असली जानकारी केवल प्रस्तावक के पास होती है — उसकी बीमारी, इमारत की दशा, माल की प्रकृति। तथ्य छिपाने पर बीमा-पत्र ही चुनौती के योग्य हो जाता है। यह कर्तव्य उचित कदम उठाने का नहीं, सच बताने का है, और वह हानि से पहले का है — इसलिए प्रश्न की भाषा से मेल नहीं खाता।
- (c)सहयोग का सिद्धांत — यह विकल्प उस अर्थ को छूता है जिसमें बीमा को एक सहयोगी व्यवस्था कहा जाता है : बहुत से लोग थोड़ा-थोड़ा प्रीमियम देकर एक कोष बनाते हैं, और उनमें से जिन थोड़े लोगों पर विपत्ति आती है, उनकी हानि उसी साझा कोष से भरी जाती है। यह बीमा के आर्थिक स्वरूप का सही वर्णन है, पर वह किसी ऐसे सिद्धांत का नाम नहीं है जो हानि के बाद बीमाकृत पर कोई कर्तव्य डालता हो — और प्रश्न ठीक वैसा ही कर्तव्य ढूँढ़ रहा है। यहाँ यह भी ध्यान रखने योग्य है कि जिस सिद्धांत के लिए अंग्रेज़ी में मिलता-जुलता शब्द चलता है, वह अंशदान का सिद्धांत है : जब एक ही जोखिम का बीमा एक से अधिक बीमाकर्ताओं से कराया गया हो, तो हानि उन सबमें अनुपात के अनुसार बँटती है। वह भी बीमाकृत का कर्तव्य नहीं, बीमाकर्ताओं के बीच का बँटवारा है।
अवधारणा
बीमा संविदा साधारण संविदाओं से कुछ बातों में अलग है, और उन अंतरों को कुछ स्थापित सिद्धांतों के रूप में रखा जाता है। परीक्षा की दृष्टि से इन्हें दो कसौटियों पर छाँटना सबसे उपयोगी है : सिद्धांत किस समय लागू होता है, और वह किस पक्ष पर कर्तव्य डालता है।
संविदा बनते समय दो सिद्धांत काम करते हैं। परम सद्भाव — हर तात्त्विक तथ्य स्वयं बताना; और बीमा-योग्य हित — बीमा कराने वाले का उस विषय-वस्तु में ऐसा हित होना कि उसके नष्ट होने से उसे आर्थिक हानि हो। बीमा-योग्य हित के बिना संविदा जुए जैसी हो जाती और विधि उसे मान्यता नहीं देती।
हानि हो जाने पर तीन सिद्धांत काम करते हैं। निकटतम कारण — यह देखना कि हानि का प्रभावी कारण वही है जो बीमा-पत्र में शामिल है; क्षतिपूर्ति — बीमाकृत को उसी आर्थिक स्थिति में लाना जिसमें वह हानि से पहले था, न उससे बेहतर; और शमन — बीमाकृत का यह कर्तव्य कि वह हानि को बढ़ने से रोके।
दावा चुकाने के बाद दो सिद्धांत काम करते हैं। प्रत्यासन — बीमाकर्ता का बीमाकृत के अधिकारों में प्रवेश, जिससे वह बचे हुए माल या तीसरे पक्ष से वसूली पा सके; और अंशदान — जब एक ही जोखिम पर एक से अधिक बीमा-पत्र हों, तो बीमाकर्ताओं के बीच हानि का अनुपात में बँटवारा।
इन दोनों अंतिम सिद्धांतों का उद्देश्य एक ही है, और वह क्षतिपूर्ति के सिद्धांत की रक्षा है : बीमाकृत किसी भी रास्ते से एक हानि पर दोहरा भुगतान न पा जाए।
इस प्रश्न का ढाँचा भाषा पर टिका है। चारों विकल्प एक ही साँचे में हैं — पहला शब्द बदलता है और शेष 'का सिद्धांत' सब में एक जैसा है। इसलिए पूरा निर्णय पहले शब्द पर आ टिकता है, और उस शब्द तक पहुँचने का रास्ता प्रश्न की परिभाषा से होकर जाता है।
यहाँ परिभाषा असामान्य रूप से लंबी है : एक ही वाक्य, दो अंतर्निहित उपवाक्य, पाँच छपी हुई पंक्तियाँ। ऐसे वाक्य में अभ्यर्थी का काम उसे तोड़ना है। तीन शब्द ढूँढ़िए — किसका कर्तव्य, कब का कर्तव्य, और करना क्या है। यहाँ उत्तर हैं : बीमाकृत का, हानि हो जाने के बाद का, और हानि को कम करने का। इन तीनों पर एक साथ खरा उतरने वाला केवल एक सिद्धांत है।
इस पेपर में यह प्रश्न बीमा से जुड़ी मदों की शुरुआत है और उसके ठीक बाद क्षतिपूर्ति संविदा वाला प्रश्न आता है, इसलिए दोनों को साथ पढ़ना उपयोगी है। इस पूरे उपखंड में विकल्प हिन्दी में ही नामित हैं, बिना कोष्ठक में अंग्रेज़ी दिए, इसलिए पारिभाषिक शब्दों की हिन्दी जानना यहाँ केवल सुविधा नहीं, आवश्यकता है — प्रत्यासन, परम सद्भाव, अंशदान, निकटतम कारण और शमन।
मुख्य तथ्य
- शमन अथवा हानि न्यूनीकरण का सिद्धांत बीमाकृत पर यह कर्तव्य डालता है कि हानि हो जाने पर वह उसे कम रखने के उचित कदम उठाए — वही सावधानी जो वह अपनी बिना बीमा वाली संपत्ति के लिए बरतता।
- यह कर्तव्य असाधारण या ख़र्चीले उपायों तक नहीं जाता; और हानि रोकने में बीमाकृत ने जो उचित ख़र्च किया, वह सामान्यतः दावे का ही अंग बन जाता है, क्योंकि वह बीमाकर्ता के हित में किया गया था।
- परम सद्भाव का सिद्धांत संविदा करते समय लागू होता है और हर तात्त्विक तथ्य स्वयं बताने का कर्तव्य डालता है; साधारण संविदाओं में ऐसा कर्तव्य नहीं होता, जहाँ ख़रीदार को स्वयं सावधान रहना पड़ता है।
- प्रत्यासन दावा चुका देने के बाद लागू होता है : बीमाकर्ता बीमाकृत के अधिकारों में प्रवेश कर जाता है और बचे हुए माल या दोषी तीसरे पक्ष से वसूली पा सकता है, ताकि बीमाकृत दोहरा भुगतान न पाए।
- अंशदान का सिद्धांत तब काम करता है जब एक ही जोखिम पर एक से अधिक बीमा-पत्र हों — हानि सब बीमाकर्ताओं में अनुपात के अनुसार बँटती है, और यह भी क्षतिपूर्ति के सिद्धांत की ही रक्षा करता है।
आगे की तैयारी
सामान्य भ्रम
- शमन और क्षतिपूर्ति को एक मान लेना; क्षतिपूर्ति बीमाकर्ता के भुगतान की सीमा तय करती है, शमन बीमाकृत पर हानि रोकने का कर्तव्य डालता है।
- प्रत्यासन को हानि के तुरंत बाद का सिद्धांत समझ लेना; वह दावा चुका देने के बाद ही काम में आता है।
- बीमा को सहयोगी व्यवस्था कहने वाले वर्णन को किसी सिद्धांत का नाम मान लेना; बीमाकर्ताओं के बीच बँटवारे का सिद्धांत अंशदान है।
बीमा के सिद्धांतों पर प्रश्न प्रायः दो रूपों में आते हैं। पहला रूप यही है — परिभाषा देकर सिद्धांत का नाम पूछना। ऐसे प्रश्न में सबसे अच्छा तरीक़ा यह है कि परिभाषा में से तीन बातें निकाल ली जाएँ : कर्तव्य किस पर है, वह किस समय लगता है, और उसका उद्देश्य क्या है। इन तीनों से सिद्धांत अपने आप छँट जाता है।
दूसरा रूप उल्टा है — सिद्धांत का नाम देकर पूछना कि वह क्या करने देता है। इसी परिवार के एक पहले के पेपर में प्रत्यासन पर ठीक ऐसा ही प्रश्न आ चुका है, और उसकी आधिकारिक कुंजी उसे बीमाकृत तथा उसकी बीमा कंपनी को मिलने वाली वसूली से जोड़ती है।
तीसरा रूप उदाहरण का है : कोई घटना देकर पूछना कि उसमें कौन-सा सिद्धांत लागू होगा — जैसे एक ही मकान का दो कंपनियों से बीमा, या आग बुझाने में हुआ ख़र्च, या प्रस्ताव-पत्र में बीमारी छिपाना। तैयारी में हर सिद्धांत के साथ एक-एक ठोस उदाहरण जोड़कर याद कीजिए; परीक्षा में प्रायः उदाहरण ही पहचानना पड़ता है।
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प्रत्यासन का सिद्धांत क्या करने देता है — इसी विषय पर सीधा प्रश्न, जिसकी आधिकारिक कुंजी उसे बीमाकृत तथा उसकी बीमा कंपनी को मिलने वाली वसूली से जोड़ती है।
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