निम्नलिखित में से कौन-सी समायोजन जर्नल प्रविष्टि होगी, यदि ₹ 2,000 अग्रिम किराया प्राप्त हुआ है ?
- (a)डेबिट लाभ और हानि खाता तथा क्रेडिट किराया खाता
- (b)डेबिट किराया प्राप्ति खाता तथा क्रेडिट अग्रिम किराया प्राप्ति खाता
- (c)डेबिट अग्रिम किराया प्राप्ति खाता तथा क्रेडिट किराया प्राप्ति खाता
- (d)डेबिट किराया खाता तथा क्रेडिट लाभ और हानि खाता
उत्तर
क्यों
सही उत्तर — B, (b) डेबिट किराया प्राप्ति खाता तथा क्रेडिट अग्रिम किराया प्राप्ति खाता — जो किराया अगली अवधि का है पर इस वर्ष मिल चुका है, उसे इस वर्ष की आय में से निकालकर दायित्व बना देना ही समायोजन प्रविष्टि का काम है, और यह विकल्प ठीक वही करता है।
स्थिति को क्रम से देखिए। वर्ष के दौरान जब भी किराया मिला, रोकड़ बही में रोकड़ डेबिट हुई और किराया प्राप्ति खाता क्रेडिट। इस तरह किराया प्राप्ति खाते में पूरा मिला हुआ किराया इकट्ठा हो गया — उसमें वह ₹ 2,000 भी शामिल है जो वास्तव में अगली अवधि के लिए है। उपार्जन की मान्यता कहती है कि आय उसी अवधि में गिनी जाए जिसकी वह है, न कि उस अवधि में जब रोकड़ आई। इसलिए ₹ 2,000 को इस वर्ष की आय में से हटाना पड़ेगा।
आय का खाता क्रेडिट शेष रखता है, इसलिए उसे घटाने का अर्थ है उसे डेबिट करना। और जो राशि हटाई गई वह व्यवसाय के पास पड़ी है पर अभी कमाई नहीं गई — यानी वह किरायेदार के प्रति एक दायित्व है, जिसे अनुपार्जित आय कहते हैं। दायित्व बढ़ाने का अर्थ है उसे क्रेडिट करना। इसलिए प्रविष्टि बनी : किराया प्राप्ति खाता डेबिट, अग्रिम किराया प्राप्ति खाता क्रेडिट।
इसका असर दो जगह दिखता है। लाभ-हानि खाते में किराया प्राप्ति की राशि ₹ 2,000 कम होकर आती है, और चिट्ठे के दायित्व पक्ष में 'अग्रिम प्राप्त किराया' नाम से ₹ 2,000 खड़े हो जाते हैं। अगले वर्ष जब वह अवधि बीत जाएगी, उलटी प्रविष्टि करके यही राशि उस वर्ष की आय बना दी जाएगी।
चारों विकल्पों की रचना ध्यान देने योग्य है : उनमें केवल दो जोड़े खाते हैं और हर जोड़ा दो बार आया है — एक बार सीधा, एक बार उलटा। इसलिए यहाँ खाता पहचानना आधा काम है; असली परीक्षा यह है कि कौन-सा खाता डेबिट होगा और कौन-सा क्रेडिट। ऐसे प्रश्न में हर बार दो सवाल अलग-अलग पूछिए : कौन-से दो खाते बदलेंगे, और उनमें से कौन बढ़ रहा है, कौन घट रहा है।
अन्य विकल्प क्यों गलत हैं
- (a)डेबिट लाभ और हानि खाता तथा क्रेडिट किराया खाता — यह विकल्प किराए को व्यय की तरह बरतता है, जबकि प्रश्न में किराया प्राप्त हुआ है, दिया नहीं गया। लाभ और हानि खाते को डेबिट करके किराया खाता क्रेडिट करना उस स्थिति की प्रविष्टि है जिसमें किराया एक व्यय हो और उसे वर्ष के अंत में लाभ-हानि खाते में ले जाया जा रहा हो। यहाँ न किराया व्यय है, न यह अंतरण की प्रविष्टि है — प्रश्न समायोजन प्रविष्टि माँगता है, यानी वह प्रविष्टि जो अंतिम खाते बनाने से पहले आँकड़े को सही अवधि पर बिठाती है। इसके अलावा इस विकल्प में अग्रिम राशि के लिए कोई अलग खाता है ही नहीं, इसलिए दायित्व कहीं दर्ज नहीं होता और चिट्ठा अधूरा रह जाता है। जिस प्रविष्टि में अनुपार्जित आय का खाता ही न हो, वह अग्रिम प्राप्ति का समायोजन नहीं कर सकती।
- (c)डेबिट अग्रिम किराया प्राप्ति खाता तथा क्रेडिट किराया प्राप्ति खाता — यह विकल्प सही प्रविष्टि का ठीक उल्टा है — वही दो खाते, पर डेबिट और क्रेडिट आपस में बदले हुए। इसका अर्थ होगा कि अग्रिम किराया प्राप्ति का दायित्व घटाया जा रहा है और किराया प्राप्ति की आय बढ़ाई जा रही है। यह प्रविष्टि अपने आप में निरर्थक नहीं है : वह अगली अवधि में की जाती है, जब वह अवधि बीत जाने पर अनुपार्जित आय सचमुच कमाई हुई आय बन जाती है। पर इस वर्ष, जिस वर्ष में राशि अग्रिम मिली है, यह प्रविष्टि उल्टी दिशा में काम करती है — वह उसी ₹ 2,000 को इस वर्ष की आय में दोबारा जोड़ देती और उपार्जन की मान्यता का ठीक उलटा कर देती। समय का यह भेद ही इस विकल्प को यहाँ ग़लत बनाता है, और यही कारण है कि ऐसे प्रश्न में यह पूछना ज़रूरी है कि प्रविष्टि किस वर्ष की है।
- (d)डेबिट किराया खाता तथा क्रेडिट लाभ और हानि खाता — यह विकल्प भी दो खातों को उलटकर बनाया गया है, और यह विकल्प (a) का दर्पण-प्रतिबिंब है। किराया खाता डेबिट करके लाभ और हानि खाता क्रेडिट करना वस्तुतः वर्ष के अंत में किराया-आय को लाभ-हानि खाते में ले जाने की अंतरण प्रविष्टि है — नाममात्र खाते को बंद करने की सामान्य कार्रवाई। वह अपनी जगह ठीक है, पर वह समायोजन प्रविष्टि नहीं है। क्रम भी ध्यान रखिए : पहले समायोजन होते हैं और तब आय-व्यय के खाते लाभ-हानि खाते में जाते हैं, इसलिए यह प्रविष्टि उस प्रविष्टि के बाद आती है जिसे प्रश्न पूछ रहा है। यहाँ भी अग्रिम राशि के लिए कोई दायित्व-खाता नहीं बनता, इसलिए अनुपार्जित ₹ 2,000 इस वर्ष की आय में ही गिने रह जाते और चिट्ठे में उनका कोई निशान न होता।
अवधारणा
समायोजन प्रविष्टियाँ लेखांकन की उस मान्यता से निकलती हैं जिसे उपार्जन कहा जाता है : आय और व्यय उस अवधि में गिने जाते हैं जिसकी वे हैं, न कि उस अवधि में जब रोकड़ का लेन-देन हुआ। रोकड़ का आना-जाना और आय-व्यय का बनना दो अलग घटनाएँ हैं, और वर्ष के अंत में उनके बीच का अंतर पाटना पड़ता है।
इसी से चार परिचित जोड़े बनते हैं। पहला, बकाया व्यय : सेवा ली जा चुकी है, भुगतान बाक़ी है — व्यय बढ़ता है और दायित्व बनता है। दूसरा, पूर्वदत्त व्यय : भुगतान हो चुका है, सेवा अगली अवधि की है — व्यय घटता है और परिसंपत्ति बनती है। तीसरा, उपार्जित आय : आय बन चुकी है, राशि मिलनी बाक़ी है — आय बढ़ती है और परिसंपत्ति बनती है। चौथा, अग्रिम प्राप्त आय : राशि मिल चुकी है, अवधि अगली है — आय घटती है और दायित्व बनता है। यह प्रश्न ठीक चौथे जोड़े का है।
चारों में एक ही तर्क दोहराया जाता है, और उसे दो पंक्तियों में रखा जा सकता है। पहली : आय का खाता क्रेडिट शेष रखता है, इसलिए आय घटानी हो तो उसे डेबिट कीजिए; व्यय का खाता डेबिट शेष रखता है, इसलिए व्यय घटाना हो तो उसे क्रेडिट कीजिए। दूसरी : जो राशि हटाई गई वह ग़ायब नहीं होती — वह या तो परिसंपत्ति बनती है या दायित्व, और उसी रूप में चिट्ठे में चली जाती है।
अग्रिम प्राप्त आय को अनुपार्जित आय भी कहते हैं। पारंपरिक वर्गीकरण में यह प्रतिनिधि व्यक्तिगत खाता है, क्योंकि वह उस व्यक्ति का प्रतिनिधित्व करता है जिसे सेवा देना अभी शेष है।
इस प्रश्न की रचना पूरी तरह दिशा पर टिकी है। चारों विकल्पों में केवल दो जोड़े खाते हैं और हर जोड़ा दो बार छपा है — एक बार सीधा और एक बार उलटा। इसलिए जो अभ्यर्थी केवल खातों के नाम पहचानकर उत्तर चुनता है, उसके पास पचास प्रतिशत से अधिक कुछ नहीं बचता।
यही कारण है कि ऐसे प्रश्न में विकल्प के दोनों हिस्सों को उसी क्रम में पढ़ना ज़रूरी है जिस क्रम में वे छपे हैं। पहले पद में डेबिट होने वाला खाता है और दूसरे में क्रेडिट होने वाला; दोनों को आपस में बदल देने से अर्थ पलट जाता है। पृष्ठ पर दोनों पद 'तथा' से जुड़े हैं, और तीन विकल्प दूसरी पंक्ति तक चले गए हैं, जिससे जल्दबाज़ी में दूसरा आधा छूट जाने का ख़तरा और बढ़ जाता है।
राशि की भूमिका पर भी ध्यान दीजिए : ₹ 2,000 यहाँ केवल स्थिति बताने के लिए है, गणना के लिए नहीं। चारों विकल्पों में कोई अंक नहीं है, इसलिए राशि का काम इतना ही है कि वह प्रश्न को ठोस बना दे। ऐसे प्रश्न में अंक देखकर गणना खोजने लगना समय की हानि है।
मुख्य तथ्य
- अग्रिम प्राप्त किराए के लिए समायोजन प्रविष्टि है — किराया प्राप्ति खाता डेबिट, अग्रिम किराया प्राप्ति खाता क्रेडिट; इससे इस वर्ष की आय घटती है और उतना ही दायित्व खड़ा हो जाता है।
- अग्रिम प्राप्त आय को अनुपार्जित आय कहते हैं; वह चिट्ठे के दायित्व पक्ष में दिखती है और लाभ-हानि खाते में संबंधित आय में से घटाकर दिखाई जाती है।
- उपार्जन की मान्यता के अनुसार आय और व्यय उसी अवधि में गिने जाते हैं जिसकी वे हैं, चाहे रोकड़ पहले आई हो या बाद में — सब समायोजन प्रविष्टियाँ इसी एक मान्यता से निकलती हैं।
- आय घटानी हो तो आय-खाते को डेबिट कीजिए और व्यय घटाना हो तो व्यय-खाते को क्रेडिट, क्योंकि आय का सामान्य शेष क्रेडिट होता है और व्यय का डेबिट; यही नियम चारों समायोजन-जोड़ों में दोहराया जाता है।
- अगली अवधि में अनुपार्जित आय कमाई हुई आय बन जाती है और तब उलटी प्रविष्टि की जाती है — अग्रिम किराया प्राप्ति खाता डेबिट और किराया प्राप्ति खाता क्रेडिट।
आगे की तैयारी
सामान्य भ्रम
- विकल्प का केवल पहला आधा पढ़कर उत्तर चुन लेना; यहाँ दो विकल्प एक ही जोड़ी खातों को उलटकर बनाए गए हैं और भेद केवल दिशा का है।
- अगली अवधि में की जाने वाली उलटी प्रविष्टि को इसी वर्ष की समायोजन प्रविष्टि मान लेना; दोनों प्रविष्टियाँ अलग-अलग वर्षों की हैं।
- अंतरण प्रविष्टि और समायोजन प्रविष्टि को एक समझ लेना; समायोजन पहले होता है, लाभ-हानि खाते में अंतरण उसके बाद।
समायोजन पर प्रश्न तीन रूपों में आते हैं। पहला रूप यही है — स्थिति देकर प्रविष्टि पूछना, और विकल्पों में वही खाते उलट-पलट कर रख देना। यहाँ बचाव का एक ही तरीक़ा है : प्रविष्टि पहले अपने मन में बना लीजिए, फिर विकल्पों में ढूँढ़िए। पहले विकल्प पढ़कर उनमें से चुनने की कोशिश करना इसी साँचे में सबसे अधिक भूल कराता है।
दूसरा रूप स्थान का है : कोई मद देकर पूछना कि वह चिट्ठे में कहाँ आएगी या लाभ-हानि खाते में कैसे दिखेगी। इसी परिवार के एक पहले के पेपर में 'बकाया किराया' का वर्गीकरण पूछा गया था और उसकी आधिकारिक कुंजी उसे प्रतिनिधि व्यक्तिगत खाता बताती है — वही वर्ग जिसमें अग्रिम प्राप्त किराया भी आता है।
तीसरा रूप मान्यता का है : कौन-सी मान्यता किस व्यवहार को जन्म देती है। लेखा मानक 1 की तीन मूलभूत मान्यताओं में उपार्जन एक है, और वह इसी परिवार में सीधे पूछी जा चुकी है। तैयारी में तीनों रूपों को एक साथ जोड़कर देखिए, क्योंकि वे एक ही समझ के तीन चेहरे हैं।
संबंधित PYQ
EPFO_EOAO_2023_Q45'Outstanding rent' may be classified as :
- (a) Natural personal account
- (b) Representative personal account
- (c) Real account
- (d) Nominal account
उत्तर(b) Representative personal account
'बकाया किराया' का वर्गीकरण पूछने वाला प्रश्न, जिसकी आधिकारिक कुंजी उसे प्रतिनिधि व्यक्तिगत खाता बताती है — अग्रिम प्राप्त किराया भी उसी वर्ग में आता है।
EPFO_APFC_2023_Q42According to the Accounting Standard–1, which of the following are the fundamental accounting assumptions?
- (a) Going Concern, Consistency, Accrual
- (b) Going Concern, Money Measurement, Conservatism
- (c) Going Concern, Consistency, Conservatism
- (d) Going Concern, Accounting Period, Accrual
उत्तर(a) Going Concern, Consistency, Accrual
लेखा मानक 1 की मूलभूत लेखांकन मान्यताएँ पूछने वाला प्रश्न, जिसकी कुंजी में उपार्जन भी है — वही मान्यता जिससे यह समायोजन प्रविष्टि निकलती है।
EPFO_EOAO_2020_Q107What is the underlying accounting concept that supports no anticipation of profits but provision for all possible losses ?
- (a) Matching
- (b) Materiality
- (c) Consistency
- (d) Conservatism
उत्तर(d) Conservatism
वह लेखांकन धारणा पूछने वाला प्रश्न जो लाभ का पूर्वानुमान नहीं करने देती पर संभावित हानियों के लिए प्रावधान कराती है — अंतिम खाते बनाते समय लगने वाली दूसरी बड़ी कसौटी।
अभ्यास
- practice — not a real PYQ
वर्ष के अंत में ₹ 5,000 का किराया प्राप्त होना शेष है, यद्यपि उसकी अवधि बीत चुकी है । इसके लिए समायोजन जर्नल प्रविष्टि क्या होगी ?
- (a)डेबिट किराया प्राप्ति खाता तथा क्रेडिट उपार्जित किराया खाता
- (b)डेबिट उपार्जित किराया खाता तथा क्रेडिट किराया प्राप्ति खाता
- (c)डेबिट लाभ और हानि खाता तथा क्रेडिट उपार्जित किराया खाता
- (d)डेबिट रोकड़ खाता तथा क्रेडिट किराया प्राप्ति खाता
उत्तर(b) डेबिट उपार्जित किराया खाता तथा क्रेडिट किराया प्राप्ति खाता — अवधि बीत चुकी है इसलिए आय बन गई और उसे क्रेडिट किया जाएगा, तथा राशि अभी मिलनी है इसलिए वह परिसंपत्ति है और उसका खाता डेबिट होगा; रोकड़ अभी आई नहीं, इसलिए रोकड़ खाता इसमें नहीं आता।
- practice — not a real PYQ
अग्रिम प्राप्त किराया अंतिम खातों में किस प्रकार दिखाया जाएगा ?
- (a)चिट्ठे के परिसंपत्ति पक्ष में
- (b)चिट्ठे के दायित्व पक्ष में
- (c)व्यापार खाते के डेबिट पक्ष में
- (d)लाभ और हानि खाते के डेबिट पक्ष में
उत्तर(b) चिट्ठे के दायित्व पक्ष में — यह अनुपार्जित आय है, यानी अगली अवधि की सेवा देने का दायित्व, इसलिए वह दायित्व पक्ष में आती है और साथ ही लाभ-हानि खाते में किराया-आय में से घटा दी जाती है।