निम्नलिखित में से कौन-सा सही है ?
- (a)प्रचालन लाभ = निवल लाभ – ग़ैर-प्रचालन व्यय – ग़ैर-प्रचालन आय
- (b)प्रचालन लाभ = निवल लाभ + ग़ैर-प्रचालन व्यय + ग़ैर-प्रचालन आय
- (c)प्रचालन लाभ = निवल लाभ + ग़ैर-प्रचालन व्यय – ग़ैर-प्रचालन आय
- (d)प्रचालन लाभ = निवल लाभ – ग़ैर-प्रचालन व्यय + ग़ैर-प्रचालन आय
उत्तर
क्यों
सही उत्तर — C, (c) प्रचालन लाभ = निवल लाभ + ग़ैर-प्रचालन व्यय – ग़ैर-प्रचालन आय — यह प्रचालन लाभ और निवल लाभ के बीच का मानक संबंध है, और चारों विकल्पों में केवल इसी के दोनों चिह्न सही दिशा में लगे हैं।
संबंध की जड़ यह है कि निवल लाभ प्रचालन लाभ से किस तरह निकलता है। प्रचालन लाभ व्यवसाय की अपनी नियमित गतिविधि से कमाया गया लाभ है — सकल लाभ में से कार्यालय, प्रशासन, बिक्री और वितरण के व्यय घटाकर। उसके बाद कुछ ऐसी मदें जुड़ती हैं जिनका मुख्य व्यवसाय से कोई संबंध नहीं होता : एक ओर ग़ैर-प्रचालन व्यय, जैसे ऋणपत्रों पर ब्याज या पुरानी परिसंपत्ति बेचने पर हुई हानि; दूसरी ओर ग़ैर-प्रचालन आय, जैसे निवेश पर मिला ब्याज या लाभांश, या परिसंपत्ति बेचने पर हुआ लाभ। इन्हें लगाने पर निवल लाभ बनता है :
निवल लाभ = प्रचालन लाभ – ग़ैर-प्रचालन व्यय + ग़ैर-प्रचालन आय।
प्रश्न इसी समीकरण को उलटकर पूछता है। प्रचालन लाभ को अकेला करने पर दोनों चिह्न पलट जाते हैं : जो व्यय घटाया गया था उसे वापस जोड़ना पड़ेगा, और जो आय जोड़ी गई थी उसे वापस घटाना पड़ेगा। इसलिए प्रचालन लाभ = निवल लाभ + ग़ैर-प्रचालन व्यय – ग़ैर-प्रचालन आय।
अंकों से देखिए। मान लीजिए सकल लाभ ₹ 4,00,000 है और कार्यालय तथा बिक्री के व्यय ₹ 1,50,000; तब प्रचालन लाभ ₹ 2,50,000 हुआ। अब ग़ैर-प्रचालन व्यय ₹ 30,000 घटाइए और ग़ैर-प्रचालन आय ₹ 18,000 जोड़िए — निवल लाभ ₹ 2,38,000 निकलता है। अब उल्टी दिशा में चलिए : 2,38,000 + 30,000 – 18,000 = 2,50,000, यानी वही प्रचालन लाभ वापस मिल गया। यही जाँच इस प्रश्न का सबसे भरोसेमंद तरीक़ा है — कोई भी अंक मान लीजिए, दोनों दिशाओं में चलिए, और देखिए कि कौन-सा चिह्न-जोड़ा आपको वापस उसी संख्या पर लाता है।
एक सामान्य नियम भी याद रखने योग्य है : किसी समीकरण के पक्ष बदलते समय हर मद का चिह्न बदल जाता है। यहाँ यही एक नियम पूरे प्रश्न का उत्तर दे देता है।
अन्य विकल्प क्यों गलत हैं
- (a)प्रचालन लाभ = निवल लाभ – ग़ैर-प्रचालन व्यय – ग़ैर-प्रचालन आय — इस विकल्प में दोनों चिह्न ऋण के हैं, इसलिए यह ग़ैर-प्रचालन व्यय और ग़ैर-प्रचालन आय — दोनों को निवल लाभ में से घटा देता है। यह दो में से एक भी दिशा में सही नहीं है। ग़ैर-प्रचालन व्यय पहले ही घटाया जा चुका है, इसलिए उसे दोबारा घटाना उसी मद को दो बार काटना है; और ग़ैर-प्रचालन आय को घटाना अकेले सही होता, पर वह भी तभी जब व्यय को जोड़ा गया हो। ऊपर वाले अंकों पर परखिए : 2,38,000 – 30,000 – 18,000 = 1,90,000, जो प्रचालन लाभ ₹ 2,50,000 से बहुत नीचे है। यह विकल्प उस अभ्यर्थी को खींचता है जो सोचता है कि प्रचालन लाभ निकालने के लिए 'ग़ैर-प्रचालन' शब्द वाली हर मद हटा देनी है — पर हटाने का अर्थ हर बार घटाना नहीं होता; जो पहले घटाया गया था उसे हटाने के लिए जोड़ना पड़ता है।
- (b)प्रचालन लाभ = निवल लाभ + ग़ैर-प्रचालन व्यय + ग़ैर-प्रचालन आय — इसमें दोनों चिह्न धन के हैं, इसलिए यह दोनों मदों को निवल लाभ में जोड़ देता है। इसका पहला आधा हिस्सा सही है — ग़ैर-प्रचालन व्यय वास्तव में वापस जोड़ना पड़ता है — पर दूसरा आधा उलटा है। ग़ैर-प्रचालन आय निवल लाभ में पहले से शामिल है, इसलिए उसे फिर से जोड़ना उसी आय को दो बार गिनना है। अंकों से : 2,38,000 + 30,000 + 18,000 = 2,86,000, जो सही प्रचालन लाभ से ₹ 36,000 अधिक है — ठीक उतना ही जितनी ग़ैर-प्रचालन आय दो बार गिनी गई। यही इस प्रश्न का सबसे आकर्षक ग़लत विकल्प है, क्योंकि आधा सही होने से पूरा सही जान पड़ता है। ऐसे विकल्पों में दोनों चिह्न अलग-अलग जाँचिए, एक साथ नहीं।
- (d)प्रचालन लाभ = निवल लाभ – ग़ैर-प्रचालन व्यय + ग़ैर-प्रचालन आय — यह विकल्प सही संबंध का ठीक दर्पण-प्रतिबिंब है : इसके चिह्न वही हैं जो निवल लाभ निकालने के समय लगते हैं, पर समीकरण के दोनों पक्ष आपस में बदल गए हैं। निवल लाभ = प्रचालन लाभ – ग़ैर-प्रचालन व्यय + ग़ैर-प्रचालन आय — यह पंक्ति सही है; पर उसमें 'निवल लाभ' और 'प्रचालन लाभ' की जगह बदल देने से पंक्ति ग़लत हो जाती है, क्योंकि पक्ष बदलते समय चिह्न भी बदलने चाहिए थे। अंकों से : 2,38,000 – 30,000 + 18,000 = 2,26,000, जो प्रचालन लाभ नहीं है। इस विकल्प की चूक सबसे सूक्ष्म है, क्योंकि यह याद की हुई सही पंक्ति की तरह दिखता है। बचाव का तरीक़ा यही है कि रटी हुई पंक्ति लिखने से पहले देख लीजिए कि प्रश्न किस राशि को अकेला करने को कह रहा है।
अवधारणा
लाभ को मापने के कई स्तर होते हैं, और यह प्रश्न उनमें से दो के बीच के पुल पर खड़ा है।
पहला स्तर सकल लाभ है : बिक्री में से बेचे गए माल की लागत घटाकर जो बचे। यह केवल क्रय और विक्रय के अंतर को देखता है और व्यापार खाते में निकलता है।
दूसरा स्तर प्रचालन लाभ है : सकल लाभ में से वे सब व्यय घटाकर जो व्यवसाय को चलाने के लिए नियमित रूप से करने पड़ते हैं — कार्यालय और प्रशासन के व्यय, बिक्री और वितरण के व्यय। यह वह लाभ है जो व्यवसाय अपनी मुख्य गतिविधि से कमाता है, इसलिए दो कंपनियों की तुलना करते समय यही सबसे उपयोगी अंक माना जाता है।
तीसरा स्तर निवल लाभ है : प्रचालन लाभ में वे मदें लगाकर जिनका मुख्य गतिविधि से संबंध नहीं है। ग़ैर-प्रचालन व्यय में ऋणपत्रों पर ब्याज, परिसंपत्ति बेचने पर हानि, राइट-ऑफ़ की गई मदें आती हैं; ग़ैर-प्रचालन आय में निवेश पर ब्याज और लाभांश, किराए से आय, परिसंपत्ति बेचने पर लाभ आते हैं।
इसी क्रम से यह भी समझ आता है कि दोनों दिशाओं के सूत्र क्यों अलग दिखते हैं। नीचे से ऊपर जाना हो — यानी निवल लाभ से प्रचालन लाभ निकालना हो — तो जो घटाया गया था उसे जोड़ना पड़ेगा और जो जोड़ा गया था उसे घटाना। ऊपर से नीचे जाना हो तो उल्टा। यह बीजगणित का साधारण नियम है, पर परीक्षा में इसी पर सबसे अधिक चूक होती है, क्योंकि अभ्यर्थी सूत्र को रटता है, निकालता नहीं।
इस पेपर के लेखाशास्त्र खंड में यह अकेला प्रश्न है जिसके चारों विकल्प सूत्र हैं। चारों में पद बिलकुल एक जैसे हैं — प्रचालन लाभ, निवल लाभ, ग़ैर-प्रचालन व्यय, ग़ैर-प्रचालन आय — और अंतर केवल दो चिह्नों का है। इसलिए यहाँ पढ़ने की गति सबसे बड़ा ख़तरा है : विकल्प देखने में एक जैसे लगते हैं और आँख उन पर से फिसल जाती है।
ऐसे प्रश्न में सबसे सुरक्षित तरीक़ा सूत्र याद करना नहीं, अंक रखकर जाँचना है। कोई भी सुविधाजनक संख्या लीजिए, नीचे की दिशा में चलकर निवल लाभ निकालिए, फिर चारों विकल्पों को उसी निवल लाभ पर लगाकर देखिए कि कौन-सा आपको वापस उसी प्रचालन लाभ पर लाता है। इसमें आधा मिनट लगता है और अनुमान की गुंजाइश शून्य हो जाती है।
व्यावहारिक दृष्टि से भी यह भेद महत्त्व रखता है। किसी कंपनी का निवल लाभ किसी एक वर्ष परिसंपत्ति बेचने से अचानक बढ़ सकता है, जबकि उसका मुख्य कारोबार बैठ रहा हो। इसीलिए विश्लेषण में प्रचालन लाभ अलग से देखा जाता है — वह बताता है कि व्यवसाय अपने असली काम से क्या कमा रहा है।
मुख्य तथ्य
- प्रचालन लाभ = निवल लाभ + ग़ैर-प्रचालन व्यय – ग़ैर-प्रचालन आय; और इसी का उलटा रूप है निवल लाभ = प्रचालन लाभ – ग़ैर-प्रचालन व्यय + ग़ैर-प्रचालन आय। दोनों एक ही संबंध के दो पाठ हैं।
- प्रचालन लाभ का दूसरा रास्ता सकल लाभ से होकर जाता है : सकल लाभ में से कार्यालय, प्रशासन, बिक्री और वितरण के व्यय घटाने पर प्रचालन लाभ मिलता है, और सकल लाभ बिक्री में से बेचे गए माल की लागत घटाकर।
- ग़ैर-प्रचालन व्यय के उदाहरण — ऋणपत्रों पर ब्याज, परिसंपत्ति बेचने पर हुई हानि, राइट-ऑफ़ की गई मदें; ये मुख्य कारोबार से नहीं, वित्त-व्यवस्था या इतर सौदों से आते हैं।
- ग़ैर-प्रचालन आय के उदाहरण — निवेश पर मिला ब्याज और लाभांश, किराए से आय, परिसंपत्ति बेचने पर हुआ लाभ; ये निवल लाभ बढ़ाते हैं पर व्यवसाय की मुख्य कमाई की शक्ति नहीं दिखाते।
- किसी समीकरण में पक्ष बदलते ही हर मद का चिह्न बदल जाता है — यही एक नियम इस प्रकार के सब प्रश्नों का उत्तर दे देता है, बशर्ते यह देख लिया जाए कि किस राशि को अकेला करना है।
आगे की तैयारी
सामान्य भ्रम
- दोनों 'ग़ैर-प्रचालन' मदों के साथ एक ही व्यवहार कर देना; एक जुड़ती है और दूसरी घटती है, और यही पूरे प्रश्न का भेद है।
- निवल लाभ निकालने वाली सही पंक्ति को ज्यों-का-त्यों उलटकर लिख देना; पक्ष बदलने पर चिह्न भी बदलने चाहिए।
- विकल्पों को देखने में एक जैसा मानकर आँख से पढ़ लेना; यहाँ चारों के पद समान हैं और पूरा भेद दो चिह्नों में है।
यह विषय तीन रूपों में लौटता है। पहला रूप यही है — सूत्र के चार पाठ देकर सही पाठ छाँटना। ऐसे प्रश्न में अंक रखकर जाँचना सबसे तेज़ और सबसे भरोसेमंद तरीक़ा है।
दूसरा रूप संख्यात्मक है : निवल लाभ, ग़ैर-प्रचालन व्यय और ग़ैर-प्रचालन आय देकर प्रचालन लाभ पूछना, या उल्टी दिशा में। इसी परिवार के एक पहले के पेपर में सकल लाभ की परिभाषा सीधे पूछी जा चुकी है और एक अन्य में लागत पर सकल लाभ की दर देकर राशि निकालने को कहा गया था — यानी लाभ के स्तरों पर संख्यात्मक अभ्यास इस परीक्षा की नियमित माँग है।
तीसरा रूप वर्गीकरण का है : कोई मद देकर पूछना कि वह प्रचालन है या ग़ैर-प्रचालन। यहाँ सबसे अधिक चूक परिसंपत्ति बेचने पर हुए लाभ, प्राप्त ब्याज और प्राप्त किराए पर होती है। तैयारी में इसलिए सूत्र के साथ मदों की एक छोटी सूची भी बना लीजिए।
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अभ्यास
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किसी फर्म का निवल लाभ ₹ 2,38,000 है । उसके ग़ैर-प्रचालन व्यय ₹ 30,000 और ग़ैर-प्रचालन आय ₹ 18,000 हैं । फर्म का प्रचालन लाभ कितना होगा ?
- (a)₹ 1,90,000
- (b)₹ 2,26,000
- (c)₹ 2,50,000
- (d)₹ 2,86,000
उत्तर(c) ₹ 2,50,000 — प्रचालन लाभ = निवल लाभ + ग़ैर-प्रचालन व्यय – ग़ैर-प्रचालन आय = 2,38,000 + 30,000 – 18,000 = 2,50,000; शेष तीनों उत्तर चिह्नों के तीन अन्य जोड़ों से निकलते हैं।
- practice — not a real PYQ
किसी फर्म का प्रचालन लाभ ₹ 3,00,000 है, ग़ैर-प्रचालन व्यय ₹ 40,000 हैं और ग़ैर-प्रचालन आय ₹ 25,000 है । फर्म का निवल लाभ कितना होगा ?
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उत्तर(b) ₹ 2,85,000 — निवल लाभ = प्रचालन लाभ – ग़ैर-प्रचालन व्यय + ग़ैर-प्रचालन आय = 3,00,000 – 40,000 + 25,000 = 2,85,000; यही संबंध उलटी दिशा में चलने पर प्रचालन लाभ वापस ₹ 3,00,000 देता है।