निम्नलिखित में से कौन-सा कथन प्रसिद्ध ढोकरा कला के लिए सही नहीं है ?
- (a)यह कला बैतूल की भारेवा आदिवासी समुदाय से संबंधित है ।
- (b)यह एक अलौह धातु ढलाई कला है ।
- (c)यह विवाह समारोह से जुड़ी एक सजावटी कपड़ा कला है ।
- (d)सभी कथन सही हैं ।
सही उत्तर — (C) या (D) (दोनों स्वीकार्य)। कथन C ढोकरा के बारे में तथ्यात्मक रूप से गलत है: यह एक धातु-ढलाई शिल्प है, न कि 'सजावटी कपड़ा कला', और यह विशेष रूप से विवाह समारोह से जुड़ी भी नहीं है — इसलिए C ही वह 'सही नहीं' कथन है। परंतु चूँकि C असत्य है, इसलिए कथन D का यह दावा कि 'सभी कथन सही हैं' भी असत्य हो जाता है, क्योंकि A, B और C सभी सही नहीं हैं। इस कारण D स्वयं भी एक 'सही नहीं' कथन बन जाता है, यही वजह है कि आयोग ने 'कौन-सा कथन सही नहीं है' पूछे गए इस प्रश्न के लिए C और D दोनों को स्वीकार किया।
- (a)यह कला बैतूल की भारेवा आदिवासी समुदाय से संबंधित है । — ढोकरा कला के बारे में यह एक सत्य कथन है, इसलिए यह 'सही नहीं' कथन खोजने वाले प्रश्न का उत्तर नहीं हो सकता।
- (b)यह एक अलौह धातु ढलाई कला है । — यह भी एक सत्य कथन है — ढोकरा पीतल व कांसे जैसी अलौह धातुओं में मोम-निष्कासन (लॉस्ट-वैक्स) ढलाई है — इसलिए यह भी खोजे जा रहे 'सही नहीं' कथन में फिट नहीं बैठता।
ढोकरा (जिसे भराई काम भी कहा जाता है) एक प्राचीन अलौह धातु-ढलाई शिल्प है जिसमें लॉस्ट-वैक्स (सायर पेर्दु) तकनीक का प्रयोग होता है: मोम के एक मॉडल को मिट्टी से लेपित किया जाता है, छेद के माध्यम से मोम को पिघलाकर निकाला जाता है, और परिणामी साँचे में पिघला हुआ पीतल या कांसा डालकर अंतिम वस्तु ढाली जाती है। मध्य प्रदेश में यह मुख्यतः भारेवा समुदाय द्वारा किया जाता है, जो बैतूल जिले में एक गोंड उप-जनजाति है।
यह एक क्लासिक 'असत्य कथन पहचानें' प्रश्न है, जिसमें 'सभी कथन सही हैं' जैसा एक 'पलायन विकल्प' भी है। जब पहले के किसी कथन (C) को असत्य पाया जाता है, तो 'सभी सही' वाला विकल्प (D) भी असत्य हो जाता है — इसलिए दोनों वैध रूप से 'सही नहीं' प्रश्न का उत्तर हो सकते हैं। इस दोहरे-निषेध जाल की संरचना पर ध्यान दें।
- ढोकरा/भराई काम अलौह धातु (पीतल/कांसा) की लॉस्ट-वैक्स ढलाई है — यह कोई कपड़ा या वस्त्र कला नहीं है।
- यह मध्य प्रदेश के बैतूल जिले के भारेवा समुदाय, जो एक गोंड उप-जनजाति है, द्वारा किया जाता है।
- प्रमुख उत्पादों में घंटियाँ, दीये, पशु-पक्षी आकृतियाँ, शिवलिंग व सजावटी बर्तन शामिल हैं।
- लॉस्ट-वैक्स तकनीक हज़ारों वर्ष पुरानी है और पश्चिम बंगाल व ओडिशा के आदिवासी शिल्पकार समुदायों द्वारा भी अपनाई जाती है।
- 'सजावटी' और 'समारोह' जैसे शब्दों के वस्त्र-संबंधी लगने के कारण ढोकरा को कपड़ा/वस्त्र शिल्प मान लेना
- यह न देख पाना कि एक असत्य 'सभी कथन सही हैं' विकल्प स्वयं भी 'सही नहीं' प्रश्न का वैध उत्तर हो सकता है
MPPSC अक्सर मध्य प्रदेश के आदिवासी हस्तशिल्प (कला ↔ समुदाय ↔ जिला) का परीक्षण करता है, प्रायः इसी 'सही नहीं' तथा 'सभी उपर्युक्त' प्रारूप में — अंतिम विकल्प का निर्णय करने से पहले पहले के प्रत्येक कथन का सावधानीपूर्वक मूल्यांकन करें।
इस प्रश्न से सीधे संबंधित कोई पूर्व PYQ उपलब्ध नहीं।
- अभ्यास — वास्तविक PYQ नहीं
ढोकरा कला में प्रयुक्त लॉस्ट-वैक्स (सायर पेर्दु) तकनीक किस श्रेणी की धातु से वस्तुएँ बनाती है ?
- (a)अलौह धातुएँ (पीतल/कांसा)
- (b)लौह धातुएँ (लोहा/इस्पात)
- (c)केवल कीमती धातुएँ (सोना/चाँदी)
- (d)केवल एल्युमिनियम मिश्र धातु
उत्तर(a) अलौह धातुएँ — ढोकरा लॉस्ट-वैक्स विधि से पीतल/कांसा ढालता है।
- अभ्यास — वास्तविक PYQ नहीं
मध्य प्रदेश के बैतूल जिले में ढोकरा धातु शिल्प के लिए प्रसिद्ध भारेवा समुदाय, किसकी उप-जनजाति है ?
- (a)गोंड
- (b)भील
- (c)बैगा
- (d)कोरकू
उत्तर(a) गोंड — भारेवा एक गोंड उप-जनजाति है।